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बाघ बचे भी तो कैसे?

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नेपाल की राजधानी काठमांडू में अक्टूबर को अंतिम सप्ताह में विश्व बैंक और नेपाल सरकार के सहयोग से ग्लोबल टाइगर वर्कशाप में यह आधार बनाया गया कि ”शेर बचाना हमारी परीक्षा है” और यदि हम इसमें सफल हुए तो हम इस धरती को बचाने में सक्षम होंगे।

जंगल का राजा बाघ, इंसान से लड़ाई में अपनी सल्तनत तो खो चुका है लेकिन इस से बड़ी लड़ाई बाघ को अपनी जाति का अस्तित्व बचाने की है । अच्छी बात यह है कि कुछ इंसानों ने बाघ का दर्द समझा है और वे उसके साथ इस संघर्ष के सहभागी हैं जिसमें बाघ की प्रजाति को बचाना एक बड़ा सवाल है ।

विश्व बैंक जो इस वर्कशाप के आयोजक में से एक हैं, के अध्यक्ष राबर्ट जोलिक के आंकलन के अनुसार एशिया के दक्षिण व दक्षिण पूर्वी भाग में "वन्य जीव अंग व्यापार" दस अरब डालर के लगभग है, जो तस्करी व अवैध हथियारों के व्यापार के आस-पास ही है । इस व्यापार में प्रमुख हिस्सा बाघ अंगो का है । बाघ संरक्षण के लिए चिंता इसलिए और जरूरी है कि पिछले तीस वर्षों में इस दिशा में किये गये प्रयासों के परिणाम अपेक्षित मानकों एवं मानदंडों से बहुत दूर हैं। इस सम्मेलन की बड़ी उपलब्धि यह रही कि इसमें भारत व नेपाल के अलावा चीन, भूटान, थायलैंड, कंबोडिया, रूस आदि उन सभी देशों के प्रतिनिधि सम्मिलित हुए, जहां यह शानदार जीव अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहा है।  इस वर्कशाप के मुख्य बिंदुओं में बाघ संरक्षण योजना 1999 और 2008 में किये गये उसके पुनरीक्षण को अमली जामा पहनाना, हथियारबंद शिकारियों से लड़ाने वाली हथियारबंद सुरक्षा बलों को मजबूत करना एवं उन देशों के बाघ संरक्षण प्रयासों का आंकलन करना जहां इस दिशा में अपेक्षित प्रगति नहीं हुई है ।

चीन ने अगले वर्ष को "बाघ वर्ष”  घोषित किया है, चीन की यह घोषणा बाघ प्रेमियों के लिए चिंता का कारण है चूंकि चीन ही बाघ अंग का सबसे बड़ा बाजार है और यह बाजार अपनी आपूर्ति अपने पड़ौसी देश भारत से सबसे अधिक मात्रा में करता है । इन दोनों देशों के बीच नेपाल इस अवैध कारोबार का पड़ाव व मध्य बिंदु है, चीन व नेपाल के इस अवैध कारोबारियों की निगाहें भारत के बाघों पर हैं । विशेषज्ञों की मानें तो चीन द्वारा घोषित इस ”बाघ वर्ष” में अवैध अंगों का व्यापार बड़ने की उम्मीद है । चीन सरकार भी इस दिशा में तमाम कोशिशें कर रही है, कि चीन में बाघ के अंगों के प्रति लगाव को कम किया जा सके किंतु इसके बाद भी शेर व शेर के अंगों की मांग वहां दिनोदिन जोर पकड़ती जा रही है। बाघ की खाल चीन में वैभव का प्रतीक बन चुकी है । और इस खाल के कद्रदानों में चीन के बड़े उद्योगपति, सेना व सरकार के आला अफसर भी शामिल हैं। चीन के ल्हासा, शिनिंग व नागचु आदि क्षेत्र मुख्य हैं जहां बाघ के अंग व खाल हमेशा डिमांड में रहते हैं। इसको ध्यान में रखते हुए भारत को अपने बाघों की हिफाजत व संरक्षण की व्यवस्थाएं और मजबूत करने की आवश्यता है ।

वैसे ही भारत में बाघ संरक्षण के तमाम प्रयास आज तक पर्याप्त साबित नहीं हुए हैं और बाघों का आंकड़ा घटते-घटते लगभग 1400 के आसपास बचा है। इन सबसे निपटने के लिए भारत में अपने सभी 38 सूचीबद्ध बाघ संरक्षित क्षेत्रों में ”स्पेशल टाईगर प्रोटेक्शन फोर्स” की तैनाती करने के साथ-साथ समस्त सुरक्षा एजेन्सियों को दिशा निर्देश जारी किये हैं ताकि नेपाल के रास्ते इस वन्य जीव अंगों की तस्करी पर लगाम लगाने की कोशीश की जा सके। किंतु चिंता का विषय यह है कि यह सरकारी घोषणाएं सरकारी गति से ही कार्य करती हैं और कब पूर्ण रूप से अमल में आएं यह सरकार भी नहीं बता सकती क्योंकि सरकार अभी तक एक भी टाईगर रेंज में एस.टी.पी.एफ. की तैनाती नहीं कर पाई है, वह भी तब जबकि इस बल के लिए बजट में 50 करोड़ रूपये से अधिक की राशि स्वीकृत की जा चुकी है । 

बाघ संरक्षण में सबसे बड़ा रोड़ा बाघ एवं स्थानीय निवासियो के बीच का संघर्ष है, जहां बाघ की चुस्ती व चपलता इंसान की चालाकी के आगे मात खा जाती है, क्योंकि जंगल के निवासी जन कुछ पैसों के लालच में क्रूर शिकारियों का साथ दे देते हैं। उनकी मानसिकता बदलने का प्रयत्न किया जाना आवश्यक है, यह बाघ संरक्षण की दिशा में पहला कदम होना चाहिए, क्योंकि सबसे बड़ा खतरा बाघ को अपने घर से ही है। यदि मध्यप्रदेश की बात करें जो आज की तारीख में संभवतः देश का सबसे अधिक बाघ समृद्ध क्षेत्र है जहां कान्हा व बांधवगढ़, पन्ना व पेंच जैसे टाइगर क्षेत्र हैं, यहां भी शेर को अपने आसपास के क्षेत्र में रहने वाली मानव आबादी से ही ज्यादा खतरा है क्योंकि यह वह बागड़ है जो शेर को बचाती है और यदि बागड़ ही शेर खाने लगे तो शेर का भगवान ही मालिक है । 

शेर भी शिकार की तलाश में मजबूरी में मानव क्षेत्र में प्रवेश करता है जहां उसका पहला निशाना मवेशी होते हैं। ऐसा माना जाता है कि प्रत्येक शेर के लिए लगभग 15 वर्ग किमी क्षेत्रफल और खाने के लिए भरपूर शिकार होना चाहिए। औसतन एक शेर हर पांचवे दिन एक शिकार करता है, इस हिसाब से साल के लगभग 70 शिकार शेर को अपने भोजन के लिए चाहिए जिसमें शेर की पसंद हिरन, चीतल और हिरन की प्रजाति के अन्य जानवर होते हैं। जरूरत पड़ने पर शेर सुअर का भी शिकार करता है। शेर बिगड़ते पर्यावरण की ओर बहुत अच्छे से इशारा करता है, क्योंकि शेर का प्रिय भोजन हिरण या सुअर अच्छे पर्यावरण में अर्थात घनी जंगल की घास या पेड़ों से आच्छादित क्षेत्रों में ही पाए जाते हैं। मानव और शेर के इस द्वंद का समाधान मानव मानसिकता में बदलाव लाकर ही किया जा सकता है जहां लोगों को शेर के लिए जगह छोड़ने के लिए तैयार किया जा सके क्योंकि हमेशा यह सवाल सामने आता है कि आदमी ज्यादा कीमती है या शेर। काठमांडू वर्कशाप में यह निर्णय भी प्रमुख था कि बाघ के अंगो के स्थान पर जीवित बाघ की मांग बनायी जा सके। ऐसी कोई नीति बने इसके लिए बाघ चित्र प्रदर्शनी व जनचेतना जैसे कार्यक्रम की बात करी गई। आज की परिस्थितियों में ऐसा प्रतीत होता है कि शेर ही ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि मानव जीवन की दीघकालीन भलाई के लिए पर्यावरण की रक्षा आवश्यक है और शेर व शेर से जुड़े वन्य क्षेत्र का जीवन चक्र उन्नत पर्यावरण का एक सशक्त आधार है। चींटी से लेकर हाथी तक को प्रकृति ने यह ज्ञान दिया है कि जब तक मजबूरी न हो तब तक बगैर किसी को क्षति या चोट पहंचाए कैसे जिया जाए । वर्षों पहले मनुष्य भी इस बात को जानता एवं मानता था कि अपने निकट के पर्यावरण एवं वन्य जीवन चक्र से सामंजस्य कैसे बैठाया जाये किंतु दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि आज यह सामंजस्य अपना संतुलन खोता जा रहा है और इंसान यह भूल गया है कि अपने पर्यावरण तंत्र को हष्ट पुष्ट रखने के लिए शेर व शेर से जुड़े वन जीवन चक्र का स्वच्छंद विकास जरूरी है नहीं तो आने वाले समय में इस पर्यावरण व जैव असंतुलन के लिए इंसान दोषी होगा ना कि शेर । 


(लेखक एन.डी. सेंटर फॉर सोशल डेवलपमेंट एंड रिसर्च के अध्यक्ष एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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Krishna Kumar Mishra on 16 December, 2009 13:02;49
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श्रीमान जी आप के पोर्टल के बारे में दैनिक हिन्दुस्तान में पढ़ा। बधाई
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