Home | पर्यावरण | कोपेनहेगन में क्या हुआ?...कुछ खास नहीं!

कोपेनहेगन में क्या हुआ?...कुछ खास नहीं!

image कोपेनहेगन में बोलते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह

भले ही विकासशील देशों और कई पश्चिमी देशों की मांग के विपरीत इसमें कार्बन उत्सर्जन घटाने की किसी विस्तृत समय-सारिणी की व्यवस्था नहीं है इसकी बदौलत कोपेनहेगन शिखर सम्मेलन का समापन उस किस्म की नाकामी में नहीं हुआ जिसकी आशंका थी। वहां से लौटते नेताओं के हाथ में जो दस्तावेज है वह भविष्य का प्रतीकात्मक और अबाध्यकारी दस्तावेज है।

जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर अमेरिका, भारत, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका (बेसिक देश) के बीच हुआ अबाध्यकारी समझौता भले ही विकासशील देशों को पसंद न आया हो, लेकिन चलिए पहले से ही नाकाम माने जा चुके कोपेनहेगन शिखर सम्मेलन का कुछ तो हासिल रहा! अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के निजी हस्तक्षेप और भारत-चीन रणनीतिक कलाबाजियों के कारण संभव हुए इस समझौते का फौरी लक्ष्य है- दुनिया के तापमान को दो डिग्री सेल्सियस से अधिक नहीं बढ़ने देना।

समझौते की पृष्ठभूमि में एक अहम बात यह है कि भारत जिस विकासशील ब्लॉक के साथ पारंपरिक रूप से खड़ा रहता आया था, जिसकी तकलीफों और आकांक्षाओं को वह निर्गुट शिखर से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक में अभिव्यक्त करता था, नए जमाने की महत्वाकांक्षाओं के चलते वह उनसे धीरे-धीरे अलग हट रहा है। विकास की दौड़ और बाजार की होड़ में उसके लक्ष्य भी विकासशील देशों से अलग हो रहे हैं, रणनीतियां भी और नीतियां भी। हम सैंकड़ों गरीब एवं अशक्त मित्रों का साथ छोड़कर कुछ धनी एवं शक्तिशाली देशों के मित्र बनने की प्रक्रिया में हैं। आगे बढ़ना जरूरी है लेकिन इस प्रक्रिया में यह सुनिश्चित किए जाने की जरूरत है कि हम ऐसे नव-धनाढ्यों की तरह बर्ताव न करने लगें जिन्हें दूसरों की रोजी-रोटी से ज्यादा अपने ऐशो-आराम की फिक्र हो। हमारा लक्ष्य आंकड़ों की बाजीगरी और धनपतियों के सानिध्य में नहीं बल्कि उस दुनिया के भविष्य की रक्षा में निहित होना चाहिए जिस पर बड़े और छोटे, सभी देशों का समान अधिकार है। अपने लक्ष्यों की ओर बढ़ने के साथ-साथ धरती के हितों को बचाना भी बेहद जरूरी है क्योंकि अगर वह नहीं है तो हम भी नहीं हो सकते।जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर भारत और चीन उन जी-77 देशों से छिटक कर अलग हो  गए हैं जिनके साथ अपने साझा हितों की लड़ाई वे पिछले कुछ वर्षों से लड़ रहे थे.

लेकिन हकीकत यही है कि जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर भारत और चीन उन जी-77 देशों से छिटक कर अलग हो गए हैं जिनके साथ अपने साझा हितों की लड़ाई वे पिछले कुछ वर्षों से लड़ रहे थे। अफ्रीकी देशों की ओर से इस पर भावुकतापूर्ण एवं कटु प्रतिक्रियाएं आई हैं जो बेसिक देशों के नजरिए से आहत महसूस कर रहे हैं। वे न सिर्फ स्वयं को बातचीत की प्रक्रिया से अलग रहने से नाराज हैं बल्कि उनका यह भी मानना है कि तापमान में दो डिग्री तक की वृद्धि को स्वीकार्य मानकर उनके साथ अन्याय किया गया है। इतनी वृद्धि से उन देशों पर कई प्राकृतिक आपदाएं टूट पड़ेंगी। यह लक्ष्य हद से हद डेढ़ डिग्री तक होना चाहिए था। दूसरे क्योतो प्रोटोकॉल की अवधि बढ़ाने या सन 2010 में कोई अन्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बाध्यकारी समझौता करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाए गए हैं। क्योतो प्रोटोकॉल के प्रावधान कानूनी रूप से बाध्यकारी हैं लेकिन वह अगले सन 2012 में निष्प्रभावी हो जाएगा।

महज पर्यावरण का मुद्दा नहीं
जलवायु परिवर्तन का मुद्दा एक पर्यावरणीय विषय भर नहीं है। वह एक बड़ा सामाजिक मुद्दा, उससे बड़ा राजनैतिक मुद्दा और बहुत बड़ा व्यापारिक मुद्दा भी है। स्वास्थ्य, विश्व-शांति और प्रकृति से जुड़े और न जाने कितने मुद्दे उसके भीतर समाहित हैं। जब स्वयं दुनिया का ही अस्तित्व खतरे में हो तो किसी भी विश्व शक्ति, क्षेत्रीय महाशक्ति और अशक्ति के लिए त्वरित महत्व का कोई और मुद्दा उससे अधिक महत्वपूर्ण नहीं हो सकता। कार्बन उत्सर्जनों, बिजली की खपत और वनों के काटे जाने के कारण दुनिया का तापमान जिस तेजी से बढ़ रहा है उसकी अमेरिका, यूरोप और अन्य विकसित देशों ने कितने ही दशकों से उपेक्षा की है। वे अपना कूड़ा-करकट यहां-वहां फैलाते चले गए। वे अपने ऐशो-आराम के लिए धरती की छाती खोदते चले गए। वे अपने कल-कारखानों से धन कमाते चले गए। वे फैक्टिªयों और वाहनों की असंख्य धौंकनियों से धरती के वातावरण में धुआं झोंकते चले गए।

कहा जाता है कि अगर दुनिया का हर व्यक्ति आम अमेरिकी जैसी ऐश्वर्य की जिंदगी जीना चाहे तो उनकी मांग पूरी करने के लिए कम से कम पांच धरतियों की जरूरत पड़ेगी। पश्चिमी देशों ने धरती के संसाधनों का कितना अथाह दोहन किया है, यह इससे जाहिर है। दुनिया में फैलते हानिकारक धुआं का तीन चौथाई हिस्सा उन्हीं की देन है, और उन पर अंकुश लगाए बिना धरती को बचाने की मुहिम कामयाब नहीं हो सकती। भारत भले ही कोपेनहेगन समझौते के जरिए उनके करीब दिखाई दे रहा हो, उसे विकासशील देशों द्वारा उठाए जा रहे इस बुनियादी मुद्दे को नहीं भूलना चाहिए। और वह मुद्दा यह है कि जिन देशों ने धरती को इस स्थिति में पहुंचाया है, उन्हें ही मरम्मत के सामान मुहैया कराने होंगे और इसका खर्चा उठाना होगा। यह खर्चा अथाह है। दूसरे, जिन देशों को तापमान-वृद्धि का फल भुगतना पड़ेगा उन्हें लोगों के बेघर होने और शहरों के डूबने से भी बहुत बड़ी आर्थिक हानि उठानी पड़ेगी। विकसित देश तो यह खर्च उठा लेंगे लेकिन बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव जैसे देशों का क्या होगा? उनके पांवों तले से धरती खींच लेने का काम किसी और ने किया और परिणाम भुगतने के लिए उन्हें अकेले भंवर में छोड़ दिया जाए?

दोष किसका, भुगते कौन?
जाहिर है, धनी देश दुनिया को  खतरे में डालकर गरीब देशों पर उसे बचाने का दबाव बनाएंगे तो नतीजा सिफ़र ही आएगा। उन्हें खुद अपने कार्बन उत्सर्जनों पर अंकुश लगाना होगा और दूसरों को ऐसा करने के लिए आर्थिक तथा तकनीकी मदद मुहैया करानी होगी। लगता है, इस बारे में अमेरिका को अपने दायित्वों का कुछ तो अहसास हुआ है। अमेरिका और बेसिक देशों के समझौते में व्यवस्था है कि तापमान-वृद्धि पर अंकुश लगाने के लिए सन 2020 तक सौ अरब डालर प्रति वर्ष की रकम जुटाई जाएगी। यह धन अब तक हुए नुकसान की मरम्मत और नए प्रदूषण रोकने के लिए जरूरी वैकल्पिक तकनीकों के प्रयोग पर खर्च होगा। कहा जा रहा है कि इस प्रावधान को सुनिश्चित करने में चीन की अहम भूमिका है और इसमें से अधिकांश रकम विकासशील तथा अविकसित देशों को मिलेगी। उम्मीद है कि इन प्रयासों के जरिए धरती के तापमान को अब दो डिग्री से अधिक नहीं बढ़ने दिया जाएगा। यह देखने की बात है कि क्या दुनिया के सभी देशों को जोड़े बिना और साझा समयबद्ध लक्ष्य तय किए बिना ऐसा हो सकेगा।

लेकिन यह करार महज एक राजनैतिक दस्तावेज है। यह कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है और इसे कोपेनहेगन सम्मेलन में पारित करवाने की अनिवार्यता नहीं थी। इसी बात पर यूरोपीय देशों को आपत्ति है जिन्होंने खुद अपने बीच कार्बन उत्सर्जन नियंत्रण संबंधी बाध्यकारी समझौता कर रखा है। वे चाहते हैं कि कहीं धरती बचाने की मुहिम में वे अकेले न खड़े हों जबकि बाकी देश महज खाना-पूरी में लगे हों। ओबामा से उम्मीद लगाई गई थी कि वे सन 2010 में एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बाध्यकारी समझौता सुनिश्चित करेंगे। मौजूदा करार उस बारे में कोई आश्वासन नहीं देता। हां, इसके जरिए दुनिया की अहम अर्थव्यवस्थाओं ने जलवायु संरक्षण के लिए अपनी जिम्मेदारियों को जरूर स्वीकार किया है। फिर सन 1997 में हुए क्योतो प्रोटोकॉल के बाद पहली बार पर्यावरण संरक्षण के लिए कोई अंतरराष्ट्रीय समझौता हुआ है।

Subscribe to comments feed Comments (0 posted):

total: | displaying:

Post your comment comment

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
image बालेन्दु दाधीच माईक्रोसाफ्ट के मोस्ट वैलुएबल प्रोफेशनल पुरस्कार से सम्मानित बालेन्दु दाधीच वेब पोर्टल प्रभासाक्षी के समूह संपादक है. तकनीकि के घोड़े पर हिन्दी की काठी बांधनेवाले बालेन्दु दाधीच केवल तकनीकि के जानकार ही नहीं बेहतरीन पत्रकार भी हैं.
Rate this article
5.00
More from पर्यावरण
Previous
image
चिकित्सक के अभाव में बागी 'शेरा' मौत के कगार पर
लखनऊ प्राणि उद्यान से आए गजराज सुमित की अव्यवस्थाओं और समुचित उपचार के अभाव में विगत माह जुलाई में हुई असमय लाचारी और बेबसी वाली दर्दनाक मौत दुधवा नेशनल पार्क के इतिहास का काला अध्याय बनी ही साथ में दुधवा की व्यवस्थाओं पर प्रश्नचिन्ह भी लगाया। इसके बाद भी दुधवा नेशनल पार्क प्रशासन ने ऐसा लगता है कि कोई उससे सबक नहीं लिया है। शायद इसी का परिणाम है कि मेरठ से लाए गए बागी हाथी 'शेरा' के जिन्दगी की जीवन की डोर भी धीरे-धीरे संकुचित होने लगी है।...
image
पाँचना से फोन पर पानी पहुँचा घना
घना पक्षी विहार को इस बर्ष पानी मिल गया है। करौली जिले के पाँचना बाँध से छोडा गया पानी अब भरतपुर की सीमा में पहुँच गया है। इस पानी के बाद संभावना है घने का ताज बच जाये। पानी से रिक्शा चालकों से लेकर होटल मालिक सब प्रसन्न है, लेकिन इस पानी पहुँचने के कारणों में भरतपुर सांसद का करौली कलक्टर को फोन करना चर्चा का विषय बना हुआ है।...
image
यमुना में पानी बढ़ा है, बाढ़ नहीं आयी!
24 अगस्त 2010. पुरानी दिल्ली के इलाके में पुराने लोहेवाले पुल के आस पास टीवी चैनलों के ओवी वैन की लंबी कतारें खड़ी हैं. हर बड़े चैनल की ओवी वैन वहां मौजूद हैं और उन वैन में लगे हुए जनरेटर पूरी क्षमता से चल रहे हैं. संकेत साफ है कि लाइव वगैरह भी किया जा रहा है. कुछ ओवी वैन में भले ही ड्राइवर सीट पर ही सो रहे थे लेकिन रिपोर्टर और कैमरामैन दिल्ली में आयी "बाढ़" को कवर करने के लिए पूरी तत्परता से तैनात थे. ...
image
मुंबई के पर्यावरण का डूबता जहाज
मुंबई के समुद्री तट के पास जवाहरलाल नेहरु पोर्ट ट्रस्ट (जेएनपीटी) से करीब 5 (नॉटिकल) समुद्री मील की दूरी पर अरब सागर में 7 अगस्त शनिवार की सुबह 9.30 बजे पनामा के दो मालवाहक जहाज एमएससी चित्रा और एमवी खलिजिया की जोरदार टक्कर हुई इस हादसे में जहाज में सवार 33 क्रू मेंबरों को बचा लिया गया किन्तु इस टक्कर से एमएससी चित्रा के ईंधन टैंक में दरार आ जाने से जहाज (एमएससी चित्रा) डूब रहा है....
image
मानसून की टेढ़ी चाल
मानसून की टेढ़ी चाल से भारत में सभी हतप्रभ हैं। पिछले कुछ वर्षो से जिस तरह से मानसून दगा दे रहा है वो भारत जैसे कृषि प्रधान देश में भारी चिंता का विषय हैं। सामान्यतः मानसून शब्द का उपयोग भारी वर्षा के पर्याय के रूप में होता है, लेकिन वस्तुतः यह हवा कि दिशा बदलने का प्रतीक है, जिससे वर्षा कि सम्भावनाएं ज्ञात होती है।...
image
गिद्ध के बाद अब सारस पर संकट
सारस पक्षी पर आया संकट एक तरह से गिद्ध पर आये संकट से किसी मायने मे कम नही लग रहा है. इस बात को वन अधिकारियों के अलावा पर्यावरणीय संस्था से जुड़े हुए लोग भी मानने लगे है.सारस पक्षी की गणना को लेकर कई लोग सवाल उठाने लगे है कि जब सारस के संरक्षण की हकीकत मे जरूरत थी उस वक्त वन अमले ने कोई काम नही किया अब लकीर पीट कर दिखवा करने की कोशिश की जा रही है. ...
image
अरावली में अवैध खनन का गोरखधन्धा
राजस्थान की पहचान वैसे तो रेगिस्तान से है। लेकिन अरावली की श्रृखलाऐं भी उसके बहुत बडे हिस्से में फैली हुई है। अभी तक अरावली की इन श्रृखलाओं को हरा भरा करने के नाम पर देश और विदेशी मदद के पैसे को अकेला वन विभाग हडप करता रहा। अब इन श्रृखलाओं से पत्थर और लकडी का दोहन सरकार के दर्जनों विभाग और उनकी आड़ में खुद सरकारें कर रही है। राजस्थान के भरतपुर जिले में अवैध खनन के गोरखधंधे की पडताल करती एक रिपोर्ट। ...
image
पन्ना के बाघों का वंशनाश
पन्ना नेशनल पार्क के जंगल का गहरा भूरा रंग अब मानसून की आहट के साथ हरे रंग में बदल गया है, यहां का धुंधवा पहाड़ बांधवगढ़ से लाई गई बाघिन और उसके नवजात 4 बच्चों की अठखेलियों से पुन: पुलकित हुआ था और पार्क के फील्ड डायरेक्टर व डीएफओ हर्ष व्यक्त कर पत्रकारों को मिठाइयां भी खिला चुके हैं पर वास्तव में पन्ना क्षेत्र की जनता को फिलहाल कोई विशेष हर्ष नहीं है। उनके लिये दु:ख की बात यह है कि हमारे इलाके के जन्मजात बाघ समाप्त हो गये हैं। अब जो भी बाघ-बाघिन हैं, वे बाहर से लाये जा रहे हैं।...
image
किस दिन मनाएं हम अपना पर्यावरण दिवस?
पर्यावरण दिवस का आयोजन 1972 के बाद शुरू हुआ। 5 से 15 जून 1972 को स्वीडन की राजधानी स्टाकहोम मेें मानवी पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र का सम्मेलन हुआ। जिस में 113 देश शामिल हुए थे। इसी सम्मेलन की स्मृति बनाए रखने कि लिए 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस घोषित कर दिया गया। सवाल तो यह है कि पर्यावरण दिवस के इस दिन का हमारे से क्या रिश्ता? क्या 1972 के बाद लगातार पर्यावरण दिवस मना लेने से हमारा पर्यावरण ठीक हो रहा है? या फिर ठिकाने लगाया जा रहा है? यह विवेचना आप करिए।...
image
जान का दुश्मन बना इलेक्ट्रानिक कचरा
आज के इस आधुनिक युग में जब संचार क्रांति के परिणाम परिलक्षित हो रहे हैं। ऐसे समय में यह ध्यान देना और सोचना भी बहुत आवश्यक है कि, क्या यह संचार क्रांति के अत्याधुनिक उपकरण कहीं मानव जीवन से खिलवाड़ तो नहीं कर रहे, कहीं ऐसा न हो कि आधुनिकता की दौड़ में भागते-भागते हमारा दम निकल जाए ।...
image
संकट में है सुजान गंगा
राजस्थान के भरतपुर जिले में एक सुजान गंगा है. ऐतिहासिक महत्व की ये नहर अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष के साथ लोगों के लिए मुसीबत बन गई है. अब एक बार फिर न्यायालय ने सुजान गंगा के उद्धार के लिए हस्तक्षेप किया है. देखना ये है कि कोर्ट की फटकार के बाद सरकारी अमला कुछ करता है या फिर वो ही ढाक के तीन पात वाली बात होकर रह जायेगी....
image
रिहंद का होना, रिहंद का रोना
इधर गर्मी का पारा चढ़ रहा है उधर रिहंद का कंठ सूख रहा है. रिहंद बांध जलाशय जिसे गोविन्द वल्लभ पंत जलाशय भी कहते हैं पिछले कुछ सालों से संकट का शिकार है. रिहंद का पानी विषैला हो चुका है. रिहंद का पानी पीने के लिए रोक लगा दी गयी है. दुर्भाग्य देखिए कि जिन बिजलीघरों के कारण रिहंद का पानी विषाक्त हुआ अब उन्हीं बिजलीघरों के लिए रिहंद का विषाक्त पानी भी सूखने लगा है. लगभग 15,000 मेगावाट के बिजलीघरों के लिए प्राणवायु कहे जाने वाले रिहंद बाँध की स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि आने वाले दिनों में रिहंद के पानी पर निर्भर बिजलीघरों में उत्पादन ठप्प हो सकता है और उत्तर भारत में संभावित बिजली संकट की वजह बन सकता है. ...
image
यूरोप में उठे धुएं के गुबार की चुनौती
15 अप्रैल गुरूवार को ”अयाजाफजलाजोकुल” ग्लेशियर के नीचे स्थित ज्वालामुखी विस्फोट ने यूरोप सहित सारे विश्व को चिंता और परेशानी में डाल दिया है । यूरोप में आईसलैंड जैसे छोटे से टापूनुमा देश में स्थित यह ज्वालामुखी एक महीने से कम समय के अंतराल में दूसरी बार फटा है, और इस दूसरे विस्फोट से जो लावा निकला है, उसकी तीव्रता से सभी अचंभित और आश्चर्यचकित हैं। ...
image
हमें चाहिए नयी जमीन, नया जीवन
धरा को वसुंधरा बनाये रखने के लिए हमें व्यापक बदलाव की ओर कदम उठाना होगा. दुनिया के नीति निर्धारकों को यह सोचना होगा कि मनुष्य की हर समस्या का समाधान आर्थिक अधिनायकवाद में निहित नहीं है. व्यक्ति की स्वतंत्रता, उसकी मूल जरूरत इस आर्थिक अधिनायकवाद के भरोसे पूरी नहीं की जा सकती. हमें नयी जमीन चाहिए. हमें नया जीवन चाहिए. हमें वसुधा को कुटुंब स्वरूप चाहिए जिसमें हम सब साथ मिलकर अपना जीवन जी सकें. ...
image
गैंडो के सिर पर प्रशासन की आफत
यूपी के एकमात्र दुधवा नेशनल पार्क में चल रही विश्व की अद्वितीय गैंडा पुनर्वास परियोजना अफसरों की लापरवाही एवं उदासीनता का शिकार होकर कुप्रवन्धन की पर्याय बन गयी है । अब्यवस्थाओं के कारण उर्जाबाड़ से संरक्षित वनक्षेत्र में रहने वाले तीस सदस्यीय गैंडा परिवार के पांच सदस्य करंटयुक्त फैंसिंग तोड़कर बाहर जा चुके हैं। यह बात जानकर भी पार्क प्रशासन के अफसर गैंडों की सुरक्षा की कोई पुख्ता दीर्घकालिक व्यवस्था नहीं कर पा रहे हैं। इससे उनके जीवन पर संकट मंडराता रहता है। इसके अतिरिक्त एक ही नर गैंडा की संतानों का परिवार होने से उनके ऊपर अनुवांषिक प्रदूषण यानी अन्तःप्रजनन के खतरे की तलवार भी लटक रही है।...
image
ग्रीन कोर्ट में भी बाघ बहादुर को न्याय नहीं
बाघों के गणना का कार्य जारी है। गणना कार्य के लिए जुटाये गए संकेतों के समग्र अध्ययन के आधार पर ठोस निष्कर्ष निकालने से पहले ही किसी क्षेत्र में कम तो किसी क्षेत्र में ज्यादा बाघ होने की खबर भी आ रही है। तरह-तरह के कयास हैं। कोई कह रहा है, बाघों की संख्या वर्तमान संख्या 1411 से कम होगी। ...
image
पर्यावरण के लिए हिन्दी चीनी भाई-भाई
बीते सप्ताह भारत और चीन द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वैश्विक तापमान के विरूद्ध की जा रही लड़ाई में शामिल होने का ऐलान शायद इस संघर्ष में अब तक की सबसे बड़ी सफलता है । निःसंदेह भारत और चीन दुनिया की दो बड़ी अर्थ व्यवस्थाओं में शामिल हैं । आर्थिक विकास सीधे-सीधे औद्योगिकरण से जुड़ा है, और यह औद्योगिकरण ही दुनिया भर में वैश्विक तापमान को बढ़ाने वाली ग्रीन हाऊस गैसों का प्रमुख जनक है।...
Next
Tags
No tags for this article
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम में प्रकाशित सामग्री पर हमारी ओर से कोई कापीराइट नहीं है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2