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हर नीलकेणी की एक राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी होती है

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image बाये से सुधा मूर्ति, नारायणमूर्ति, नंदन नीलकेणी और रोहिणी नीलकेणी

इन्फोसिस के बारे में कहा जाता है कि वह केवल एक व्यापारिक संस्थान भर नहीं है. वह उससे भी अलग कुछ है. इसी बात का प्रमाण उस समय मिल गया जब केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने नीलकेणी को देश के महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट (एनएयूआई) का अध्यक्ष बनाते हुए उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा दे दिया है, और नीलकेणी की राजनीतिक महत्वाकांक्षी को कुछ हद पूरा कर दिया है.

नंदन नीलकेणी इस समय इन्फोसिस के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं. नीलकेणी को राजनीति में उसी तरह दिलचस्पी है जैसे नारायणमूर्ति को. हालांकि नीलकेणी की राजनीतिक रूचि आम आदमी के बीच संघर्ष वाली नहीं है और वे प्रशासनिक मामलों में रूचि रखते हैं. लेकिन राजनीतिक गलियारों में उठना बैठना उन्हें भी अच्छा लगता है और कुछ हद तक यह उनकी व्यावसायिक मजबूरी भी है.

लेकिन जब हम इन्फोसिस के बारे में बात करते हैं तो किसी व्यावसायिक घराने की व्यावसायिक वजहों से राजनीति में रूचि एकमात्र कारण नहीं होता है. भारत में नव उदारवादी अर्थव्यवस्था के पहले से परंपरागत व्यावसायिक घरानों से अलग नये तरह के व्यावसायिक घराने पैदा होने शुरू हो गये थे. इनमें सबसे पहला नाम रिलांयस का है. रिलांयस ही वह पहली कंपनी है जिसने देश में जनता के पैसे को व्यवसाय के लिए भरपूर इस्तेमाल किया. भारत में शेयर बाजार का ऐसा व्यापक उपयोग रिलांयस से पहले किसी ने नहीं किया था और शेयर बाजार सिर्फ एक समुदाय के सट्टेबाजी का अड्डा भर हुआ करता था. जबकि सहारा समूह कारपोरेट को परिवार की शक्ल देकर कारपोरेट दुनिया के सामने एक नयी नजीर प्रस्तुत की थी. सहारा उस दौर में अस्तित्व में आया था जब देश में हड़ताल राज और बंद चरम पर था. उसने बड़ी चालाकी से परिवार व्यवस्था का नारा दिया और अपने परिसर से हड़तालियों को बड़ी सफाई से दूर कर दिया.

लेकिन इन्फोसिस ने ये दोनों प्रयोग मिलाकर किये और कारपोरेट कल्चर का नया स्वरूप विकसित किया. इन्फोसिस में काम करनेवाला व्यक्ति इन्फोसिस का कर्मचारी नहीं होता बल्कि मालिक होता है. उनसे देश की ग्लोबल होती इकोनोमी को एक नया और अलबेला रास्ता दिखाया जो सही अर्थों में कारपोरेट कल्चर की स्थापना करता है. इसके अलावा नारायणमूर्ति और नंदन नीलकेणी दोनों ने अपने सामाजिक सरोकारों से कभी पीछा नहीं छुड़ाया. नारायणमूर्ति के दौर में सुधा मूर्ति इंफोसिस फाउण्डेशन के जरिए सामाजिक काम कर रही थीं तो नीलकेणी के जमाने में यह काम रोहिणी कर रही हैं. सुधा मूर्ति जहां बेसहारा बच्चों और बेसहारा लोगों की सेवा को प्राथमिकता देती थीं वहीं रोहिणी पर्यावरण और परंपरागत ज्ञान को आधार देने का काम कर रही हैं.

क्या है नेशनल यूनिक आइडेन्टीफिकेशन? सबसे पहले एनडीए सरकार ने इस प्रस्ताव पर विचार करना शुरू किया था कि देश के हर नागरिक के विविध पहचान पत्र के स्थान पर एक ही पहचानपत्र होना चाहिए. पिछली यूपीए सरकार द्वारा इस दिशा में कोई खास काम नहीं हुआ. लेकिन सरकार जाने से कुछ महीने पहले 28 जनवरी को इस बारे में नोटिफिकेशन जारी किया गया. अब नंदन नीलकेणी इस आयोग के अध्यक्ष होंगे जिसका अनुमानित बजट 1,90,000 करोड़ होगा. नीलकेणी को उम्मीद है कि अगले एक से डेढ़ साल के अंदर वे पहला कार्ड का सेट जारी कर देंगे.

इसमें अन्यथा या निन्दा योग्य कुछ नहीं है. वे भी आईआईटी की उसी जमात के हिस्से हैं जो अपनी समझ के मुताबिक देश का निर्माण करना चाहता है. आईआईटी और आईआईएम कैसे शिक्षण संस्थान है और कौन से भारत का निर्माण कर रहे हैं यह बताने की जरूरत शायद किसी को नहीं है. लेकिन पिछले कुछ सालों में नारायणमूर्ति और नीलकेणी के कामकाज को ध्यान से देखें तो समझ में आता है कि उनकी सामाजिक जिम्मेदारी और राजनीतिक सक्रियता उनकी अपनी महत्वाकांक्षा है. वे चाहते हैं कि देश की व्यवस्था में अपने मुताबिक हस्तक्षेप किया जाना चाहिए. पिछली दफा जब राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया चल रही थी तो  यह खबर भी आयी थी कि अपनी इमेज बिल्डिंग के लिए नारायणमूर्ति ने एक पीआर कंपनी को किराये पर लिया है और वे भी अपना नाम राष्ट्रपति पद के लिए चलवाना चाहते हैं. उसी दौर में उनकी किताब भी आयी थी और एक हद तक उनको प्रचार मिला भी. 

ठीक उन्हीं के नक्शेकदम पर नंदन ने भी हाल में ही एक किताब लिखी है - इमेजिनिन्ग इंडिया. इस किताब में उन्होंने अपने सपनों के भारत का खाका खींचा होगा लेकिन इस किताब के प्रचार पर जमकर पैसे खर्च किये गये. पूरे देश के मीडिया हाउसों को एक तरह से किराये पर ले लिया गया और हर बड़े घराने ने इस किताब का गुणगान किया. नंदन की यह कवायद अनायास नहीं थी. नंदन लगातार राजनीतिक विषयों पर लिखते हैं और अपनी बेबाक राय से लोगों को अवगत भी कराते हैं. मसलन आमचुनाव में मायावती के खराब प्रदर्शन के बाद अपने ब्लाग पर उन्होने लिखा कि जाति हमारे लिए जड़ता है और कहीं न कहीं हमारे विकास में बाधक भी. उनका तर्क है कि दलितों के लिए सत्ता का सिर्फ एक ही मतलब है कि उनके लिए आरक्षण के दरवाजे खुल जाएंगे.

अब तक के उनके लेखन और कार्यकलाप को देखें तो इतना साफ समझ में आता है कि वे कांग्रेस के करीब हैं. इसलिए कांग्रेस की सरकार उनको देश के सबसे महत्कांक्षी प्रोजेक्ट का मुखिया नियुक्त कर रही है तो इसमें कुछ आश्चर्य नहीं है. पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम चाहते थे कि देश में हर नागरिक का एक यूनिक पहचानपत्र हो. आतंकवाद के खतरों के बीच सरकार भी इसे एक जरूरी कदम मान रही है क्योंकि सरकार में बैठे लोग मानते हैं कि इस एक कदम से देश की बहुत सारी आंतरिक समस्याओं का निदान हो जाएगा. यह एक स्वतंत्र विषय है कि इस प्रोजेक्ट का ही कोई महत्व भारत जैसे देश में है या नहीं, या फिर अगर यह प्रोजेक्ट लंबे समय से सरकार के विचाराधीन था तो अरबों रूपये परिचयपत्र बनाने पर क्यों खर्च किये गये? क्या केवल इसलिए कि टाटा कंसल्टेसी को एक बड़ा प्रोजेक्ट मिला रहे?

लेकिन फिलहाल तो नीलकेणी इस नये आयोग के अध्यक्ष होकर कुछ हद तक अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा कर सकेंगे. प्रोजेक्ट के लिए पहले चरण में 100 करोड़ रूपये का आवंटन हो चुका है इसलिए इंफोसिस के लिए सरकार के पैसे पर एक ऐसा प्रोजेक्ट भी मिल गया है जिसका आंकलन करने और प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाने का खर्च भी उसे नहीं उठाना है. और नीलकेणी की वह राजनीतिक महत्वाकांक्षी भी मुफ्त में पूरी हो जाती है जिसकी बेचैनी और तड़प उनके लेखन में लगातार दिखाई देती रही है. नये दौर के इस कारपोरेट युग में हर बिजनेसमैन की एक राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी होती है जिसे कांग्रेस जैसी सरकारें जमकर पूरा करती हैं.   

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