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इंसान नहीं, चमगादड़ है

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हाल ही में एक टी वी चैनल पर दिखाई गई एक खबर में दिखाए गए दृश्य उत्तर केरल के कासरगोड नामक ज़िले के 'अदुर्पंदिवयल' गाँव के हैं. केरल के इस गाँव में रहने वाले लोग हर साल दो बार एक आदिवासी देवता को प्रसन्न करने के लिए अपने आसपास के जंगलों के सारे चमगादड़ों को बेरहमी से पीट पीट कर मार डालते हैं, फिर इन्हें खा जाते हैं. इन लोगों का मानना है कि ऐसा करने से वह अपनी बुरी किस्मत का पासा पलट देंगे और उनके जीवन में खुशहाली आ जाएगी.

इसके चलते हर साल महाशिवरात्रि पर्व के कुछ दिन बाद इस गाँव के लोग जंगलों पर लम्बे ऊंचे पेड़ों में अपने बसेरा बनाने वाले इन निशाचर (रात्रिकाल में चुस्त रहने वाले) स्तनधारियों को बेरहमी से आग-धुएं से लदीं झाड़ियों से डरा-खींच कर नीचे ज़मीन पर घसीट लातें हैं और फिर इन्हें पीट-पीट कर मार डालते हैं. इस साल भी फरवरी के महीने में इस गाँव में सदियों से चली आ रही प्रथा के चलते 15,000 चमगादड़ों को मार डाला गया और फिर उन्हें खा लिया गया. इसको देखकर आप खुद ही सोचिए कि आखिर कौन किसका खून चूसकर पी रहा है-इंसान या चमगादड़?

तो क्या चमगादड़ सच में इंसानों का खून पी सकते हैं? उत्तर है 'नहीं'. चमगादड़ों के खून चूसने वाली अफवाहों को तूल मिलता है "ड्राकुला" जैसे किरदारों से. पर असल में भारत से कोसों दूर, लाटिन अमरीका में पाई जानी वाली 'वाम्पायर' बैट नामक प्रजाति का एक चमगादड़ ही केवल खून पीता है, वह भी इंसानों का नहीं बल्कि मवेशी गाय-भैंस का! और इन खून पीने वाले चमगादड़ों की थूक में पाई जाने वाली एक किण्वक/एन्ज़ाइम के ऊपर दुनिया के कई वैज्ञानिक परीक्षण कर रहे हैं, क्योंकि माना जाता है कि इस एन्ज़ाइम में खून के थक्कों को पिघलाने की क्षमता है, जिसका इस्तेमाल ह्रदय रोग से पीड़ित लोगों की रक्त-वाहिकाओं में जमे हुए खून के थक्कों को पिघलाने में किया जा सकता है.

चमगादड़ों की विश्व भर में एक हज़ार से ऊपर प्रजातियाँ हैं, जिनमें से भारत में 103 प्रकार के चमगादड़ पाए जाते हैं, जिन्हें मुख्य तौर पर दो वर्गों में बांटा गया है- फल खाने वाले और कीड़े खाने वाले. भारत में पाए जाने वाले लगभग चार सौ जंगली स्तनधारी जीवों में से लगभग पच्चीस प्रतिशत चमगादड़ों के होने के पीछे भी एक बहुत महत्वपूर्ण प्राकृतिक और आर्थिक कारण है. कीड़े खाने वाले चमगादड़ों की खासियत यह है की यह रात के समय हर घंटे लगभग 600-1000 कीड़ों को खा सकते हैं. खासकर कि ऐसे कीड़े जो की हमें, और हमारे जंगल-फसलों को नुकसान पहुंचाने में सक्षम होते हैं. एक गर्भधारी मादा चमगादड़ तो एक रात में अपने वज़न के बराबर कीड़ों का सेवन कर सकती है. अगर इस बात का आंकलन किया जाए तो ऐसा करना यानी इतने कीड़ों को मारना तो किसी कीटनाशक के भी बस की बात नहीं है, वह भी प्रकृति को किसी भी तरह का नुकसान पहुंचाए बगैर.

साथ ही फल खाने वाले चमगादड़ भी प्रकृति की एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण कड़ी हैं. यह फूलों के पराग पर या फलों का सेवन करते हैं. यह करते हुए वह पराग को एक फूल से दूसरे फूल तक पहुंचाते हैं और परागण (POLLINATION) में मदद करते हैं. माना जाता है की चमगादड़ ढेरों फल खाकर फलों के बागों को नुकसान पहुंचाते हैं, इसलिए इन्हें मार देना चाहिए, पर सच्चाई तो कुछ और ही है...असल में चमगादड़ केवल ऐसे फल खाते हैं जो कि परिपक्व या पकने में अक्षम होते हैं. अर्थात जिन्हें माली या बागबान कभी खा-बेच नहीं सकता. इसलिए यह सोच बिलकुल गलत है कि चमगादड़ों की वजह से हमारे फल की खेती को कोई नुकसान पहुँचता है. इसके विपरीत चमगादड़ जब इन खराब-कच्चे फलों का सेवन करते हैं तो इनके बीजों को अपनी चोंचों में एक जगह से दूसरी जगह ले जाते हैं या फिर इन्हें अपनी मल में निकालते हैं, जो कि इन बीजों को जंगल में गिरने के बाद तेज़ी से अंकुरित करने में मदद करती है. साथ ही साथ बीजों को इधर उधर कोसों दूर फैंककर यह चमगादड़ बूढे-मरे हुए जंगल में भी पेड़ों की नयी पैदाइश में सहायक होते हैं. 

आज अगर चमगादड़ों को बिना किसी कानूनी डर से बेधड़क मारा जा रहा है तो इसका कारण केवल लोगों का अंधविश्वास/भय, खाने या शिकार के शौक को पूरा करने भर के लिए नहीं है. इसका एक मूल और महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि १९७२ के भारतीय वन्य जीव अधिनियम के अंतर्गत 'चमगादड़ों' को चूहों के साथ इस अधिनियम के Schedule 5 में एकांकित किया गया है, जिसका तात्पर्य यह है कि इन्हें 'Vermin' (वेर्मिन) यानी कि 'सब प्रकार के जीव जंतु/कीड़े-मकौड़े जो अनाज को हानि पहुंचाते है' उस वर्ग के अन्दर रखा गया है-जिनको मारने की सरकार ने कोई कानूनी सज़ा रेखांकित नहीं की है. इसके पीछे कारण यह है कि अधिनियम बनाने वाली हमारी सरकार भी चमगादड़ों के प्राकृतिक और आर्थिक फायदों से अपरिचित है. चिंता कि बात यह है कि हमारे देश के वन्य जीव अधिनियम कानून की पुस्तक में 'फल खाने वाले चमगादड़' को अभी भी साधारण तौर पर Schedule 5 में ही लिस्ट किया गया है और कीड़े खाने वाले चमगादड़ों का तो पूरे अधिनियम में कहीं ज़िक्र ही नहीं है! इसलिए अभी भी CCINSA जैसी संस्थाएं भारत सरकार पर दबाव डाल रही हैं कि वह विश्व में सभी प्रजातियों कि जनसँख्या और स्थिति का ब्यौरा देने वाली IUCN (International Union of Conservation of Nature) की रेड डाटा बुक के अंतर्गत भारतीय चमगादड़ प्रजातियों के दर्जे के हिसाब से इन्हें भारतीय वन्य जीव अधिनयम के सुरक्षित दर्जों में लिस्ट करे ताकि इनको मारना कानूनी तौर पर अपराध के रूप में मान्य हो सके.

चमगादड़ों के बारे में अनेकों और गलतफहमियां फैली हुई हैं जिनमे से एक यह है की यह 'गंदे' जीव हैं जबकि असलियत में चमगादड़ अपनी साफ़-सफाई में कई घंटे लगाते हैं. चमगादड़ों का शिकार भी किया जाता है, न केवल खाने के लिए, पर कई लोगों का माना है कि चमगादड़ के पंखों में एक ऐसा टेकल होता है जिससे जोड़ों के दर्द से छुटकारा पाया जा सकता है परन्तु इस बात की अभी तक वैज्ञानिक तौर पर कोई पुष्टि नहीं हुई है और ना ही उसका कोई वैज्ञानिक आधार उभर के सामने आया है.  यह भी माना जाता है की चमगादड़ वह अंधे होते हैं, जोकि गलत है. चमगादड़ खासकर कि फलों को खाने वाले चमगादड़ों कि नज़र काफी तेज़ होती है, पर क्योंकि यह रात्रिकाल में ज्यादा चुस्त-दुरुस्त रहने वाला जीव है इसलिए दिन में यह सुस्त होता है. दिन के समय चमगादड़ों के साथ छेड-छाड़ करना एक निहत्थे और कमज़ोर जीव पर वार करने के सामान है. देखने के मुकाबले चमगादड़ की सुनने की शक्ति ज़िदा तेज़ होती है, यह उन आवाजों को भी सुन सकते हैं जिन्हें इंसान नहीं सुन सकते. चमगादड़ 'Echolation' (गूंजों की टकराहट से निकली ध्वनि के आभास) नामक तकनीक से अपने आस पास की अन्य वस्तुओं या अपने शिकार की मौजूदगी का आभास करते हैं.

अगर कभी यह निष्पाप और हानिरहित चमगादड़ आपके घर में घुस भी आए, तो डरिए मत क्योंकि कोई भी जानवर तब तक आपको नुकसान नहीं पहुंचाएगा जब तक आप उसे जाने-अनजाने में नुकसान न पहुंचाएं. याद रखिये चमगादड़ एक शर्मीला जंगली जानवर है न कि कोई पालतू पक्षी जिससे आप छू सकें, इसलिए अपने आपको किसी भी क्षति से बचाने के लिए इसे अकेला छोड़ दें. और अगर कभी चमगादड़ आपके घर के किसी कोने, चिमनी, कोई खुला/टूटा दरवाज़े-खिड़की से गलती से अन्दर आ भी जाए तो इन्हें मारने के तरीकों का इस्तेमाल न करें बल्कि ऐसे में केवल अपने खिड़की दरवाजें खोल दीजिये और यह अपने आप बाहर चले जायेंगे या फिर आराम से एक गत्ते के डिब्बे में इससे बंद कर केवल 'रात' को बाहर छोड़ देने के) . इन चमगादड़ों को क्षति पहुंचाए बिना इन्हें हटाने के तरीकों को विधिवत समझने के लिए इस लिंक से PDF फाइल को डाउनलोड करें, या फिर इस पेज को पढ़ें या इस विडियो लिंक को देखें.

एक अरब से अधिक आबादी रखने वाले हमारे इस भारत देश में चमगादड़ की इतनी प्रजातियाँ भगवान की देन है ताकि यह चमगादड़ भारत जैसे कृषि-प्रधान देश के खेत-खलिहान, फल-फसलों और जंगलों को हानिकारक कीड़ों से बचा सकें. इनके बीजों और परागों को बिखेर कर इनकी उपज और प्रजनन में मदद करें. वे वह काम मुफ्त में करते हैं जिसके लिए आज कई पेस्टीसाईड कंपनियां भारी कीमत वसूलती हैं. इसलिए हमेशा याद रखिए कि चमगादड़ों को मारकर हम अपने ही वर्तमान और भविष्य को चौपट कर रहे हैं.

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Dr.Arvind Mishra on 04 March, 2010 12:21;10
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जैव विविधता वर्ष -२०१० पर एक बुक मार्क पोस्ट -विदुषी लेखिका ने एक कुप्रथा के उल्लेख के साथ ही चमगादड़ों पर विस्तृत जानकारी दी है .शुक्रिया !
दुःख है अंधविश्वासों की बलि वेदी पर हमारी समृद्ध जैव विविधता होम हो रही है ! क्या किसी कड़े क़ानून से इन कुरीतियों पर प्रभावी अंकुश नहीं रखा जा सकता ?
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amitabh ojha on 28 April, 2010 21:35;15
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apne keral ka jikrya kiya lekin kabhi aap bihar ki rajdhani patna se 50 kilometer dur hazipur ke sisai gaon me jaiye nazara choukane wala milega.yahan talab ke kinare hazaro nahi lakho ki sankhya me chamgadar hai.yahan ke log chamgadar ko bhagwana mante hai aur unki dekhbhal karte hai
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ramdayal pal on 07 September, 2010 15:04;50
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chamgadad ko current kyon lagta hai
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image Vasudha Mehta A Post Graduate in Plant Molecular Biology from University of Delhi, she has pursued diploma courses in Environmental Law and then Journalism. After finishing studies, determined to realise her dream to contribute towards the cause of animal welfare and nature conservation, she has been working over the past three years with Wildlife and Environmental Groups in a multi-tasking capacity of a 'Communication, Resource Mobilization and Outreach professional'. (vasudha1907@gmail.com)
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