गए थे अमन का पैगाम देने, कर आए तिरंगे का अपमान
सीमा पार पड़ौसी मुल्क पाकिस्तान के लाहौर में बाढ़ पीडितों के सहायतार्थ भारत से गया बुद्धीजीवी वर्ग का एक दल तिरंगे का अपमान कर आया। खबर तब सुर्खियों में आई जब दल के सदस्यों की उलटा तिरंगा थामे तस्वीर अंग्रेजी के समाचार पत्र हिंदुस्तान टाईम्स के हरियाणा पृष्ठ पर तीन सितंबर के अंक में छपी।
इंडो-पाक शांति कारवां के नाम पर अमन के १० पैरोकार सीमा पार बाढ़ पीडितों की मदद के लिए गए थे। यह दल मैगससे अवार्ड विजेता संदीप पांडे की अगुवाई में पाकिस्तान गया था। जिसमें गुरदयाल सिंह शीतल व दर्शन सिंह पंजाब से, जायद अहमद शेख गुजरात से, कॉनफेडरेशन ऑफ वॉलेंटरी एसोसीएशन (कोवा) हैदराबाद से मजहर हुसैन, फिरोज हुड्डा लखनऊ, राजेश्वर दिल्ली से, फिरोज मिट्ठीबोरवाला व मोनिका वाही मुंबई से तथा रमनीक मोहन हरियाणा भी भारत से पाकिस्तान गए थे।
तस्वीरों में बड़े गर्व के साथ खड़े यह सभी बुद्धिजीवी लोग पाकिस्तान के झंडे के साथ लगाए गए उलटे राष्ट्रीय ध्वज के अपमान को नजरअंदाज करते दिखाई दे रहे हैं। उल्टा तिरंगा थामे पाकिस्तान के लाहौर में खिंचवाई यह तस्वीर इन्होंने भारतीय मीडिया को भी जारी की है। राष्ट्रीय ध्वज के अपमान करने की घटना आमतौर पर राजनीतिक लोगों व विदेशियों के द्वारा ही सुनाई देती रही है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे ये बुद्धिजीवी लोग ऐसी गलती करें तो बात जरूर गंभीर हो जाती है।



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वैसे उचित तो यह था कि भारत लौटने पर इन्हें कड़ी सजा दी जानी चाहिये थी, मगर क्या एक धर्मनिरपेक्ष राज्य में देश का अपमान कोई अपराध माना जा सकता है...
प्रतीक से प्राप्ति नहीं, मन के सब व्यापार.
बदल ही जाते अर्थ सब, बुद्धि से यह सार.
बुद्धि से है सार, जरा सा सोच के देखो.
मंशा सबकी शुभ होती, यह जाँच के देखो.
कह साधक कवि, हटकर सोचो जरा लीक से.
बुद्धि से जानो कि प्राप्ति नहीं प्रतीक से.
भरतकुमार जी! भगत सिंह को फ़ांसी ३० मार्च १९३१ को दी गई थी, और तब तक इस देश का झण्डा तिरंगा तय नहीं हुआ था. यह मैं भी जानता हूँ कि भगत सिंह अद्भुत देशभक्त थे,पर आपकी तरह कच्ची भावुकता उनमें नहीं थी. श्री मुकुल शुक्ल ने बुद्धिजीवी होने का मुकुट पहनाना चाहा,धन्यवाद, लेकिन मैं इसे स्वीकार नहीं करता बन्धु! अभी बुद्धि को ठीक से तो जानलूँ पहले. मैं तो अभी मन-वृत्ति-चित्त का ही चक्कर लगा रहा हूँ भाई! आप यदि बुद्धि तक पहुँचे हों तो आपको प्रणाम. हाँ, आपके हाथों फ़ांसी का फ़ंदा खुशी-खुशी स्वीकार करूँगा, यदि आप मुझे ’बुद्धि’ दे सकें. और यह तो मैं पहले से जानता हूँ कि बुद्धि आजीविका का साधन नहीं, बल्कि सही जीने का आयाम है. जो सही जीना जान जायेगा, वही सबको जीने का अवसर और महौल दे सकेगा. शेष जन श्री शिव शंकर की तरह बिना जाने मान लेंगे.
रही तिरंगे के अपमान की बात. तो तिरंगा वर्तमान में हमारे देश का प्रतिनिधित्व करता है, प्रतीक रूपमें. इसके लिये सम्मान दिखाने के लिये उत्तेजित होने की बजाय देश और प्रतीकों को सही परिप्रेक्ष्य में जानना चाहिये. जिन्होंने इसे उल्टा पकङा है, वह अनजाने हुई भूल ही हो सकती है. अपमान करने की मंशा मुझे तो नहीं दिखी. आप कोशिश करें, आपको दिखे तो बतायें. वैसे इन अनजान मित्रों को ’शब्दजीवी’ कहकर इनकी पर्याप्त ’खातिरदारी’ मैंने भी की है. इस सम्बोधन पर वे या उनका कोई हम-विचार ’बुद्धिजीवी’ मुझे गरियाता तो कुछ बात थी. आप तीनों नाहक परेशान हुये.
फ़िरभी, बातचीत के लिये आपका स्वागत है, धन्यवाद!
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