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गिद्ध फिर से गायब हो गये

image बूचडखाने भेजे जाने से पहले एकत्र किये पशु

3 जनवरी 2009. यही वो दिन था जब हमने कहा कि ‘गिद्ध लौट आये है’. ठीक एक साल बाद हम एक दूसरी बात कह रहे है. लौट कर आने वाले गिद्ध वापस चले गये है. गिद्धों की प्रजाति के लुप्त होने के पीछे पशुओं को दी जाने वाली दवा एक कारण मानी जाती है लेकिन गिद्धों की प्रजाति के समाप्त होने का कारण पशुओं को दी जाने वाली दवा के अलावा एक और भयावह सच्चाई है.

गिद्ध कुदरत के सफाईकर्मी माने जाते है. देश में गिद्धों की नौ प्रजातियों की जानकारी है. जिनमें से अधिकांश उत्तराखंड में मिलती है. हिमालयन ग्रिफन,व्हाईट वेक्ड, सिलेन्डर बिल्ड,रैड हैडेड,इजिप्सियन,सिनेरियस,लामरगियर और लौंग बिल्ड प्रमुख है. इनमें से लौंग बिल्ड और सिलेन्डर बिल्ड प्रजाति समाप्त होने के कगार पर है. एक अनुमान के मुताबिक अस्सी के दशक में देश में आठ करोड गिद्व थे. मगर अब इनकी सख्या बमुशिकल कुछ हजारों की गिनती में है.

गिद्ध मांसाहारी पक्षी है. जो मृत गले सड़े जानवरों को ही खाकर अपना गुजारा करते है. 2004 में ये बात सामने आई कि गिद्धों के सफाए के पीछे डाइक्लोफिनेक दवा है. जो दुधारू पशुओं से उनकी इच्छा के विरूद्ध जाकर दूध लेने के काम आती है. पशुपालक बहुतायत में इस दवा का इस्तेमाल करते है. बर्ष 2006 में जानवरों के इस्तेमाल के लिए इसकी बिक्री और प्रयोग पर पाबंदी लगा दी गई. फिर भी ये दवा आज खुलेआम बाजार में मिल जाती है. इस दवा से प्रभावित पशु जब मरता है तो गिद्ध उसे खाते है. इससे गिद्धों में विसरल व्हाइड नामक बीमारी उन्हें घेर लेती है. इस बीमारी से गिद्धों के गुर्दे पूरी तरह से खराब हो जाते है. जिससे धीरे धीरे उनकी मौत हो जाती है.

हम बात बयाना की कर रहे हैं. बयाना राजस्थान का इतिहास प्रसिद्ध ऐतिहासिक कस्वा है,जिसके आधा दर्जन तो अब तक नाम बदल गये है. यहाँ कभी नील की प्रसिद्व मंडी थी . तो अब पिंक स्टोन पत्थर के साथ दूध की बडी मंडी है. मुस्लिम बादशाह बाबर के द्वारा  शराब को तलाक देने की प्रसिद्व ‘तलाकनी मस्जिद’ यहाँ आज भी है. कृष्ण के भतीजे अनिरूद की प्रिया उषा का मन्दिर भी यहाँ  विधमान है.  इस कस्बे के पास अरावली की खडी पहाडियाँ है. इन पहाडों की चटटानें  गिद्वों के लिए अनुकूल आवास रहे है. यहाँ लगभग एक दशक पहले हजारों गिद्व रहते थे. ये गिद्व लौंग बिल्ड प्रजाति के थे.

धीरे धीरे ये गिद्व यहाँ से विलुप्त हो गये.  वर्ष 2009 में ये गिद्व वापिस आये. जनवरी माह में सैंकडों गिद्व फिर से इन पहाडियों में दिखाई दिये. कुछ ही महीनों बाद ये गिद्व वापिस जाने लग गये. आज ये पहाडियाँ फिर से सूनी हो गई है. लोगों में न तो जब इनके आने को लेकर खुशी थी. न अब जाने का कोई गम दिखाई दे रहा है. किसे फुर्सत है इनके आने और जाने को देखने समझने की.

एक वर्ष के अन्तराल में गिद्धों का यों फिर से चले जाना सोचने का मजबूर करता है. बयाना के आसपास  पूरा ग्रामीण ईलाका है. गुर्जर बाहुल्य इलाका होने के कारण यहाँ पशुपालन का काम अधिक है. अब तो लोग व्यावसायिक दृष्टि से पशुपालन करने लगे है. बयाना दूध की भी बहुत बडी मंडी है. लगभग 2.30 लाख लीटर दूध रोजाना यहाँ से बाहर जाता है. ये बात अलग है कि उसमें सिंथैटिक की मात्रा बहुत है.

बयाना को चारों दिशाओं से रास्ते है. एक राजधानी जयपुर को जोडता है तो दूसरा उत्तर प्रदेश के मथुरा तक जाता है.एक रास्ता मध्यप्रदेश के ग्वालियर तक  जाता है तो एक करौली जिले को छूता है. ये चारों ही रास्ते ग्रामीण सडकों से जुडे है. आप इन रास्तों पर यदि थोडी भी सावधानी से नजर रखते है. तो आपको हर दिशा से कुछ लोग पशुओं को लेकर बयाना की ओर आते नजर आयेगें. ये कौन लोग है. और छोटे बडे पशुओं को लेकर बयाना की ओर क्यों जा रहे है. आपने अगर इस विषय पर गौर कर लिया तो कुछ बातें समझ में आने लग जायेगी. ये कोई एक दिन की बात नहीं है. अगर रोजाना ऐसा हो रह है तो जरूर कोई कारण है.

अब भी आप किसी बात पर नहीं पहुँचे है तो हम ही बता देते है. स्थानीय भाषा में इन्हें गाँव में लोग ‘कसाई’ कहकर बुलाते है. गांव में ये आबाज लगाते घूमते है. ‘‘हाँ भाई कोई भेंस पडा बिकाउ है’’. इन लोगों की संख्या सैंकडों में है. आजकल तो गाडरिया लुहार भी इस काम को करने लग गये है. इनकी इस आबाज के साथ ही लोग इन्हें  अपने पशुबाडों की ओर ले जाते है. फिर सबसे पहले पशुओं के छोटे बच्चों की शामत आती है. जो पशु दूध देना बंद कर देते है उनके बच्चों को अब पशुपालक रखना पसंद नहीं करते. साथ ही जो पशु कुछ बीमार या बेकार है उसकी भी कीमत लगा कर बेच दिया जाता है. ये कीमत 5 से 15 हजार तक है. ऐसे में व्यवसायी पशुपालक लाभ का सौदा देखता है पशु के साथ अपना संबंध नहीं.

बयाना में छोटे बडे लगभग 100 पशु रोजाना इकठठे किये जाते है. उसके बाद इन्हें बडे शहरों के बूचडखानों तक पहुँचाया जाता है. कस्बे में भी मांसाहार की आधा दर्जन दुकाने चल रही है. ये किसी एक दिन की बात नहीं है. रोजाना इस व्यापार से जुडे लोग इस काम में लगे हुये है. दूसरी बात ये सामने आती है कि पशुपालन के व्यवसाय से जुड जाने के कारण लोगों में उपयोगिता की बात अधिक हो गई है. अब इस इलाके में आपकों सडक के किनारे रास्तों में मरे हुये पशु दिखाई नहीं देगें.

अब सवाल यही से आरम्भ होता है. गिद्व मांसाहारी पक्षी है. और जब उसे मरे हुये पशु खाने को नहीं मिलेगें तो वो उस स्थान पर कैसे रूक पाऐगें. पशु यदि बीमार है तो मरने से पहले बेचा जा रहा है. पशु सीधे तौर पर उपयोगी नहीं है तो भी उसे बेचा जा रहा है. बच्चों तक को बेचने से पशुपालक परहेज नहीं कर रहे है तो फिर गिद्व खाऐं क्या? और जब खाने को नहीं मिलेगा तो केवल अनुकूल आवास के सहारे कोई पक्षी कब तक रह सकता है. बयाना क्षेत्र से हजारों गिद्वों के पलायन के पीछे तो यही एक कारण है. जब इंसान ही जिंदा पशुओं को बडी मात्रा में खाने के काम में लेने लग गये तो बेचारे गिद्वों को मरे पशु खाने को कहाँ से मिलें. अब ऐसे में गिद्व लौट के नहीं जाऐं तो क्या करें?

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Vasudha Mehta on 03 January, 2010 20:48;31
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Rajeev ji, very nice observation at your end on Vultures in Bayana...you are so right when you say that who is after all worried whether the Vultures are there or not!
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Sanjeet tripathi on 04 January, 2010 00:18;06
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boss, bahut sahi report hai jo k har jagah pe yatharth hai aaj.
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कृष्ण कुमार मिश्र on 17 February, 2010 18:27;09
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विलुप्त हो रही प्रजाति के प्रति चिन्ता जतानें के लिए धन्यवाद
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image राजीव शर्मा राजीव शर्मा राजस्थान में रहकर मुक्त पत्रकारिता कर रहे हैं.इससे पूर्व कइ अखवारों के लिए रिपोटिंग कर चुके हें। राजनीति के अलावा पानी-पर्यावरण के मुद्दे पर संवेदनशील रिपोर्टिंग के लिए प्रयासरत। विस्फोट के लिए राजस्थान से नियमित लेखन और रिपोर्टिंग. rsmediaraj@gmail.com
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