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सुनिये, माननीय सर्वोच्च न्यायालय

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हाल ही में देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने अपनी ही आलोचना की है। आलोचना करते हुए कहा है कि वैश्वीकारण की दौड़ में आम आदमी का दर्द समझने में दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश के शीर्ष न्यायालय की न्यायायिक प्रक्रिया में आम आदमी के प्रति सहानुभूति खत्म होती जा रहा हैं।

आम आदमी को लेकर सुप्रीम कोर्ट की अपनी ही आलोचना पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के एक आदेश की चुनौती याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति जी एस सिंघवी और ए के गांगुली की खण्डपीठ ने की। खण्डपीठ ने यह भी कहा कि अदालती प्रक्रिया आम आदमी की स्थिति और धैर्य को नहीं समझ पाती है। यह स्थिति संवैधानिक रूप से उत्पन्न हुई है। यदि कोई इस स्थिति को बदलना चाहता है तो उसे देश को नजदीक से देखना चाहिए। इसके लिए देश का भ्रमण करने की जरूरत है।

मतलब साफ पर देश की शीर्ष अदालत में जब आम  आदमी का सुनने वाला कोई  नहीं हैं, तो फिर भला निचली अदालतों  का क्या हाल होगा, यह सहज अनुमान लगाया जा सकता हैं। यह आलोचना  इसलिए भी महत्वपूर्ण क्योंकि कोर्ट  के एक खण्डपीठ ने ईमानदारी से गणतन्त्र भारत के साठ साल बाद अपनी गिरेबान में झांकने की कोशिश तो की। पर आम आदमी के दर्द समझने के हिमाकत कौन करेगा, देश का कौन और कैसे करेगा। इसमें कोर्ट का संकेत कार्यपालिका की तरफ दिखता है कि वह वह दफ्तरों से निकलकर आम आदमी तक पहुंचे और आम आदमी के लिए बदले हुए संविधान के बुनियादी आकार में बदलाव करें। इस आकार में बदलावा की ताकत स्वयं कोर्ट को  नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट  की अपनी ही आलोचना में इस बात  का भी स्पष्ट संकेत हैं कि भले  ही कानून अमीर गरीब का भेन्द नहीं देखता हैं, लेकिन कानून का लाभ उठाने वालों में गरीब नहीं है। समाज में एक पुराना जुमना प्रसिद्ध है। दादा के जमाने में दायर केस पर पोते के जमाने तक भी निर्णय आ जाए तो खुदकिशमत समझिये। देश का प्रबुद्ध ही नहीं विभिन्न ओहदे पर बैठे प्रभावशाली लोग भी इसको लेकर चिन्ता जता चुके है। पर समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाने का संकेत कुछ दिखता नहीं है।

60 साल का युवा गणतन्त्र भारत आम आदमी को त्वरित न्याय दिलाने के मामले में फेल हो चुका है। पर प्रभावशाली और धन बल से संपन्न लोगों के मामले जल्द सुलझने के अनेक उदाहरण है। आजाद भारत की तरक्की भले ही सन्तोषजनक न हो, लेकिन वैश्वीकरण और उदारीकरण के दौर में देश ने काफी तरक्की की है। पर अदालती प्रक्रिया में तरक्की नहीं हुई। बार-बार न्यायपालिका और कार्यपालिका की आपसी टकराहट के बीच न्यायिक प्रक्रिया का मुद्दा हमेशा ही सुस्त रहा है। अब भला सुप्रीम कोर्ट आम आदमी के प्रति सहानुभूति जता कर उन्हें क्या दे देगा, सहानुभूति दिखाने से न्याय तो मिलने से रहा।

बीते एक सप्ताह की एक और खबर आई। एक समाजिक कार्यकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल होने वाली याचिकाओं की जानकारी सूचना के अधिकार कानून के तहत मांगी। जब सूचना मिली तो पता चला कि गए एक दशक में सुप्रीम कोर्ट में दस गुनी याचिकाएं बढ़ी है। वर्ष 1999 में सुप्रीम कोर्ट में 119 पुननिरीक्षण याचिकाएं दर्ज की गई थीं। 2009 तक यह संख्या  2016 पहुंच गई। पर याचिकाकर्ताओं के पक्ष में दिए गए निर्णय के बाद सुप्रीम कोर्ट ने जानकारी नहीं दी। यह बात समझी जा सकती है कि जब सुप्रीम कोर्ट के जजों का एक तबका अपनी संपत्ति की सार्वजनिक घोषणा कर पारदर्शी होने की राह पर अग्रसर हो रहा हो, वहीं दस वर्षों में दायर याचिकाओं पर निर्णय की जानकारी कोर्ट ने देने से इनकार क्यों कर दिया? जाहिर सी बात है, यचिका दायर होने के आंकड़े तो हैं, पर उनमें कितने मामले निपटाये गए, यह कैसे पता चलेगा। सूचना कानून के तहत सुप्रीम कोर्ट से यह भी पूछा गया था कि उद्योगपतियों, वीआईपी और सामान्य आदमी में भेदभाव क्यों किया जाता है?

टाटा बिरला अंबानी जैसे बड़े घरानों के न्यायिक मामले त्वरित क्यों सुलझ जाते हैं? न्यायाधीश कितने समय काम करते हैं? कुछ ऐसे गम्भीर सवालों के के जवाब सुप्रीम कोर्ट को देते नहीं बन रहा है। लिहाजा,कोर्ट के निबंधन विभाग ने यह कह कर इन सवालों से पल्ला झाड़ लिया कि ये सवाल सूचना के अधिकार के तहत नहंी आते है। जाहिर है, देश की जिस शीर्ष अदालत में मामलों का संख्या तेजी से बढ़ रही और न्यायधिशों की संख्या स्थिर है, वहां कोर्ट का झुंझलाना लाजिमी है। न्यायमूर्ति समाज के ही अंग होते हैं। उनमें से कुछ के मन में आम आदमी के प्रति सहानुभूति की संवदेना उमड़ना सहज है। पर संवेदनाओं के इस धार से सुप्रीम कोर्ट का प्रायश्चित नहीं होगा। न्यायिक प्रकिया में टाटा, बिराला, अंबानी बंधुओं जैसे प्रभावशाली लोगों के मामलों की तरह आम आदमी से जुड़े मामलों के त्वरित निपटान से ही असली प्रायश्चित होगा।

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रोग की जड़ सुप्रीम कोर्ट में नहीं है। रोग की जड़ है हमारी व्यवस्था में है जो देश को जरूरत के चौथाई न्यायालय भी उपलब्ध नहीं करा पा रही है। वर्तमान में भारत में 10 लाख की आबादी पर 12-13 न्यायालय हैं जब कि अमरीका में 111, ब्रिटेन में 55। हमारी संसद मानती है कि यहाँ भारत में कम से कम 50 तो होने ही चाहिए। लेकिन न्यायालयों की संख्या 12-13 से आगे बढ़ ही नहीं रही है। सुप्रीम कोर्ट अपनी आलोचना करने के सिवा और क्या कर सकती है।
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अंकुर गुप्ता on 10 February, 2010 22:37;44
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दिनेशजी, आपने बिल्कुल सही कहा. परंतु ये संख्या बढ़ाई क्यों नही जा रही. जब समस्या सामने है. हल भी पता है तो फ़िर उसपर अमल में क्यों नही किया जा रहा है.
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संजय तिवारी on 10 February, 2010 23:29;16
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समस्या अदालत की कमी नहीं है. अदालत बढ़ा भी देंगे तो इस देश में न्याय नहीं मिलेगा. जिस दिन यह देश संपूर्ण न्याय प्रणाली पर पुनर्विचार करेगा और न्याय को केन्द्रित मानसिकता के दायरे से बाहर का विषय स्वीकार कर लेगा उस दिन अदालतों का वह स्वरूप ही नहीं बचेगा जो आज है.

अगर सबको न्याय मिलना है तो सामाजिक पहल पर जोर बढ़ना चाहिए. सामाजिक अदालतों को कानूनी अदालतों जैसी मान्यता मिलनी चाहिए. लेकिन अभी तो इसका उलट ही हो रहा है. इसलिए फिलहाल कोई समाधान मिलना मुश्किल है.
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Udan Tashtari on 11 February, 2010 14:54;30
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अजब सी बात है.
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jai shri ram on 13 February, 2010 00:34;33
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jai shri ram!
desh me sabse jaya congress ka shasan raha hain. ushi ne court ki sankha badhane me kavi dilchaspi nahi dikhayee.
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image संजय स्वदेश किरोडीमल कॉलेज स्नातकोत्तर के बाद केंद्रीय हिंदी संस्थान दिल्ली से पत्रकारिता में डिप्लोमा। दैनिक हिंदुस्तान, नवभारत टाईम्स, सहारा समय, दैनिक भास्कर में काम. कई पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन के साथ स्थानीय जनअभियानों से जुड़े हैं। sanjayinmedia@rediffmail.com
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