मम्मी मुझे पापा से मिलने दो
नागपुर। रविवार को 'फादर डे' के मौके पर कई लाड़लों ने अपने पापा को विश करते हुए उन्हें छोटे-मोटे उपहार देकर उनका दिल जीता लेकिन वहीं नागपुर के कई बच्चे और अभिभावक रविवार की सुबह रामदासपेठ स्थित लैंड्रा पार्क में उपस्थित हुए। यहां आए बच्चे अपने पापा का प्यान पाने के लिए जज साहब से गुहार लगाने की तख्ती लिए हुए थे।
वहीं अभिभावक वर्षों से अपने लाडले-लाडलियों की एक झलक नहीं पाने की कसक दिले में लिए हुए आपस में चर्चा कर रहे थे। दरअसल ये सभी लोग दहेज विरोधी कानून 498-ए के तहत पीडित पति और बच्चे थे। ये सेव इंडिया फैमिली फाऊंडेशन नागपुर शाखा के बैनर तले यहां एकत्रित होकर फादर दिवस के मौके पर सरकार और न्यालय से इस धारा के तहत चल करे मामलों में बच्चों को पिता केस साथ मिलने की छूट देने की मांग कर रहे थे।
मोहन बावेटकर ने बताया कि वे खाड़ी देश में अच्छे जॉब में थे। लेकिन घरेलू विवाद में पत्नी ने 498-ए के तहत मामला दर्ज कराया। जॉब तो गई ही। मेरी पूरी जिंदगी तबाह हो गई। साढ़े तीन साल से बेटी का चेहरा तक नहीं देखा। जब अंतिम बार बेटी का चेहरा देखा था, तब वह दो माह की थी। अब तो उसका चेहरा भी ठीक से याद नहीं। राष्ट्र परिवहन विभाग में तैनात अनिल फूल ने बताया कि उने के लिए फादर डे को कोई मायने नहीं है। जब से पत्नी ने 498-ए के तहत मामला दर्ज कराया है। तब से बेटे की सूरत देखने के लिए तरस गया है। 9 साल से बेटे की एक झलक पाने की मन में लालसा लिये कानून की कमजोरी को कोस रहा हूं।
फाऊंडेशन के नागपुर शाखा के प्रमुख राजेश बखारिया ने बताया कि नागपुर हजारों ऐसे लोग हैं जिन्होंने वर्षों से अपने बेटी-बेटे की सूरत नहीं देखी। दरअसल 498-ए के तहत चल रहे मामले में करीब 90 प्रतिशत बच्चे मां के साथ ही रहते हैं। पिता के द्वारा कोर्ट से बच्चों से मिलने की गुहार लगाने के बाद जब मां को बच्चे को उसके पिता से मिलाने के लिए कहा जाता है, करीब 70-80 प्रतिशत मामले में महिलाएं बच्चे लेकर आती ही नहीं है। वे किसी न किसी तरह का बहाना बना देती है। इसपर कोर्ट किसी तरह की कार्रवाई नहीं करती है।
बाखरिया ने बताया कि 498-ए के पीडित लोग नागपुर के फैमिली कोर्ट में गत एक माह से इस बात अभियान चला रहे थे कि फादर डे के दिन उनके बच्चों से जरूर मुलाकात कराया जाए। क्योंकि बच्चों के परवरिश के दौरान उनके मन पर मां के साथ पिता का भी महत्वपूर्ण असर पड़ता है। लेकिन इस धारा के तहत फंसे लोग बच्चों की एक झलक पाने के लिए मोहताज रहते हैं।



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Thanks
इसके अलावा समाज संक्रमण काल से गुजर रहा है। स्वार्थ एवं निजता का भाव तेजी से बढ रहा है। लोगों में आहत एवं पीडित व्यक्तियों के समर्थन में संघर्ष करने का भाव समाप्त होता जा रहा है। ऐसे में जो भी चंगुल में फंस जाता है, उसके पास घुट-घुट कर मरने के सिवा और कोई विकल्प ही नहीं है। ऐसे में क्या तो फादर्स-डे और क्या पितृत्व का भाव, ऐसे लोगों के लिये तो जीना भी अपने आप में बोझ है। ऐसा नहीं है कि पुरुषों के कारण महिलाएँ उत्पीडित नहीं हैं।
हमें दोनों पक्षों को सामने रखते हुए सन्तुलित और न्यायपूर्ण व्यवस्था के लिये जनान्दोलन चलाने ही होंगे, इसके अलावा मुझे तो कोई रास्ता नजर नहीं आता। विशेषकर इसलिये भी क्योंकि पुरुषों द्वारा निर्मित और महिलाओं द्वारा पोषित सामाजिक व्यवस्था आज कटघरे में खडी है और उच्चतम न्यायालय के स्तर पर भी केवल निर्णय हो रहे हैं, न्याय नहीं मिल पा रहा है। न्याय-व्यवस्था न मात्र अक्षम एवं भ्रष्ट है, बल्कि निष्पक्षता से पडताल की जाये तो स्वतः प्रमाणित हो जायेगा के एक ही कानून की अलग-अलग लोगों के लिये अलग-अलग और विरोधाभाषी व्याख्याएँ भी सामने आ रही हैं। जिससे न्याय के मन्दिरों की सारी कहानी समझ में आ जाती है।
अन्त में यही कहना चाहँूगा कि एक संवेदनशील विषय पर; संवेदनापूर्ण तरीके से आलेख लिखने के लिये साधुवाद और शुभकामनाएँ।
आपका-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश', सम्पादक-प्रेसपालिका (जयपुर से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र) एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) (जो दिल्ली से देश के सत्रह राज्यों में संचालित है। इस संगठन ने आज तक किसी गैर-सदस्य, या सरकार या अन्य बाहरी किसी भी व्यक्ति से एक पैसा भी अनुदान ग्रहण नहीं किया है। इसमें वर्तमान में ४३२८ आजीवन रजिस्टर्ड कार्यकर्ता सेवारत हैं।)। फोन : ०१४१-२२२२२२५ (सायं : ७ से ८) मो. ०९८२८५-०२६६६
E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in
मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!!
काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा।
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सच में इस देश को जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है। सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे।
हमें ऐसे जिन्दा लोगों की तलाश हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है।
इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है।
अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं।
आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना।
शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल-
सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! अब हम स्वयं से पूछें कि-हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे?
जो भी व्यक्ति इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :-
(सीधे नहीं जुड़ सकने वाले मित्रजन भ्रष्टाचार एवं अत्याचार से बचाव तथा निवारण हेतु उपयोगी कानूनी जानकारी/सुझाव भेज कर सहयोग कर सकते हैं)
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा
राष्ट्रीय अध्यक्ष
भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666
E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in
No words can express this agony. Thank you so so much for focusing this issues.
Regards
Vinay
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