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गिद्ध लौट आये हैं

image बयाना की पहाड़ियों में लांग-बिल्ड प्रजाति का भारतीय गिद्ध

पर्यावरण के खिलाफ लगातार मिलती बुरी खबरों के बीच यह एक अच्छी खबर है कि गिद्ध लौट आये हैं. भरतपुर के इस बयाना इलाके में वे दुर्लभ गिद्ध दिखाई दे रहे हैं जो कोई दशक भर पहले यहां से गायब हो चुके थे. मानवीय अपराधों के शिकार गिद्धों के इस इलाके में दोबारा लौट आने से प्रकृति प्रेमियों ही नहीं सामान्य पशुपालकों में भी आशा की नयी उम्मीद जागी है. गिद्धों का लौट आना सबके लिए शुभ संकेत है.

राजस्थान के पूर्वी सिंह द्वार कहे जाने वाले भरतपुर जिले में स्थित पक्षियों के स्वर्ग कहे जाने वाले घना पक्षी विहार में भले ही विदेशी पक्षियों के न आने से वीरानी हो, मगर पक्षी प्रेमियों के लिए एक अच्छी खवर यह है कि ऐतिहासिक बयाना शहर की पहाड़ियॉ इस बार फिर से गिद्वों की उपस्थिति से आबाद हो गई है।प्रकृति के हमसफर कहे जाने वाले गिद्वों को बयाना के खडे पहाडों की चटटाने बहुत दिनों से अपने लिए रास आ रही थी। जिन पर उनका मड़राना इस क्षेत्र के लोगों के लिए भी सुखद था, मगर पिछले एक दशक से गिद्वों की यह दुर्लभ प्रजाति इस क्षेत्र से पूरी तरह पलायन कर गई थी.

लेकिन इस बार लगभग एक दर्जन गिद्ध इन पहाडियों के ऊपर मंडराते दिखाई पड रहे हैं। ये गिद्ध लांग बिल्ड प्रजाति के हैं जो कि बिल्कुल लुप्त होने के कगार पर घोषित किये जा चुके है. लांग बिल्ड प्रजाति के गिद्ध का मूल स्थान हिमालय है लेकिन उत्तर भारत के मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान इलाकों में भी इसी प्रजाति के गिद्ध पाये जाते हैं. जिन पहाड़ियों पर ये गिद्ध मंडराते हुए दिखाई दे रहे हैं वे बयाना से हिण्डोन सडक मार्ग के किनारे स्थित ये दुर्गम पहाड़ियां सिकन्दरा गॉव के पास है. इन्हीं पहाड़ियों पर आजकल इन गिद्वों को उडते हुआ देखा जा सकता है। लांग बिल्ड प्रजाति के इन गिद्धों के संरक्षण के प्रयास किये जा रहे थे मगर कछुआ गति के प्रयासों से कोई सफलता मिलती उससे पहले ही ये गिद्व अपने उस स्थान पर फिर से दिखाई पड गये जिसकी पहचान इन्ही के कारण थी ।

आज जब विलुप्त होते गिद्ध दिखाई पड़ने लग गये है तो इनकी चिंता करने वाले भी सामने आ रहे है. उन दिनों ऐसे गिद्ध प्रेमी भी गुम हो गये थे जब गिद्वों की यह प्रजाति भी विलुप्त मान ली गई। हालांकि आजकल बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी इन गिद्वों की हलचलों की देखभाल कर रही है। आमतौर पर पशु पक्षी इंसानों के रहने की जगहों के आस पास रहने लग जाते है मगर इन गिद्वों के आवास पहाडियों की उन चटटानों में बने हुए है जो बिल्कुल ही खडी हैं और जिनपर इंसान का आना जाना भी संभव नहीं है। गिद्धों का डेरा इन्हीं पहाड़ियों पर बना है क्योंकि आम तौर पर ये गिद्ध इंसानों से दूर रहते है। पहाडी की चटटानों में इनके घोंसले भी अजीब किस्म से बने होते है।लांग विल्ड गिद्वों की यह प्रजाति पूरी तरह से मांसाहारी है और यही कारण इनके विनाश के पीछे भी माना जा रहा है। मरे हुए पशुओं से भोजन प्राप्त करने के कारण ही इन्हें प्रकृति का हमसफर कहा जाता है। स्थानीय निवासी बताते हैं कि जब इन गिद्वों की इस क्षेत्र में काफी संख्या थी तो मरे हुए पशुओं की सफाई का काम ये गिद्ध बखूबी कर दिया करते थे. अपने लिए भोजन की तलाश में ये गिद्व सैकडों किलोमीटर की यात्रा कर लेते है पशु की मौत का की भनक इन्हें बहुत जल्दी लग जाती है और ये उस स्थान की ओर कूच कर जाते है। लेकिन जबसे गिद्ध गायब हुए सड़कों के किनारे मरे हुए पशुओं की फैलती सड़ांध आम बात हो गयी थी जिससे लोग बहुत परेशान होते है। फसलों में कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग और मानव की पशु बनने की प्रवृति ने इस प्रजाति के समक्ष जीवन का संकट खडा कर दिया था। 

कैसे आया गिद्धों पर संकट?

दुधारू पशुओं से उनकी क्षमता से अधिक दूध लेने की कोशिशों में लोगों ने डाइक्लोफेनेक दवा का इस्तेमाल शुरू किया जिसके प्रभाव ने लोगों को पशुओं का दूध तो बढ़ा दिया लेकिन उसके दुष्परिणामों ने गिद्वों को मौत के कगार पर लाकर खडा कर दिया। ऐसी दवाओं से प्रभावित पशुओं के मरने पर जब गिद्व उन्हें खाते है तो विसरल व्हाइड नामक बीमारी से ग्रसित हो जाते है जो उनके गुर्दे को पूरी तरह से बेकार कर देती है जिसके बाद गिद्व की मौत ही हो जाती है। राजस्थान के इस इलाके में पशुपालकों की बहुतायत है जो विक्री पर प्रतिबंध होने के वावजूद इस दवा की व्यवस्था अपने लालच के कारण कर ही लेते है। मनुष्य की लालच का अंत नहीं है. इतना सब होने और देखने के बावजूद आज भी बाजार में खुलेआम इस दवा को मैडीकल की दुकानों पर बिकते हुए देखा जा सकता है।

बहरहाल एक बार फिर से गिद्वों के दिखाई पडने से न केवल इस क्षेत्र के लोगों को अच्छा लग रहा है पक्षी प्रेमियों के लिए भी एक अच्छी खबर है। लेकिन मानव ने यदि अपनी प्रकृति के विनाश करने की मनोवृति में बहुत जल्दी सुधार नही किया तो वो दिन दूर नही जब उसके स्वयं के अस्तित्व पर ही इसी तरह का खतरा मडरा जाएगा। उस समय प्रकृति के ये मूक प्राणी उसके लिए उतना भी कुछ नही कर पाऐगें जितना आज इंसान उनके लिए थोडा बहुत कर पा रहा है क्योंकि कौन जाने मनुष्य सभी प्रकार के पशु पक्षियों का अंत करके ही अपने अंत को निमंत्रण दे दे?

s.rajeevsharma@yahoo.com

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arjun sharma on 03 January, 2009 16:09;29
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yeh bahut achi aur samvedansheel story hai. Rajiv ji ko badhai
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ghughutibasuti on 03 January, 2009 16:45;04
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सही कह रहे हैं। बचपन में हर जगह दिखने वाले ये गिद्ध आज गायब हो गए हैं और परिणाम स्वरूप मरे जानवारों की केवल बास रह गई है।
घुघूती बासूती
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dalchand dhakad on 03 January, 2009 18:29;52
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aapki yah giddon ke khabar mujhe bahut acchi lage.
thanku you rajeev sharma
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ummed Singh Baid Saadhak on 04 January, 2009 16:12;56
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जुङा हुआ है परस्पर, जीवन का व्यापार.
एक मरे तो दूजे को, मरना निश्चित सार.
मरना निश्चित यार,कि मानव लोभ में भूला.
स्वयं कङाही पर चढ कर, सुलगाता चूल्हा.
पर साधक यह प्रकृति माँ,पुनः हो गया सिद्ध.
कृपा हो गई मानव पर, लौट आये हैं गिद्ध.
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A Pathak on 04 January, 2009 16:28;08
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story achhi hain lekin aur achhi ho sakti thi. feature k abjay news formet yada lag raha hin.
kee it up
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rlcha arya on 06 February, 2009 12:52;18
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i really like yr views
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image राजीव शर्मा राजीव शर्मा राजस्थान में रहकर मुक्त पत्रकारिता कर रहे हैं.इससे पूर्व कइ अखवारों के लिए रिपोटिंग कर चुके हें। राजनीति के अलावा पानी-पर्यावरण के मुद्दे पर संवेदनशील रिपोर्टिंग के लिए प्रयासरत। विस्फोट के लिए राजस्थान से नियमित लेखन और रिपोर्टिंग. rsmediaraj@gmail.com
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