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सांसद नहीं, बनना है सरपंच

image बयाना में पंचायत समिति सदस्य के लिए वोट मांगते एक प्रत्याशी

महात्मा गांधी राष्ट्रीय गा्रमीण रोजगार गारंटी कानून ‘महानरेगा’ यही वो नाम है जिसने सरपंच को सांसद से भी बडा बना दिया है. लोगों की माने तो महानरेगा ने ही यूपीए की सरकार दुबारा बनबाई. इसमें कितनी सच्चाई है ये बहस का बिषय हो सकता है. लेकिन इतना सच है कि अब गांवों में इस योजना ने सरपंच के पद को सांसद से भी बडा बना दिया है.

राजस्थान में इन दिनों पंचायतीराज के चुनाव हो रहे है. जहां हर कोई, हर कीमत पर सिर्फ सरपंच बनना चाहता है. कारण साफ है महानरेगा और उसके महाघोटाले. राजस्थान क्षेत्रफल की दृष्टि से देश का सबसे बडा प्रदेश है. 9189 ग्राम पंचायतों में यहां 41353 गांव है. इन गांवों में इन दिनों कडाके की सर्दी में भी अलावों की गर्मी है. रात रात भर लोग अलाव जलाकर चुनाव प्रचार और चुनावी गणित बिठाने में लगे हुए है. चुनाव वैसे यहां तीन स्तरों के हो रहे है. लेकिन लोगों का ध्यान  येन केन प्रकारेण सरपंच बनने पर अधिक है. हो भी क्यों नही ?

प्रदेश में 9189 ग्राम पंचायतें है तो चालू वित्तीय वर्ष में नरेगा का अनुमानित बजट 9275 करोड का है. जो एक गा्म पंचायत के हिस्से एक बर्ष में एक करोड से कहीं अधिक ठहरता है. इसके अलावा दूसरी सैकडों योजनाओं की क्रियांविति और अधिकार अलग से है. पैसे की इस खनक ने सरपंच के पद को लोगों के बीच अति महत्वपूर्ण बना दिया है. कारण साफ है  गांव में होने वाला हरेक काम ग्राम पंचायत  जो करती है. चाहे पेयजल की व्यवस्था,स्वचछता का काम हो या फिर सांसद विधायक कोश से आने वाली राशि का उपयोग. किसे इंदिरा आवास देना है और किसका नाम बीपीएल की सूची में आयेगा ये सब सरपंच की मोहर निर्धारित करती है.

बीते पांच साल को देखें तो राजस्थान में अब सरपंचों को ‘‘बोलेरो सरपंच’’ कहना शुरू कर दिया है. एक अनुमान के मुताबिक लगभग तीन चैथाई सरपंच चार पहिये के  वाहनधारी  हो गये है. उनके बच्चों  के पास मोटर साईकिल तो आम बात सी हो गई है. जबकि नरेगा को लागू हुए अभी पूरे दो साल भी नहीं हुये है. इस बात में सच्चाई इससे नजर आती है कि  केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री डॉ सी पी जोशी के निर्वाचन क्षेत्र भीलवाडा की 11 ग्राम पंचायतों में हुई एक बर्ष की ही सोशल आँडिट में एक ग्राम पंचायत में औसत 20 लाख रूपये के घोटाले जो सामने आये है. कमोबेश स्थिति सभी जगह ऐसी है. यही कारण था कि राज्य सरकार ने सरपंचों का बचाव करते हुये सोशल आँडिट को सरकारी बाबूओं के हवाले जो कर दिया है.

पंचायतीराज के चुनावों में इस बार जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्य बनने से कही ध्यान सरपंच बनने को लेकर है. या फिर सीधे जिला परिषद और प्रधान बनने की जुगत बिठाई जा रही है. इन सबके पीछे भी कहीं न कहीं ‘महानरेगा’ एक बडा कारण साफ नजर आ रहा है. इस योजना के आरम्भ होते ही पंचायतीराज के जनप्रतिनिधि बनने की ओर रूझान एकदम से बढ गया है. जिसमें सरपंच बनना तो सबसे अहम हो गया है. नरेगा के तहत पंचायतों में सालाना बजट एक करोड से कही अधिक हो गया है. साथ ही केन्द्र और राज्य सरकार की योजनाओं का सीधा पैसा भी पंचायतों तक पहुंच रहा है.

पैसे की इस बाढ ने गांवों में सरपंच का ओहदा बढा दिया है. जिला परिषद और पंचायत समिति के लिए चुने जाने वाले सदस्यों का महत्व तो जिलाप्रमुख और प्रधान के चुन लिये जाने के बाद खत्म सा ही हो जाता है. जबकि सरपंच सीधे पाँच सालों तक ग्राम पंचायत का मुखिया बना रहता है. इस बीच सरपंच का काम गांव के विकास से जुडी हर एक योजना से प्रत्यक्ष जुडा रहता है.प्रदेश भर में इन दिनों चुनावी की खुमारी चढी हुई है.  सरपंच बनने की इच्छा रखने वाले लोगों ने मतदाताओं के बीच अपनी पैठ बनाना आरम्भ कर दिया है. अभी तक  इन चुनावों में आम तौर पर प्रचार सामग्री का प्रयोग न के बराबर ही दिखाई पडता था. इस बार चुनावों में प्रचार सामग्री का इस्तेमाल भी बडे स्तर पर किया जा रहा है. इतना ही नहीं प्रचार में बायकादा गाडियों का इस्तेमाल प्रत्याशी कर रहे है. साथ ही गांव में मतदाताओं को खरीदने की पूरी कीमत लगाई जा रही है.
सरपंच पद के प्रत्याशियों की ओर से मतदाताओं को खुलेआम पैसों की पेशकश हो रही है. अभी तक की जानकारी के अनुसार एक मतदाता की कीमत एक हजार रूपये तक तो सामने आ गई है. युवा मतदाताओं को मोबाईल दिये जा रहे है. महिलाओं को अपने पक्ष में करने के लिए पहनने की पायल और साड़ियों का बितरण तक किया जा रहा है.
ग्रामीण क्षेत्रों से जाकर शहरी हो गये लोग भी अब गांव की ओर लौट रहे है. ऐसे प्रभावशाली लोगों ने चुनाव से पूर्व ही गांव में आकर माहौल बनाया. और अब सरपंच के प्रत्याशी बन रहे है. सरपंच बनने की ओर युवाओं का रूझान भी एक दम से बढा है. हर किसी की जुबान पर नरेगा है. सरपंच के पद की मारा मारी ने ये जरूर साबित कर दिया है महानरेगा का आगे क्या हश्र होने वाला है. क्योंकि जिस तरह सरपंच बनने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा. वो आखिर वापिस कहां से आऐगा ? कहीं महानरेगा पर ही तो निशाना नही है.

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Ranjana on 21 January, 2010 14:54;32
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Ekdam saty kaha...parantu yah sthiti kewal rajasthaan kee nahi hai...
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image राजीव शर्मा राजीव शर्मा राजस्थान में रहकर मुक्त पत्रकारिता कर रहे हैं.इससे पूर्व कइ अखवारों के लिए रिपोटिंग कर चुके हें। राजनीति के अलावा पानी-पर्यावरण के मुद्दे पर संवेदनशील रिपोर्टिंग के लिए प्रयासरत। विस्फोट के लिए राजस्थान से नियमित लेखन और रिपोर्टिंग. rsmediaraj@gmail.com
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