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जिंदगी को कूड़ा करता कंम्प्यूटर

image एक 15 इंच के मानीटर में 3 किलो तक सीसा हो सकता है

चेतावनी के साथ किसी खबर की शुरूआत करना अटपटा लगता है लेकिन इसकी शुरूआत और किसी रूप में हो भी नहीं सकती. क्योंकि मैं जिस कम्प्यूटर पर बैठकर यह खबर लिख रहा हूं यह उसी तरह मेरे लिए घातक है जैसे कोई और कम्प्यूटर किसी और के लिए नुकसानदेह हो सकता है.

फिर भी कम्प्यूटर, मोबाईल और अन्य दूसरे तकनीकि उपकरण हमारे दैनिक काम-काज में इतना घुल-मिल चुके हैं कि इसके बिना हम रोजमर्रा के जीवन की कल्पना नहीं कर सकते. तो फिर ऐसे में एक ही रास्ता बचता है कि हम उस तकनीकि और उपकरणों के बारे में जाने जिसका उपयोग कर रहे हैं. संभव हो तो कुछ सावधानी बरतें जिससे हमारे शरीर को कम से कम नुकसान हो. इस चेतावनी का मतलब इतना ही है.

इलेक्ट्रानिक उत्पादों का भारत में 1200 अरब डॉलर का कारोबार हो रहा है. इसमें सालाना 7 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है और इलेक्ट्रीनिक उत्पादों के भारतीय संगठन एलसिना का अनुमान है कि सन 2015 तक भारत में इलेक्ट्रानिक उत्पादों का कारोबार 2400 अरब डालर पहुंच जाएगा. उद्योग जगत के लिए यह जितनी अच्छी खबर है उपभोक्ताओं के लिए यह खबर उतनी ही बुरी. बुरी इस लिहाज से कि आज भारत में इलेक्ट्रानिक उत्पादों के लिए कोई ठोस नियम-कानून नहीं हैं. आईटी पार्कों की चकाचौंध में बनने वाले इलेक्ट्रानिक उत्पाद जब उन उत्पाद केन्द्रों के बाहर अपनी यात्रा शुरू करते हैं तो उपभोक्ता के प्रयोग के बाद रिसाईक्लिंग यार्ड का रास्ता पकड़ लेते हैं. जब तक ये उत्पाद अंतिम सांस लेते हैं तब तक कई लोगों को बीमार बना चुके होते हैं. उनके सिर पर तो कहर टूटता ही है जो इसको नष्ट करते हैं. आश्चर्यजनक रूप से इन उत्पादों के निर्माण की जिस चकाचौंध को विकास बताकर हमें गौरव दिलाया जाता है, उस सिक्के के दूसरे पहलू को हमारे सामने कभी नहीं रखा जाता कि यह उत्पाद कितनी जिंदगियों के साथ खिलवाड़ करता है.

दुनिया के विकसित देशों में जहां तकनीकि ने पहले पांव पसारें उनको खतरे का अंदाजा पहले ही लग गया था. इसलिए कड़े नियम कानून बनाये गये कि तकनीकि उपकरणों में प्रतिबंधित या फिर घातक रसायनों , द्रव्यों का प्रयोग नहीं किया जाएगा. अमरीका में बने इस तरह के कानून को ईपीआर यानी एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पांसबिलिटी कहा जाता है. अमरीका और यूरोपीयन यूनियन सहित अन्य विकसित देशों ने अपने यहां ऐसा कानूनी ढांचा खड़ा कर रखा है कि इलेक्ट्रानिक उत्पादों पर कम से कम जहरीले रसायनों का प्रयोग हो. लेकिन भारत में अभी ऐसा कोई कानून नहीं है. गैरसरकारी संगठनों के दबाव के बाद सूचना तकनीकि मंत्रालय ने अगस्त 2007 में एक गाईडलाईन जारी की है लेकिन वह एक खानापूर्ति से ज्यादा कुछ नहीं है.ऐसे में इलेक्ट्रनिक उत्पादों का प्रयोग करनेवालों को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ सकता है.

आमतौर हम जिन्हें इलेक्ट्रानिक उत्पाद कहते हैं उनमें कम्प्यूटर, लैपटाप, मोबाईल, टीवी , रेफ्रीजरेटर, ओवेन, वाशिंग मशीन, सीडी प्लेयर, डीवीडी प्लेयर, होम थियेटर आदि शामिल हैं. इन उत्पादों को बनाने में जिन रसायनों को प्रयोग किया जाता है वे आमतौर पर मनुष्य के स्वास्थ्य के लिहाज से घातक होते हैं. मसलन इन उत्पादों को बनाने में सीसा , पारा, कैडियम, ब्रेलियम, पालिमर, पीवीसी आदि. अगर आप अपने कम्प्यूटर को ही देखें तो आपके कम्प्यूटर के मानीटर में लेड की भारी मात्रा प्रयोग किया जाता है. एक 15 इंच के मानीटर में 3 किलो तक सीसा हो सकता है . इतनी भारी मात्रा में सीसे के लगातार संपर्क में रहने के कारण आपके नर्वस सिस्टम पर फर्क पड़ता है, किडनी का रोग हो सकता है और आंखों को नुकसान हो सकता है. इसके साथ ही कोई बच्चा लगातार कम्प्यूटर पर काम करता है तो उसकी सीखने की प्रकृया (लर्निंग प्रोसेस) पर फर्क पड़ सकता है . 1989 और 1992 में अपने दो अध्ययन निष्कर्षों में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी सीसा को खतरनाक पदार्थ घोषित कर रखा है. सीआरटी मानीटर पीछे छूटा तो सीसे की घातक मात्रा भले कम हुई हो लेकिन फ्लैट मानीटर ने पारा का प्रयोग शुरू कर दिया. पारा के लगातार संपर्क में रहने से आपको ब्रेन ट्यूमर, तंत्रिका तंत्र के अन्य रोग होने की संभावना और अधिक बढ़ जाती है.

इसी तरह 2004 के आकड़ें देखें तो 674 मिलियन मोबाईल फोन के निर्माण में 1000 टन टीबीबीपीए का प्रयोग किया गया. औसत फोन का वजन अगर 75ग्राम मान लें तो इसका 2 प्रतिशत टीबीबीपीए होता है. टीबीबीपीए के लगातार संपर्क में रहने से भी मष्तिष्क की कोशिकाओं का क्षय होता है और तंत्रिका तंत्र कमजोर पड़ता है. लगातार टीबीबीपीए, पारा, सीसा आदि रसायनों के संपर्क में रहने के कारण शुरूआती लक्षण चिड़चिड़ेपन, गुस्से आदि के रूप में दिखते हैं लेकिन समय बीतने के साथ ये गंभीर रोग का रूप ले लेते हैं.

भारत में इन विषयों के बारे में जानकारी एकतरफा है. हम यह तो जानते हैं तकनीकि उपकरणों के प्रयोग से हमारे दैनिक काम-काज में आसानी आयी है और सरकार और व्यावसायिक घराने इसको विकास का पहिया कहकर घुमाने को अपनी सिद्धि और महारत समझते हैं. लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू क्या है यह न हमें बताया जाता है और हम अपने से इसके बारे में जानने की कोशिश शायद ही करते हों. नये उत्पाद, उत्पादों के नये माडल और नवीनतम संस्करण की जानकारी हमें होती है लेकिन ये उत्पाद पुराने भी पड़ते होंगे. जब पुराने पड़ते हैं तो उनकी क्या गति होती है और वे हमारी और हमारे पर्यावरण की क्या दुर्गति करते हैं इसे भी जानना जरूरी है. भारत में इस समय हर साल 146,000 टन ई-वेस्ट अर्थात ईलेक्ट्रानिक उपकरणों का कूड़ा तैयार होता है. लगभग इतना ही कूड़ा हम बाहर से आयात करते हैं. तकनीकि क्रांति जैसे-जैसे आकार लेगी इसे कूड़े के आकार में भी बढ़ोत्तरी होगी. अनुमान है कि 2012 तक तकनीकि कूड़े का ढेर 16,00,000 टन पहुंच जाएगा. लेकिन इन कूड़ो के निपटान की क्या हमारे पास कोई योजना है? अभी तो बिल्कुल ही नहीं है. अभी यह कूड़ा दिल्ली के पिछड़े इलाकों, मेरठ, चेन्नई और बंगलौर के कबाड़ियों के सिर मढ़ दिया जाता है.

यह एक कारोबार है और इसमें जितना पैसा मिलता है उससे ज्यादा घातक रोगों का फैलाव होता है. कम्प्यूटर या फिर मोबाईल उपकरणों के मदरबोर्ड या सर्किट बोर्ड में छिपी धातुओं को निकालने के लिए इन्हें स्टोव पर जलाया जाता है. हथौड़े से मारकर तोड़ा जाता है. विदेशी तकनीकि के इस देशी निपटान तरीकों से केवल मजदूरों को ही नहीं पूरे पर्यावरण को नुकसान होता है. कंपनियों को इस बात की कोई चिंता नहीं है कि जिन उत्पादों को बेचकर वे भारी मुनाफा पीट रही हैं उनका निस्तारण करने की चिंता उन्हें नहीं है. ग्रीनपीस में ई-वेस्ट पर काम करनेवाले दल के मुखिया रमापति कुमार कहते हैं" हम कभी यह नहीं कहते कि सरकार सूचना क्रांति के घोड़े रोक ले. लेकिन इतना जरूर कहते हैं कि कुछ नियम कायदे होने चाहिए. सरकार और कंपनियों दोनों को अपनी जिम्मेदारी का अहसास होना चाहिए. कंपनियों को यह तय करना होगा कि वे अपने उत्पाद का निस्तारण खुद करें. क्योकि वे ही बेहतर रूप से जानते हैं कि उनके उत्पादों में क्या केमिकल प्रयुक्त हुए हैं और उनका सही रूप से निस्तारण कैसे हो सकता है. साथ ही सरकार केवल मुनाफे और टैक्स की बजाय लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण के बारे में भी सोचे और ऐसे कानून बनाए जिससे तकनीकि क्रांति को रोक भी न लगे और हम तथा हमारा पर्यावरण भी बचा रहे." सरकार चेते न चेते उपभोक्ता को खुद इन विषयों के बारे में सावधान रहना होगा.

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राजेश अग्रवाल on 24 July, 2008 15:39;00
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यह समस्या बहुत गंभीर है, शायद हम उस दौर से गुजर रहे हैं जब इलेक्ट्रानिक उत्पादों को अपने फायदे के लिये इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन नुकसानों के बारे में बेपरवाह हैं. आने वाली पीढ़ी हमें इसी लापरवाही के लिये कोसेगी.
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