Home | जनता दरबार | संविधान बदल देने से नहीं बदलेंगे हालात

संविधान बदल देने से नहीं बदलेंगे हालात

image

भारत का संविधान अब साठ साल पुराना हो चुका । इस साठ साल के वरिष्ठ संविधान में बदलाव की मांग कोई नया राग नहीं है । जब इस देश में किसी को कुछ समझ नहीं आता तो बस संविधान परिवर्तन की ढपली बजने लगती है । इन्हीं सब के बीच सन् 2000 में तत्कालीन सरकार ने न्यायमूर्ति एम.एन. वैंकटचलैया की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया था । आयोग के कार्यक्षेत्र को लेकर विवाद व शोर-शराबा होने पर यह स्पष्टीकरण दिया गया कि आयोग का कार्य संविधान में बदलाव नहीं अपितु उसका पुनरीक्षण करना है ।

प्रश्न यह है कि क्या डॉ. बाबा साहब अंबेडकर द्वारा रचित यह संविधान साठ वर्ष उपरान्त इतना कमजोर हो गया है? कि उसे पूर्ण कायाकल्प कर बदल दिया जाये। क्या वह संविधान सभा जिसकी अध्यक्षता डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जैसे व्यक्तित्व ने की हो आज के राजनेताओं और नौकरशाहों के द्वारा पुनरीक्षण या बदलाव के योग्य है र्षोर्षो आजादी के इतने लंबे समय के बाद देश में कई क्षेत्रों में बदलाव की बयार चली है जिसमें हमारी संस्कृति, वेश-भूषा, रहन-सहन, पाठन-पठन मे काफी तब्दीली आ चुकी है पर शायद संविधान कोई वस्त्र, भोजन या संस्कृति नहंी है जिसे आसानी से या कठिनाई से बदला जा सके । वस्तुत: हमारा संविधान हमारी आत्मा है जिसने इतनी विषमताओं से जूझने के बाद बड़ी मजबूती से भारत में लोकतन्त्र को ज़िन्दा रखा है और अब शायद यह लोकतन्त्र परिपक्व हो चुका है । यदि हम अपने लोकतन्त्र की तुलना अपने पड़ोसी देशों के साथ करें । फिर चाहे वह पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका या नेपाल हो, इन सब स्थानों पर लोकतन्त्र में लोक का तन्त्र से संघर्ष सबके सामने है ।

ऊपर उल्लेखित सभी देशों में आतंक तन्त्र, लोक तन्त्र से स्पष्टत: उपर नज़र आता है । और यहीं पर हमारे संविधान की सशक्तता स्पष्ट नज़र आती है । जहां आज भी तमाम समस्याओं के बाद हम इस संविधान की बदौलत ही विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र के रूप में खड़े हैं और ऐसा कहीं भी नहीं लगता कि इस संविधान में कहीं कोई बदलाव आवश्यक है । आज भी हम सजधज कर सरकारी स्तर पर गणतन्त्र पर्व मनाने एकत्रित होते हैं । पर यह आयोजन अब महज सरकारी आयोजन के रूप में सिमटता जा रहा है । आम जनता के बीच इस आयोजन को लेकर लोकप्रियता और उत्साह दोनों लगभग समाप्त हो चुके हैं । यदि हम स्वयं पर या आसपास नज़र डालें तो गणतन्त्र का यह राष्ट्रीय पर्व हमारे लिये महज एक और छुट्टी के दिन जैसा है । अन्तर सिर्फ इतना है कि इस दिन सुबह से हमारे कानों में देशभक्ति के गीत सुनाये पड़ने लगते हैं और स्कूली बच्चे दो लड्डू लेकर अपना गणतन्त्र मना लेते हैं ।

इस संविधान परिवर्तन की चर्चा में सकारात्मक एवं सार्थक क्या हो सकता है? यदि इस दिशा में सोचा जाये तो बहुत कुछ सम्भव है । ऐसा कहा जाता है कि लोकतन्त्र या गणतन्त्र जनता का, जनता द्वारा एवं जनता के लिये है । सवाल यह है कि क्या सही मायनों में ऐसा ही है र्षोर्षो यद्यपि हम विश्व के सबसे सफल गणतान्त्रिक राष्ट्रों में शामिल हैं किन्तु कमी सिर्फ है तो इस गणतन्त्र को पूर्ण रूप से जनहित में बदलने की । और यदि कहीं भी किसी बदलाव की आवश्यकता है तो वह इस संविधान को पालन करने और कराने की व्यवस्थाओं में बदलाव की है । जिस भावना और सोच के साथ डॉ. अंबेडकर जैसे विद्वान लोगों ने इसका मसौदा तैयार किया था वेसी व्यवस्था दुर्भाग्यपूर्णरूप से आज तक इस देश मे नहीं बन पायी है। आज भी इस देश का आदमी रोजी-रोटी और रहने-पहनने की बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा है । 

सबसे पहले परिवर्तन या बदलाव उस व्यवस्था में हो जो आम आदमी के हित का दिखावा कर उसे परेशान कर रही हैं । भ्रष्टाचार आज शिष्टाचार का रूप ले चुका है । वहीं इस लोकतन्त्र पर राजनेता और अफसरशाही सवार हैं । जिन्होंने आम जनता के अधिकारों को कुचल डाला है । और सच यह है जिसे हमें स्वीकार करना चाहिये कि देश का सबसे कमजोर व्यक्ति वह चाहे किसी भी समाज या जाति का हो, इस संविधान से उत्पन्न विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के द्वारा छला एवं ठगा जा रहा है । और यह सब उस सड़ी-गली और गन्दी व्यवस्था के मजबूत अंग हैं जो अब भ्रष्ट लोगों के आगे लचर एवं लाचार हो चुकी है ।

यदि कोई बदलाव करना है तो सबसे पहले उस अफसरशाही पर करें जो आज भी अंग्रेजों की मानसिकता से ग्रसित है और वह अपने आपको इस देश का मालिक मानती है और देश की जनता को गुलामों का दर्जा देकर रखा है । संविधान की जनकल्याण की मूल भावना में सबसे बड़ा रोड़ा यह लालफीताशाही ही है । जिसने कई बार जनता के चुने हुए जनप्रतिनिधियों को भी निकम्मा और नकारा साबित कर दिया है। ऐसा ही कुछ हाल हमारी पुलिस व्यवस्था का भी है जो जनता की रक्षक नहीं भक्षक बन चुकी है । इसी क्रम में हमारी न्यायपालिका भी है । जहां आज कोर्ट में जज के सामने बैठा उसका मातहत कर्मचारी खुलेआम रिश्वत लेकर अगली तारीख देता हो ऐसी न्यायपालिका से इंसाफ की क्या उम्मीद की जा सकती है। ऐसा ही सब कुछ तहसील, नजूल, बिजली, अस्पताल, सिंचाई, सड़क और अनगिनत जगह है । 

तो हमें देश के इस भ्रष्ट चरित्र को बदलने की आवश्यकता है, ना कि अपने संविधान को । देखा जाये तो संविधान कुछ कागज के पन्नों पर लिखी बातें हैं । और हम पर यह निर्भर करता है कि हम उसका पालन किस तरह करते हैं । हमारी गलतियों और कमियों का दोष संविधान की पुस्तक पर लगाना बिल्कुल गलत है । क्योंकि यह हमारी और आपकी सामुहिक जिम्मेदारी है कि हम इस पर कैसे अमल करते हैं । यह सब हम पर यानी आम जनता पर ही निर्भर है कि हम किसमें बदलाव करते हैं - अपने आप में या फिर संविधान रूपी किताब में । क्योंकि कहीं तो एक कदम बढ़ाकर परिवर्तन की शुरूआत करनी होगी वर्ना हम कितने भी संविधान बदल लें हालात नहीं बदलने वाले । 

Subscribe to comments feed Comments (3 posted):

shailendra kumar on 04 February, 2010 02:04;00
avatar
apke anusar dr. bhimarao aur rajendra prasad ke baad koi yogya vyakti bharat me paida nahi hua aur jo unhone likh diya wo brmhavakya hai.
Thumbs Up Thumbs Down
0
अंकुर गुप्ता on 04 February, 2010 14:46;58
avatar
शैलेंद्र भैया आपने बिल्कुल सही फ़रमाया. भई जिन्होने संविधान बनाया उनकी नीयत में कोई खोट नही था परंतु कोई भी व्यक्ति हर तरीके से परिपूर्ण नही हो सकता है और आज की परिस्थितियां बहुत बदल गई हैं अत: संविधान में कई बदलावों की जरूरत है. उदाहरण के लिए नीति निर्देशन तत्वों को बाध्यकारी नही बनाया गया है अत: आज सरकारें वोट के लिए धड़ल्ले से शराब को बढ़ावा दे रही हैं. जगह जगह शराबखाने खुल रहे हैं. क्योंकि मद्यपान निषेध के लिए प्रयास करना नीति निर्देशक तत्वों में दिया गया है. यहां पर ये जोड़ा जा सकता है कि कि भले ही सरकार इन्हे पालन करने के लिए बाध्यकारी ना हो परंतु इनके विपरीत कानून भी ना बना सके.
Thumbs Up Thumbs Down
0
sadhak ummed singh baid on 04 February, 2010 16:40;37
avatar
हाँ सच हैं दोनों ही पक्ष, है संविधान में दोष.
उससे बढकर भ्रमित है मानव, नीयत में है दोष.
नीयत में है दोष, बदलने की सब कोशिश.
धूल-धूसरित ही दिखती हैं सारी कोशिश.
कह साधक कोई नया ही रस्ता, पूरा सच है.
संविधान और व्यक्ति दोष, यह बात भी सच है.
Thumbs Up Thumbs Down
0
total: 3 | displaying: 1 - 3

Post your comment comment

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
image Pankaj Chaturvedi पर्यावरण विज्ञान में पोस्ट ग्रेजुएट की डिग्री. सामाजिक, राजनीतिक कार्यकर्ता और पत्रकार पंकज चतुर्वेदी भोपाल स्थित एनडी सेन्टर फार सोशल डेवलमेन्ट एण्ड रिसर्च के अध्यक्ष हैं.
Rate this article
5.00
More from जनता दरबार
Previous
image
भारत से धंधा, पाक को चंदा
अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने अपना तीन दिवसीय दौरा पूरा कर लिया. मुंबई उतरकर दिल्ली दरबार तक उनकी दस्तक भारत पर अमेरिका के मजबूत पकड़ की मिसाल बन गया. निश्चित रूप से उनका दौरा भारत के लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना खुद अमेरिका के लिए है. मंदी के दौर से जूझ रहे अमेरिका को "कारपोरेट" जगत का धंधा दिलाने के लिए उन्होंने न केवल भारत को महाशक्ति करार दे दिया बल्कि सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का समर्थन भी कर दिया....
image
मत्था टेकने की मानसिकता
वैसे तो किशनलाल की गांधी से अधिक श्रद्धा अपने कारोबार पर है और ओबामा से अधिक डर अपनी पत्नी का है. लेकिन आज न तो उनका कारोबार आड़े आया और न ही पत्नी. सुबह नौ पैंतीस पर वे राजघाट जा रहे थे. पूछने पर बोल पड़े मत्था टेकने जा रहे हैं. गांधी की समाधि के प्रति किशनलाल की इतनी अगाध श्रद्धा कि उन्होंने 'मत्था टेकने' की ऊंचाई दे दी. लेकिन वहां तो आज 10.20 पर बराक ओबामा आ रहे हैं. वहां जाने नहीं देंगे. उन्होंने कहा कि जब "वो" चले जाएंगे तब आधे घण्टे बाद राजघाट खोल देंगे उसके बाद सबसे पहले हम मत्था टेकेंगे. ...
image
'गांधीवादी' ओबामा पर भारी अमेरिकी आर्थिक लाचारी
अगर आपने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के मणिभवन यात्रा की फोटो देखी हो तो आपको उस फोटो में बराक ओबामा और पत्नी मिशेल ओबामा के चित्र में गांधी की पोती से हाथ मिलाते वक्त जो श्रद्धा दिख रही है उसमें अमेरिकी बनावट की मिलावट कहीं से नहीं है. गांधी के प्रति ओबामा की श्रद्धा किसी व्यक्ति के प्रति श्रद्धा नहीं बल्कि उस विचार के प्रति है जिसे बीसवीं सदी में अंग्रेजों से लड़ते हुए गांधी ने पुन: परिभाषित किया था. ...
image
लालू भी चाहिए नीतीश भी
बिहार के मतदाता इन दिनों अपने लिए एक बेहतर नेता चुनने में जुटे हैं. एक ऐसा नेता जो अगले पांच साल के लिए उनके अंदर छुपी बदलाव की खदबदाहट को दिशा दे सके और विकास के रास्तों के कंटक हटा सके. लोगों के सामने दो विकल्‌प है लालू या नीतीश. इस बार हो सकता है भावावेश में जनता एक को चुन ले और दूसरे को रिजेक्ट कर दें. पर जहां तक मेरी राय इनमें से किसी एक नेता से बिहार का काम चलने वाला नहीं. बिहार को दोनों चाहिए, लालू भी और नीतीश भी. आखिर क्यों ?...
image
विकास की बिसात पर कैसे हो नीतीश की मात
बिहार में चुनाव हो तो क्या मुद्दा होना चाहिए? निश्चित रूप से बिहार से बाहर रहनेवाले लोग विकास और जातिमुक्त बिहार की आदर्शवादी कल्पना पिछले कई चुनाव से बिहार के लिए मुद्दा बनाने की बातें करते रहे हैं. लेकिन साथ में यह भी जोड़ देते हैं कि बिहार चुनाव में विकास शायद ही मुद्दा बने? लेकिन इस बार यह कमाल दिखाई दे रहा है. पक्ष में हो या विपक्ष में केन्द्रीय मुद्दा विकास ही है. असल में बिहार की विपक्षी पार्टियां नीतीश को रिप्लेक्स करने के लिये तैयार ही नहीं है. लोगों को यह बात अतिशयोक्तिपूर्ण लगती है. मगर आप ही बतायें कि ”या विकास को मुद्दा बनाकर नीतीश से चुनावी समर जीता जा सकता है?...
image
गिलानी की गुगली और हिन्दुस्तान की गफलत
अभी-अभी हुर्रियत कांफ्रेंस के गरमपंथी धड़े के नेता सैयद अली शाह गिलानी अपने विस्फोटक सेमीनार के जरिए दिल्ली और देश में अच्छा-खासा आक्रोश और विवाद पैदा करके गए हैं। अपने अलगाववादी नजरिए पर टस से मस न होने के लिए कुख्यात गिलानी ने दिल्ली में हुए इस कार्यक्रम में न सिर्फ कश्मीर की ‘आजादी‘ की पारंपरिक मांग दोहराईं बल्कि एक कदम आगे बढ़कर ‘स्वतंत्र कश्मीर‘ बनने के बाद की ‘नीतियों‘ का खाका भी पेश कर गए। ‘कश्मीर की आजादी ही एकमात्र विकल्प‘ नामक विषय के इर्द-गिर्द केंद्रित सेमीनार में उन्होंने देशद्रोह के दायरे में आने वाली दर्जनों टिप्पणियां कीं और ‘अभिव्यक्ति की आजादी‘ का फायदा उठाकर आराम से कश्मीर की ओर निकल लिए।...
image
कांग्रेस का दाना, नीतीश की ना-ना
बिहार में चुनाव के दो चरण बीत चुका है. नक्सालियों के दखल के अलावा कहीं कोई खलल नहीं है. जनता भी निश्चिंत है और नेता भी. जैसा किसी पूर्व निर्धारित पटकथा पर सारे किरदार अपनी भूमिका निभाने में जुटे हों. नेशनल न्यूज चैनलों ने सर्वे जारी कर जरूर थोड़ी सी गहमा-गहमी क्रियेट की है मगर लोकल मीडिया में कहीं कोई सनसनी नहीं है....
image
विकीलीक्स ने फिर साबित किया अमेरिका को हत्यारा
इराक में अमेरिकी सेना ने अपने आपरेशन के दौरान ना सिर्फ निर्दोष नागरिकों की हत्या की बल्कि युद्ध की कवरेज कर रहे पत्रकारों को भी मौत के घात उतार दिया। विकिलिक्स ने अमेरिका में इराकी आपरेशन को लेकर पेंटागन के जो डाटाबेस और रिकार्ड जारी किये हैं उनमे अमरीकी सेना के अपाची हेलीकाप्टर्स (क्रेजी हार्स 18) जो कि टेक्सास स्थित यु एस आर्मी के २२७ रेजिमेंट के फर्स्ट बटालियन का हिस्सा है के बारे में चौका देने वाले खुलासे किये हैं। विकिलीक्स द्वारा जारी किये गए एक वीडियो में अमेरिकी जवानों को सिर्फ खबरिया एजेंसी रायटर के दो जांबाज पत्रकारों की गलत सूचना देकर हत्या किये जाने बल्कि उनकी मौत पर ठहाके भी लगाये देखा जा सकता है।...
image
बिहार चुनाव में चौराहे पर खड़ा मुसलमान
बिहार चुनाव में पसमांदा मुसलमान एक बार फिर चौराहे पर खड़े हैं। पसमांदा मुसलमानों में किसी पार्टी या गठबंधन को लेकर कोई उत्साह नहीं हैं। ज़्यादातर पसमांदा वोटर ख़ामोश हैं। कभी पसमांदा आंदोलन के अगुआ रहे लोग इस चुनाव में आश्चर्यजनक रूप से निषक्रिय हैं। कई पार्टियों की तरफ़ से बुलावा आने को बावजूद उन्होंने पार्टियों के दफ़्तर जाना या नेताओं से मिलना तक मुनासिब नहीं समझा। वजह साफ है पसमांदा मुसलमान तमाम पार्टियों की वादा ख़िलाफी से ऊब चुके हैं।...
image
पपेट प्रधानमंत्री का एक और पापकर्म
देश में एक वर्ग विशेष को तुष्ट करने के लिए सरकार कहां तक गिर सकती है उसका हालिया उदाहरण है शत्रु संपत्ति विधेयक-2010 का विरोध करना फिर उसमें मुस्लिम नेताओं के मनमाफिक संसोधन को केन्द्रीय कैबिनेट द्वारा स्वीकृति देना। कठपुतली (पपेट) प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में बुधवार को केंद्रीय कैबिनेट की बैठक आयोजित की गई थी। इसमें इसी बैठक में केंद्रीय गृह मंत्रालय के प्रस्ताव पर शत्रु संपत्ति (संसोधन एवं विधिमान्यकरण) विधेयक-2010 में संसोधन को स्वीकृति प्रदान की गई।...
image
चुनाव आयोग के सामने बिहार चुनाव की चुनौती
पिछले विधानसभा में स्वतंत्र और भयमुक्त चुनाव होने का असर राजनैतिक दलों और नेताओं पर साफ देखने को मिल रहा है। चुनाव आयोग की सख्ती का साफ असर इस बार भी नेताओं और पार्टियों कार्यालयों में देखा जा रहा है। विभिन्न पार्टियों के नेता काफी चौकस है कि इस दौरान किसी भी सूरत में चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन नहीं हो। मुख्यमंत्री आवास एक अणे मार्ग में नीतीश कुमार से मुलाकात करने जा रहे नेता भी वहां किसी तामझाम के पहुंच रहे हैं। लालू प्रसाद यादव भी अपने नेताओं को यह समझाया कि सभी सरकार आवास पर नहीं, पार्टी कार्यालय में मिले।...
image
दशहरा रैली का दम
शिवाजी पार्क शिवसेना और शिवसेनाप्रमुख के बीच दशकों पुराना अटूट संबंध है. शिवेसना की पहली जनसभा 19 जून 1966 को इसी शिवाजी पार्क में हुई थी. तत्कालीन राजनीतिक विश्लेषकों का मत था कि 1960 और 1966 के बीच व्यंगचित्र साप्ताहिक मार्मिक के माध्यम से ठाकरे परिवार ने स्थानीय लोकाधिकार के लिए जो अलख जगाया था, उससे उपजे राजनीतिक विचार से जन्मी शिवेसना की पहली जनसभा में अधिकतम दस हजार स्रोता जमा होंगे....
image
जांच होगी पर आंच किसी को नहीं आयेगी
कामनवेल्थ खेलों के समापन के अगले दिन ही खेलों की तैयारियों में हुई हेराफेरी की जांच का आदेश देकर केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर संभावित राजनीतिक पैंतरेबाजी पर लगाम लगा दिया है लेकिन इस जांच की गंभीरता पर सवाल किये जाने लगे हैं. दिल्ली में सत्ता के गलियारों में सक्रिय ज़्यादातर लोग इस खेल में शामिल थे. पूना वाले बुड्ढे नौजवान ने मामला इस तरह से डिजाइन किया था कि दिल्ली के सभी अमीर उमरा ७० हज़ार करोड़ रूपये की लूट में थोडा बहुत हिस्सा पा जाएँ....
image
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों का आतंक
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव चल रहे हैं. इन चुनावों को नजदीक से देखने और जानने की जरूरत है. दो चरण पूरे हो चुके हैं। तीसरा और अन्तिम चरण 20 अक्टूबर को पूरा हो जाएगा. जब उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव की अधिसूचना जारी हुई तो मेरठ के एक पॉश इलाके में बसपा कार्यालय पर बसपा के समर्थन से चुनाव लड़ने वाले इच्छुक लोगों की भीड़ लगी थी। महंगी लग्जरी गाड़ियों का रैला था। गाड़ियों में सवार हष्टपुष्ट आदमी थे। कुर्ता-पायजामा की जगह झक सफेद पेंट-शर्ट के साथ सफेद जूते में दिखनेवाले नेता हमें माफियाओं के आस पास होने का आभास दे रहे थे. उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों का आंतक के शुरूआत की घोषणा हो चुकी थी. ...
image
विपक्ष का कार्य सरकार गिराना ही नही है
दक्षिणी दुर्ग में बनी भाजपा की पहली सरकार गहरे संकट में है। मुख्यमंत्री येदियुरप्पा शुरु से ही सकटों से घिरे रहे है। यह संकट बाहरी कम अंदरुनी ज्यादा रहे है। कुछ समय पहले बंगलौर निकाय चुनावों में भी भाजपा को जोरदार सफलता मिली थी। ईसाई समुदाय को छोड़कर किसी और वर्ग को भाजपा सरकार से कोई खास नराजगी नही रही है। चर्च का एक हिस्सा पिछले कुछ समय से राज्य में युदियुरप्पा सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग करता रहा है इसके लिए यह वर्ग राज्यपाल हंसराज भारद्वाज को कई ज्ञापन भी दे चुका है।...
image
यह उमर और ऐसी गलती?
यह राजनीतिक पूतों के पांव हैं जो पालने में दिख रहे हैं. पहले राहुल गांधी का बयान और अब उमर अब्दुल्ला की गलती. जम्मू कश्मीर विधानसभा में बोलते हुए उन्होंने कश्मीर के भारत में विलय को ही अधूरा बता दिया. देशभर में विरोध हुआ लेकिन राहुल गांधी ने चुप रहने में भलाई नहीं समझी, उमर की तारीफ करने मैदान में कूद पड़े. कश्मीर इनके पुरखों की विरासत है, लेकिन पुरखों की इस विरासत से कैसा खिलवाड़ कर रहे हैं ये दो नौजवान? शेष नारायण सिंह का विश्लेषण-...
image
बिहार चुनाव में बच्चों के लिए नदारद है नारा
बिहार के विधानसभा की घमाचान में हर पार्टी के झोले के भीतर से एक-एक करके हर एक के लिए मुद्दे ही मुद्दे और नारे ही नारे बाहर आ रहे हैं. मगर बच्चों के लिए इस बार भी कोई मुद्दा और नारा नहीं गूंज रहा है. ऐसे में क्राई ने बच्चों के मुद्दों को सूचीबद्ध करते हुए सभी राजनैतिक दलों से बच्चों के अधिकारों को वरीयता देने के लिए संवाद का सिलसिला शुरू किया है. इसके तहत बाल अधिकारों का एक घोषणा-पत्र तैयार किया जा चुका है और अब बच्चों के मामले में राजनैतिक दलों पर जल्द से जल्द अपना-अपना रूख स्पष्ट करने के लिए दबाव बनाना तय हुआ है....
Next
Tags
No tags for this article
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम में प्रकाशित सामग्री पर हमारी ओर से कोई कापीराइट नहीं है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2