Home | जनता दरबार | हर नीलकेणी की एक राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी होती है

हर नीलकेणी की एक राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी होती है

image बाये से सुधा मूर्ति, नारायणमूर्ति, नंदन नीलकेणी और रोहिणी नीलकेणी

इन्फोसिस के बारे में कहा जाता है कि वह केवल एक व्यापारिक संस्थान भर नहीं है. वह उससे भी अलग कुछ है. इसी बात का प्रमाण उस समय मिल गया जब केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने नीलकेणी को देश के महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट (एनएयूआई) का अध्यक्ष बनाते हुए उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा दे दिया है, और नीलकेणी की राजनीतिक महत्वाकांक्षी को कुछ हद पूरा कर दिया है.

नंदन नीलकेणी इस समय इन्फोसिस के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं. नीलकेणी को राजनीति में उसी तरह दिलचस्पी है जैसे नारायणमूर्ति को. हालांकि नीलकेणी की राजनीतिक रूचि आम आदमी के बीच संघर्ष वाली नहीं है और वे प्रशासनिक मामलों में रूचि रखते हैं. लेकिन राजनीतिक गलियारों में उठना बैठना उन्हें भी अच्छा लगता है और कुछ हद तक यह उनकी व्यावसायिक मजबूरी भी है.

लेकिन जब हम इन्फोसिस के बारे में बात करते हैं तो किसी व्यावसायिक घराने की व्यावसायिक वजहों से राजनीति में रूचि एकमात्र कारण नहीं होता है. भारत में नव उदारवादी अर्थव्यवस्था के पहले से परंपरागत व्यावसायिक घरानों से अलग नये तरह के व्यावसायिक घराने पैदा होने शुरू हो गये थे. इनमें सबसे पहला नाम रिलांयस का है. रिलांयस ही वह पहली कंपनी है जिसने देश में जनता के पैसे को व्यवसाय के लिए भरपूर इस्तेमाल किया. भारत में शेयर बाजार का ऐसा व्यापक उपयोग रिलांयस से पहले किसी ने नहीं किया था और शेयर बाजार सिर्फ एक समुदाय के सट्टेबाजी का अड्डा भर हुआ करता था. जबकि सहारा समूह कारपोरेट को परिवार की शक्ल देकर कारपोरेट दुनिया के सामने एक नयी नजीर प्रस्तुत की थी. सहारा उस दौर में अस्तित्व में आया था जब देश में हड़ताल राज और बंद चरम पर था. उसने बड़ी चालाकी से परिवार व्यवस्था का नारा दिया और अपने परिसर से हड़तालियों को बड़ी सफाई से दूर कर दिया.

लेकिन इन्फोसिस ने ये दोनों प्रयोग मिलाकर किये और कारपोरेट कल्चर का नया स्वरूप विकसित किया. इन्फोसिस में काम करनेवाला व्यक्ति इन्फोसिस का कर्मचारी नहीं होता बल्कि मालिक होता है. उनसे देश की ग्लोबल होती इकोनोमी को एक नया और अलबेला रास्ता दिखाया जो सही अर्थों में कारपोरेट कल्चर की स्थापना करता है. इसके अलावा नारायणमूर्ति और नंदन नीलकेणी दोनों ने अपने सामाजिक सरोकारों से कभी पीछा नहीं छुड़ाया. नारायणमूर्ति के दौर में सुधा मूर्ति इंफोसिस फाउण्डेशन के जरिए सामाजिक काम कर रही थीं तो नीलकेणी के जमाने में यह काम रोहिणी कर रही हैं. सुधा मूर्ति जहां बेसहारा बच्चों और बेसहारा लोगों की सेवा को प्राथमिकता देती थीं वहीं रोहिणी पर्यावरण और परंपरागत ज्ञान को आधार देने का काम कर रही हैं.

क्या है नेशनल यूनिक आइडेन्टीफिकेशन? सबसे पहले एनडीए सरकार ने इस प्रस्ताव पर विचार करना शुरू किया था कि देश के हर नागरिक के विविध पहचान पत्र के स्थान पर एक ही पहचानपत्र होना चाहिए. पिछली यूपीए सरकार द्वारा इस दिशा में कोई खास काम नहीं हुआ. लेकिन सरकार जाने से कुछ महीने पहले 28 जनवरी को इस बारे में नोटिफिकेशन जारी किया गया. अब नंदन नीलकेणी इस आयोग के अध्यक्ष होंगे जिसका अनुमानित बजट 1,90,000 करोड़ होगा. नीलकेणी को उम्मीद है कि अगले एक से डेढ़ साल के अंदर वे पहला कार्ड का सेट जारी कर देंगे.

इसमें अन्यथा या निन्दा योग्य कुछ नहीं है. वे भी आईआईटी की उसी जमात के हिस्से हैं जो अपनी समझ के मुताबिक देश का निर्माण करना चाहता है. आईआईटी और आईआईएम कैसे शिक्षण संस्थान है और कौन से भारत का निर्माण कर रहे हैं यह बताने की जरूरत शायद किसी को नहीं है. लेकिन पिछले कुछ सालों में नारायणमूर्ति और नीलकेणी के कामकाज को ध्यान से देखें तो समझ में आता है कि उनकी सामाजिक जिम्मेदारी और राजनीतिक सक्रियता उनकी अपनी महत्वाकांक्षा है. वे चाहते हैं कि देश की व्यवस्था में अपने मुताबिक हस्तक्षेप किया जाना चाहिए. पिछली दफा जब राष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया चल रही थी तो  यह खबर भी आयी थी कि अपनी इमेज बिल्डिंग के लिए नारायणमूर्ति ने एक पीआर कंपनी को किराये पर लिया है और वे भी अपना नाम राष्ट्रपति पद के लिए चलवाना चाहते हैं. उसी दौर में उनकी किताब भी आयी थी और एक हद तक उनको प्रचार मिला भी. 

ठीक उन्हीं के नक्शेकदम पर नंदन ने भी हाल में ही एक किताब लिखी है - इमेजिनिन्ग इंडिया. इस किताब में उन्होंने अपने सपनों के भारत का खाका खींचा होगा लेकिन इस किताब के प्रचार पर जमकर पैसे खर्च किये गये. पूरे देश के मीडिया हाउसों को एक तरह से किराये पर ले लिया गया और हर बड़े घराने ने इस किताब का गुणगान किया. नंदन की यह कवायद अनायास नहीं थी. नंदन लगातार राजनीतिक विषयों पर लिखते हैं और अपनी बेबाक राय से लोगों को अवगत भी कराते हैं. मसलन आमचुनाव में मायावती के खराब प्रदर्शन के बाद अपने ब्लाग पर उन्होने लिखा कि जाति हमारे लिए जड़ता है और कहीं न कहीं हमारे विकास में बाधक भी. उनका तर्क है कि दलितों के लिए सत्ता का सिर्फ एक ही मतलब है कि उनके लिए आरक्षण के दरवाजे खुल जाएंगे.

अब तक के उनके लेखन और कार्यकलाप को देखें तो इतना साफ समझ में आता है कि वे कांग्रेस के करीब हैं. इसलिए कांग्रेस की सरकार उनको देश के सबसे महत्कांक्षी प्रोजेक्ट का मुखिया नियुक्त कर रही है तो इसमें कुछ आश्चर्य नहीं है. पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम चाहते थे कि देश में हर नागरिक का एक यूनिक पहचानपत्र हो. आतंकवाद के खतरों के बीच सरकार भी इसे एक जरूरी कदम मान रही है क्योंकि सरकार में बैठे लोग मानते हैं कि इस एक कदम से देश की बहुत सारी आंतरिक समस्याओं का निदान हो जाएगा. यह एक स्वतंत्र विषय है कि इस प्रोजेक्ट का ही कोई महत्व भारत जैसे देश में है या नहीं, या फिर अगर यह प्रोजेक्ट लंबे समय से सरकार के विचाराधीन था तो अरबों रूपये परिचयपत्र बनाने पर क्यों खर्च किये गये? क्या केवल इसलिए कि टाटा कंसल्टेसी को एक बड़ा प्रोजेक्ट मिला रहे?

लेकिन फिलहाल तो नीलकेणी इस नये आयोग के अध्यक्ष होकर कुछ हद तक अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा कर सकेंगे. प्रोजेक्ट के लिए पहले चरण में 100 करोड़ रूपये का आवंटन हो चुका है इसलिए इंफोसिस के लिए सरकार के पैसे पर एक ऐसा प्रोजेक्ट भी मिल गया है जिसका आंकलन करने और प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनाने का खर्च भी उसे नहीं उठाना है. और नीलकेणी की वह राजनीतिक महत्वाकांक्षी भी मुफ्त में पूरी हो जाती है जिसकी बेचैनी और तड़प उनके लेखन में लगातार दिखाई देती रही है. नये दौर के इस कारपोरेट युग में हर बिजनेसमैन की एक राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी होती है जिसे कांग्रेस जैसी सरकारें जमकर पूरा करती हैं.   

Subscribe to comments feed Comments (0 posted):

total: | displaying:

Post your comment comment

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
visfot news network विस्फोट.कॉम इंटरनेट पर नये दौर की पत्रकारिता में परंपरागत मूल्यों को स्थापित करने की दिशा में लगातार काम कर रहा है, जो कि पूरी तरह से जनकेन्द्रित, वास्तविक और निहित स्वार्थी तत्वों के प्रभाव से मुक्त है. हमारा संपर्क है visfot@visfot.com
Rate this article
3.75
More from जनता दरबार
Previous
image
भारत से धंधा, पाक को चंदा
अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने अपना तीन दिवसीय दौरा पूरा कर लिया. मुंबई उतरकर दिल्ली दरबार तक उनकी दस्तक भारत पर अमेरिका के मजबूत पकड़ की मिसाल बन गया. निश्चित रूप से उनका दौरा भारत के लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना खुद अमेरिका के लिए है. मंदी के दौर से जूझ रहे अमेरिका को "कारपोरेट" जगत का धंधा दिलाने के लिए उन्होंने न केवल भारत को महाशक्ति करार दे दिया बल्कि सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का समर्थन भी कर दिया....
image
मत्था टेकने की मानसिकता
वैसे तो किशनलाल की गांधी से अधिक श्रद्धा अपने कारोबार पर है और ओबामा से अधिक डर अपनी पत्नी का है. लेकिन आज न तो उनका कारोबार आड़े आया और न ही पत्नी. सुबह नौ पैंतीस पर वे राजघाट जा रहे थे. पूछने पर बोल पड़े मत्था टेकने जा रहे हैं. गांधी की समाधि के प्रति किशनलाल की इतनी अगाध श्रद्धा कि उन्होंने 'मत्था टेकने' की ऊंचाई दे दी. लेकिन वहां तो आज 10.20 पर बराक ओबामा आ रहे हैं. वहां जाने नहीं देंगे. उन्होंने कहा कि जब "वो" चले जाएंगे तब आधे घण्टे बाद राजघाट खोल देंगे उसके बाद सबसे पहले हम मत्था टेकेंगे. ...
image
'गांधीवादी' ओबामा पर भारी अमेरिकी आर्थिक लाचारी
अगर आपने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के मणिभवन यात्रा की फोटो देखी हो तो आपको उस फोटो में बराक ओबामा और पत्नी मिशेल ओबामा के चित्र में गांधी की पोती से हाथ मिलाते वक्त जो श्रद्धा दिख रही है उसमें अमेरिकी बनावट की मिलावट कहीं से नहीं है. गांधी के प्रति ओबामा की श्रद्धा किसी व्यक्ति के प्रति श्रद्धा नहीं बल्कि उस विचार के प्रति है जिसे बीसवीं सदी में अंग्रेजों से लड़ते हुए गांधी ने पुन: परिभाषित किया था. ...
image
लालू भी चाहिए नीतीश भी
बिहार के मतदाता इन दिनों अपने लिए एक बेहतर नेता चुनने में जुटे हैं. एक ऐसा नेता जो अगले पांच साल के लिए उनके अंदर छुपी बदलाव की खदबदाहट को दिशा दे सके और विकास के रास्तों के कंटक हटा सके. लोगों के सामने दो विकल्‌प है लालू या नीतीश. इस बार हो सकता है भावावेश में जनता एक को चुन ले और दूसरे को रिजेक्ट कर दें. पर जहां तक मेरी राय इनमें से किसी एक नेता से बिहार का काम चलने वाला नहीं. बिहार को दोनों चाहिए, लालू भी और नीतीश भी. आखिर क्यों ?...
image
विकास की बिसात पर कैसे हो नीतीश की मात
बिहार में चुनाव हो तो क्या मुद्दा होना चाहिए? निश्चित रूप से बिहार से बाहर रहनेवाले लोग विकास और जातिमुक्त बिहार की आदर्शवादी कल्पना पिछले कई चुनाव से बिहार के लिए मुद्दा बनाने की बातें करते रहे हैं. लेकिन साथ में यह भी जोड़ देते हैं कि बिहार चुनाव में विकास शायद ही मुद्दा बने? लेकिन इस बार यह कमाल दिखाई दे रहा है. पक्ष में हो या विपक्ष में केन्द्रीय मुद्दा विकास ही है. असल में बिहार की विपक्षी पार्टियां नीतीश को रिप्लेक्स करने के लिये तैयार ही नहीं है. लोगों को यह बात अतिशयोक्तिपूर्ण लगती है. मगर आप ही बतायें कि ”या विकास को मुद्दा बनाकर नीतीश से चुनावी समर जीता जा सकता है?...
image
गिलानी की गुगली और हिन्दुस्तान की गफलत
अभी-अभी हुर्रियत कांफ्रेंस के गरमपंथी धड़े के नेता सैयद अली शाह गिलानी अपने विस्फोटक सेमीनार के जरिए दिल्ली और देश में अच्छा-खासा आक्रोश और विवाद पैदा करके गए हैं। अपने अलगाववादी नजरिए पर टस से मस न होने के लिए कुख्यात गिलानी ने दिल्ली में हुए इस कार्यक्रम में न सिर्फ कश्मीर की ‘आजादी‘ की पारंपरिक मांग दोहराईं बल्कि एक कदम आगे बढ़कर ‘स्वतंत्र कश्मीर‘ बनने के बाद की ‘नीतियों‘ का खाका भी पेश कर गए। ‘कश्मीर की आजादी ही एकमात्र विकल्प‘ नामक विषय के इर्द-गिर्द केंद्रित सेमीनार में उन्होंने देशद्रोह के दायरे में आने वाली दर्जनों टिप्पणियां कीं और ‘अभिव्यक्ति की आजादी‘ का फायदा उठाकर आराम से कश्मीर की ओर निकल लिए।...
image
कांग्रेस का दाना, नीतीश की ना-ना
बिहार में चुनाव के दो चरण बीत चुका है. नक्सालियों के दखल के अलावा कहीं कोई खलल नहीं है. जनता भी निश्चिंत है और नेता भी. जैसा किसी पूर्व निर्धारित पटकथा पर सारे किरदार अपनी भूमिका निभाने में जुटे हों. नेशनल न्यूज चैनलों ने सर्वे जारी कर जरूर थोड़ी सी गहमा-गहमी क्रियेट की है मगर लोकल मीडिया में कहीं कोई सनसनी नहीं है....
image
विकीलीक्स ने फिर साबित किया अमेरिका को हत्यारा
इराक में अमेरिकी सेना ने अपने आपरेशन के दौरान ना सिर्फ निर्दोष नागरिकों की हत्या की बल्कि युद्ध की कवरेज कर रहे पत्रकारों को भी मौत के घात उतार दिया। विकिलिक्स ने अमेरिका में इराकी आपरेशन को लेकर पेंटागन के जो डाटाबेस और रिकार्ड जारी किये हैं उनमे अमरीकी सेना के अपाची हेलीकाप्टर्स (क्रेजी हार्स 18) जो कि टेक्सास स्थित यु एस आर्मी के २२७ रेजिमेंट के फर्स्ट बटालियन का हिस्सा है के बारे में चौका देने वाले खुलासे किये हैं। विकिलीक्स द्वारा जारी किये गए एक वीडियो में अमेरिकी जवानों को सिर्फ खबरिया एजेंसी रायटर के दो जांबाज पत्रकारों की गलत सूचना देकर हत्या किये जाने बल्कि उनकी मौत पर ठहाके भी लगाये देखा जा सकता है।...
image
बिहार चुनाव में चौराहे पर खड़ा मुसलमान
बिहार चुनाव में पसमांदा मुसलमान एक बार फिर चौराहे पर खड़े हैं। पसमांदा मुसलमानों में किसी पार्टी या गठबंधन को लेकर कोई उत्साह नहीं हैं। ज़्यादातर पसमांदा वोटर ख़ामोश हैं। कभी पसमांदा आंदोलन के अगुआ रहे लोग इस चुनाव में आश्चर्यजनक रूप से निषक्रिय हैं। कई पार्टियों की तरफ़ से बुलावा आने को बावजूद उन्होंने पार्टियों के दफ़्तर जाना या नेताओं से मिलना तक मुनासिब नहीं समझा। वजह साफ है पसमांदा मुसलमान तमाम पार्टियों की वादा ख़िलाफी से ऊब चुके हैं।...
image
पपेट प्रधानमंत्री का एक और पापकर्म
देश में एक वर्ग विशेष को तुष्ट करने के लिए सरकार कहां तक गिर सकती है उसका हालिया उदाहरण है शत्रु संपत्ति विधेयक-2010 का विरोध करना फिर उसमें मुस्लिम नेताओं के मनमाफिक संसोधन को केन्द्रीय कैबिनेट द्वारा स्वीकृति देना। कठपुतली (पपेट) प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में बुधवार को केंद्रीय कैबिनेट की बैठक आयोजित की गई थी। इसमें इसी बैठक में केंद्रीय गृह मंत्रालय के प्रस्ताव पर शत्रु संपत्ति (संसोधन एवं विधिमान्यकरण) विधेयक-2010 में संसोधन को स्वीकृति प्रदान की गई।...
image
चुनाव आयोग के सामने बिहार चुनाव की चुनौती
पिछले विधानसभा में स्वतंत्र और भयमुक्त चुनाव होने का असर राजनैतिक दलों और नेताओं पर साफ देखने को मिल रहा है। चुनाव आयोग की सख्ती का साफ असर इस बार भी नेताओं और पार्टियों कार्यालयों में देखा जा रहा है। विभिन्न पार्टियों के नेता काफी चौकस है कि इस दौरान किसी भी सूरत में चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन नहीं हो। मुख्यमंत्री आवास एक अणे मार्ग में नीतीश कुमार से मुलाकात करने जा रहे नेता भी वहां किसी तामझाम के पहुंच रहे हैं। लालू प्रसाद यादव भी अपने नेताओं को यह समझाया कि सभी सरकार आवास पर नहीं, पार्टी कार्यालय में मिले।...
image
दशहरा रैली का दम
शिवाजी पार्क शिवसेना और शिवसेनाप्रमुख के बीच दशकों पुराना अटूट संबंध है. शिवेसना की पहली जनसभा 19 जून 1966 को इसी शिवाजी पार्क में हुई थी. तत्कालीन राजनीतिक विश्लेषकों का मत था कि 1960 और 1966 के बीच व्यंगचित्र साप्ताहिक मार्मिक के माध्यम से ठाकरे परिवार ने स्थानीय लोकाधिकार के लिए जो अलख जगाया था, उससे उपजे राजनीतिक विचार से जन्मी शिवेसना की पहली जनसभा में अधिकतम दस हजार स्रोता जमा होंगे....
image
जांच होगी पर आंच किसी को नहीं आयेगी
कामनवेल्थ खेलों के समापन के अगले दिन ही खेलों की तैयारियों में हुई हेराफेरी की जांच का आदेश देकर केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर संभावित राजनीतिक पैंतरेबाजी पर लगाम लगा दिया है लेकिन इस जांच की गंभीरता पर सवाल किये जाने लगे हैं. दिल्ली में सत्ता के गलियारों में सक्रिय ज़्यादातर लोग इस खेल में शामिल थे. पूना वाले बुड्ढे नौजवान ने मामला इस तरह से डिजाइन किया था कि दिल्ली के सभी अमीर उमरा ७० हज़ार करोड़ रूपये की लूट में थोडा बहुत हिस्सा पा जाएँ....
image
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों का आतंक
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव चल रहे हैं. इन चुनावों को नजदीक से देखने और जानने की जरूरत है. दो चरण पूरे हो चुके हैं। तीसरा और अन्तिम चरण 20 अक्टूबर को पूरा हो जाएगा. जब उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव की अधिसूचना जारी हुई तो मेरठ के एक पॉश इलाके में बसपा कार्यालय पर बसपा के समर्थन से चुनाव लड़ने वाले इच्छुक लोगों की भीड़ लगी थी। महंगी लग्जरी गाड़ियों का रैला था। गाड़ियों में सवार हष्टपुष्ट आदमी थे। कुर्ता-पायजामा की जगह झक सफेद पेंट-शर्ट के साथ सफेद जूते में दिखनेवाले नेता हमें माफियाओं के आस पास होने का आभास दे रहे थे. उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों का आंतक के शुरूआत की घोषणा हो चुकी थी. ...
image
विपक्ष का कार्य सरकार गिराना ही नही है
दक्षिणी दुर्ग में बनी भाजपा की पहली सरकार गहरे संकट में है। मुख्यमंत्री येदियुरप्पा शुरु से ही सकटों से घिरे रहे है। यह संकट बाहरी कम अंदरुनी ज्यादा रहे है। कुछ समय पहले बंगलौर निकाय चुनावों में भी भाजपा को जोरदार सफलता मिली थी। ईसाई समुदाय को छोड़कर किसी और वर्ग को भाजपा सरकार से कोई खास नराजगी नही रही है। चर्च का एक हिस्सा पिछले कुछ समय से राज्य में युदियुरप्पा सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग करता रहा है इसके लिए यह वर्ग राज्यपाल हंसराज भारद्वाज को कई ज्ञापन भी दे चुका है।...
image
यह उमर और ऐसी गलती?
यह राजनीतिक पूतों के पांव हैं जो पालने में दिख रहे हैं. पहले राहुल गांधी का बयान और अब उमर अब्दुल्ला की गलती. जम्मू कश्मीर विधानसभा में बोलते हुए उन्होंने कश्मीर के भारत में विलय को ही अधूरा बता दिया. देशभर में विरोध हुआ लेकिन राहुल गांधी ने चुप रहने में भलाई नहीं समझी, उमर की तारीफ करने मैदान में कूद पड़े. कश्मीर इनके पुरखों की विरासत है, लेकिन पुरखों की इस विरासत से कैसा खिलवाड़ कर रहे हैं ये दो नौजवान? शेष नारायण सिंह का विश्लेषण-...
image
बिहार चुनाव में बच्चों के लिए नदारद है नारा
बिहार के विधानसभा की घमाचान में हर पार्टी के झोले के भीतर से एक-एक करके हर एक के लिए मुद्दे ही मुद्दे और नारे ही नारे बाहर आ रहे हैं. मगर बच्चों के लिए इस बार भी कोई मुद्दा और नारा नहीं गूंज रहा है. ऐसे में क्राई ने बच्चों के मुद्दों को सूचीबद्ध करते हुए सभी राजनैतिक दलों से बच्चों के अधिकारों को वरीयता देने के लिए संवाद का सिलसिला शुरू किया है. इसके तहत बाल अधिकारों का एक घोषणा-पत्र तैयार किया जा चुका है और अब बच्चों के मामले में राजनैतिक दलों पर जल्द से जल्द अपना-अपना रूख स्पष्ट करने के लिए दबाव बनाना तय हुआ है....
Next
Tags
No tags for this article
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम में प्रकाशित सामग्री पर हमारी ओर से कोई कापीराइट नहीं है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2