विश्व के 35 फीसदी निरक्षर भारत में
भारत को साक्षर बनाने की मुहिम अभी भी परवान नहीं चढ़ पा रही है। शिक्षा का अधिकार और सर्वशिक्षा अभियान के बावजूद विश्व की 35 फीसद निरक्षर आबादी भारतीयों की है। भारत की 68 प्रतिशत साक्षरता दर वैश्विक साक्षरता दर 84 प्रतिशत से काफी पीछे है।
देश की 70 प्रतिशत निरक्षर आबादी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, आंध्रप्रदेश पश्चिम बंगाल, झारखंड और छत्तीसगढ़ में निवास करती है। चिंताजनक बात यह है कि महिलाओं और पुरुषों की साक्षरता दर में काफी अंतर है। पुरुषों की साक्षरता जहां दर 76.9 फीसदी है वहीं महिलाओं की मात्र 54.5 फीसदी। हालांकि वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार महिला साक्षरता दर में 14.38 फीसदी और पुरुष साक्षरता दर में 11.13 फीसदी की वृद्धि हुई। देश में साक्षरता दर बढ़ने के बावजूद तेजी से बढ़ती आबादी के कारण हर दशक में निरक्षरों की संख्या बढ़ती जा रही।
1991-2001 में पहली बार निरक्षरों की संख्या में कमी आई। उस दशक में बिहार, नगालैंड और मणिपुर ही ऐसे राज्य थे, जहां निरक्षरों की संख्या में वृद्धि हुई। 2001 की जनगणना में बिहार एकमात्र राज्य था, जहां आधी से अधिक आबादी यानी 53 प्रतिशत जनता निरक्षर थी। लेकिन दूसरा पहलू यह भी है कि राज्य में 60 प्रतिशत पुरुष साक्षर थे। योजना आयोग के सदस्य रहे किरीट एस पारिख ने भारत विकास रिपोर्ट, 2002 में भौतिक अवसरंचना की तरह सामाजिक अवसरंचना महत्वपूर्ण विषय पर अपने आलेख में लिखा है कि 2001 की जनगणना के अनुसार 65 प्रतिशत साक्षरता दर के साथ ही देश में 29 करोड़ 60 लाख निरक्षर हैं, जो आजादी के समय की 27 करोड़ की जनसंख्या के आसपास हैं। शिक्षा अभियान चलाने वाले सुप्रीम कोर्ट के वकील अशोक अग्रवाल के अनुसार, वयस्क निरक्षरता के साथ बाल निरक्षरता भी बहुत ज्यादा है। उन्होंने कहा कि तमामे दावों के बावजूद हकीकत यह है कि अब भी करीब दस करोड़ बच्चे स्कूल से दूर हैं। इनमें बड़ी संख्या में बाल श्रमिक और अपंग हैं।



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पूरी धरती आतंकित है पढे-लिखों के कारण. बेहतर है अनपढ रहना, शिक्षा है लूट का कारण.
शिक्षा लूटना सिखलाती, कानून ही दे आधार.
सारी व्यवस्था चौपट है, पाया शिक्षा का सार.
कह साधक मजबूरी है, शिक्षा देनी ही पङती.
लूट में आगे बढना है, चाहे बिखर ही जाये धरती.
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