संविधान के मूल ढांचे का मिथक
आज जब गणतंत्र के साठ साल पूरा होने के मौके पर संविधान की समीक्षा पर देश में बहस चल रही है तो संविधान के मूल ढांचे के सिद्धान्त के गुण-दोष पर भी विस्तार से चर्चा होनी चाहिए, ताकि इस आकर्षक तर्क के सभी आयामों को सबके सामने लाया जा सके।
संविधान के मूल ढांचे के सिद्धान्त का जन्म उस समय हुआ था जब न्यायालय और सरकार में इस मुद्दे पर मतभेद अपने चरम पर थे कि जमीन्दारी उन्मूलन, बैंकों के राष्ट्रीयकरण और प्रिवीपर्स की समाप्ति जैसे नीतिगत मुद्दों पर अन्तिम निर्णय लेने का अधिकार अपनी सभी तथाकथित कमियों के बावजूद हमारे चुने गए प्रतिनिधियों के हाथ में हो जो जनता के प्रति जवाबदेह हैं या न्यायाधीशों के हाथ में हो जो अपनी विद्वता के बावजूद या तो केवल ईश्वर के प्रति या अपनी अन्तरात्मा के प्रति जवाबदेह हैं। इस रस्साकशी के पहले भाग का पटाक्षेप तब हुआ जब `केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य´ के मुकदमे का फैसला आया। सुप्रीम कोर्ट ने इसमें अपनी मंशा स्पष्ट कर दी कि संसद में बहुमत का सहारा लेकर सरकार अपनी मनमानी नीतियों को लागू नहीं कर सकती। वह संविधान में संशोधन करते समय उसके मूल ढांचे को नष्ट नहीं कर सकती। तेरह न्यायाधीशों वाली पीठ ने यह स्वीकार किया कि यद्यपि संविधान में इस प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है, किन्तु फिर भी इस अधिकार पर कुछ अन्तर्निहित प्रतिबंध अवश्य होने चाहिए और इस प्रतिबंध के लिए संविधान के मूल ढांचे की सुरक्षा जैसा शब्द ईजाद किया गया। जब इस इस मूल ढांचे को परिभाषित करने का विषय आया तो इस सिद्धान्त की अस्पष्टता और अन्तर्निहित दुरूहता स्पष्ट होने लगी। बाद के वर्षों में दिए गए निर्णयों में जहां एक ओर यह अबोधगम्य होता गया वहीं दूसरी ओर इसकी धार पैनी हो गई। बाद में आपातकाल ने राजनीतिज्ञों के मन में इतना अपराध बोध भर दिया कि न्यायपालिका के इस सिद्धान्त के गुण-दोष पर चर्चा करने की नैतिक हिम्मत भी समाप्त हो गई। इतिहास बोध से कटकर अब तो केवल उसकी लकीर पीटी जा रही है।
संविधान के मूल ढांचे को परिभाषित करने का प्रयास `केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य´ के मुकदमे से शुरू हुआ। इसमें बहुमत का निर्णय देने वाले सात में से छह न्यायाधीशों ने कहा कि संविधान के अध्याय तीन में वर्णित मूल अधिकार, उसका मूल ढांचा है अत: उसमें संशोधन नहीं होना चाहिए, जबकि उनमें से एक न्यायाधीश एच.आर. खन्ना ने मत व्यक्त किया कि संपत्ति का मूल अधिकार संविधान के बुनियादी ढांचे का भाग नहीं है। न्यायमूर्ति शैलेट तथा न्यायमूर्ति ग्रोवर का कहना था कि संविधान के मूल ढांचे की कोई सर्वमान्य सूची नहीं बनाई जा सकती और इस निर्णय में मूल ढांचे की सूची उदाहरण के रूप में दी जा रही है। उन कुछ उदाहरणों की सूची को स्पष्ट करते हुए दोनों न्यायाधीशों ने कहा कि संविधान की सर्वोच्चता, सरकार की गणतन्त्रीय व्यवस्था, राष्ट्र की संप्रभुता, संविधान का संघीय तथा पन्थ निरपेक्ष स्वरूप, कार्यपालिका-विधायिका तथा न्यायपालिका के बीच शक्तियों का बंटवारा, मूलभूत अधिकारों से पराभूत मानवीय गरिमा की सुरक्षा, भाग चार में विर्णत समाज कल्याणकारी राज्य बनाने का संकल्प तथा भारत की एकता व अखण्डता संविधान के मूल ढांचे के कुछ उदाहरण हैं।
इसी मुकदमे में न्यायमूर्ति सीकरी ने अपनी सूची देते हुए कहा कि संविधान की सर्वोच्चता, उसकी गणतन्त्रीय व्यवस्था, पन्थ निरपेक्षता, राज्य के तीनों अंगों की शक्ति का पृथक्करण, संविधान का संघीय चरित्रा तथा नागरिकों का स्वतन्त्राता व प्रतिष्ठा का अधिकार, मूल ढांचे के अन्तर्गत शामिल हैं। इस निर्णय के बाद के फैसलों में मूलभूत ढांचे के उदाहरणों में कुछ और वृद्धि हुई। जैसे `इन्दिरा गांधी बनाम राज नारायण´ के मुकदमे में न्यायमूर्ति खन्ना ने मत व्यक्त किया कि संविधान का प्रजातान्त्रिक ढांचा और स्वतन्त्रा एवं निष्पक्ष चुनाव की परंपरा हमारे संविधान के मूल ढांचों का भाग है, जबकि मुख्य न्यायाधीश ए.एन. रे ने मत व्यक्त किया कि चुनाव व्यवस्था हमारे मूलभूत ढांचे का हिस्सा नहीं है। इसी केस में न्यायमूर्ति मैथ्यू ने कहा कि न्यायिक पुनरावलोकन का सिद्धान्त संविधान का मूल ढांचा है जबकि न्यायमूर्ति चन्द्रचूड़ ने इससे असहमति व्यक्त की। इस कड़ी में तीसरा निर्णय `मिनर्वा मिल्स लिमिटेड बनाम भारत संघ´ का था जिसमें मूल ढांचे के सिद्धान्त की कमजोरी बिल्कुल उजागर हो गई। इसमें सभी न्यायाधीश इस बात पर तो सहमत थे कि मूल अधिकार तथा राज्य के नीति निर्देशक तत्त्वों में सामंजस्यपूर्ण सम्बंध संविधान का मूल ढांचा है, लेकिन इस मूल ढांचे को लागू करने के सवाल पर उनमें मतभेद थे। मुख्य न्यायाधीश चन्द्रचूड़ व न्यायमूर्तिगण गुप्ता, वालिया तथा कैलासम का मानना था कि चवालीसवें संविधान संशोधन का विवादग्रस्त हिस्सा मूल ढांचे का उल्लंघन करता था, अत: वह असंवैधानिक था। जबकि, न्यायमूर्ति भगवती ने उसी मूल ढांचे के सिद्धान्त को लागू करते हुए कहा कि विवादग्रस्त संशोधन मूल ढांचे का उल्लंघन नहीं, अपितु उसे पुष्ट करता था। इस प्रकार केवल इतना ही नहीं है कि मूल ढांचे के बारे में अलग-अलग न्यायाधीशों की वस्तुनिष्ठ नहीं, अपितु व्यक्तिनिष्ठ धारणाएं हैं, बल्कि इसके साथ ही उसे लागू करने की परिस्थितियों के आकलन में भी उनमें प्रबल अन्तर्विरोध हैं।
`मूल ढांचे´ को बचाए रखने का सिद्धान्त ईजाद इसलिए हुआ था कि संविधान के तथाकथित गैर जरूरी संशोधनों पर प्रतिबंध लग सके। इसलिए भावी पीढ़ी द्वारा प्रस्तावित किए जाने वाले संविधान संशोधनों के लिए यह जानना जरूरी है कि कौन से अनुच्छेद हैं जिनमें छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए। इसके लिए मूल ढांचे के सभी उदाहरणों को सूचीबद्ध करना जरूरी है। यद्यपि सभी न्यायाधीशों ने संविधान के मूल ढांचे के बारे में व्याख्या करते समय यह स्पष्ट कर दिया था कि यह सूची अन्तिम नहीं है और उसमें नए नाम जोड़े जा सकते हैं फिर भी यदि अब तक के उदाहरणों को ही अन्तिम माना जाए तो उसके भाग एक, भाग पांच तथा भाग छह को संशोधन से परे रखना होगा। इस प्रकार `पन्थ निरपेक्ष एवं संघीय व्यवस्था´ को बचाए रखने के लिए संविधान की उद्देश्यिका, अनुच्छेद 25 से 30, भाग पांच एवं भाग छह को संशोधन की सीमा से अलग रखना होगा। यदि संविधान में विर्णत शक्ति के पृथक्करण के सिद्धान्त को सुरक्षित रखना है, जिसे इन्दिरा गांधी बनाम राजनारायण के मूल ढांचे के अन्तर्गत रखा गया था, तो संविधान के भाग पांच के अध्याय एक, दो, तीन तथा चार के अन्तर्सम्बंधों में किसी प्रकार की छेड़छाड़ से उसे अलग रखना होगा।
कुछ न्यायाधीशों के मुताबिक संविधान के भाग तीन में विर्णत स्वतन्त्रताओं से उद्भूत मानवीय गरिमा के अधिकार तथा भाग चार में विर्णत समाज, कल्याणकारी समाज के लिए दिया गया निर्देश मूल ढांचा है। यदि मान लिया जाए कि इस मूल ढांचे में परिवर्तन किया जा सकता है तो संविधान के भाग तीन और चार के मौजूदा स्वरूप में कोई तब्दीली नहीं की जा सकती। इस प्रकार यदि मूल ढांचे के उदाहरणों जैसे- न्यायिक पुनरावलोकन, संशोधन का सीमित अधिकार, कानून का शासन, प्रजातन्त्रीय व्यवस्था, स्वतन्त्रा और निष्पक्ष चुनाव, अलग-अलग विभागों के अधिकारों का बंटवारा, समानता के अधिकार को भी जोड़ दिया जाए तो सम्पूर्ण संविधान उसमें समाहित हो जाएगा। मूल ढांचे के कुछ उदाहरणों को तो संविधान के कुछ अनुच्छेदों या अध्यायों से जोड़ा जा सकता है, किन्तु उसमें से कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें किसी अनुच्छेद या भाग से नहीं जोड़ा जा सकता। पूरा संविधान ही उन्हीं आधारों पर टिका हुआ है। संविधान की सर्वोच्चता, कानून का शासन तथा समतामूलक समाज बनाने के निर्देश जैसे उदाहरण ऐसे हैं जिन्हें संविधान के किसी अनुच्छेद या भाग से नहीं जोड़ा जा सकता। सम्पूर्ण संविधान इन्हीं सिद्धान्तों को बढ़ावा देने और अभिसिंचित करने के लिए बनाया गया है।
मूल ढांचे के सिद्धान्त केवल अस्पष्ट ही नहीं हैं, अपितु उनमें पारस्परिक अन्तर्विरोध भी हैं। इनकी कोई प्रामाणिक सूची नहीं बनाई जा सकती। इसलिए संविधान संशोधन की अन्तिमता पर प्रश्नचिह्न लगा रहेगा। ऐसा सम्भव है कि कोई संशोधन दस साल तक सही माना जाता रहे और बाद में वह पांच न्यायाधीशों की पीठ के सामाजिक दर्शन के विपरीत हो और उसे निरस्त कर दिया जाय। फिर दस वर्षों के बाद सात न्यायाधीशों की पीठ उसे सही करार कर दे। यदि मूल ढांचे के अन्तर्विरोधों को अपने स्वाभाविक मुकाम तक पहुंचने दिया जाए तो भविष्य में संविधान के किसी अनुच्छेद में संशोधन नहीं किया जा सकता। जबकि संविधान तो जीवन्त समाज को शासित करने वाले सूत्रा वाक्यों का संहिताकरण मात्रा है। चूंकि प्रगतिशील समाज की जरूरतें हर समय बदलती रहती हैं तथा उसकी आकांक्षाओं में सतत परिवर्तन होता रहता है, अत: संविधान में उसके मुताबिक संशोधन की भी आवश्यकता पड़ती रहती है। यदि उसमें संशोधन की संभावनाओं को इस तरह समाप्त कर दिया जाएगा तो उसमें जड़ता आ जाएगी, वह समाज की अपेक्षाओं के अनुरूप अपने आपको ढालने में असमर्थ रहेगा, और जब संविधान में संशोधन के विधिसम्मत रास्ते बन्द कर दिए जाएंगे तो अपनी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए जनता गैर कानूनी तरीकों का सहारा लेगी और विद्रोह जैसे विकल्पों को चुनने को बाध्य होगी।
अपनी सभी कमियों के बावजूद जन प्रतिनिधि ही जनता की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है। प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में यह जिम्मेदारी उसे ही दी गई है। इसलिए उसकी जवाबदेही और वफादारी पर निगरानी रखने के लिए हर पांच साल बाद उसे जनता की अदालत में आना पड़ता है। अत: शासन की नीतियों को निर्धारित करने का स्वाभाविक अधिकार उसी का है। न्यायालय द्वारा सृजित मूल ढांचे जैसे अस्पष्ट और अन्तर्विरोधों से ग्रस्त मोहक और लुभावने सिद्धान्तों द्वारा इसमें बाधा नहीं पहुंचाई जानी चाहिए। विद्वान न्यायाधीशगण संविधान के बहुत महत्त्वपूर्ण स्तंभ होते हैं, लेकिन हमें इस खुशफहमी में नहीं रहना चाहिए कि किसी देश की व्यवस्था को केवल न्यायाधीश ही बचा सकते हैं।
हमें मूल ढांचे जैसे नारों पर भरोसा रखने के बजाय देश की जनता के निर्णय के ऊपर यकीन रखना चाहिए। और, जब हम संविधान के किसी संशोधन से सहमत नहीं हैं तो उसे जनता की अदालत में ले जाना चाहिए। आज जब संविधान की समीक्षा पर देश में बहस चल रही है तो संविधान के मूल ढांचे के सिद्धान्त के गुण-दोष पर भी विस्तार से चर्चा होनी चाहिए, ताकि इस आकर्षक तर्क के सभी आयामों को सबके सामने लाया जा सके और इसे परस्पर विरोधी हित रखने वाले लोगों द्वारा दुधारी तलवार के रूप में इस्तेमाल किए जाने से बचाया जा सके।
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