कितना सफल होगा आपरेशन ग्रीन हंट
सदी के जिस पूर्वार्ध में हम खड़े हैं वहां ग्रीन शब्द सबसे बड़े आकर्षण का केन्द्र बन गया है. पूरी दुनिया में जीवन के हर पहलू और जरूरत को ग्रीन शब्द से जोड़कर देखने की प्रथा चल पड़ी है. भारत में भी ग्रीन शब्द को सरकार ने जिस काम के लिए इस्तेमाल किया है वह थोड़ा चौंकानेवाला है. देश में नक्सलियों के खिलाफ सरकार ने "व्यापक" स्तर पर जिस आपरेशन की रुपरेखा तैयार की है उसे आपरेशन ग्रीन हण्ट का नाम दिया है. इस आपरेशन ग्रीन हण्ट के तहत सरकार देश से नक्सलियों का सफाया करना चाहती है. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या आपरेशन ग्रीन हण्ट का कोई औचित्य है? अगर हां, तो क्या यह सफल होगा?
इस समय भारत और पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा की स्थिति लगभग एक जैसी है। पाकिस्तान ने वजीरस्तान इलाके में जहां तालिबान के खिलाफ सबसे बड़ा सैनिक अभियान राह-ए-निज्जत की शुरूआत की है वहीं भारत सरकार ने नक्सली प्रभावित एरिया में आपरेशन ग्रीन हंट की शुरूआत कर दी है। ग्रीन हंट नक्सलवाद को खत्म करने की पुलिस कार्रवाई है। इस कार्रवाई में कुल पचास हजार से ज्यादा पुलिस के जवान लग गए है। उधर इस ग्रीन हंट अभियान की शुरूआत के बीच ही झारखंड से एक खबर आयी है। नक्सली प्रभावित झारखंड राज्य में चार हजार करोड़ रुपये का घोटाला सामने आया है। इसके जनक झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कौड़ा है। मधु कौड़ा के निवेश वाले स्थानों पर छापे पड़ रहे है। इस खुलासे के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि कैसे गरीब लोगों के अमीर राज्य में नेताओं, अधिकारियों और कारपोरेट हाउसों ने मिलकर संसाधनों की लूट की है। साथ ही यह स्पष्ट हो गया है कि नक्सली आंदोलन के बढ़ते प्रभाव का मुख्य कारण आदिवासियों के इन संसाधनों की लूट है।
इस संघर्ष में एक तरफ भूखे नंगे रोटी को मोहताज आदिवासी है। दूसरी तरफ भ्रष्ट कारपोरेट, नौकरशाही और नेता है। झारखंड में मधु कौड़ा की लूट ने यह सच्चाई सामने ला दी है। उनके संसाधनों को लूट उन्हें ही भूख से मारना कहां का न्याय है? इसका जवाब तो पी चिंदबरम को देना होगा। कई सच्चाई सामने आयी है। उड़ीसा, झारखंड आदि के बाक्साइट, लौह अयस्क समेत पत्थरों के खानों पर कई कारपोरेट हाउस की नजर है। इन खानों को कौड़ियों के भाव में कारपोरेट हाउसों ने खरीदा है। इसमें एक नाम वेदांता का भी आया है। यह वही हाउस है जिसके पी चिंदबरम से काफी गहरे रिश्ते है। यह विश्व की एक बड़ी माइनिंग संबंधित कारपोरेट हाउस जिसने हाल ही में दक्षिणी उड़ीसा के नियामगिरी पहाड़ को खरीद लिया है। नियामगिरी पहाड़ बाक्साइट की खान है और यहां के डोंगरिया कोंध आदिवासी अब इसके विरोध में खड़े हो रहे है। उधर लालगढ़ की सच्चाई भी सामने है। आदिवासियों की रोजी रोटी वाली जमीन कौड़ियों के भाव में एक उद्योगपति सजन्न जिंदल को दी जा रही है।
दरअसल देश के सबसे ज्यादा प्राकृतिक संसाधन अमीर राज्य छतीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड के संसाधनों की लूट कारपोरेट हाउस करना चाह रहे है। इसमें मनमोहन सिंह सरकार की नीतियों का जोरदार समर्थन कारपोरेट हाउसों को मिल रहा है। इस मामले पर कांग्रेस विरोधी दल भी उन्हीं नीतियों पर चल रहे है। जिन राज्यों में भाजपा या दूसरे दलों की सरकार है वे भी कारपोरेट हाउसों के साथ मिल गई है। न तो छतीसगढ़ की रमण सिंह सरकार ने आदिवासियों के हितों के लिए कुछ किया न ही बीजू पटनायक की उड़ीसा सरकार ने किया। रही कसर पश्चिम बंगाल की सीपीएम सरकार ने पूरी की। उनकी नीति भी आदिवासी दमन के मामले में कारपोरेट हाउसों के साथ लेकर चलने वाली है। कुल मिलाकर संसाधनों की लूट के मसले पर देश के राजनीतिक दलों के बीच कोई गतिरोध नहीं है। सारे एकजुट है, संसाधनों की लूट को लेकर। झारखंड में तो कई भाजपा नेताओं ने जोरदार लूट मचाई है। अधिकतर शराब के ठेके भाजपा के एक राष्ट्रीय नेता के पास है जिन्होंने एक माफिया को आगे कर शराब के ठेके ले रखे है।
आजादी से पहले की स्थिति लीजिए। इन आदिवासी इलाकों में अंग्रेजों का जोरदार विरोध हुआ था। कारण आदिवासी जनजीवन में हस्तक्षेप था। यहां के संसाधनों की लूट की कोशिश जब भी की गई उसका विरोध हुआ। अंग्रेजों की लूट नीति का विरोध भी आदिवासियों ने किया। आंध्रप्रदेश, बंगाल और झारखंड के इलाके में आदिवासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ स्थानीय जल, जमीन, जंगल संबंधित कानून में फेरबदल के विरोध में जोरदार संघर्ष किया। आदिवासियों के इन आंदोलन से आजादी के लिए चल रहे राष्ट्रीय आंदोलन को जोरदार मजबूती मिली। आजादी के बाद भारतीय संविधान में आदिवासी क्षेत्रों के रीति रिवाज, उनकी संस्कृति और संसाधन की रक्षा के उपाय किए गए। संविधान की पांचवी और छठी अनुसूची में आदिवासी क्षेत्रों, राज्यों में रहने वाले आदिवासियों के लिए जो प्रबंध है उसका भी उल्लंघन किया जा रहा है।
पी चिंदबरम को यह याद रखना चाहिए कि वर्तमान नक्सली आंदोलन 1980 के दशक में शुरू हुए नक्सली आंदोलन से अलग है। बिहार में 1980 के दशक में शुरु हुए नक्सली आंदोलन में जातीय पुट था जहां पर भूमिसुधार के साथ-साथ जातीय विषमता भी शामिल थी। उच्च जातियों द्वारा पिछड़ों और दलितों के दमन ने नक्सली आंदोलन को मजबूत किया था। इस आंदोलन में पिछड़ों की दबंग जाति यादवों ने जोरदार तरीके से भाग लिया था, लेकिन लालू यादव के सता में आने के बाद इनका नवसामंती चरित्र हो गया। जबकि हरिजनों की कई जातीयों ने भी नक्सली आंदोलन को मजबूत किया। पर गैर कांग्रेसवाद के बिहार में काबिज होने के बाद नक्सल आंदोलन भटक गया। शुरू से जाति आधारित राजनीति के गढ़ रहे बिहार में नक्सली आंदोलन को तोड़ने में लालू यादव की मुख्य भूमिका रही है। उन्होंने नक्सली आंदोलन में शामिल यादव जो ज्यादातर उस समय के मजबूत संगठन एमसीसी के सदस्य थे, को अपने राजनीतिक हित के लिए यूज किया।
कुल मिलाकर आप कह सकते है कि नक्सली कैडरों के पास भी भाजपा के नेताओं की तरह दोहरी सदस्यता थी। जिस तरह से भाजपा के नेता आरएसएस के सदस्य होते है उसी तरह से एमसीसी में शामिल यादव जाति के एरिया कमांडर या सदस्य लालू यादव की पार्टी के भी कैडर हो गए, उनकी मेंबरशीप ले ली है। इसका परिणाम यह हुआ कि नक्सली आंदोलन में शामिल एक और मजबूत जाति दुसाध ने एमसीसी के साथ-साथ रामविलास पासवान का दामन थाम लिया। नतीजा यह निकला कि एमसीसी के अंदर ही टकराव हुआ और कई एरिया कमांडर अपनी राजनीतिक दलों की सदस्यता के हिसाब से लालू यादव और रामविलास पासवान को चुनावों में मदद करते रहे। इनके बीच आपसी संघर्ष भी बढ़ा और कई एरिया कमांडर और नक्सली इन्हीं आपसी संघर्ष में मारे गए। इस दौरान ही अगड़े भूमिहारों ने रणवीर सेना और राजपूतों ने सनलाइट सेना बना ली। रणवीर सेना को पाकिस्तानी भाषा में सरकार समर्थित लश्कर कह सकते है जो एक तरह से सरकार विरोधी हिंसक नक्सली संघर्ष को खत्म करने में सरकार को अप्रत्यक्ष रुप से मदद करती रही। बेशक इसे प्रतिबंधित किया गया पर आंतरिक रुप से कई राजनीतिक दलों के नेता इन्हें समर्थन देते रहे। परिणाम यह हुआ कि बिहार से नक्सली आंदोलन का जड़ कमजोर होता गया। आज बिहार झारखंड, उड़ीसा या बंगाल के मुकाबले कम नक्सली प्रभावित है।
लेकिन आज नक्सली आंदोलन का रुप बदला है। इसने पूरी तरह से वर्ग संघर्ष को अपनाया है। कहीं भी नक्सली प्रभावित झारखंड, उड़ीसा, बंगाल और छतीसगढ़ में जातीय आधार पर नक्सली कत्लेआम की रिपोर्ट नहीं है। पूरी तरह से सरकारी स्टैबलिशमेंट को निशाने पर लाया जा रहा है। संसाधनों की लूट, महंगाई और बढ़ती गरीबी से परेशान तमाम जातियों के लोगों को नक्सली अपने प्रभाव में लेने की कोशिश कर रहे है। गैर आदिवासियों को भी अपने आंदोलन में शरीक करने की योजना नक्सलियों ने बनायी है। झारखंड में कुछ महीनें पहले महंगाई के ऊपर नक्सलियों का बंद यही संकेत है। एक समय था कि नक्सली बंद अपील का प्रभाव नहीं पड़ता था। आज स्थिति यह है कि बंद के आहवान के बाद पूरा झारखंड बंद नजर आता है। झारखंड से लगते बिहार के जिलों में बंद का पूरा प्रभाव नजर आता है। बसें बंद हो जाती है। निजी वाहन बंद हो जाते है। सड़कें सूनसान हो जाती है।
तमाम कयासों के बीच यह स्पष्ट है कि पी चिंदबरम का ग्रीन हंट आपरेशन सफल नहीं होगा। कारण नक्सली समस्या ने अब वर्ग संघर्ष का व्यापक रुप ले लिया है। आने वाले समय में नक्सलियों को आदिवासी ही नहीं गैरआदिवासियों का भी समर्थन होगा और इसक पूरी जिम्मेवारी केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों पर होगी। हैव और हैव नाट्स के बीच बढ़ रहे गैप का सीधा फायदा नक्सली उठा रहे है। बढ़ती महंगाई ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया है। ऐसे में सिर्फ आपरेशन ग्रीन हंट क्या करेगा? देश का आर्थिक विकास भी तभी होगा जब विकास की गति का फायदा समाज के हर तबके को मिले। अगर कुछ लोगों को अरबपति बनाने के लिए ही विकास की दर बढ़ायी जाएगी तो अरबपति भी कहां रहेंगे? उनके सारे उद्योग धंधे चौपट हो जाएंगे। न तो नक्सल प्रभावित एरिया में इंडस्ट्री लगा पाएंगे न ही अपना और कोई व्यापार कर पाएंगे। अगर कुछ काम करेंगे तो नक्सलियों को लेवी देकर ही। खैर नेता और उद्योगपति नक्सलियों को लेवी तो दे ही रहे है। यह तथ्य किसी से नहीं छिपा है।
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