चिकित्सक के अभाव में बागी 'शेरा' मौत के कगार पर
लखनऊ प्राणि उद्यान से आए गजराज सुमित की अव्यवस्थाओं और समुचित उपचार के अभाव में विगत माह जुलाई में हुई असमय लाचारी और बेबसी वाली दर्दनाक मौत दुधवा नेशनल पार्क के इतिहास का काला अध्याय बनी ही साथ में दुधवा की व्यवस्थाओं पर प्रश्नचिन्ह भी लगाया। इसके बाद भी दुधवा नेशनल पार्क प्रशासन ने ऐसा लगता है कि कोई उससे सबक नहीं लिया है। शायद इसी का परिणाम है कि मेरठ से लाए गए बागी हाथी 'शेरा' के जिन्दगी की जीवन की डोर भी धीरे-धीरे संकुचित होने लगी है।
इसका भी मुख्य कारण है कि शेरा के शरीर पर कई गहरे जख्म हैं जिनका समुचित उपचार न होने के कारण उनसे भारी मात्रा में मवाद का रिसाव लगातार हो रहा है, जिससे उसका शरीर धीरे-धीरे कमजोरी की चादर ओढ़ने लगा है। मोहताजी और ऊपर से जख्मों के दर्द ने शेरा के आराम को हराम कर दिया है, नींद शेरा की आंखों से दूर भागने लगी है। वह लगातार जागते हुए इधर-उधर हिलता-डुलता रहता है। यह स्थिति शेरा के भविष्य के लिए खतरनाक बताई जाने लगी है। इसको जानते हुए भी वन विभाग के अफसर शेरा की जिन्दगी को बचाने के लिए कोई सार्थक उपाय नहीं कर रहे हैं। केवल दिखावे के तौर डव्ल्यूटीआई के पशु चिकित्सक से शेरा का उपचार कराकर अपनी नाकामियों पर पर्दा डाल रहे हैं। किसी वन्यजीव विशेषज्ञ चिकित्सक से शेरा का इलाज कराना तो दूर रहा उसका परीक्षण तक न कराया जाना ही इस बात के स्पष्ट संकेत हैं कि दुधवा के अफसर शेरा के गिरते स्वास्थ्य को लेकर कतई गंभीर नहीं हैं।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के धनकुबेरों के घरानों में होने वाली अधिकांश शादी-बारातों में शानो-शौकत का गवाह बनने वाला गजराज शेरा इसी साल तीन मई को अज्ञात कारणों से तब बागी हो गया था जब वह शान से सजासंवरा मेरठ के सांसद मुनकाद अली और कादिर राणा के बेटा-बेटी के निकाह में द्वाराचार करा रहा था। इस दौरान अचानक शेरा पर पागलपन सवार हो गया और उसने महावत को नीचे गिराकर भारी उत्पात मचाया, भगदड़ मची कई लोग घायल भी हुए, यहां तक दिल्ली-मेरठ नेशनल हाइवे भी करीब तीस घंटा तक जाम रहा था। इसकी कारस्तानी की गूंज लखनऊ तक पहुंची तब बागी शेरा को काबू में करने के लिए लखनऊ प्राणि उद्यान के वरिष्ठ चिकित्सक डा. उत्कर्ष शुक्ला शासन के निर्देश पर स्पेशल फ्लाइट से मेरठ गए और खासी मशक्कत के बाद उसे बेहोश करने में कामयाब हुए थे। तत्पश्चात वन विभाग के उच्चाधिकारियों के आदेश पर बागी हाथी शेरा को महावत नासिर दुधवा नेशनल पार्क लेकर आए थे किंतु उसे दुधवा से दस किमी दूर जंगल के अंदर सलूकापुर शिफ्ट कर दिया गया था। बागी शेरा को काबू करते समय उस पर गोलियां भी चलाई गई थीं, और भाला से भी वार किए गए थे। इससे शेरा के शरीर पर जगह-जगह गहरे जख्म हो गए थे। दुधवा नेशनल पार्क क्षेत्र के अंतरगत सलूकापुर फारेस्ट गेस्ट हाउस के हाथीखाना में रखकर शेरा के जख्मों का उपचार किसी वन्यजीव विशेषज्ञ चिकित्सक से कराने के बजाय डव्ल्यूटीआई के पशु चिकित्सक के द्वारा शेरा का इलाज किया जाता रहा। जबकि कायदे से शेरा को दुधवा में ही रखकर उपचार कराया जाना चाहिए था। लेकिन दुधवा के अफसरों ने शेरा को उसके हाल पर छोड़ दिया। इसका दुष्परिणाम यह निकला कि शेरा के शरीर के कुछ जख्म तो ठीक हो गए और कुछ नासूर बन गए हैं। इनमें शेरा के पिछले भाग में दाहिने पुट्ठा समेत घुटनों और पीठ में बने गहरे घावों से भारी मात्रा में मवाद का रिसाव होता है, यहां तक शेरा के दातों से भी मवाद आने लगा है। जख्मों के दर्द ने शेरा का सुख-चैन छीन लिया है। शायद यही कारण है कि नींद उसकी आंखों से दूर होने लगी हैं और वह जागते हुए बैचेनी में अपनी जिंदगी गुजारने को विवश हो गया है।
गजराज शेरा की हुई दयनीय दशा की बावत यह बात प्रमुखता से उभर कर सामने आई है कि दुधवा नेशनल पार्क में जरूरत होने के बाद भी वन्यजीव विशेषज्ञ चिकित्सक का पद शासन से स्वीकृत नहीं है। जबकि दुधवा नेशनल पार्क को बने हुए लगभग तैंतीस साल का वक्त गुजर चुका है। और वह यूपी का एकमात्र नेशनल पार्क है। इसके बाद भी दुधवा में वन्यजीव विशेषज्ञ चिकित्सक की नियुक्ति न होना ही वन विभाग के उच्चाधिकारियों की उदासीनता को दर्शाती है कि वह दुधवा के वन्यजीवों को लेकर कतई गंभीर नहीं हैं। वन्यजीव विशेषज्ञ चिकित्सक न होने के कारण अक्सर समुचित उपचार के अभाव में घायल अथवा बीमार वन्यजीव या फिर पालतू हाथी असमय कालकवलित हो जाते हैं। पिछले दो दशक के भीतर आपसी प्रणय द्वन्द-युद्ध में घायल हुए एक नर एवं एक मादा गैंडा तथा गैंडा के एक बीमार बच्चे की असमय मौत होने के साथ दो मादा हाथियों व एक मादा बच्चा भी बीमारी के दौरान उपचार के अभाव में कालकवलित हो चुके हैं। हाल ही में विगत माह जुलाई में लखनऊ प्राणि उद्यान से आए गजराज सुमित की मौत भी समुचित उपचार के अभाव में लाचारी एवं बेबसी में हो गई थी। जबकि आंखों से अंधे सुमित को स्वास्थ्य लाभ के लिए प्राकृतिक वातावरण में रखने के उद्देश्य से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था। वह दुधवा में रहकर स्वस्थ्य तो नहीं हो पाया वरन् अफसरों की उदासीनता और लापरवाही के कारण मौत उसका नसीब बन गई थी। सुमित की असमय मौत से भी दुधवा नेशनल पार्क प्रशासन अथवा वन विभाग के आलाअफसरों ने कोई सबक नहीं लिया। शायद इसी का परिणाम है कि शेरा को दुधवा में रखने के लिए लाया तो गया था परन्तु उसे दुधवा में नहीं रखा गया। अफसरों ने मनमानी करके शेरा को सलूकापुर में रखकर लगभग तीन माह तक उसका उपचार कराया। लेकिन कोई उसे कोई खास फायदा नहीं पहुंचा, जिसके कारण शेरा की दशा दिनोंदिन खराब ही होती चली गई।
शेरा की दयनीय दशा के पीछे अफसरों की उदासीनता भी मुख्य कारण रही। वह भी इसलिए क्योंकि सलूकापुर तक पहुंचने के लिए कच्चा वनमार्ग है। जिस पर से वरसात में वाहन निकालना लगभग असंभव है, तो चिकित्सक वहां तक कैसे जाते होंगे? इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। जब चिकित्सक जरूरत के मुताबिक सलूकापुर प्रतिदिन नहीं पहुंच सकता था तो शेरा को सलूकापुर में क्यों रखा गया? यह प्रश्न भी स्वयं में बिचारणीय बन गया है। इन परिस्थियों में स्पष्ट हो जाता है कि शेरा का इलाज केवल खानापूर्ति के तौर ही कराया जाता रहा। जिसका दुष्परिणाम यह निकला कि अफसरों की मनमानी के चलते नियमित इलाज न होने से शेरा की दशा बद् से बद्तर होती चली गई। अब शेरा की स्थिति यह है कि वह ठीक से खड़ा भी नहीं हो पा रहा है। उसकी गिरती हालत को देखकर यहां के कुछ वन्यजीव प्रेमियों ने लखनऊ में बैठे वन विभाग के आलाअफसरों को दी तब उनको भी शेरा का ख्याल आया। उन्होंने दुधवा के अफसरों से पूछताछ शुरू कर दी। इस चेते दुधवा के अफसर भी सक्रिय हुए और उनके निर्देश पर शेरा को किसी प्रकार 09 सितंबर को सलूकापुर से दुधवा लाया गया है। दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर शैलेष प्रसाद भी आनन-फानन में दुधवा पहुंच गए और शेरा को देखकर उसकी सेहत का जायजा लिया साथ ही उसकी उचित देखभाल करने का फरमान तो सुना दिया। लेकिन शेरा के स्वास्थ्य का परीक्षण अभी तक किसी वन्यजीव विशेषज्ञ चिकित्सक से नहीं कराया गया है। इस पर चिन्ता जाहिर करते हुए सृष्टि कंजरवेशन एंड वेलफेयर सोसाइटी उप्र की फाउंडर सदस्य विनीता सिंह ने सूबे के प्रमुख वन संरक्षक वन्यजीव को पत्र भेजकर शेरा का उपचार वन्यजीव विशेषज्ञ चिकित्सक से कराने की मांग की है, तथा शेरा के उपचार में लापरवाही बरतने की जांच कराकर दोषी के खिलाफ कार्यवाही किए जाने की भी बात कही है। उन्होंने पत्र में कहा है कि समय रहते शेरा का समुचित उपचार वन्यजीव विशेषज्ञ चिकित्सक से नहीं कराया गया तो सुमित की तरह ही शेरा का भी हश्र हो सकता है इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है। यह भी शेरा के भाग्य की बिडंवना ही कही जाएगी कि लखनऊ में बैठे वन विभाग के उच्चाधिकारियों ने अदूरदर्शितापूर्ण तुगलकी फरमान जारी करके शेरा को मेरठ से दुधवा तो भेजवा दिया था, लेकिन उसकी सेवा के लिए अलग से न महावत की ब्यवस्था कराई और न ही उस पर होने वाले खर्च का बजट ही भेजा है। जिससे शेरा भी पूर्ववर्ती मृतक गजराज सुमित की तरह बजट की कमी और उचित देखभाल के अभाव में लाचारी और बेवशी में मोहताजी की जिन्दगी गुजारते हुए दूसरों की दया पर निर्भर होकर रह गया है।
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