Home | जनता दरबार | कितना सफल होगा आपरेशन ग्रीन हंट

कितना सफल होगा आपरेशन ग्रीन हंट

image

सदी के जिस पूर्वार्ध में हम खड़े हैं वहां ग्रीन शब्द सबसे बड़े आकर्षण का केन्द्र बन गया है. पूरी दुनिया में जीवन के हर पहलू और जरूरत को ग्रीन शब्द से जोड़कर देखने की प्रथा चल पड़ी है. भारत में भी ग्रीन शब्द को सरकार ने जिस काम के लिए इस्तेमाल किया है वह थोड़ा चौंकानेवाला है. देश में नक्सलियों के खिलाफ सरकार ने "व्यापक" स्तर पर जिस आपरेशन की रुपरेखा तैयार की है उसे आपरेशन ग्रीन हण्ट का नाम दिया है. इस आपरेशन ग्रीन हण्ट के तहत सरकार देश से नक्सलियों का सफाया करना चाहती है. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या आपरेशन ग्रीन हण्ट का कोई औचित्य है? अगर हां, तो क्या यह सफल होगा?

इस समय भारत और पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा की स्थिति लगभग एक जैसी है। पाकिस्तान ने वजीरस्तान इलाके में जहां तालिबान के खिलाफ सबसे बड़ा सैनिक अभियान राह-ए-निज्जत की शुरूआत की है वहीं भारत सरकार ने नक्सली प्रभावित एरिया में आपरेशन ग्रीन हंट की शुरूआत कर दी है। ग्रीन हंट नक्सलवाद को खत्म करने की पुलिस कार्रवाई है। इस कार्रवाई में कुल पचास हजार से ज्यादा पुलिस के जवान लग गए है। उधर इस ग्रीन हंट अभियान की शुरूआत के बीच ही झारखंड से एक खबर आयी है। नक्सली प्रभावित झारखंड राज्य में चार हजार करोड़ रुपये का घोटाला सामने आया है। इसके जनक झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कौड़ा है। मधु कौड़ा के निवेश वाले स्थानों पर छापे पड़ रहे है। इस खुलासे के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि कैसे गरीब लोगों के अमीर राज्य में नेताओं, अधिकारियों और कारपोरेट हाउसों ने मिलकर संसाधनों की लूट की है। साथ ही यह स्पष्ट हो गया है कि नक्सली आंदोलन के बढ़ते प्रभाव का मुख्य कारण आदिवासियों के इन संसाधनों की लूट है।

इस संघर्ष में एक तरफ भूखे नंगे रोटी को मोहताज आदिवासी है। दूसरी तरफ भ्रष्ट कारपोरेट, नौकरशाही और नेता है। झारखंड में मधु कौड़ा की लूट ने यह सच्चाई सामने ला दी है। उनके संसाधनों को लूट उन्हें ही भूख से मारना कहां का न्याय है? इसका जवाब तो पी चिंदबरम को देना होगा। कई सच्चाई सामने आयी है। उड़ीसा, झारखंड आदि के बाक्साइट, लौह अयस्क समेत पत्थरों के खानों पर कई कारपोरेट हाउस की नजर है। इन खानों को कौड़ियों के भाव में कारपोरेट हाउसों ने खरीदा है। इसमें एक नाम वेदांता का भी आया है। यह वही हाउस है जिसके पी चिंदबरम से काफी गहरे रिश्ते है। यह विश्व की एक बड़ी माइनिंग संबंधित कारपोरेट हाउस जिसने हाल ही में दक्षिणी उड़ीसा के नियामगिरी पहाड़ को खरीद लिया है। नियामगिरी पहाड़ बाक्साइट की खान है और यहां के डोंगरिया कोंध आदिवासी अब इसके विरोध में खड़े हो रहे है। उधर लालगढ़ की सच्चाई भी सामने है। आदिवासियों की रोजी रोटी वाली जमीन कौड़ियों के भाव में एक उद्योगपति सजन्न जिंदल को दी जा रही है। 

दरअसल देश के सबसे ज्यादा प्राकृतिक संसाधन अमीर राज्य छतीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड के संसाधनों की लूट कारपोरेट हाउस करना चाह रहे है। इसमें मनमोहन सिंह सरकार की नीतियों का जोरदार समर्थन कारपोरेट हाउसों को मिल रहा है। इस मामले पर कांग्रेस विरोधी दल भी उन्हीं नीतियों पर चल रहे है। जिन राज्यों में भाजपा या दूसरे दलों की सरकार है वे भी कारपोरेट हाउसों के साथ मिल गई है। न तो छतीसगढ़ की रमण सिंह सरकार ने आदिवासियों के हितों के लिए कुछ किया न ही बीजू पटनायक की उड़ीसा सरकार ने किया। रही कसर पश्चिम बंगाल की सीपीएम सरकार ने पूरी की। उनकी नीति भी आदिवासी दमन के मामले में कारपोरेट हाउसों के साथ लेकर चलने वाली है। कुल मिलाकर संसाधनों की लूट के मसले पर देश के राजनीतिक दलों के बीच कोई गतिरोध नहीं है। सारे एकजुट है, संसाधनों की लूट को लेकर। झारखंड में तो कई भाजपा नेताओं ने जोरदार लूट मचाई है। अधिकतर शराब के ठेके भाजपा के एक राष्ट्रीय नेता के पास है जिन्होंने एक माफिया को आगे कर शराब के ठेके ले रखे है। 

आजादी  से पहले की स्थिति लीजिए। इन आदिवासी इलाकों में अंग्रेजों का जोरदार विरोध हुआ था। कारण आदिवासी जनजीवन में हस्तक्षेप था। यहां के संसाधनों की लूट की कोशिश जब भी की गई उसका विरोध हुआ। अंग्रेजों की लूट नीति का विरोध भी आदिवासियों ने किया। आंध्रप्रदेश, बंगाल और झारखंड के इलाके में आदिवासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ स्थानीय जल, जमीन, जंगल संबंधित कानून में फेरबदल के विरोध में जोरदार संघर्ष किया। आदिवासियों के इन आंदोलन से आजादी के लिए चल रहे राष्ट्रीय आंदोलन को जोरदार मजबूती मिली। आजादी के बाद भारतीय संविधान में आदिवासी क्षेत्रों के रीति रिवाज, उनकी संस्कृति और संसाधन की रक्षा के उपाय किए गए। संविधान की पांचवी और छठी अनुसूची में आदिवासी क्षेत्रों, राज्यों में रहने वाले आदिवासियों के लिए जो प्रबंध है उसका भी उल्लंघन किया जा रहा है।

पी चिंदबरम  को यह याद रखना चाहिए कि वर्तमान नक्सली आंदोलन 1980 के  दशक में शुरू हुए नक्सली  आंदोलन से अलग है। बिहार में 1980 के दशक में शुरु  हुए  नक्सली आंदोलन में जातीय पुट था जहां पर भूमिसुधार के साथ-साथ जातीय विषमता भी शामिल थी। उच्च जातियों द्वारा पिछड़ों और दलितों के दमन ने नक्सली आंदोलन को मजबूत किया था। इस आंदोलन में पिछड़ों की दबंग जाति यादवों ने जोरदार तरीके से भाग लिया था, लेकिन लालू यादव के सता में आने के बाद इनका नवसामंती चरित्र हो गया। जबकि हरिजनों की कई जातीयों ने भी नक्सली आंदोलन को मजबूत किया। पर गैर कांग्रेसवाद के बिहार में काबिज होने के बाद नक्सल आंदोलन भटक गया। शुरू से जाति आधारित राजनीति के गढ़ रहे बिहार में नक्सली आंदोलन को तोड़ने में लालू यादव की मुख्य भूमिका रही है। उन्होंने नक्सली आंदोलन में शामिल यादव जो ज्यादातर उस समय के मजबूत संगठन एमसीसी के सदस्य थे, को अपने राजनीतिक हित के लिए यूज किया। 
कुल मिलाकर आप कह सकते है कि नक्सली कैडरों के पास भी भाजपा के नेताओं की तरह दोहरी सदस्यता थी। जिस तरह से भाजपा के नेता आरएसएस के सदस्य होते है उसी तरह से एमसीसी में शामिल यादव जाति के एरिया कमांडर या सदस्य लालू यादव की पार्टी के भी कैडर हो गए, उनकी मेंबरशीप ले ली है। इसका परिणाम यह हुआ कि नक्सली आंदोलन में शामिल एक और मजबूत जाति दुसाध ने एमसीसी के साथ-साथ रामविलास पासवान का दामन थाम लिया। नतीजा यह निकला कि एमसीसी के अंदर ही टकराव हुआ और कई एरिया कमांडर अपनी राजनीतिक दलों की सदस्यता के हिसाब से लालू यादव और रामविलास पासवान को चुनावों में मदद करते रहे। इनके बीच आपसी संघर्ष भी बढ़ा और कई एरिया कमांडर और नक्सली इन्हीं आपसी संघर्ष में मारे गए। इस दौरान ही अगड़े भूमिहारों ने रणवीर सेना और राजपूतों ने सनलाइट सेना बना ली। रणवीर सेना को पाकिस्तानी भाषा में सरकार समर्थित लश्कर कह सकते है जो एक तरह से सरकार विरोधी हिंसक नक्सली संघर्ष को खत्म करने में सरकार को अप्रत्यक्ष रुप से मदद करती रही। बेशक इसे प्रतिबंधित किया गया पर आंतरिक रुप से कई राजनीतिक दलों के नेता इन्हें समर्थन देते रहे। परिणाम यह हुआ कि बिहार से नक्सली आंदोलन का जड़ कमजोर होता गया। आज बिहार झारखंड, उड़ीसा या बंगाल के मुकाबले कम नक्सली प्रभावित है। 

लेकिन  आज नक्सली आंदोलन का रुप बदला है। इसने पूरी तरह से वर्ग संघर्ष को अपनाया है। कहीं भी नक्सली प्रभावित झारखंड, उड़ीसा, बंगाल और छतीसगढ़ में जातीय आधार पर नक्सली कत्लेआम की रिपोर्ट नहीं है। पूरी तरह से सरकारी स्टैबलिशमेंट को निशाने पर लाया जा रहा है। संसाधनों की लूट, महंगाई और बढ़ती गरीबी से परेशान तमाम जातियों के लोगों को नक्सली अपने प्रभाव में लेने की कोशिश कर रहे है। गैर आदिवासियों को भी अपने आंदोलन में शरीक करने की योजना नक्सलियों ने बनायी है। झारखंड में कुछ महीनें पहले महंगाई के ऊपर नक्सलियों का बंद यही संकेत है। एक समय था कि नक्सली बंद अपील का प्रभाव नहीं पड़ता था। आज स्थिति यह है कि बंद के आहवान के बाद पूरा झारखंड बंद नजर आता है। झारखंड से लगते बिहार के जिलों में बंद का पूरा प्रभाव नजर आता है। बसें बंद हो जाती है। निजी वाहन बंद हो जाते है। सड़कें सूनसान हो जाती है।

तमाम कयासों  के बीच यह स्पष्ट है कि पी चिंदबरम  का ग्रीन हंट आपरेशन सफल नहीं होगा। कारण नक्सली समस्या ने अब वर्ग संघर्ष का व्यापक रुप ले लिया है। आने वाले समय में नक्सलियों को आदिवासी ही नहीं गैरआदिवासियों का भी समर्थन होगा और इसक पूरी जिम्मेवारी केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों पर होगी। हैव और हैव नाट्स के बीच बढ़ रहे गैप का सीधा फायदा नक्सली उठा रहे है। बढ़ती महंगाई ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया है। ऐसे में सिर्फ आपरेशन ग्रीन हंट क्या करेगा? देश का आर्थिक विकास भी तभी होगा जब विकास की गति का फायदा समाज के हर तबके को मिले। अगर कुछ लोगों को अरबपति बनाने के लिए ही विकास की दर बढ़ायी जाएगी तो अरबपति भी कहां रहेंगे? उनके सारे उद्योग धंधे चौपट हो जाएंगे। न तो नक्सल प्रभावित एरिया में इंडस्ट्री लगा पाएंगे न ही अपना  और कोई व्यापार कर पाएंगे। अगर कुछ काम करेंगे तो नक्सलियों को लेवी देकर ही। खैर नेता और उद्योगपति नक्सलियों को लेवी तो दे ही रहे है। यह तथ्य किसी से नहीं छिपा है।

Subscribe to comments feed Comments (1 posted):

sunl parbhakar on 12 December, 2009 00:31;58
avatar
sanjeev bhai ikdam sahi likha apnay
Thumbs Up Thumbs Down
0
total: 1 | displaying: 1 - 1

Post your comment comment

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
image संजीव पाण्डेय छात्र राजनीति से पत्रकारिता में आये संजीव पाण्डेय ने कई अखबारों के लिए काम किया है. हाल-फिलहाल तक अमर उजाला में कार्यरत थे. वर्तमान में चंडीगढ़ में रहकर स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन. विस्फोट.कॉम के नियमित स्तंभलेखक.
Rate this article
5.00
More from जनता दरबार
Previous
image
भारत से धंधा, पाक को चंदा
अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने अपना तीन दिवसीय दौरा पूरा कर लिया. मुंबई उतरकर दिल्ली दरबार तक उनकी दस्तक भारत पर अमेरिका के मजबूत पकड़ की मिसाल बन गया. निश्चित रूप से उनका दौरा भारत के लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना खुद अमेरिका के लिए है. मंदी के दौर से जूझ रहे अमेरिका को "कारपोरेट" जगत का धंधा दिलाने के लिए उन्होंने न केवल भारत को महाशक्ति करार दे दिया बल्कि सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का समर्थन भी कर दिया....
image
मत्था टेकने की मानसिकता
वैसे तो किशनलाल की गांधी से अधिक श्रद्धा अपने कारोबार पर है और ओबामा से अधिक डर अपनी पत्नी का है. लेकिन आज न तो उनका कारोबार आड़े आया और न ही पत्नी. सुबह नौ पैंतीस पर वे राजघाट जा रहे थे. पूछने पर बोल पड़े मत्था टेकने जा रहे हैं. गांधी की समाधि के प्रति किशनलाल की इतनी अगाध श्रद्धा कि उन्होंने 'मत्था टेकने' की ऊंचाई दे दी. लेकिन वहां तो आज 10.20 पर बराक ओबामा आ रहे हैं. वहां जाने नहीं देंगे. उन्होंने कहा कि जब "वो" चले जाएंगे तब आधे घण्टे बाद राजघाट खोल देंगे उसके बाद सबसे पहले हम मत्था टेकेंगे. ...
image
'गांधीवादी' ओबामा पर भारी अमेरिकी आर्थिक लाचारी
अगर आपने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के मणिभवन यात्रा की फोटो देखी हो तो आपको उस फोटो में बराक ओबामा और पत्नी मिशेल ओबामा के चित्र में गांधी की पोती से हाथ मिलाते वक्त जो श्रद्धा दिख रही है उसमें अमेरिकी बनावट की मिलावट कहीं से नहीं है. गांधी के प्रति ओबामा की श्रद्धा किसी व्यक्ति के प्रति श्रद्धा नहीं बल्कि उस विचार के प्रति है जिसे बीसवीं सदी में अंग्रेजों से लड़ते हुए गांधी ने पुन: परिभाषित किया था. ...
image
लालू भी चाहिए नीतीश भी
बिहार के मतदाता इन दिनों अपने लिए एक बेहतर नेता चुनने में जुटे हैं. एक ऐसा नेता जो अगले पांच साल के लिए उनके अंदर छुपी बदलाव की खदबदाहट को दिशा दे सके और विकास के रास्तों के कंटक हटा सके. लोगों के सामने दो विकल्‌प है लालू या नीतीश. इस बार हो सकता है भावावेश में जनता एक को चुन ले और दूसरे को रिजेक्ट कर दें. पर जहां तक मेरी राय इनमें से किसी एक नेता से बिहार का काम चलने वाला नहीं. बिहार को दोनों चाहिए, लालू भी और नीतीश भी. आखिर क्यों ?...
image
विकास की बिसात पर कैसे हो नीतीश की मात
बिहार में चुनाव हो तो क्या मुद्दा होना चाहिए? निश्चित रूप से बिहार से बाहर रहनेवाले लोग विकास और जातिमुक्त बिहार की आदर्शवादी कल्पना पिछले कई चुनाव से बिहार के लिए मुद्दा बनाने की बातें करते रहे हैं. लेकिन साथ में यह भी जोड़ देते हैं कि बिहार चुनाव में विकास शायद ही मुद्दा बने? लेकिन इस बार यह कमाल दिखाई दे रहा है. पक्ष में हो या विपक्ष में केन्द्रीय मुद्दा विकास ही है. असल में बिहार की विपक्षी पार्टियां नीतीश को रिप्लेक्स करने के लिये तैयार ही नहीं है. लोगों को यह बात अतिशयोक्तिपूर्ण लगती है. मगर आप ही बतायें कि ”या विकास को मुद्दा बनाकर नीतीश से चुनावी समर जीता जा सकता है?...
image
गिलानी की गुगली और हिन्दुस्तान की गफलत
अभी-अभी हुर्रियत कांफ्रेंस के गरमपंथी धड़े के नेता सैयद अली शाह गिलानी अपने विस्फोटक सेमीनार के जरिए दिल्ली और देश में अच्छा-खासा आक्रोश और विवाद पैदा करके गए हैं। अपने अलगाववादी नजरिए पर टस से मस न होने के लिए कुख्यात गिलानी ने दिल्ली में हुए इस कार्यक्रम में न सिर्फ कश्मीर की ‘आजादी‘ की पारंपरिक मांग दोहराईं बल्कि एक कदम आगे बढ़कर ‘स्वतंत्र कश्मीर‘ बनने के बाद की ‘नीतियों‘ का खाका भी पेश कर गए। ‘कश्मीर की आजादी ही एकमात्र विकल्प‘ नामक विषय के इर्द-गिर्द केंद्रित सेमीनार में उन्होंने देशद्रोह के दायरे में आने वाली दर्जनों टिप्पणियां कीं और ‘अभिव्यक्ति की आजादी‘ का फायदा उठाकर आराम से कश्मीर की ओर निकल लिए।...
image
कांग्रेस का दाना, नीतीश की ना-ना
बिहार में चुनाव के दो चरण बीत चुका है. नक्सालियों के दखल के अलावा कहीं कोई खलल नहीं है. जनता भी निश्चिंत है और नेता भी. जैसा किसी पूर्व निर्धारित पटकथा पर सारे किरदार अपनी भूमिका निभाने में जुटे हों. नेशनल न्यूज चैनलों ने सर्वे जारी कर जरूर थोड़ी सी गहमा-गहमी क्रियेट की है मगर लोकल मीडिया में कहीं कोई सनसनी नहीं है....
image
विकीलीक्स ने फिर साबित किया अमेरिका को हत्यारा
इराक में अमेरिकी सेना ने अपने आपरेशन के दौरान ना सिर्फ निर्दोष नागरिकों की हत्या की बल्कि युद्ध की कवरेज कर रहे पत्रकारों को भी मौत के घात उतार दिया। विकिलिक्स ने अमेरिका में इराकी आपरेशन को लेकर पेंटागन के जो डाटाबेस और रिकार्ड जारी किये हैं उनमे अमरीकी सेना के अपाची हेलीकाप्टर्स (क्रेजी हार्स 18) जो कि टेक्सास स्थित यु एस आर्मी के २२७ रेजिमेंट के फर्स्ट बटालियन का हिस्सा है के बारे में चौका देने वाले खुलासे किये हैं। विकिलीक्स द्वारा जारी किये गए एक वीडियो में अमेरिकी जवानों को सिर्फ खबरिया एजेंसी रायटर के दो जांबाज पत्रकारों की गलत सूचना देकर हत्या किये जाने बल्कि उनकी मौत पर ठहाके भी लगाये देखा जा सकता है।...
image
बिहार चुनाव में चौराहे पर खड़ा मुसलमान
बिहार चुनाव में पसमांदा मुसलमान एक बार फिर चौराहे पर खड़े हैं। पसमांदा मुसलमानों में किसी पार्टी या गठबंधन को लेकर कोई उत्साह नहीं हैं। ज़्यादातर पसमांदा वोटर ख़ामोश हैं। कभी पसमांदा आंदोलन के अगुआ रहे लोग इस चुनाव में आश्चर्यजनक रूप से निषक्रिय हैं। कई पार्टियों की तरफ़ से बुलावा आने को बावजूद उन्होंने पार्टियों के दफ़्तर जाना या नेताओं से मिलना तक मुनासिब नहीं समझा। वजह साफ है पसमांदा मुसलमान तमाम पार्टियों की वादा ख़िलाफी से ऊब चुके हैं।...
image
पपेट प्रधानमंत्री का एक और पापकर्म
देश में एक वर्ग विशेष को तुष्ट करने के लिए सरकार कहां तक गिर सकती है उसका हालिया उदाहरण है शत्रु संपत्ति विधेयक-2010 का विरोध करना फिर उसमें मुस्लिम नेताओं के मनमाफिक संसोधन को केन्द्रीय कैबिनेट द्वारा स्वीकृति देना। कठपुतली (पपेट) प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में बुधवार को केंद्रीय कैबिनेट की बैठक आयोजित की गई थी। इसमें इसी बैठक में केंद्रीय गृह मंत्रालय के प्रस्ताव पर शत्रु संपत्ति (संसोधन एवं विधिमान्यकरण) विधेयक-2010 में संसोधन को स्वीकृति प्रदान की गई।...
image
चुनाव आयोग के सामने बिहार चुनाव की चुनौती
पिछले विधानसभा में स्वतंत्र और भयमुक्त चुनाव होने का असर राजनैतिक दलों और नेताओं पर साफ देखने को मिल रहा है। चुनाव आयोग की सख्ती का साफ असर इस बार भी नेताओं और पार्टियों कार्यालयों में देखा जा रहा है। विभिन्न पार्टियों के नेता काफी चौकस है कि इस दौरान किसी भी सूरत में चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन नहीं हो। मुख्यमंत्री आवास एक अणे मार्ग में नीतीश कुमार से मुलाकात करने जा रहे नेता भी वहां किसी तामझाम के पहुंच रहे हैं। लालू प्रसाद यादव भी अपने नेताओं को यह समझाया कि सभी सरकार आवास पर नहीं, पार्टी कार्यालय में मिले।...
image
दशहरा रैली का दम
शिवाजी पार्क शिवसेना और शिवसेनाप्रमुख के बीच दशकों पुराना अटूट संबंध है. शिवेसना की पहली जनसभा 19 जून 1966 को इसी शिवाजी पार्क में हुई थी. तत्कालीन राजनीतिक विश्लेषकों का मत था कि 1960 और 1966 के बीच व्यंगचित्र साप्ताहिक मार्मिक के माध्यम से ठाकरे परिवार ने स्थानीय लोकाधिकार के लिए जो अलख जगाया था, उससे उपजे राजनीतिक विचार से जन्मी शिवेसना की पहली जनसभा में अधिकतम दस हजार स्रोता जमा होंगे....
image
जांच होगी पर आंच किसी को नहीं आयेगी
कामनवेल्थ खेलों के समापन के अगले दिन ही खेलों की तैयारियों में हुई हेराफेरी की जांच का आदेश देकर केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर संभावित राजनीतिक पैंतरेबाजी पर लगाम लगा दिया है लेकिन इस जांच की गंभीरता पर सवाल किये जाने लगे हैं. दिल्ली में सत्ता के गलियारों में सक्रिय ज़्यादातर लोग इस खेल में शामिल थे. पूना वाले बुड्ढे नौजवान ने मामला इस तरह से डिजाइन किया था कि दिल्ली के सभी अमीर उमरा ७० हज़ार करोड़ रूपये की लूट में थोडा बहुत हिस्सा पा जाएँ....
image
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों का आतंक
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव चल रहे हैं. इन चुनावों को नजदीक से देखने और जानने की जरूरत है. दो चरण पूरे हो चुके हैं। तीसरा और अन्तिम चरण 20 अक्टूबर को पूरा हो जाएगा. जब उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव की अधिसूचना जारी हुई तो मेरठ के एक पॉश इलाके में बसपा कार्यालय पर बसपा के समर्थन से चुनाव लड़ने वाले इच्छुक लोगों की भीड़ लगी थी। महंगी लग्जरी गाड़ियों का रैला था। गाड़ियों में सवार हष्टपुष्ट आदमी थे। कुर्ता-पायजामा की जगह झक सफेद पेंट-शर्ट के साथ सफेद जूते में दिखनेवाले नेता हमें माफियाओं के आस पास होने का आभास दे रहे थे. उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों का आंतक के शुरूआत की घोषणा हो चुकी थी. ...
image
विपक्ष का कार्य सरकार गिराना ही नही है
दक्षिणी दुर्ग में बनी भाजपा की पहली सरकार गहरे संकट में है। मुख्यमंत्री येदियुरप्पा शुरु से ही सकटों से घिरे रहे है। यह संकट बाहरी कम अंदरुनी ज्यादा रहे है। कुछ समय पहले बंगलौर निकाय चुनावों में भी भाजपा को जोरदार सफलता मिली थी। ईसाई समुदाय को छोड़कर किसी और वर्ग को भाजपा सरकार से कोई खास नराजगी नही रही है। चर्च का एक हिस्सा पिछले कुछ समय से राज्य में युदियुरप्पा सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग करता रहा है इसके लिए यह वर्ग राज्यपाल हंसराज भारद्वाज को कई ज्ञापन भी दे चुका है।...
image
यह उमर और ऐसी गलती?
यह राजनीतिक पूतों के पांव हैं जो पालने में दिख रहे हैं. पहले राहुल गांधी का बयान और अब उमर अब्दुल्ला की गलती. जम्मू कश्मीर विधानसभा में बोलते हुए उन्होंने कश्मीर के भारत में विलय को ही अधूरा बता दिया. देशभर में विरोध हुआ लेकिन राहुल गांधी ने चुप रहने में भलाई नहीं समझी, उमर की तारीफ करने मैदान में कूद पड़े. कश्मीर इनके पुरखों की विरासत है, लेकिन पुरखों की इस विरासत से कैसा खिलवाड़ कर रहे हैं ये दो नौजवान? शेष नारायण सिंह का विश्लेषण-...
image
बिहार चुनाव में बच्चों के लिए नदारद है नारा
बिहार के विधानसभा की घमाचान में हर पार्टी के झोले के भीतर से एक-एक करके हर एक के लिए मुद्दे ही मुद्दे और नारे ही नारे बाहर आ रहे हैं. मगर बच्चों के लिए इस बार भी कोई मुद्दा और नारा नहीं गूंज रहा है. ऐसे में क्राई ने बच्चों के मुद्दों को सूचीबद्ध करते हुए सभी राजनैतिक दलों से बच्चों के अधिकारों को वरीयता देने के लिए संवाद का सिलसिला शुरू किया है. इसके तहत बाल अधिकारों का एक घोषणा-पत्र तैयार किया जा चुका है और अब बच्चों के मामले में राजनैतिक दलों पर जल्द से जल्द अपना-अपना रूख स्पष्ट करने के लिए दबाव बनाना तय हुआ है....
Next
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम में प्रकाशित सामग्री पर हमारी ओर से कोई कापीराइट नहीं है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2