आडवाणी पर भारी पड़े गड़करी
मोहरा बने गडकरी ने आखिरकार एक काम ऐसा कर ही दिया जो सीधे सीधे भाजपा के वयोवृद्ध दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी की बादशाहत को चुनौती दे देता है. झारखण्ड में सरकार बनाने के सवाल पर नितिन गडकरी आडवाणी पर भारी पड़े और बिना संसदीय दल की बैठक के झारखण्ड में सरकार बनाने को हरी झण्डी दे दिया.
झारखण्ड में सरकार बनाने के सवाल पर पिछली दफा भी नितिन गडकरी ही कोशिश कर रहे थे. गडकरी का तर्क था कि सरकार सब सवालों का जवाब होती है. झारखण्ड को लेकर संघ भी यही चाहता है कि वहां हर हाल में उसके नियंत्रण वाली सरकार रहे ताकि ईसाई मिशनरियों के प्रभाव को कम किया जा सके. इसलिए गडकरी के फैसले को संघ ने अपना समर्थन देने में कोई गुरेज नहीं किया. भाजपा के और वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह ने भी गडकरी की इस मुहिम को अपना पूरा समर्थन दिया.
हालांकि इस पूरे प्रकरण में लालकृष्ण आडवाणी और सुषमा स्वराज दोनों ही चाहते थे कि संसदीय बोर्ड की बैठक होनी चाहिए और बोर्ड में सरकार बनाने के बारे में आखिरी निर्णय होना चाहिए. लेकिन मास्को में रहते हुए भी नितिन गडकरी ने फोन पर ही आदेश पारित कर दिया कि हर हाल में झारखण्ड में सरकार बननी चाहिए. हालांकि ऊपरी तौर पर भले ही यह लग रहा हो कि नितिन गडकरी संघ की इच्छाओं का सम्मान कर रहे हैं लेकिन हकीकत यह है िक झारखण्ड में किसी भी सूरत में कोई सरकार बनवाने के लिए औद्योगिक घराने सक्रिय हैं. इस बार आश्चर्यजनक रूप से रिलायंस समूह का अनिल अंबानी धड़ा भी राज्य में भाजपा की सरकार बनवाने की कोशिशों में लगा हुआ था.
कांग्रेस ने भी कोई खास विरोध नहीं किया. एक तो लोकतंत्र का तकाजा और ऊपर से राज्य में नेतृत्व का संकट. उसने भी बहुमत का सम्मान करने में ही भलाई समझी. बहरहाल राज्य में मुण्डा के ताजपोशी की तैयारियां चल रही हैं और शनिवार को झारखण्ड में मुण्डा एक और 9/11 को अंजाम दे देंगे.



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कितने दिन चल पायेगी, यही प्रश्न है मुख्य.
मुंडा जी के सामने, विकट प्रश्न है मुख्य.
विकट प्रश्न यह मुख्य, भाजपा सत्ता-लोभी.
काँग्रेस की राह चल रही जोर से वो भी.
कह साधक कवि, यह फ़ंडा चलना कितने दिन?
प्रश्न यही है मुख्य कि मुण्डा है कितने दिन?
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