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भारतीय गणतंत्र का गणित

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image संविधान पर हस्ताक्षर करने के बाद डॉ राजेन्द्र प्रसाद को बधाई देते पंडित नेहरू

भारत गणतंत्र अपने 60 वें पायदान पर पहुंच रहा है। इस अवसर पर यह पूछना स्वाभाविक है कि क्या एक गणतंत्र के रूप में हम सफल रहे है? हमारी संवैधानिक व्यवस्था ने क्या हमको एक राष्ट्र के रूप में सफल साबित किया है? क्या हमारा संविधान सफल हुआ है?

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर तीन वर्षों तक संविधान लेखन पर कड़ी मेहनत के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि ‘कोई भी संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो यदि उस पर काम करनेवाले बुरे लोग हुए तो उसे वे बुरा बना देंगे। इसी तरह कितना भी बुरा संविधान हो यदि उस पर काम करने वाले अच्छे लोग होंगे तो उसे अच्छा बना देंगे।’

इस देश की संवैधानिक संस्थाओं के सतत क्षरण को देखकर डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर के वे शब्द शब्दशः सही साबित हो रहे हैं। 1950 में जब भारत को गणराज्य के रूप में स्थापित किया गया तो हर बुद्धिजीवी सवाल पूछता था, क्या भारत एक लोकतंत्र के रूप में बचा रहेगा? इस सवाल के दो तरह के जवाब हुआ करते थे। पहला जवाब सकारात्मक था। हां, भारत एक लोकतंत्र के रूप में निश्चित तौर पर सफल रहेगा क्योंकि भारत के पास एक लोकतांत्रिक संविधान है जिसके तहत निर्वाचित सरकार शासन का संचालन करेगी जिसमें विपक्षी दलों को काम करने की पूरी इजाजत है। नागरिकों के बुनियादी अधिकारों की गारटी है। भारत के पास स्वतंत्र प्रेस और न्यायपालिका है। भारत के मंत्री संसद के प्रति जवाबदेह रहेंगे। संघात्मक संविधान के आधार पर सरकार ने अधिकारों और शक्तियों का प्रसार ग्राम स्तर तक कर दिया है। चूंकि राज्यों की रचना भाषाई आधार पर की गई है, सो हर राज्य का प्रशासन स्थानीय भाषा में काम कर आम आदमी को उसके अधिकारों व कर्तव्यों से अवगत करा देगा। संविधान ने वंचित तबकों को सुरक्षा और सरकार में विशेष नुमाइंदगी का प्रावधान किया है। ऐसे में राजनीतिक दल लोकतांत्रिक प्रक्रिया का प्रयोग कर आर्थिक, सामाजिक आयामों को सुदृढ़ कर इस देश की लोकतांत्रिक प्रणाली को विकसित करेंगे। इस जवाब के साथ-साथ दूसरा नकारार्थी जवाब कुछ बुद्धिजीवी दिया करते थे कि भारत में लोकतंत्र की सफलता संदिग्ध है क्योंकि भारत संघवाद एकात्मकता के पक्ष में झुका हुआ है। भारत का प्रशासन केंद्रित है।

indian_1 copy.jpgभारतीय राष्ट्रपति के पास आपातकालीन शक्तियां है। एक ही पार्टी के हाथ में सत्ता की इजारेदारी है जिसके कारण विधायिका जी-हुजूरियों के संगठन में परिवर्तित हो गई है। मंत्रिमंडल  में कैबिनेट के भीतर कैबिनेट है और उसके हाथ में निर्णयकारी शक्ति कैद है। सरकार के पास संविधान की भावना के विपरीत निवारक नजरबंदी कानून है। सरकार द्वारा अधिगृहीत निजी संपति का मुआवजा निर्धारित करने में अदालती हस्तक्षेप को रोकने के लिए संविधान में संशोधन कर दिया गया है जिससे संपति रखने के मौलिक अधिकार पर प्रभाव पड़ा है। आर्थिक नियोजन के कारण योजना आयोग जैसी संविधानेतर संस्थाएं अभर आई हैं जो संघवाद और लोकतांत्रिक विकंद्रीकरण को निष्प्रभ कर देंगी। इसके अलावा एक बड़ा वर्ग जो लोकतंत्र में ही विश्वास नहीं रखता, का तर्क हुआ करता था कि भारत की समग्र लोकतांत्रिक परंपरा ही एक बड़ा फर्जीवाड़ा है। भारत गणतांत्रिक व्यवस्था में सरकार ही सर्वशक्तिमान है। उस व्यवस्था में व्यक्ति का कोई महत्व शेष नहीं। प्रधानमंत्री लोकतंत्र का पहरूआ बनने की बजाय तानाशाह की तरह काम करता है। इस तानाशाही व्यवस्था के चलते ही पुलिस गोलीचालन जैसी घटनाओं को उसी तरह अंजाम दे रही है जिस तरह आजादी के पहले अंग्रेज हुक्कामों के इशारे पर गरीब जनता पर गोलियां चलती थी। अब हम 60 वर्ष बाद देखें कि क्या सचमुच हम एक लोकतंत्र के रूप में सफल रहे हैं या फिर हम लोकतांत्रिक प्रणाली के चलते एक राष्ट्र के रूप में नष्ट होने की कगार पर पहुंच गए है? दरअसल, भारतीय संवैधानिक व्यवस्था दुनिया की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्थाओं में से एक है। पर संविधान के संदर्भ में डॉ. आंबेडकर का निष्कर्ष सही साबित हुआ है। कई बार मेरे मन में यह बात उठती है कि यदि इस देश में पं. जवाहरलाल नेहरू पहले प्रधानमंत्री बनने की बजाय पहले राष्ट्रपति हुए होते  और डॉ. राजेंद्र प्रसाद को पहला प्रधानमंत्री बनने का अवसर प्राप्त हुआ होता तो क्या दृश्य अलग होता? पं. जवाहरलाल नेहरू के साथ समस्या थी कि वे लोकतांत्रिक स्वभाव से संपन्न एक अच्छे व्यक्तित्व होने के बावजूद अभिजन वर्ग के बेहद करीब थे। उनका इस देश के बहुजनों के बीच किसी प्रकार का संपर्क नहीं था। वे सारे देश में घूमते थे। वे लोगों को मुक्त करना चाहते थे। वे जनता को आजादी और समृद्धि देना चाहते थे लेकिन उनकी अपनी शैली के कारण लोगों की लोकतंत्र में भागीदारी का मार्ग ही नहीं खुल पाता था। इसीलिए उनका डॉ. राजेंद्र प्रसाद से टकराव भी होता रहा।

पं. जवाहरलाल नेहरू डॉ. राजेंद्र प्रसाद को राष्टपति बनाने के लिए तैयार ही नहीं थे। वे उनकी जगह सी. रजगोपालाचारी को राष्ट्रपति के रूप में देखना चाहते थे। पं. जवाहरलाल नेहरू ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद को पत्र लिखकर उनसे राष्ट्रपति चुनाव न लड़ने का आग्रह किया था। इसी तरह का उन्होंने एक पत्र सरदार वल्लभ भाई पटेल को लिखकर डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उम्मीदवारी को समर्थन न देने का आग्रह रखा था। पं. नेहरू की बात को डॉ. राजेंद्र प्रसाद और बल्लभ भाई पटेल ने सिरे से खारिज कर दिया। हिंदू कोड बिल पर भी डॉ. राजेंद्र प्रसाद और पं. नेहरू के बीच टकराव हुआ था। टकराव इस हद तक गया था। कि 27 मार्च 1950 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने तत्कालीन एटॉर्नी जनरल एम. सी. सेटलवाड को पत्र लिखकर पूछा था कि ‘संसद द्वारा पारित किसी बिल पर क्या राष्ट्रपति स्वतंत्रतापूर्वक निर्णय लेने के लिए मुक्त है? उनका यह भी प्रश्न था कि क्या राष्ट्रपति मंत्रिमंडल को भंग करने का अधिकार रखता है?’ सेटलवाड ने राष्ट्रपति को उत्तर दिया था कि ‘राष्ट्रपति को मंत्रिमंडल द्वारा प्रस्तावित और संसद द्वारा पारित किसी भी विधेयक को रोकने का अधिकार है।’ इसी तरह राष्ट्रपति मंत्रिमंडल की सलाह को मानने के लिए मजबूर नहीं है। राष्ट्रपति को आपात स्थिति में मंत्रिमंडल को भंग करने का अधिकार है। इसी दौरान नेहरू ने भी एटॉर्नी जनरल को पत्र लिखकर इन्हीं प्रश्नों के उत्तर मांगे। इस पर सेटलवाड ने 24 सितंबर 1951 को पं. नेहरू को उत्तर दिया कि ‘राष्ट्रपति अपने अधिकारों का प्रयोग मंत्रिमंडल की सलाह पर ही कर सकता है।’ उन्होंने पं. नेहरू को यह भी सलाह दी कि ‘राष्टपति मंत्रिमंडल को तब तक नहीं भंग कर सकता जब तक उसे लोकसभा में महुमत प्राप्त है। यदि राष्ट्रपति को मंत्रिमंडल के कामकाज से असंतोष है तो वह संसद को भंग कर शीध्र चुनाव का आदेश दे सकता है।’ निश्चित तौर पं. जवाहरलाल नेहरू और राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के बीच कुछ गंभीर किस्म के मतभेद उपजे होंगे तभी प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति दोनों ने एटॉर्नी जनरल से राष्ट्रपति के अधिकारों के संबंध में सलाह मांगी थी। एटॉर्नी ने दोनों संस्थाओं को एक ही विषय पर अलग-अलग राय दी थी। आप कल्पना करें कि यदि पं. नेहरू राष्ट्रपति होते और डॉ. राजेंद्र प्रसाद प्रधानमंत्री तो क्या राष्ट्रपति भवन प्रधानमंत्री की तुलना में सशक्त नहीं होता? डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने निश्चित तौर पर इस देश की संवैधानिक व्यवस्था की साख को बनाए रखने के लिए उस समय उपजे टकराव की स्थिति को टाला। यदि पं. नेहरू की जगह डॉ. राजेंद्र प्रसाद प्रधानमंत्री हुए होते तो  प्रधानमंत्री का कार्यकाल कांग्रेस संगठन, विधायिका और कार्यपालिका ये सब अभिजन समर्थक होने की बजाय बहुजनोन्मुखी संस्थाओं के रूप में उभरते। लाल बहादुर शास्त्री का कार्यकाल बहुत छोटा था, लेकिन उन्होंने उस अवधि में जो कुछ किया उसने प्रमाणित किया कि सामान्य जनता के बीच से आधा व्यक्ति संविधान द्वारा अपेक्षित लोकतंत्र के लिए ज्यादा उपयुक्त प्रधानमंत्री साबित हुआ। डॉ. राजेंद्र प्रसाद भी इस देश की व्यथा-कथा को समझते थे इसलिए यदि वे प्रधानमंत्री हुए होते तो इस देश का कल्याण निश्चित तौर पर होता। नेहरू की अभिजन नीतियों से डॉ. राजेंद्र प्रसाद ही व्यथित नहीं हुए थे। पं. जवाहरलाल नेहरू डॉ. राजेंद्र प्रसाद को दूसरी बार राष्ट्रपति नहीं बनने देना चाहते थे वे उनकी जगह सर्वपल्ली राधाकृष्णन  को उस पद पर बैठाना चाहते थे। पहली बार उन्हें इसमें सफलता नहीं हासिल हुई। जब तीसरे राष्ट्रपति चुनाव के समय डॉ. राजेंद्र प्रसाद का नाम उभरा तो पं. नेहरू ने संविधान में संशोधन लाकर राष्ट्रपति कार्यकाल को सीमित करने का विचार आगे बढ़ाया। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने उस समय भी टकराव की बजाय सामंजस्य का मार्ग अपनाकर अपनी उम्मीदवारी स्वयं पीछे ले ली।

इसके चलते सर्वपल्ली राधाकृष्णन इस देश के दूसरे राष्ट्रपति हुए। कालांतर में राधाकृष्णन ने भी पं. नेहरू की नीतियों से नाराजगी दिखाई। नेहरू की चीन नीति के खिलाफ राधाकृष्णन और के. कामराज ने अगस्त 1963 में पं. नेहरू प्रधानमंत्री पद से रिटायर करने की योजना बनाई थी। कामराज ने राधाकृष्णन के कहने पर प्रधानमंत्री निवास में परिचर्चा के लिए कांग्रेस पदाधिकारी और मंत्रिमंडल के सदस्यों की बैठक बुलाई थी।उस बैठक में कामराज नेहरू को रिटायर करना चाहते थे। बैठक के फैसलों की प्रतीक्षा में राष्ट्रपति भवन में राधाकृष्णन रातभर जागे थे लेकिन जब सुबह उन्हें खबर मिली कि नेहरू ने कामराज को ही रिटायर कर दिया। नेहरू के बाद लाल बहादुर शास्त्री और शास्त्री के बाद इंदिरा गांधी इस देश की प्रधानमंत्री बनी। इंदिरा एक ऐसी प्रधानमंत्री थी कि उनकी अंगुलियां न केवल राजनीति के नब्ज पर रहती थीं बल्कि उनके पास इस देश को एक महान शक्ति बनाने की एक दृष्टि भी थी। मैं इंदिरा गांधी का गुणगान नहीं करना चाहता लेकिन यह एक तथ्य है कि वे इस देश की सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री रही हैं। उनके आपातकाल के युग को छोड़ दिया जाए तो इस देश को सशक्त बनाने में उनका प्रबल योगदान रहा ळै। इंदिरा गांधी ने इस देश को सशक्त बनाया पर लोकतांत्रिक व्यवस्था को खोखला कर दिया। उनके कार्यकाल के राष्ट्रपति उनसे संवैधानिक मार्यादाओं के पालन की अपेक्षा करने का भी साहस नहीं रखते थे। जो लोग मानते हैं कि राजीव गांधी इंदिरा की तुलना में अधिक उदारवादी थे, वे गलत हैं। राजीव गांधी ने भारत मॉडल को पूरी तरह से खत्म कर एक प्रबंधकीय तकनीकशाही शैली का विकास कर लोकतंत्र को व्यक्तितंत्र में बदलने का काम किया। राजीव गांधी के कार्यकाल में बाजारवाद की विकृतियों ने इस देश पर कब्जा कर लिया। राजीव गांधी की प्रधानमंत्री पद पर नियुक्ति में ही राष्ट्रपति भवन ने संवैधानिक मर्यादा का उल्लंघन किया था। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने राजीव गांधी को कार्यवाहक प्रधानमंत्री किस आधार पर बनाया? क्या राजीव गांधी इंदिरा मंत्रिमंडल के सदस्य थे? नहीं। ज्ञानी जैल सिंह के इसी अज्ञान ने कालांतर में राजीव गांधी को खुद को संविधान से ऊपर मानने का भ्रम पालने की सहूलियत दी। कालातंर में आम आदमी के हित के नाम पर चंद लोगों को अमीर बनाने का खेल शुरू हुआ। इसी खेल ने इस देश की राजनीतिक व्यवस्था को सांसत में डाल दिया है और लोकतंत्र लोभतंत्र में तब्दील होने की कगार पर खड़ा है।

गांधी परिवार के अलावा सिर्फ अटलबिहारी वाजपेयी ही अकेले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री हुए जिनसे संवैधानिक व्यवस्था पर प्रभाव की उम्मीद की जा सकती थी। नरसिंह राव वैसे तो संविधानवादी थे पर उन्होंने जिस तरह हाईकोर्ट के न्यायाधीश रामास्वामी के खिलाफ आए महाभियोग का विरोध किया उससे न्यायपालिका में भ्रष्टाचारी निरंकुशता को प्रश्रय मिला। सोनिया गांधी इस गणतांत्रिक व्यवस्था में संविधान के तीनों स्तभों से ऊपर उठकर महाशक्ति बन गई हैं। क्या यह साबित नहीं करता कि संविधान पालन के वर्तमान उत्तरदायी संविधान का दुरूपयोग कर लोकतंत्र को लोभतंत्र में तब्दील कर चुके है। गणतंत्र का गणित गड़बड़ा गया है।

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sameer chougaonkar on 26 January, 2010 16:26;30
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very well written.
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RAJ SINH on 27 January, 2010 00:16;36
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मैं असहमत हूँ.
दरअसल मोतीलाल नेहरू से लेकर अब तक का हर नेहरू-गांधी अपने आप में तानाशाह और आटोक्रेट रहा है,संतान मोह में अंधे ध्रितराष्ट्र की तरह . हाँ उसके लिए राजनैतिक और सामाजिक समीकरण तथा परिस्थितियां अलग रहीं . जवाहर चाह कर भी उतने स्वछंद नहीं हो सकते थे क्योंकि उतने सार्वभौम नहीं हो सकते थे ,प्रतिरोध में आज़ादी की लडाई में तपे तपाये बहुत सिखर पुरुस थे ,चेक और बैलेंस के लिए.
इंदिरा और राजीव पार्टी को नपुंसक और कठपुतली बना स्वच्छंद हो सके. आज का सोनिया तंत्र भी काफी लगामों के बीच उतना अनियंत्रित नहीं हो सकता और राजनैतिक समीकरणों से ही वह वही स्थिति पाने का ख्वाब देख रहा है.
लेकिन यह भी सच है की आज की राजनीती में कौन ऐसा नहीं है. सभी राजा बनना चाहते हैं .तानाशाह की हदों तक .कोई जनसेवक नहीं है.
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image प्रेम शुक्ल मुंबई से प्रकाशित हिन्दी सामना के कार्यकारी संपादक. पिछले 20 सालों से पत्रकारिता. पत्रकारिता के साथ ही मुबंई में हिन्दीभाषी समाज के विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय. विस्फोट.कॉम के नियमित स्तंभ लेखक. संपर्क - premshukla@rediffmail.com
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