जानवरों के मुंह मे गरीबों का गेंहू
इटावा। गरीबों का बांटे जाने वाला गेंहू का बुरा हाल अगर देखना है तो इटावा आइये जिस गेंहू को गरीबो को बांटा जाना है उस गेंहू को गाय,बैल,सुअर के अलावा गधे भी खाने मे लगे हुये है.इतना ही नहीं छुट पुट हो रही बरसात से भी यह गेहूं सड़ रहा है.
एक ओर मंहगाई ने गरीबों के मुंह से दो वक्त के निवाले को मोहताज कर रखा है वहीं सरकारी मशीनरी की लापरवाही का आलम यह है कि सैकड़ों टन अनाज को बर्बाद किया जा रहा है। कहीं भूख है तो कहीं लाचारी मगर इससे कोई सरोकार नहीं रह गया है। बुंदेलखंड में भूख से होने वाली मौतों पर राजनीति होना शुरू हो जाती है तो दोष इंद्रदेव पर दिया जाने लगता है, परंतु नौकरशाही की लापरवाही पर निगाहें ठहरतीं हीं नहीं हैं। पिछले दिनों जब हरियाणा और पंजाब में सरकारी गोदामों में सड़ रहे खाद्यान्न की जब तस्वीरें देश के सामने आईं तो चंद रोजों के लिए नौकरशाही और राजनीति में हड़कंप मचा परंतु बाद में बेशर्मी फिर उस वक्त सामने आ गई जब गरीबों के बच्चों को रात की सुकुन भरी नींद देने के लिए उपलब्ध कराने वाला गेंहू सड़ता हुआ नजर आया तो ऐसी नौकरशाही पर शर्म आने लगती है।
मानसून कभी भी दस्तक दे सकता है। उमड़ते- घुमड़ते बादल किसानों की उम्मीदों को जिंदा रखे हुए हैं तो वहीं इटावा रेलवे स्टेशन परिसर से लेकर माल गोदाम तक तकरीबन पांच सौ मीटर के दायरे में गरीबों को खाद्यान्न के रूप में वितरित करने के लिए आया गेंहू खुले आसमान तले बिखरा पड़ा है। जब इस गेंहू का पुरसा हाल लेने वाला कोई सामने नहीं आया तो इसे जानवरों ने अपने निवाले के रूप में लेना ही उपयुक्त समझा। फिर क्या था जानवरों के हुजूम एकत्र होने लगे और तीन दिनों से खुले आसमान तले बिखरे गेंहू को अपने आहार के रूप में लेने लगे।
आश्चर्यजनक पहलू यह है कि गत वर्ष ही केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने विदेशों से काफी अधिक कीमत पर विदेशों से खाद्यान्न आयात किया था। विगत दिवस भी सपा संसदीय दल के नेता डॉ. रामगोपाल यादव ने सरकारी गोदामों में सड़ने वाले खाद्यान्न पर सवाल खड़े किए थे परंतु यह सवाल भी प्रशासनिक मशीनरी की नींद नहीं उड़ा सके। पिछले दिनों हुई बारिश के दरम्यान यह गेंहू खुद को छिपाने के लिए तड़पता रहा। यह वह गेंहू था जो पिछले तीन दिन पूर्व हरियाणा से सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत जनपद को आवंटित किया गया था। इस गेंहू की सुरक्षा का दारोमदार भारतीय खाद्य निगम के अधिकारियों के हाथ में है, परंतु इसके बावजूद उसका जबाब अपने आप में आश्चर्यजनक है। वे कहते हैं कि हमारे पास पर्याप्त इंतजाम हैं परंतु बारिश हो नहीं रही है तो हम इनका प्रयोग क्यों करें। अब इनसे यदि पूछा जाए कि इंद्रदेव क्या इनके रहमोकरम पर हैं तो शायद इसका जबाब उनके पास नहीं होगा।
अब सरकारी मशीनरी की लापरवाही को लेकर सवाल उठने लगे है.इटावा वासियो ने सरकारी मशीनरी के खिलाफ कार्यवाही करने की बात कही है.पूरे का पूरा मामला सामने आने के बाद भारतीय खाद निगम के अधिकारी पल्ला झाडते हुये नजर आ रहे है. इटावा रेलवे स्टेशन पर 2 दिन से करीब 33 हजार कुंटल गेंहू पड़ा हुआ है जिसे जानवर तो खा ही रहे है दूसरे बरसात का भी ताप झोलना पड रहा है. पानी से बचाव के लिये त्रिरपाल का इंतजाम करना चाहिये लेकिन कोई इंतजाम नही किया जा रहा है ऐसा ही जानवरो के लिये भी होना चाहिये ताकि इस गेंहू को कोई नुकसान नही हो सके.



del.icio.us
Digg
एक बार फिर आपने एक achha लेख प्रस्तुत किया है. सोती हुई प्रशासनिक मशीनरी को जगाने के लिए इसी प्रकार के काम की जरूरत है. मैंने इस अनाज के गोदाम की चर्चा आपसे पहले भी की थी.
अच्छा लगा , आपने इस व्यवहारिक गड़बड़ी को उठाया. आज कानपुर में pi. ऍम . आये थे. गरीबों को बहुत उम्मीदें थीं की वो कुछ कहेंगे. पर कुछ नहीं हो सका. संवेदनाओं की कमी बहुत खराब पहलू है. आपके इस खबर में ग़रीबों के लिए भेजे जाने वाले अनाज की दुर्दशा अत्यंत निंदनीय और दुखद है. शायद मायावती और kendra सरकारों के नक़्शे में इटावा हत्या जा जा चूका है. सड़कें खोद नहीं सकते नहीं तो खोद कर कहीं और ले जा कर बिछा दी होती. बिजली तो itawa के लिए दिवास्वप्न हो गयी है. किसान और मजदूर की इस स्थिति में भी विद्रोह न करने से ऐसा लगता है की इटावा ka चिर विद्रोही स्वाभाव बदल गया है या फिर विपक्षी दल के नेताओं में अब जुझारू पण कम हो रहा है. आज यदि ७० के दशक की राजनीती होती तो ईस्ससी इटावा में इस खबर से खुनी आन्दोलन तैयार हो गया होता.
Post your comment