लोगों के हाथ में बंदूक है तो यह उनका जुर्म क्यों?
लालगढ़ को अशांत घोषित कर दिया गया है. इस अशांति के मायने क्या हैं? क्या यह कि तकरीबन 187 गाँवों में संथाली आदिवासी लोगों ने अपनी कमेटियाँ बना ली हैं, वे अपने सुख-दुख का आपस में निपटारा करने का प्रयास कर रहे हैं, गाँव की किसी समस्या का समाधान गाँव में ही कर लेना चाहते हैं. यानि गाँव के लोगों का गाँव के लोगों पर शासन, एक छोटा सा लोकतंत्र आदिवासी समाज का लोकतंत्र. क्योंकि बडा़ लोकतंत्र बडों का हो चुका है इसलिये उन पर नज़र ही नहीं जाती.
बड़े लोकतंत्र का ढांचा बड़ा है, पुलिस है, फौज़ है, कानून की एक मोटी सी किताब भी है जिसमे पूरी अरब भर जनता को नियंत्रित करने के फार्मूले हैं पर फार्मूले वही लगा सकते हैं जो पढे़ लिखे हों. संथाली आदिवासी की स्थिति तो ये है कि रात के थोडे़ से अंधेरे को अपने भूख के साथ सान कर खा जाता है और सो जाता है. ऎसे में एक छोटा लोकतंत्र बडे़ लोकतंत्र के लिये खतरा बन जाता है. क्या मैं इस बडे़ लोकतंत्र को लोकतंत्र कहूँ? दरअसल वहाँ अशांति यही है कि वहाँ पुलिस और सेना नहीं है. और बिना पुलिस और सेना के कहीं शांति कैसे रह सकती है? क्या आप कल्पना करना चाहेंगे उस स्थान की जहाँ पुलिस न हो और लोग अपनी समस्यायें खुद हल कर लेते हों. यानि पुलिस के न होने का अर्थ है उन सारी चीजों का न होना जो पुलिस के होने के साथ मौजूद होती हैं.
लालगढ़ में आज की स्थिति पर कुछ भी कहने से पहले हमे उसकी ऎतिहासिकता में उसे देखना होगा, नवम्बर से अब तक दो बातें स्पष्ट रूप से उभर कर आयेंगी एक तो यह कि आदिवासी अपने जंगल की जमीन को किसी भी स्टील प्लांट के लिये देना नहीं चाहते वे नहीं चाहते कि अपनी जमीनों पर बुलोडोजर चलता हुआ वे देखें, पर सरकार ५००० एकड़, सज्जन जिंदल को देने पर तुली है. दूसरी यह कि वे सेना और पुलिस की सुरक्षा भी नहीं चाहते क्योंकि सुरक्षा के मायने अब वे जान चुके हैं और सुरक्षा से उन्हें खतरा है जिसके बाबत उन्होंने सड़कें काट डाली, आने-जाने के रास्ते बंद कर दिये. कई बार अपनी मांगों के साथ धरने पर बैठे जो कुल छोटी-बड़ी मिलाकर १३ मांगे थी, आस-पास के गाँवों को एकता बद्ध कर रैली निकाली. रैली पर गोली चलायी गयी और ३ युवाओं को मार दिया गया जो सभा की या एकता की अगुवाई कर रहे थे. मानों ३ गोलियों से तीन मांगे पूरी की गयी हों. उनकी जायज़ मांगों को देखते हुए सी.पी.एम. के कई कार्यकर्ता उनके साथ जुड़ गये. यह सब कुछ ऎसा चल रहा था मानों राज्य में एक नया राज्य कायम हो गया हो. फरवरी में आदिवासी-ओ-गैरआदिवासी एकता समिति बनायी गयी. इसके बनाये जाने के क्या मायने लगाये जायें? कि अब तक आदिवासियों और गैर आदिवासियों के बीच कोई एकता ही नहीं थी. शायद हां, शायद नहीं. यह एक शांति अभियान था ठीक वैसा ही जैसा सलवा-जुडुम. आदिवासी युवकों को जान से मारा जाने लगा और आदिवासियों द्वारा इन्हें भी इन्हीं के छीने हथियार से. यानि यह अपने स्वरूप में एक दूसरे को मारने की एकता की समिति बनी. मुर्दों की एकता, मरने के बाद चुप रहने की एकता, प्रतिरोध में खून की एकता. आदिवासियों के भूख और वंचना से उठे आक्रोश की एकता को तोड़ने के लिये उनके साथ हमेशा इसी तरह की एकता बनायी गयी.
लालगढ़ अब अशांत हो चुका था उसे शांत करने की जरूरत थी जिसका अर्थ था पुलिस और फौज को दुबारा तैनात किया जाना. क्योंकि हमारे देश में अशांत को शांत करने का एक मात्र यही तरीका है. यहाँ तक की भूख की आग भी पुलिस की तैनाती से शांत होती है. बूट की आवाज़ों से लोगों के कान सहम जायें और आवाज़ें चुप हो जायें. देश के २८ राज्यों में से २४ राज्य ऎसे ही हैं. लालगढ़ में फौज बुलायी गयी अर्ध सैनिक बल आये, पर घुसने में नाकामयाब रहे लोगों ने प्रतिरोध किया उन पर आंसू गैस छोड़ी गयी. लाठियां बरसायी गयी. पुलिस अंदर पहुंच कर घरों की तलाशी की, औरतों को नंगा करके उनकी तलाशी ली जा रही है. पर वह नहीं मिल रहा है जिसे पुलिस ढूढ़ रही है और जो मिल रहा है उसे देख भी नहीं रही. यह है उनकी भूख जो उनके नंगे होने के बाद भी उनके बदन पर चिपकी रह जाती है. अपनी ज़मीन के छीने जाने के प्रतिरोध का हल है अस्मत का लूटा जाना या मौत के घाट उतार दिये जाना. एक तथाकथित अति सभ्य समाज अपने निर्माण के लिये एक पिछ्डे़ कहे जाने वाले समाज के साथ यह सलूक उस समय होता देख रहा है जब दुनिया के सबसे बडे़ लोकतंत्र का चुनाव हुए दो माह भी नहीं बीते हैं. २० जून को लालगढ़ में पुलिस कब्जा जमाने के सिलसिले में ५ और आदिवासियों को मारा गया, यह ठीक उस समय हुआ होगा जब आप चाय पी रहे होंगे, किसी दफ्तर की ए.सी. में बैठे रहे होंगे या जहाँ भी रह कर खबर सुनी हो. क्या थोडी़ सी भी कम्पन शरीर में नहीं हुई. शायद सभ्य समाज का निर्माण यही है संवेदनाओं का मर जाना.
ठीक उसी दिन पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य जी प्रधानमंत्री और गृहमंत्री से मिलकर यह बताया कि लालगढ़ के लोगों को ममता बनर्जी व उनकी पार्टी का सहयोग मिल रहा है जिसमे माओवादी भी शामिल हैं,यह पहली बार नहीं कहा गया था बल्कि नंदीग्राम से सिंगूर तक कई बार कहा गया पर आश्चर्य कि इसी सहयोग करने के या सम्बन्ध होने के आधार पर बिनायक सेन को जेल होती है और तब तक कैद रखे जाते हैं जब तक वे कुछ नहीं करने लायक बचते यानि हृदय रोग की अवस्था में उन्हें छोडा़ जाता है पर ममता बनर्जी को बुद्धदेव जी जेल नहीं भेज सकते क्योंकि ममता बनर्जी बडे़ लोकतंत्र की बड़ी स्तम्भ हैं.
उनके हाथ में बंदूक है, तो यह उनकी वीरता है.
लोगों के हाथ में बंदूक है तो यह उनका जुर्म क्यों?
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