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संकट में है सुजान गंगा

image लोहागड दुर्ग के चारों ओर बनी गंदी सुजानगंगा नहर

राजस्थान के भरतपुर जिले में एक सुजान गंगा है. ऐतिहासिक महत्व की ये नहर अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष के साथ लोगों के लिए मुसीबत बन गई है. अब एक बार फिर न्यायालय ने सुजान गंगा के उद्धार के लिए हस्तक्षेप किया है. देखना ये है कि कोर्ट की फटकार के बाद सरकारी अमला कुछ करता है या फिर वो ही ढाक के तीन पात वाली बात होकर रह जायेगी.

भरतपुर क्षेत्र पवित्र ब्रज भूमि का अंग माना जाता है.यह ट्रांस यमुना मैदान के अनर्तगत आता है. जाटों के निवास के समय 17 वीं सदी में यह जटवाडा के रूप में विख्यात था. बरसाती नदियों वाणगंगा,रूपारेल,गंभीर और कांकुद के द्वारा यहाँ बाढ क्षेत्रों और दलदलों का निर्माण हुआ और स्थानीय वनस्पति के जंगलों का विकास होता चला गया. इन्हीं जंगलों को काटकर तथा दलदलों को सुखाकर जाटों ने कृषि योग्य भूमि का विकास किया. साथ अपनी सुरक्षा के लिए मिटटी के किलों का निमार्ण किया.इतिहास में भरतपुर ‘लोहागढ’ के नाम से प्रसिद्व है. यहाँ का किला दुभेध माना गया है. 19 वीं सदी में जब बि्र्टिश साम्राज्यवाद अपने चरम पर था, मराठों के अतिरिक्त सब उनकी अधीनता स्वीकार कर चुके थे. छोटी सी भरतपुर रियासत ने ही कंपनी सरकार को चुनौती दी थी. 1805 में लडे गये आंग्ल जाट युद्व में अंग्रेजों को मुँह की खानी पडी. इसकी इस दुभेध्ता में इसके चारों और बनी ‘सुजान गंगा’ नहर का अपना योगदान रहा. जिसे पार कर कोई दुश्मन किले तक पहुँच ही नहीं पाया. अग्रेंज भी नहीं.

भरतपुर की जीवनदायिनी मानी जाने वाली ये नहर आज इसी शहर के लिए एक प्रकार से अभिशाप बन कर सामने आ रही है. एक ओर जिंदगी की परेशानियों से दुखी  लोग इसमें कूद कर अपनी जान दे देते  है. तो नवजात शिशुओं,कन्या  भ्रूणों को  भी इसकी गहराई में समा जाते  है. इतना ही नहीं इसका प्रदूषण अब आस पास रहने वालों के साथ ही शहर भर को अपनी चपेट में ले रहा है. दुख का विषय ये है कि इसकी सफाई और पर्यटन महत्व का बनाने के नाम पर कई बार करोडों रूपये खर्च भी हो चुके है मगर हालात बद से बदतर ही हुये है. इतना ही नहीं हाँल ही में राजस्थान उच्च न्यायालय तक को तमाम अफसरों को कडी फटकार लगानी पडी है. रियासत के वारिशों ने भी अपने पुरखों की बनाई इस अदभुत धरोहर को लेकर कभी कोई गंभीरता नहीं दिखाई है जबकि राजनैतिक दृष्टि से भरतपुर अधिकांश समय उनके ही अधीन रहता चला आ रहा है. कांग्रेस में नेहरू खानदान के खासमखास विदेशमंत्री रहे कु नटवर सिंह का यह गृह जिला है.

1743 से 1751 के बीच राजा सूरजमल ने भरतपुर में किले का निर्माण करवाया. कच्ची मिटटी के बने पारित दुर्ग के चारों ओर करीब 5 किलोमीटर लंबाई की सुजान गंगा नहर बनबाई. 250 फीट चौडाई वाली नहर की गहराई को लेकर को लेकर कई प्रकार की बातें कहते है. कुछ का मानना है कि गहराई का कोई पता नहीं. वही कुछ लोग कहते है कि 10 से अधिक  हाथियों की लंबाई के बराबर है. इतिहास के प्राध्यापक डां आलोक खन्ना की माने तो सुजान गंगा नहर 50 से 60 फीट गहरी है. इस नहर की अपनी अदभुत विशेषताऐं है जिनकी पकड आज के इंजीनियर नहीं खोज पाऐ है. नहर में पानी के भरने और गंदे पानी के निकास के लिए जमीन के अंदर से व्यवस्थाऐं थी. शहर से 10 किलोमीटर दूर स्थित अजान बाँध के पानी से नहर को भरा जाता था. आज दोनों ही व्यवस्था पूरी तरह से चौपट हो गई है. इसके साथ ही शहर भर की गंदगी अब नहर के हवाले की जाने लग गई है. इस गंदगी को रोकने के लिए 3 करोड  की लागत से एक नाला भी चारों ओर बनाया जा चुका है जो पूरी तरह से बेकार पडा हुआ है

बुजुर्गो की माने तो पूरा शहर नहर के घाटों पर नहाने आता था. खिरनी घाट पर तो माने मेले के जैसा माहोल रहता था. नहर के सीमा क्षेत्र में सैकडों कुऐं थे जिनके मीठे पानी से शहर भर की प्यास बुझती थी. आज अस्तित्व के रूप में सुजान गंगा तो है मगर उसके घाटों पर अब कोई नहाने नहीं जाता, कुऐ भी अपना अस्तिव खो चुके है. शहर में पीने योग्य मीठे पानी का अकाल है. भरतपुर के लिए पीने का पानी 50 किलोमीटर दूर के बंध वारैठा बाँध से आता है. भविष्य के संकट के लिए अरवों रूपयों की लागत से चंबल नदी से पानी लाने की योजना पर काम चल रहा है. जबकि शहर भर के लिए पानी की आपूर्ति करने वाली सुजान गंगा अब इस शहर के लिए एक अभिशाप बन गई है..

1977 के आस पास जब भरतपुर जिले के निवासी जगन्नाथ पहाडिया राजस्थान के मुख्यमंत्री बने उस समय इस नहर को लेकर कोई ठोस कार्ययोजना बनाई गई. अपने 11 माह के कार्यकाल के बाद जब पहाडिया कुर्सी पर नहीं रहे तो वो कार्ययोजना भी कहीं कागजों में ही गुम हो गई. उसके बाद तो अल्पकालीन योजनाऐं बनती रही और लोगों की जेब गरम होती रही. सुजान गंगा बद से बदतर हो विनाशकारी दिशा में बढती चली गई.

स्वंयसेवी संस्था देव जन कल्याण संस्थान के निदेशक मधुवन सिंह गुर्जर का इस संबंध में कहना था कि सरकारें प्रदेश में पानी के लिए हायतौवा तो कर रही है लेकिन किसी का भी ध्यान पारम्परिक जलस्त्रोतों की ओर नहीं है. भरतपुर शहर में आने वाले दिन पीने के पानी की दृष्टि से बहुत बुरे दिन आने वाले है. सुजान गंगा नहर इसका बेहतर विकल्प हो सकती है. सरकार और उसके नुमाइंदो का इस ओर ध्यान ही नहीं है. इस शहर के वासी भी कम दोषी नहीं है जिन्होंने अपने आशियानों की सफाई के चक्कर में इतिहास की इस धरोहर को नष्ट होने के कगार पर पहुँचा दिया है.

बर्ष 2003 की 6 मार्च को राजस्थान उच्च न्यायालय ने सुजान गंगा नहर की सफाई,गंदे पानी की आवक रोकने और स्वच्छ पानी की व्यवस्था करने संबंधी आदेश राज्य सरकार को दिये थे. इन आदेशों की कोई पालना नहीं हुई. उल्टे कागजात गायब कर किसी भी दोषी अधिकारी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की. हाल ही में न्यायालय ने दर्जनों अधिकारियों को तलब कर आदेशों की अवमानना करने को लेकर कडी फटकार लगाई. नगरीय विकास विभाग के प्रमुख सचिव के अनुरोध पर आगे 2 महीने का समय दे दिया है. न्यायालय ने गलत जानकारी देने ओर रिकार्ड गायब होने के कारण एडीएम को कडी फटकार लगाई. एडीएम ने शपथ पत्र पेश कर न्यायालय से माफी माँगी है.

सुजान गंगा नहर एक प्रकार से सेप्टिक टैंक का रूप ले चुकी है. शहर भर की गंदगी नालियाँ, कूडा करकट, पाँलिथीन और मैला नहर में डाला जा रहा है. नहर का पानी बिल्कुल हरा नजर आता है. इसके पास से गुजरने के दौरान आने वाली बदबू ने लोगों को परेशान कर रखा है. नगरपरिषद ने हाल ही में नहर से पाँलिथीन निकालने का करीब पाँच लाख का ठेका दे दिया है.

सुजान गंगा नहर के जीर्णोद्वार,प्रदूषण मुक्त करने और पर्यटन महत्व का बनाने के लिए राज्य सरकार ने 120 करोड की एक कार्ययोजना बनाई है. जिसमें से 56 करोड की वित्तीय स्वीकृति शीघ्र जारी  करने  का भरोसा मुख्यमंत्री ने सांसद रतनसिंह को दिया  है. स्थानीय लोगों की माने तो एक बार फिर सरकारी हुक्मरानों और नेताओं के नहर के सहारे करोडपति होने के दिन आ गये है. इस नहर के जीर्णोद्वार और साफ सफाई ने अब तक न जाने कितने ही लोगों के जीवन का उद्वार कर दिया है. पर सुजान गंगा का न तो उद्वार हुआ और न ही आगे होने वाला है.

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Jitendra Dave on 15 May, 2010 04:23;40
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भाई साहब, सुजान गंगा क्या, अशोक गहलोत के राज में पूरा राजस्थान ही खतरे में है. महारज को पूर्ववर्ती सरकार को कोसने से ही फुरसत नहीं है. प्रदेश का विकास क्या ख़ाक करेंगे?
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सोनू on 15 May, 2010 20:09;31
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राजीवजी शर्मा को हिंदी में टाइप करना नहीं आता।
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Mahendra Singh on 19 June, 2010 16:04;26
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महाराज अपने राज की चिंता कर रहे हैं. उन्हें तो साथ में अपनी मूंछो की चिंता है. लोगो के जीवन की उनको कोई चिंता नहीं है. सुजान गंगा की चिंता कौन करेगा.ये तो घर के शेर कहलाते हैं. फिर भी घर की सफाई का ध्यान नहीं रखते. अरे कुत्ता भी जब बैठता है तो पूँछ से झाड कर बैठता है.
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image राजीव शर्मा राजीव शर्मा राजस्थान में रहकर मुक्त पत्रकारिता कर रहे हैं.इससे पूर्व कइ अखवारों के लिए रिपोटिंग कर चुके हें। राजनीति के अलावा पानी-पर्यावरण के मुद्दे पर संवेदनशील रिपोर्टिंग के लिए प्रयासरत। विस्फोट के लिए राजस्थान से नियमित लेखन और रिपोर्टिंग. rsmediaraj@gmail.com
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