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पानी नहीं पिला सकते तो सरकार भी नहीं चला सकते

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28 अप्रैल को माननीय उच्चतम न्यायालय ने एक आदेश दिया है जिसके तहत न्यायालय ने भारत सरकार को लताड़ लगाते हुए कहा है कि सबको पानी नहीं पिला सकते तो फिर सरकार भी नहीं चला सकते. माननीय न्यायलय ने भारत सरकार से कहा है कि जल्द से जल्द बरसाती पानी को रोकने के लिए देशज और स्थानीय ज्ञान को प्रमुखता देते हुए योजना तैयार करे. न्यायालय ने जल को मौलिक अधिकार बताते हुए सबको पानी उपलब्ध कराने की जिम्मेवारी सुनिश्चित करने का आदेश दिया है।

जल संकट के समाधान के लिए विदेशी विशेषज्ञों को शामिल करते हुए एक समिति बनाने को कहा है जो हर दो महीने में प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी। यह सरकारी तंत्र को लोक के लिए जिम्मेवार बनाने की दिशा में स्वागत योग्य कदम है, लेकिन खारे पानी को पीने लायक बनाने हेतु विदेशी व्यक्तियों तथा कंपनियों को जिम्मेवारी देना शंकाप्रद है। भारत सरकार को दो महीने के भीतर उच्चस्तरीय समिति बनाने की सख्त हिदायत दी गई है। समिति देश में पानी की कमी दूर करने के लिए युध्द स्तर पर अनुसंधान करायगी। कोर्ट के सामने जो याचिका सुनवाई के लिए आई थी, वह देश में तेजी से लुप्त होती दलदली जमीन को बचाने के मकसद से दायर की गई थी। पर अदालत ने याचिका के दायरे को बडा करते हुए इसे देश के विभिन्न हिस्सों में गहराते पानी के संकट से जोड. दिया। प्रस्तावित समिति विदेशी वैज्ञानिको और विदेशों में बसे गए भारतीय वैज्ञानिको का सहयोग और परामर्श ले सकेगी। वैसे तो अनुसंधान जल संकट के हर क्षेत्र में किया जाएगा, लेकिन मुख्य जोर``खारे पानी को पीने लायक बनाने ´´पर होगा। सरकार से कहा गया है कि समिति अदालत की अपनी पहली रिपोर्ट ग्यारह अगस्त तक सौंप दें।

सभी सभ्यताओं में पृथ्वी, हवा, आग और पानी को सृष्टि का मूल आधार माना गया है। पानी हर किसी की जरूरत है, इसलिए निजीकरण की हवा चलने के पहले, हाल तक समाज के लिए यह साझी संपदा थी। तालाबों, नदियों, कुओं, बावडियों को सहेजने के हर इलाके के अपने तरीके थे। राजकाज की नई शैली के चलते धीरे-धीरे जल इकाइयों के रखरखाव और इनकी देखरेख के काम से समाज दूर होता गया, वहीं अफसरशाही ने जबाबदेही की संस्कृति का जन्म नहीं हो सका। करीब छह साल पहले संयुक्त राष्ट्र ने पानी के अधिकार को बुनियादी मानव अधिकारों में शामिल किया था। भारत के संविधान में पानी का अधिकार अलग से मौलिक अधिकारों में शामिल नहीं है। मगर न्यायपालिका ने कई फैसलों में संविधान के अनुच्छेद इक्कीस के तहत जीवन के अधिकार की व्याख्या करते हुए इसमें पानी के अधिकार को शामिल माना है। नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए अनूकूल स्थितियां बनाना शासन की जिम्मेदारी है। इस दृष्टि से देखा जाए तो हमारे देश में केंन्द्र या राज्यों में बनने वाली तमाम पार्टियों की सरकारें अपने संवैधानिक दायित्व के निर्वाह में नाकाम साबित हुई है।

यह पहली बार नहीं है, जब देश की सर्वोच्च अदालत ने पानी के अधिकार को जीवन के अधिकार का अहम हिस्सा बताया है। मगर इस अधिकार के उल्लंघन को रोकने के लिए जिस मुस्तैदी से नीतियां बनाई जाती है। उन पर अमल होना है, वह नहीं हो पाया। पानी को किसी नागरिक का मौलिक अधिकार मानने के नजरिए की तुलना बाजारवादी सोच से की जा सकती है, जो इसे खरीद-बिक्री का सामान मानता है। शीतल पेय बनाने विदेशी कंपनियों के भारत आने के बाद पानी के निजीकरण का यह आलम हुआ है कि एक नदी तक लीज पर दे दी गई थी। पेयजल की समस्या का एक निदान बारिश का पानी है। उच्चतम न्यायालय वर्षाजल को सहेजने के रास्ते को उपाय बताता है तो भारत का राज-समाज अपने राष्ट्र को समृध्द बनाने हेतु जल स्वराज का रास्ता अपनाता रहा है। आज हमारे जीवन के आधार प्राक्तिक संसाधन-जल,जंगल और जमीन सभी समाज के हाथों से निकलते जा रहे हैं और पानी के जरिए पैसे की लूट बढ रही है। पांच वर्षों में भारत की कमाई का एक बडा हिसा पानी के व्यापार से विदेश जाने की तैयार कर रहा है। बापू को जैसे ही यह गंभीर खतरनाक खेल समझ में आता , वे तुरन्त इसे रोकने की मुहिम खडी करते। उच्चतम न्यायालय का निर्णय भी इस दिशा में पहल बन सकता है।

पेयजल में अन्याय, अत्याचार और हिंसा को रोकने की इस मुहिम का आधार बापू को केवल भाषण नहीं सूझता, बल्कि वे चरखे की तरह कोई रचनात्मक उपाय ढूंढते और इसका रचनात्मक उपाय तो ``तालाब´´ही है। तालाब जल सहेजता है। सभी को समानरुप से प्राप्त करने का सत्याग्रह भी बनाए रखता है। बरसाती जल प्रबंधन के सस्ते उपायों की तरफ सरकार का ध्यान दिलाना, उच्चतम न्यायालय का स्वराज और सुराज्य की दिशा में अच्छा कदम है। तालाब के निर्माण में किसी कंपनी से पैसा लेने की जरूरत नहीं होगी। समाज के लोग अपने श्रम और समझा से मिलकर तालाब का निर्माण कर सकते हैं। समाज के निर्माण की प्रक्रिया समाज को जोडने से शुरु होती है। समाज में सब मिलकरए संगठित होकर ही तालाब का काम शुरु करते है। सहले महाजन, सेठ,जमींदार तालाब बनाने हेतु पैसा और जमीन देता था। अब राज्य सरकार पैसा और जमीन देने का दायित्व निभाए। नरेगा जैसी अच्छी योजना इस दिशा में महात्मा गांधी की खादी योजना जैसी सरल-स्वावलंबी योजना बन सकती है। लेकिन इसे ईमानदारी से चलाने की जरूरत है। नरेगा पानी पिलाने वाली योजना के रूप में काफी सफल हो सकती है। तालाब में जो पानी रुकता है, वह धरती का कटाव रोककर, प्रक्ति के शोषण को समाप्त करता है। गांव के गरीब से गरीब इंसान और पशुओं को पानी मुहैया कराता है। धरती का पेट भरता है। कुंओं का पुनर्भरण होता है। और यह काम पूरे समाज को पानीदार यानी जल संपन्न और स्वाभिमानी बनाता है। जैसे चरखा समाज को श्रमनिष्ठ, निर्भय और समृद्ध बनाता है। तालाब विश्व के गरीबतम प्राणी को बिन पैसे जिंदा रखता है। जल पर सबका समान हक कायम रखता है।

गांधी जी को चरखा ढूंढने में बहुत समय लगाना और मेहनत करनी पडी थी। क्योंकि तब तक विदेशी कपडा हमारे चरखे को निगल चुका था। आज बडे बांध और सुरंग तालाबों की संस्कृति को निगलना शुरु कर चुके हैं। तालाब खत्म हो रहे हैं। ढेर सारे तालाब कचरा घर बन गए हैं। शहरों ने अपने तालाबों पर पार्क, बस अड्डे बना लिए हैं। इनके कब्जो हटवाने का बहुत अच्छा निर्णय उच्चतम न्यायालय ने दिया था। लेकिन उसकी अवमानना हो रही है। परन्तु कन्याकुमारी से कश्मीर तक और गुवाहाटी से गुजरात तक आज भी कुछ तालाब बचे हुए हैं। मेवात, छत्तीसगढ, उडीसा, राजस्थान और गुजरात के गांवों में तो आज भी तालाब खरे हैं और तालाब के सिवा दूसरा कोई सहारा समाज को जिंदा रखने के लिए मौजूद नहीं है। बहुत से गांव केवल तालाब के पानी पर जिंदा हैं। इस गांवों की जिन्दगी बिन पैसे भी तालाब के किनारे बची रहेगी। पेयजल से लेकर खेती, उद्योग, घर की जरूरतें, सब में ही तालाब का उपयोग होता है।

हमारे उच्चतम न्यायालय ने अपने देशज ज्ञान पर भरोसा रखकर बरसाती जल प्रबंधन को बढाावा देने का सुझाव दिया है। यह अच्छा है। सामुदायिक विकेन्द्रित जल प्रबंधन भारत की बाढ़-सुखाड का समाधान है। सभी को पेयजल उपलब्ध कराने वाला सच्चा रास्ता है। लेकिन समुद्र के खारा जल को मीठा बनाना प्रकृति के नियम के विपरीत `रावणी प्रयास´ है। समुद्र जल तो मनुष्य के लिए नहीं हैं। मनुष्य को अपने पानी पर ही अपनी हकदारी और जिम्मेदारी सुनिश्चित करनी चाहिए। न्यायालय तो हमें हमारी हद और हक बताने वाला है। पानी के लिए विदेशी आए और भारत को पानी पीना सिखाएं, यह अच्छा नहीं है। जल साझा है, समाज और राज मिलकर साझा जल प्रबंधन करें तो बेपानी भारत पानीदार बन सकता है। हमारे उच्चतम न्यायालय की मंशा भी यही लगती है। इसका पूरा देश स्वागत करता है। बरसाती पानी सबको पानी पीला सकता है। इसका सुप्रबंधन करने की जरूरत है। हमें उम्मीद है कि उच्चतम न्यायलय केवल अपने बरसाती जल प्रबंधन करने के निर्णय का पालन कराए। दरअसल, उच्चतम न्यायालय के अच्छे निर्णयों की पालन कराने की चिंता किसी को नहीं है, इसलिए संदेह है कि इस निर्णय का भी वैसा ही हाल सरकार करेगी, जैसा तालाबों के जीर्णोध्दार के बारे में निर्णय हुआ।

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tulsisinghbisht@gmail.com on 07 May, 2009 21:01;24
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`पानी नहीं पिला सकते तो सरकार भी नहीं चला सकते´ उच्चतम न्यायालय का आदेश काफी अच्छा लगा, परन्तु इस आदेश का पालन कौन सी सरकार करेगी। यह आने वाला वक्त बताएगा, क्योंकि पहले भी कई बार न्यायालय ने सरकार को फटकार लगाई है। उस पर किसी भी प्रकार का काम नहीं हुआ और अब पानी के संबंध में जो फटकार लगी है वो सही मायने में काफी ठीक लगाई है। अगर पानी ही समाप्त हो जाएगा और पानी के स्रोतों पर काम नहीं किया जाएगा, तो फिर जनता प्यासी ही मरेगी। पानी वाले राजेन्द्र सिंह को इसके लिए साधुवाद धन्यवाद।
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image राजेन्द् सिंह अलवर में पानी को पुनर्जीवित करनेवाली संस्था तरुण भारत संघ के संस्थापक सदस्य वर्तमान में उस संस्था के मुखिया है. जेपी आंदोलन से सामाजिक जीवन में उतरनेवाले राजेन्द्र सिंह 1984 में सरकारी नौकरी छोड़कर पानी बचाने मैदान में आये थे. मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित राजेन्द्र सिंह वर्तमान में देशभर में पानी के काम के लिए सक्रिय हैं.
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