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भारतीय वन्यजीवन के लिए शत्रुराष्ट्र बना नेपाल

image लेखक डी पी मिश्रा

भारतीय वनों पर लगातार नेपाली नागरिको का दबाब बढ़ता जा रहा है जिससे वन्यजीवों का अवैध िशकार हो अथवा पेड़ों को काटना हो, इसमें नेपाल नागरिक जरा भी कोताही नहीं बरतते हैं। स्थानीय स्तर के प्रबंधन को यदि नज़रअन्दाज कर दिया जाए तो पैन्तीस वर्ष बाद भी हमारे देश की वननीति में उपरोक्त कुप्रभावों को निष्प्रभावी करने के लिये अभी तक न तो कोई मूल्याकंन किया गया है और न ही नई वननीति तैयार की गई है। भविष्य में भी ऐसी कोई आशा दिखाई नही पड़ती है।

आजादी के बाद बनी भारतीय वननीति की समीक्षा वर्ष 1988 में की गई थी। लेकिन परिस्थितियों के अनुसार उसमें हेर-फेर किए बिना यथावत् लागू कर दिया गया, जबकि वर्ष 1975 में नेपाल राष्ट्र द्वारा अपनाई गई वननीति का भारतीय वनों पर प्राकृतिक एवं मानवजनित कारणों का विपरीत प्रभाव पड़ा है। किंन्तु 35 साल व्यतीत हो जाने पर भी भारतीय वनों पर पड़ रहे कुप्रभावों को निष्प्रभावी करने के लिये भारत सरकार द्वारा अभी तक कोई ठोस वननीति नहीं तैयार की गई है। जबकि भारत-नेपाल सीमावर्ती भारतीय वनों पर बढ़ रहे नेपालियों के दबाव को रोकने, वन संपदा व जैव विविधता की सुरक्षा के लिये वर्तमान वननीति में बदलाव किया जाना अतिआवश्यक हो गया है।     

भारत के सभी राष्ट्रीय उद्यानों एवं वन्यजीव विहारों में दक्षिण भारत की अपेक्षा उत्तर भारत के हिमालय की तराई में आबाद राष्ट्रीय उद्यान एवं वनपशु बिहार सुरक्षा की दृष्टि से अत्यन्त संवेदनशील हैं। देश के वनों की सुरक्षा के लिये आजादी के बाद 1952 में पहली `वननीति´ बनी थी। इसके बाद बदलते परिवेश तथा समय की मांग के अनुरूप वर्ष 1978 में दूसरी वननीति बनी, जो अद्यतन यही लागू है। विडम्बना यह कही जाएगी कि इस वन नीति में नेपाल राष्ट्र की सीमा पर स्थित महत्वपूर्ण जैव विविधता के संरक्षण एवं वनों की सुरक्षा को नज़रअन्दाज किया गया है। जबकि मित्र राष्ट्र नेपाल से भारत की लगभग 1400 किमी लम्बी सीमा सटी हुई है। सन् 1975 से पूर्व भारत-नेपाल सीमा के दोनों ओर घने वनक्षेत्र स्थित थे, जिसमें दोनों ओर के समृद्ध वनक्षेत्र होने के कारण वन्य-पशुओं का आवागमन निर्बाध रूप से होता था। उत्तर भारत में हिमालय की तराई में फैले अधिकांश वनक्षेत्र की सीमा पूर्व में पिश्चम बंगाल, दार्जलिंग जिले से लेकर पिश्चम में उत्तरांचल में पिथौरागढ़ तक स्थित है। पिथौरागढ़ में काली नदी के दोनों तरफ नेपाल राष्ट्र का इलाका एवं भारत का धारचूला कस्बा आबाद है। आवागमन की दृष्टि से दुर्गम होने के बाद भी यह क्षेत्र तिब्बत में पाए जाने वाले `चीरू´ नामक हिरन के बालो से बने `शाहतूश शालों´ की तस्करी के लिये विश्व विख्यात है। अपनी अति विशेश खासियत के कारण उच्च वर्ग में इस शाहतूस शालों की खासी मांग बनी रहती है। यही कारण है कि अधिकांश वंयजीव तस्कर बाघ, तेदुंआ आदि के अंगों के बदले शाहतूस शाल प्राप्त करके उसकी तस्करी करते हैं।

गौरतलब है कि वर्ष 1975 में नेपाल राष्ट्र द्वारा अपनाई गई `सरपट वन कटान नीति´ के कारण हिमालय की तराई के वनाच्छादित भू-भाग से नेपाल के इलाकों से वनों का सफाया हो गया। नेपाल राष्ट्र की सुनियोजित नीति के तहत सरकार ने इन क्षेत्रों में सेवानिवृत्त नेपाली सैनिको को बसा दिया। जिसका प्रमुख उदेश्य भारतीय सीमा पर मजबूत नेपाली नागरिको की सामाजिक फौज की स्थापना था। खाली हुई वनभूमि पर आबाद हुए नेपाली फौजियों को नेपाल सरकार द्वारा प्राथमिकता से असलहों के लाईसेंस भी प्रदान किए गए। हालांकि कालान्तर में नेपाल की लोकतात्रिंक सरकारों की स्थिति आयाराम-गयाराम की रही इसके कारण इन क्षेत्रों में आबाद हुए गांव माओवादियों के गढ़ बन गए, जो अब भी नेपाल सरकार के लिये समस्या का प्रमुख कारण बने हुए हैं। इसका अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि विगत साल के माह दिसम्बर में नेपाल के जिला कैलाली में जंगल के बीच अतिक्रमण करके बसे तथाकथित माओवादियों एवं नेपाली नागरिकों से वन विभाग ने भूमि को मुक्त कराने का प्रयास किया तो दोनों पक्षों के बीच हिसंक और खूनी संघर्ष हो गया जिसमें तीन नागरिक एवं दो वनकर्मी मारे गए और दर्जन भर से ऊपर लोग घायल हुए थे।

यद्यपि यह मामला नेपाल की सरकार का है वह माओवादियों से कैसे निपटती हैर्षोर्षो लेकिन नेपाल की सरपट वन कटान नीति का भारतीय वनों पर अच्छा-खासा प्राकृतिक एवं मानवजनित कारणों से भारी विपरीत प्रभाव पडा़ है। नेपाल की ओर से वन के कट जाने के कारण भारतीय क्षेत्र में स्थित प्रमुख जैवविविध क्षेत्र में जलप्लावन एवं गाद (सििल्टंग) जमा होने की समस्या बढ़ने लगी और सीमावर्ती वनक्षेत्र सूख गए साथ ही जंगल के घास मैदानों पर भी इसका दुश्प्रभाव पडा़ जबकि मानवजनित कारणों से वनों की सुरक्षा भी प्रभावित हुई। इसके अतिरिक्त पिछले तीन-चार सालों से नेपाल से सटे भारतीय क्षेत्रों में बाढ़ की विनाशलीला का कहर भी बढ़ने लगा है। यह भी सर्वविदित है कि नेपाल, चीन, कोरिया, ताईवान आदि कई देश वंयजीव-जन्तु उत्पाद के प्रमुख व्यवसायिक केन्द्र हैं। जिसमें भारी मात्रा में ऊंचे दामों पर वंयजीव उत्पादों की खरीद-फरोख्त होती है। जिनके लिये कच्चा माल हिमालय एवं हिमालय की तराई में बसे जैव विविधता क्षेत्रों में उलब्ध है। ये राष्ट्र वन्यजीव एवं उससे निर्मित सामग्री का आयात-निर्यात करने वाले देशों की भूमिका अदा करते हैं। इन्ही क्षेत्रों में सारा सामान विश्व बाजार में प्रवेश करता है। जहां प्रतिवर्ष 2-5 बिलियन अमेरिकी डॉलर का व्यापार होता है। वन्यजीवों के अंगो का यह अवैध कारोबार नारकोटिक्स के बाद दूसरे नम्बर पर आता है। इस स्थिति की गम्भीरता का अनुमान नेपाल राष्ट्र ने पहले ही समझ लिया था शायद इसी का परिणाम है कि नेपाल सरकार ने अपने प्रमुख राष्ट्रीय उद्यानों के वन्यजीवों की सुरक्षा का दायित्व नेपाल आर्मी को सौंप दिया था। इसका परिणाम यह निकला कि नेपाली सैनिको के दबाव के कारण वंयजीव तस्कर भारत, श्रीलंका, म्यांमार, मलेिशया जैसे देशों में सक्रिय हो गए। हाल ही में यहां पकड़े गए वंयजीव अंगो के तस्कर भी अपने बयानों में स्वीकार कर चुके हैं कि नेपाल राष्ट्र के प्रमुख बाजारों में निर्बाध वन्यजीवों के उत्पादों की तस्करी जारी है तथा नेपाल में एकत्र होने के बाद वंयजीवों के अंग तिब्बत, चीन, कोरिया पहुंचकर ऊंचे दामों पर बिकते हैं। इससे यह स्पश्ट हो जाता है अपनी वनसंपदा एवं वयंजीवों की सुरक्षा के लिये नेपाल राष्ट्र ने यथोचित प्रबंध कर रखा है लेकिन अन्तरर्राष्ट्रीय तस्करी के मार्गो पर उसका कोई नियन्त्रण नही है।

नेपाल राष्ट्र द्वारा `सरपट वन कटान नीति´ के अन्तर्गत बृहद पैमाने पर किए गए वन कटान का भारतीय क्षेत्रों पर प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से क्या प्रभाव पडा़ अभी तक इसका मूल्यांकन नहीं किया गया है। इतना ही नहीं उपरोक्त नीति के कारण भारतीय वन क्षेत्रों पर पड़ने वाले प्रतिप्रभाव को निष्प्रभावी करने के लिये भी कोई विशेष नीति भारत सरकार द्वारा नहीं अपनाई गई है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस गम्भीर स्थिति का मूल्यांकन किए बगैर इसे राज्योंं के ऊपर छोड़ दिया गया है। यदि पूर्व में पश्चिम बंगाल से पश्चिम में उत्ताखण्ड तक फैले महानन्दा वन्यजीव विहार, मानस वन्यजीव विहार, बुक्सा टाइगर रिजर्व, बाल्मीकी टाइगर रिजर्व, सोहागीबरवा वन्यजीव प्रभाग, सुहेलदेव वन्यजीव प्रभाग, कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग, दुधवा टाइगर रिजर्व, किशनपुर वन्यजीव विहार, पीलीभीत का लग्गा-भग्गा वनक्षेत्र की स्थिति को देखा जाए तो ज्ञात होता है कि भारतीय सीमा की ओर नियन्त्रण एवं संरक्षण की यथोचित व्यवस्था है परन्तु नेपाल राष्ट्र की तरफ इन क्षेत्रों में पड़ने वाले विपरीत प्रभावों को न्यूनतम स्तर पर ले जाने के लिये वनकर्मी अपने को असहज महसूस करते हैं। परन्तु बदलते परिवेश में अब यह आवश्यक हो गया है कि हिमालय एवं हिमालय की तराई में नेपाल राष्ट्र की सीमा पर भारतीय क्षेत्र में बसे जैव विविधता क्षेत्रों की सुरक्षा हेतु एक व्यवहारिक ठोस वननीति बनाई जाए, अन्यथा की स्थिति में भारतीय वनों पर नेपाल की तरफ से पड़ रहे दुष्प्रभावों के भविष्य में और भी घातक परिणाम निकल सकते हैं, इस बात से भी कतई इंकार नही किया जा सकता है। (लेखक वाइल्ड लाइफ पत्रकार है)

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कृष्ण कुमार मिश्र on 18 February, 2010 05:03;17
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बहुत सुन्दर आलेख, वन संपदा के सरंक्षण में आँखे खोलती एक रेपोर्ट
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संजय on 19 February, 2010 00:26;34
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श्री मिश्राजी,
आपने एक गंभीर विषय को सामने लाया। इसके लिए साधुवाद। देश के दूसरे हिस्सों में समाजिक कार्यकर्ता या संगठन सक्रिय होकर वन्यजीवों के लिए अवाज उठाते हैं। कभी-कभी पुलिस धरपकड़ करती है। लेकिन देश के उत्तर-पूर्वाेत्तर हिस्सों में वन्यजीवों के प्रति न केवल कू्ररता होती है, बल्कि सरकारी नीतियों का अमल भी दूर-दूर तक नहीं दिखता।
दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि इन क्षेत्रों के पत्रकार वन्यजीवों के प्रति संवदेनशील होकर रिपोर्टिंग में रुचि नहीं दिखाते हैं। वन्यजीवों के सरोकारों के साथ आपके इस लेखन क ेलिए पुन: साधुवाद।
संजय स्वदेश
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vikky on 19 February, 2010 14:39;10
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bahut sundar
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RAJ KUMAR on 19 February, 2010 15:22;44
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very nice.............subject,,,,,,,,,
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