पीलूपुरा की पटरियों पर फिर आ सकते है गुर्जर
बर्ष 2007 के मई माह में गुर्जरों ने पाटौली में चक्का जाम किया. फिर 2008 के मई माह में पीलूपुरा में रेल की पटरियों को उखाड फेंका. एक बार फिर 2010 के चालू मई माह में गुर्जर पीलूपुरा में रेल की पटरियों पर जम कर बैठ सकते है. सोमवार 3 मई को पीलपुरा के पास महरावर में विशाल महापंचायत रखी है. उसके बाद उत्पन्न हालातों पर ही आगे की कार्यवाही करने की बात गुर्जर कह रहे है.
3 मई की महापंचायत बहुत कुछ सुनियोजित है. इसी दिन राजस्थान उच्च न्यायालय में इस मामले की सुनवाई है. वही न्यायालय के आदेशों के अनुसार बनी इसरानी कमैटी भी इसी दिन अपनी रिपोर्ट देगी. महापंचायत स्थल पर मौजूद गुर्जर समाज के लोग प्रशासन को यही भरोसा दिला रहे है कि शाम पाँच बजे तक तो भीड पर हमारा नियंत्रण रहेगा. इस बीच यदि जयपुर से कोई शुभ संकेत मिल जाता है तो सब कुछ शाति से निपट जायेगा. और अगर संकेत अच्छे नहीं मिले तो हमारा कोई नियंत्रण नहीं रह जायेगा. गुर्जर समाज की इसी बात ने प्रशासन के हाथ पैर फुला रखे है. महरावर के महापंचायत स्थल ये एक किलोमीटर की ही दूरी पर है पीलूपुरा. सुरक्षा बलों की दर्जनों कंपनियों ने आस पास के ईलाकों में डेरा डार लिया है.
लगभग एक दशक से आरक्षण की माँग को लेकर संघर्ष कर रहे गुर्जर समाज के लोग इस बार आर पार की लडाई लडने की बात कर रहे है. महरावर में पंचायत स्थल पर व्यवस्थाओं को देख रहे दीवान सिंह गुर्जर का कहना है कि सरकार को देना है तो देदे. और नहीं देना है तो मना कर दे. अब न कोई कमैटी बनेगी. और नहीं कोई वार्ता होगी. महापंचायत में पाँच बजे तक कोई शुभ समाचार आ गया तो अच्छा है और नहीं तो फिर देव नारायण भगवान को जो कराना होगा वही होगा.
बर्ष 2010 में मार्च महीने से गुर्जर समाज के बीच आन्दोलन को लेकर सरगर्मियाँ चल रही है. इस दौरान दर्जनों स्थानों पर समाज के लोग महापडाव डाले पडे हुये है. अप्रेल माह में राजधानी जयपुर की ओर कूच करने की योजना बनी थी. जिसे सरकार ने अपनी वार्ताओं की नीति से ठंडा कर दिया. दूसरी बात ये भी रही कि लोग खेत खलिहान के कामों में लगे हुये थे. मई माह के आते ही अब लोग फुरसत में आ गये है. जिससे आन्दोलन के होने के आसार बढ गये है.
गौरतलब है कि राजस्थान में गुर्जर समाज ने एसटी आरक्षण की माँग को लेकर आन्दोलन शुरू किया था. 70 सपूतो की कुर्बानियों के बाद अभी तक गुर्जरो को कुछ भी नहीं मिल पाया है. गुर्जर समाज अब पाँच प्रतिशत आरक्षण के लिए संघर्ष कर रहा है. इस बार एक बात जरूर सुनने में आ रही है. कोई पैसों को लेकर मत मर जाना. ये रानी नहीं गहलोत है किसी को चवन्नी नहीं देगा. इससे पूर्व आरक्षण आन्दोलन में मारे गये लोगों को भाजपा सरकार ने पाँच लाख रूपये और सरकारी नौकरी दी थी.



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