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खेती खेत रहे इससे पहले

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समय आ गया है कि हम इस कथित वैज्ञानिक या आधुनिक खेती की सार्थकता पर फिर से विचार करें और देर होने से पहले भारत में हजारों साल से प्रचलित जैविक (देसी) खेती की ओर लौट चलें। भारत के संदर्भ में जब हम जैविक खेती की बात करते हैं तो इसका मतलब एक ऐसी कृषि व्यवस्था से है जो मोटे तौर पर आत्मनिर्भर रहा है जहां खाद-बीज से लेकर तमाम साधन स्थानीय स्तर पर ही उपलब्ध हो जाता है। चूंकि पारम्परिक खेती में बाजारू चीजों का उपयोग न के बराबर होता है इसलिए इसमें लागत भी कम आती है।

पिछले कुछ वर्षों में तो आए दिन हमें सुनने और पढ़ने को मिलता है कि अमुक इलाके के अमुक किसान ने कर्जा देनेवालों से तंग आकर जान दे दी। लेकिन मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले से जो खबरें आ रहीं हैं वह और भी चिंताजनक है। खबरों के मुताबिक होशंगाबाद के कुर्सीढाना प्रखंड के कुछ किसानों ने पिछले दिनों आत्महत्या कर ली। इन किसानों ने गेहूं उगाने के लिए बैंक से कर्ज लिया था लेकिन उत्पादन काफी कम हुआ और वह लागत भी नहीं निकाल पाये। खराब फसल और गिरवी जमीन से टूटे किसानों ने जान देकर छुटकारा पा लिया। किसानों की आत्महत्या के मामले में यह एक नया मोड़ है, क्योंकि अब तक यही माना जाता रहा है कि कपास जैसी नकदी फसल उगाने वाले किसान ही कर्ज के जाल में फंसते हैं। लेकिन होशंगाबाद की घटना से साफ है कि गेहूं जैसी फसल उगाने वाले किसान भी, कर्ज की चपेट में आकर जान देने को मजबूर हो रहे हैं। जाहिर है, हरित क्रांति के नाम पर बाजारू खाद, बीज के साथ डीजल फूंक कर की जाने वाली खेती अब भारी पड़ने लगी है।

दरअसल वैज्ञानिक या आधुनिक खेती के नाम पर पिछले कुछ दशकों में देश के किसानों को जिस राह पर धकेला गया, उसका आज नहीं तो कल यही अंजाम होना था। आज जिस तरह की खेती की जा रही है, उसके लिए जरूरी बीज, रासायनिक खाद और कीटनाशक समेत सब कुछ बाजार से खरीदना पड़ता है। सरकार कितनी भी सब्सिडी दे इन चीजों की कीमतें कम नहीं होती। फिर सिंचाई के लिए इतना पानी चाहिए कि यह बोरिंग या नलकूप के बिना संभव नहीं है। पानी भले ही जमीन या नहर से मिल जाए, उसे निकालने और खेतों तक पहुंचाने में अच्छा-खासा पैसा लगता है। बिजली के अभाव में पंप सेट चलाने के लिए डीजल का ही सहारा लेना पड़ता है और उसमें भी पैसा ही फूंकना पड़ता है। इतना सब करने के बाद भी फसल अच्छी होगी, इसकी कोई गारंटी नहीं।

कुल मिलाकर इस खेती में लागत इतनी ज्यादा है कि भारत के ज्यादातर छोटे और मंझोले किसानों के लिए इसका खर्च उठाना संभव नहीं है। ऐसे में स्थानीय साहूकार और बैंक ही इनका सहारा बनते हैं और कुछ दिनों बाद मौत का कारण भी। सच तो यह है कि बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए अनाज का उत्पादन बढा़ने की दलील देकर आधुनिक कृषि के पैरोकारों और सरकार ने खेती की जिस पद्वति को आगे बढा़या, वह मूलत: बाजार और साहूकारों के लिए ही फायदेमंद साबित हुआ है। आम किसानों के लिए तो यह घाटे का कारोबार है। इसलिए कल तक खेती के सहारे खुशहाल जिंदगी जीने वाला परिवार आज खेती से भाग रहा है। शायद इसीलिए हरित क्रांति की वकालत करने वाले आज सदाबहार हरित क्रांति की बात कर रहे हैं।

बहरहाल, कचोटने वाली बात यह है कि हरित क्रांति के पैरोकारों में से किसी ने भी किसानों को यह नहीं बताया कि इस खेती में लागत साल दर साल बढ़ती जाएगी और उत्पादन घटता जाएगा। फिर एक समय ऐसा भी आएगा जब उस जमीन में कितना भी खाद-पानी डालो उत्पादन उतना ही रहेगा यानि उपज बढे़गी नहीं। क्योंकि मिट्टी की उर्वरता भी साल दर साल घटती ही जाएगी और कुछ सालों बाद उस जमीन पर घास उगाना भी मुिश्कल हो जाएगा। आज पंजाब और हरियाणा में कुछ ऐसा ही हाल है क्योंकि कीट-पतंगों से फसलों को बचाने के नाम पर की जाने वाले कीट नाशकों के छिड़काव ने घोंघा और केंचुए का नामो-निशान मिटा दिया है जो मिट्टी को नया प्राण देते हैं। इससे होने वाला जल प्रदूषण एक अलग समस्या है।

जैविक खेती को लेकर एक बडी़ गलतफहमी यह है कि इसमें उपज काफी कम होती है, जबकि वास्तविकता कुछ और है। असल में होता यह है कि आधुनिक खेती से बर्बाद हो चुके खेत में जब पारंपरिक तरीके से खेती की जाती है तो शुरूआत में उपज काफी कम होता है, जो स्वाभाविक है। चूंकि रासायनिक खाद से ऊसर हो चुकी जमीन को गोबर की खाद से आबाद होने में थोडा़ समय लगता है इसलिए ऐसी धारणा बन गई है कि जैविक खेती से उत्पादन कम होता है। असल में दो-तीन साल बाद पारंपरिक खेती में भी उतना ही अनाज उपजाया जा सकता है जितना महंगे खाद-बीज और हजारों गैलन पानी झोंक कर उपजाया जा रहा है। पारंपरिक खेती में फसलों का चुनाव बाजार के लिए न होकर खेत और पर्यावरण को ध्यान में रखकर किया जाता है ताकि मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी न हो और नमी बनी रहे। इसलिए जैविक खेती में पानी का इस्तेमाल भी हिसाब से ही होता है। वास्तव में जैविक खेती भारतीय कृषि व्यवस्था का अनिवार्य अंग रहा है।

लेकिन यह रातो रात नहीं होगा और न ही सरकार के सहयोग के बिना होगा। इसके लिए सबसे पहले पशुधन पर ध्यान देना जरूरी है। क्योंकि कभी दूध-दही के मामले में संपन्न माने जाने वाले गांवों को भी अब पाउच वाले दूध का इंतजार रहता है। ऐसा इसलिए हुआ कि रासायनिक खाद की उपयोगिता पर जोर ने पशुपालन को हीन कार्य बना दिया। सरकार को चाहिए कि वह खाद पर दी जाने वाली 80 हजार करोड़ रूपये की सिब्सडी खत्म कर, गाय या भैंस पालने वाले खेतिहर को सीधे आर्थिक सहायता दे। यूरोप और अमेरिका के ज्यादातर देशों में पशु पालने वालों को सरकार प्रतिदिन के हिसाब से दो यूरो या डॉलर की आर्थिक मदद देती है। भारत में भी इसी तरह से आर्थिक सहायता दी जानी चाहिए। अगर यह एक गाय या भैंस पर 100रु प्रतिदिन भी हो तो ज्यादा नहीं है। ऐसा में इसलिए कह रहा हूं कि आज खाद-बीज, कीटनाशक और सिंचाई के लिए बिजली या डीजल पर सिब्सडी के रूप में जितना रूपया झोंका जाता है उससे कम में ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि जी उठेगी। इस तरह शहर की ओर पलायन पर भी काफी हद तक लगाम लगायी जा सकेगी।

इसके अलावा देश के सभी जिलों में प्रखंड स्तर पर बीज बैंक खोला जाना चाहिए, जहां किसान बीज सुरक्षित रख सके और अगर उसके पास बीज नहीं है तो वह मनचाही फसल का बीज खरीद सके। इससे किसानों को हाईब्रिड बीजों से छुटकारा मिल जाएगा। पारंपरिक बीज की यह खासियत होती है कि इसे कई सालों तक सुरक्षित रखा जा सकता है। बीज बैंक इसलिए भी जरूरी है कि इससे जैव विविधता बनी रहेगी।

इस तरह अगर सरकार इच्छाशक्ति दिखाए तो भारत की पारंपरिक खेती का कायाकल्प हो सकता है। दिक्कत यह है कि हरित क्रांति के पैरोकार खाद और बीज वाली कंपनीयों के साथ मिलकर जो शोर मचाएंगे उससे निबटने की हिम्मत सरकार दिखा पाएगी यह कहना मुिश्कल है। लेकिन इतना तय है कि भारतीय कृषि तभी पटरी पर लौटेगी जब हम अपनी पारंपरिक यानि जैविक खेती की ओर लौटेंगे।

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image क्रांति प्रकाश जैविक खेती अभियान के संस्थापक, संचालक क्रांति प्रकाश सामाजिक व राजनीतिक क्षेत्र में सक्रियता के साथ-साथ पत्रकारिता भी करते हैं. बचपन में ही बिहार आंदोलन से जुड़े और काम किया. संप्रति पर्यावरण और खेती त्रैमासिक के संपादक. jaivik7@gmail.com
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