संविधान बदल देने से नहीं बदलेंगे हालात
भारत का संविधान अब साठ साल पुराना हो चुका । इस साठ साल के वरिष्ठ संविधान में बदलाव की मांग कोई नया राग नहीं है । जब इस देश में किसी को कुछ समझ नहीं आता तो बस संविधान परिवर्तन की ढपली बजने लगती है । इन्हीं सब के बीच सन् 2000 में तत्कालीन सरकार ने न्यायमूर्ति एम.एन. वैंकटचलैया की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया था । आयोग के कार्यक्षेत्र को लेकर विवाद व शोर-शराबा होने पर यह स्पष्टीकरण दिया गया कि आयोग का कार्य संविधान में बदलाव नहीं अपितु उसका पुनरीक्षण करना है ।
प्रश्न यह है कि क्या डॉ. बाबा साहब अंबेडकर द्वारा रचित यह संविधान साठ वर्ष उपरान्त इतना कमजोर हो गया है? कि उसे पूर्ण कायाकल्प कर बदल दिया जाये। क्या वह संविधान सभा जिसकी अध्यक्षता डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जैसे व्यक्तित्व ने की हो आज के राजनेताओं और नौकरशाहों के द्वारा पुनरीक्षण या बदलाव के योग्य है र्षोर्षो आजादी के इतने लंबे समय के बाद देश में कई क्षेत्रों में बदलाव की बयार चली है जिसमें हमारी संस्कृति, वेश-भूषा, रहन-सहन, पाठन-पठन मे काफी तब्दीली आ चुकी है पर शायद संविधान कोई वस्त्र, भोजन या संस्कृति नहंी है जिसे आसानी से या कठिनाई से बदला जा सके । वस्तुत: हमारा संविधान हमारी आत्मा है जिसने इतनी विषमताओं से जूझने के बाद बड़ी मजबूती से भारत में लोकतन्त्र को ज़िन्दा रखा है और अब शायद यह लोकतन्त्र परिपक्व हो चुका है । यदि हम अपने लोकतन्त्र की तुलना अपने पड़ोसी देशों के साथ करें । फिर चाहे वह पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका या नेपाल हो, इन सब स्थानों पर लोकतन्त्र में लोक का तन्त्र से संघर्ष सबके सामने है ।
ऊपर उल्लेखित सभी देशों में आतंक तन्त्र, लोक तन्त्र से स्पष्टत: उपर नज़र आता है । और यहीं पर हमारे संविधान की सशक्तता स्पष्ट नज़र आती है । जहां आज भी तमाम समस्याओं के बाद हम इस संविधान की बदौलत ही विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र के रूप में खड़े हैं और ऐसा कहीं भी नहीं लगता कि इस संविधान में कहीं कोई बदलाव आवश्यक है । आज भी हम सजधज कर सरकारी स्तर पर गणतन्त्र पर्व मनाने एकत्रित होते हैं । पर यह आयोजन अब महज सरकारी आयोजन के रूप में सिमटता जा रहा है । आम जनता के बीच इस आयोजन को लेकर लोकप्रियता और उत्साह दोनों लगभग समाप्त हो चुके हैं । यदि हम स्वयं पर या आसपास नज़र डालें तो गणतन्त्र का यह राष्ट्रीय पर्व हमारे लिये महज एक और छुट्टी के दिन जैसा है । अन्तर सिर्फ इतना है कि इस दिन सुबह से हमारे कानों में देशभक्ति के गीत सुनाये पड़ने लगते हैं और स्कूली बच्चे दो लड्डू लेकर अपना गणतन्त्र मना लेते हैं ।
इस संविधान परिवर्तन की चर्चा में सकारात्मक एवं सार्थक क्या हो सकता है? यदि इस दिशा में सोचा जाये तो बहुत कुछ सम्भव है । ऐसा कहा जाता है कि लोकतन्त्र या गणतन्त्र जनता का, जनता द्वारा एवं जनता के लिये है । सवाल यह है कि क्या सही मायनों में ऐसा ही है र्षोर्षो यद्यपि हम विश्व के सबसे सफल गणतान्त्रिक राष्ट्रों में शामिल हैं किन्तु कमी सिर्फ है तो इस गणतन्त्र को पूर्ण रूप से जनहित में बदलने की । और यदि कहीं भी किसी बदलाव की आवश्यकता है तो वह इस संविधान को पालन करने और कराने की व्यवस्थाओं में बदलाव की है । जिस भावना और सोच के साथ डॉ. अंबेडकर जैसे विद्वान लोगों ने इसका मसौदा तैयार किया था वेसी व्यवस्था दुर्भाग्यपूर्णरूप से आज तक इस देश मे नहीं बन पायी है। आज भी इस देश का आदमी रोजी-रोटी और रहने-पहनने की बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा है ।
सबसे पहले परिवर्तन या बदलाव उस व्यवस्था में हो जो आम आदमी के हित का दिखावा कर उसे परेशान कर रही हैं । भ्रष्टाचार आज शिष्टाचार का रूप ले चुका है । वहीं इस लोकतन्त्र पर राजनेता और अफसरशाही सवार हैं । जिन्होंने आम जनता के अधिकारों को कुचल डाला है । और सच यह है जिसे हमें स्वीकार करना चाहिये कि देश का सबसे कमजोर व्यक्ति वह चाहे किसी भी समाज या जाति का हो, इस संविधान से उत्पन्न विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के द्वारा छला एवं ठगा जा रहा है । और यह सब उस सड़ी-गली और गन्दी व्यवस्था के मजबूत अंग हैं जो अब भ्रष्ट लोगों के आगे लचर एवं लाचार हो चुकी है ।
यदि कोई बदलाव करना है तो सबसे पहले उस अफसरशाही पर करें जो आज भी अंग्रेजों की मानसिकता से ग्रसित है और वह अपने आपको इस देश का मालिक मानती है और देश की जनता को गुलामों का दर्जा देकर रखा है । संविधान की जनकल्याण की मूल भावना में सबसे बड़ा रोड़ा यह लालफीताशाही ही है । जिसने कई बार जनता के चुने हुए जनप्रतिनिधियों को भी निकम्मा और नकारा साबित कर दिया है। ऐसा ही कुछ हाल हमारी पुलिस व्यवस्था का भी है जो जनता की रक्षक नहीं भक्षक बन चुकी है । इसी क्रम में हमारी न्यायपालिका भी है । जहां आज कोर्ट में जज के सामने बैठा उसका मातहत कर्मचारी खुलेआम रिश्वत लेकर अगली तारीख देता हो ऐसी न्यायपालिका से इंसाफ की क्या उम्मीद की जा सकती है। ऐसा ही सब कुछ तहसील, नजूल, बिजली, अस्पताल, सिंचाई, सड़क और अनगिनत जगह है ।
तो हमें देश के इस भ्रष्ट चरित्र को बदलने की आवश्यकता है, ना कि अपने संविधान को । देखा जाये तो संविधान कुछ कागज के पन्नों पर लिखी बातें हैं । और हम पर यह निर्भर करता है कि हम उसका पालन किस तरह करते हैं । हमारी गलतियों और कमियों का दोष संविधान की पुस्तक पर लगाना बिल्कुल गलत है । क्योंकि यह हमारी और आपकी सामुहिक जिम्मेदारी है कि हम इस पर कैसे अमल करते हैं । यह सब हम पर यानी आम जनता पर ही निर्भर है कि हम किसमें बदलाव करते हैं - अपने आप में या फिर संविधान रूपी किताब में । क्योंकि कहीं तो एक कदम बढ़ाकर परिवर्तन की शुरूआत करनी होगी वर्ना हम कितने भी संविधान बदल लें हालात नहीं बदलने वाले ।
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उससे बढकर भ्रमित है मानव, नीयत में है दोष.
नीयत में है दोष, बदलने की सब कोशिश.
धूल-धूसरित ही दिखती हैं सारी कोशिश.
कह साधक कोई नया ही रस्ता, पूरा सच है.
संविधान और व्यक्ति दोष, यह बात भी सच है.
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