मोर मर रहे हैं
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मोर बहुतायत में पाये जाते हैं लेकिन अब राष्ट्रीय पक्षी मोर पर संकट है. एक साथ 40 मोर के मरने की खबर से इलाके के वन विभाग अधिकारी और प्रशासनिक तबका दोनों ही सकते में आ गये हैं.
हालांकि अभी इस नतीजे पर भी नहीं पहुंचा जा सका है कि असल में मोरों के मौत की वजह शिकारियों की करतूत है या फिर किसानों द्वारा फसलों के बचाव में इस्तेमाल किया जाने वाला कीटनाशक. लेकिन मोरो की मौतो ने इनकी संख्या पर प्रभाव जरूर डाल दिया है.
ऊसराहार थाना क्षेत्र में ठकुरीपुरा गांव के पास एक किमी की परिधि में खेतों में 40 से ज्यादा मोर मरे पाये जाने की खबर ने हडकंप मचा दिया. ग्रामीणों ने पुलिस चैकी में सूचना दी लेकिन कोई नहीं पहुंचा. नतीजतन मोरों के शवों को कुत्ते नोंचकर खा गये. अनुमान लगाया जा रहा है कि पंखों के लिए मोरों को शिकारियों ने जहरीला दाना डाला था. ऊसराहार क्षेत्र के भरतिया चैकी से थोड़ी दूरी पर केशोंपुर कोठी बाजार नगला चतुर एवं ठकुरीपुरा गांव के समीप चालीस से भी अधिक मोर मृत मिले हैं. ग्रामीणों का अनुमान है कि मोर का शिकार कर उनके अंग एवं पंखों की तस्करी करने वाले माफिया ने खेतों में कोई जहरीली वस्तु या दवा डाली थी जिसे खाकर पक्षियों में बेहोशी छा गई. जिसके बाद शिकारियों ने इन मोरों को पकड़कर उनकी हत्या कर उनके पंख नोच डाले और शवों को वहीं छोड़ दिया.
इटावा जिले के उसराहार इलाके में राष्ट्रीय पक्षी मोरों के कई जोडों के मरने की खबर ने वन विभाग को हरकत में ला दिया है. मोरों के मरने की यह घटना भरतिया कोठी पुलिस चैकी के आसपास करीब दो तीन किलो मीटर के दायरे मे घटी है. वन अधिकारियों की माने कि ऐसा लगता है कि फसलों में डाले जाने वाले कीटनाशक के सेवन कर लेने से मोरों के मरने का अनुमान लगाया जा रहा है. उन्होने ग्रामीणों से हुई बातचीत का हवाला देते हुए कहा कि इस इलाके में शिकारी सक्रिय नहीं है इसलिये इसे अभी शिकारियो की करतूत नहीं कहा जा सकता है
प्राभागीय वन निदेशक सुदर्शन सिंह ने मोरों के मरने वाले गांव का दौरा करने के बाद बताया कि किसानों ने अपने खेतों में जिन कीटनाशक को फसलों को सुरक्षित रखने के लिये डाला है उसी वजह से इन मोरों के मरने की घटना हुई है लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि वन अघिकारी सही रिर्पोट नहीं दे रहे है हकीकत में मोर अधिक संख्या में मरे मे है,जिनको कुत्ते या फिर अन्य जानवर खा कर अपना भेट भर चुके है इससे जाहिर है कि वन विभीग को मौक पर जितने मोर मरे उतने ना मिलने तय माना जा सकता है.अब ऐसे में वन विभाग जो कुछ भी कहेगा उसे ही सच माना जायेगा. बताते चले कि इटावा मे मोरो की खासी तादाद है जिनको इटावा के खेतों ओर बागो में आसानी से भ्रमण करते हुए देखा जा सकता है इसी को लेकर इटावा में हर साल मोरों की गणना भी कराई जाती रहती है जो कि सिर्फ एक औपचारिकता भर ही समझी जाती है.
कहा जा रहा है कि सर्दी का सत्र शुरू होते ही इस तरह से मोरो के मरने के वाक्ये सामने अमुमन आते रहते है जिसके चलते शिकारी मोरो को मारने के बाद उठा कर ले जाते है लेकिन इलाकाई लोगो के भ्रमण करते रहने के चलते शिकारी मरे हुये मोरो को उठा ले जाने में कामयाब नही हो पाते है ओर बाद में यह बात कह कर मोरो की मौतो पर पर्दा डाल दिया जाता है कि किसानों ने फसल को बचाने के लिये खेतो में जिने कीटनाशक का इस्तेमाल किया है उसके चलते ही मोरों की मौते हुई है.इस सफाई को कुछ हद तक सही इस लिये भी माना जायेगा ही क्यो कि अगर सरकारी अमले शिकारियों की करतूत का खुलासा कर देता हे तो लाजिमी है कि उनके लिये मुसीबत का कारण बन सकता है इस लिये आम तौर हमेश की तरह से इस बार भी मोरो की मौत को किसानो के कीटनाशक से ही जोड़ दिया गया है.
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