Home | जनता दरबार | शिक्षा अधिकार का छलावा कानून

शिक्षा अधिकार का छलावा कानून

image

बीते साल, नई सरकार के मानव संसाधन विकास मन्त्री कपिल सिब्बल ने शिक्षा के अधिकार विधेयक को जब संसद के पटल पर रखा, तो उसकी कुछ खासियतों का खूब जोर-शोर से प्रचार-प्रसार किया। अब जबकि संसद की हरी झण्डी मिलने के बाद 1 अप्रैल से आम जनता के हाथों में यह कानून आने को है, सवाल है कि आम जनता द्वारा इस कानून का फायदा उठाया भी जा सकेगा, या नहीं?

जो परिवार गरीबी रेखा के नीचे बैठे हैं, उनके भविष्य की उम्मीद शिक्षा पर टिकी है, जो उन्हें स्थायी तौर पर सशक्त भी बन सकती है। सरकारी आकड़े कहते हैं कि 1 अरब से ज्यादा आबादी वाले भारत में 27.5: लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं। इस देश में 70% लोग ऐसे हैं, जो हर रोज जितना कमाते हैं उससे बहुत मुश्किल से अपना गुजारा कर पाते हैं। इसी तबके के तकरीबन 20 करोड़ बच्चे स्कूलों से बाहर हैं। इसलिए भारत में गरीबी और शिक्षा की बिगड़ती  स्थितियों को देखते हुए, 2001 में एक संविधान संशोधन हुआ, जिसमें यह भी स्पष्ट हुआ कि सरकारी स्कूलों में सुधार के लिए राज्य और अधिक पैसा खर्च करेगी। मगर हुआ इसके ठीक उल्टा, राज्य ने गरीब बच्चों की जवाबदारी से बचने का रास्ता ढ़ूढ़ निकाला और सरकारी स्कूलों को सुधारने की बजाय गरीब बच्चों को प्राइवेट स्कूलों (२५% आरक्षण देकर) का रास्ता दिखाया। फिलहाल, राज्य सरकार एक बच्चे पर साल भर में करीब 2,500 रूपए खर्च करती है। अब खर्च की यह रकम राज्य सरकार प्राइवेट स्कूलों को देगी। मगर प्राइवेट स्कूलों की फीस तो साल भर में 2,500 रूपए से बहुत ज्यादा होती है। ऐसे में आशंका पनपती है कि प्राइवेट स्कूलों में गरीब बच्चों के लिए अलग से नियम-कानून बनाए जा सकते हैं और उनके लिए सस्ते पैकेज वाली व्यवस्थाएं लागू हो सकती हैं। यह आशंका केवल कागजी नहीं है, बल्कि भोपाल में एक प्राइवेट स्कूल ने ऐसा कर दिखाया है। जाहिर है, सरकारी स्कूलों के गरीब बच्चे जब प्राइवेट स्कूलों में दाखिल होंगे तो उनके लिए आत्मविश्वास और ईज्जतदार तरीके से पढ़ पाना मुश्किल होगा। ऐसे में यह कह पाना भी फिलहाल मुश्किल होगा कि इन प्राइवेट स्कूलों में गरीब बच्चे कितने दिन टिक पांऐगे, मगर तब तक शिक्षा का यह `अधिकार´, `खैरात´ में जरूर तब्दील हो जाएगा। दूसरी तरफ, बीते लंबे समय से प्राइवेट स्कूलों की फीस पर लगाम कसने की मांग की जाती रही है। मगर शिक्षा का ऐसा कानून तो प्राइवेट स्कूलों को अपनी मनमर्जी से फीस वसूलने की छूट को जारी रख रहा है। इस तरह से एक समान शिक्षा व्यवस्था, जो कि आत्म-सम्मान की बुनियाद पर खड़ी है, उसके बुनियादी सिद्धान्त को ही तोड़ने-मरोड़ने का मसौदा तैयार हुआ है।

जब शिक्षा के अधिकार के लिए विधेयक तैयार किया जा रहा था तब सरकारी स्कूलों में बिजली, कम्प्यूटर और टेलीफोन लगाने की बात भी थी। जिसे बाद में कतर दिया गया। ऐसे तो सरकारी स्कूलों की दशा सुधरने की बजाय और बिगड़ेगी। सरकारी स्कूलों को तो पहले से ही इतना बिगाड़ा जा चुका है कि इनमें केवल गरीब बच्चे ही पढ़ते हैं। फिर भी मिस्टर सिब्बल अगर कहते है कि प्राइवेट की साझेदारी से ही देश में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार आ सकता है, तो उनका यह तर्क ठीक नहीं लगता। वह भूल रहे हैं कि अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा तो भारतीय सरकार की मुख्य विशेषता रही है। तभी तो तमाम आईआईटी और आईआईएम से जो बड़े-बड़े इंजीनियर और प्रबंधक निकल रहे हैं, वो पूरी दुनिया में अपनी जगह बना रहे हैं। जबकि हम जानते है कि यह दोनों संस्थान सरकारी हैं। इसी तरह केन्द्रीय विद्यालय और नवोदय विद्यालय के उदाहरण भी हमारे सामने हैं- जिनसे निकलने वाले बच्चे, बाद में देश के बड़े-बड़े नेता, प्रशासनिक अधिकारी, सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं से जुड़कर अच्छे जानकार साबित हुए हैं।
 
इसी तरह, शिक्षा का यह अधिकार केवल 6 से 14 साल तक के बच्चों के लिए है। जबकि हमारा संविधान 6 साल के नीचे के 17 करोड़ बच्चों को भी प्राथमिक शिक्षा, पूर्ण स्वास्थ्य और पोषित भोजन का अधिकार देता रहा है। अर्थात यह कानून तो शिक्षा के अधिकार के नाम पर संविधान में पहले से ही दर्ज अधिकारों को काट रहा है। दूसरी तरफ, 15 से 18 साल तक के बच्चों को भी कानून में जगह नहीं दे रहा है।  वैश्विक स्तर पर बचपन की सीमा 18 साल तक रखी गई है, जबकि अपनी सरकार बचपन को लेकर अलग-अलग परिभाषाओं और आयु-वर्गों में विभाजित है। इन सबके बावजूद वह 18 साल तक के बच्चों से काम नहीं करवाने के सिद्धान्त पर चलने का दावा करती है। मगर जब उस सिद्धान्त को कानून या नीति में शामिल करने की बारी आती है, वह पीछे हट जाती है। अगर कक्षाओं के हिसाब से देखे, तो यह अधिकार कम से कम पहली और ज्यादा से ज्यादा आठवीं तक के बच्चों के लिए है। अर्थात जहां यह आंगनबाड़ी जाने वाले बच्चों को छोड़ रहा है, वहीं बच्चों को तकनीकी और उच्च शिक्षा का मौका भी नहीं दे रहा है। क्येंकि आमतौर से तकनीकी पाठयक्रम बारहवीं के बाद से ही शुरू होते हैं, मगर यह कानून तो उन्हें केवल साक्षर बनाकर छोड देने भर के लिए है। कुलमिलाकर, शिक्षा के अधिकार का यह कानून न तो `सभी बच्चों को शिक्षा का अधिकार´ देता है, न ही पूर्ण शिक्षा की गांरटी ही देता है।
 
दुनिया का कोई भी देश सरकारी स्कूलों को सहायता दिए बगैर सार्वभौमिक शिक्षा का लक्ष्य नहीं पा सकता है। विकसित अर्थव्यवस्था वाले देश जैसे यूएस, यूके, फ्रांस अपने राष्ट्रीय बजट का 6-7% हिस्सा शिक्षा पर खर्च करते हैं। जबकि अपने देश में 40 करोड़ बच्चों की शिक्षा पर राष्ट्रीय बजट का केवल 3% हिस्सा ही खर्च किया जाता है। जबकि देश की करीब 40% बस्तियों में प्राथमिक स्कूल नहीं हैं। जबकि देश के आधे बच्चे प्राथमिक स्कूलों से दूर हैं। जबकि देश में 1.7 करोड़ बाल-मजदूर हैं। जबकि यह देश 2015 तक स्कूली शिक्षा का लक्ष्य पूरा करने की हालत में भी नहीं हैं। ऐसे में तो हमारी सरकार को बच्चों की शिक्षा में और ज्यादा खर्च करना चाहिए। मगर वह तो केन्द्रीय बजट (2009-10) से `सर्व शिक्षा अभियान´ और `मिड डे मिल´ जैसी योजनाओं को ही दरकिनार करने पर तुली है।

Subscribe to comments feed Comments (2 posted):

Jitendra Dave on 18 February, 2010 19:12;03
avatar
Good One.Keep it up.
Thumbs Up Thumbs Down
3
RAJ SINH on 18 February, 2010 20:24;59
avatar
शिरीष जी ,
आपके लेखों का मैं प्रशंसक ही नहीं उसमे सर्वहारा भारत का दर्द ,उपेक्छा ,अपमान और उसके खिलाफ रचे गए षड्यंत्रों का दस्तावेज देखता हूँ.खास कर उन बच्चों के लिए जो वंचित ही नहीं इस देश के सबसे बड़े अभागे हैं और उनकी बात करना फैशन तक में शुमार नहीं होती .जिनकी सरकारी रोटी तक इस देश के हरामजादे भ्रष्ट डकार जा रहे हैं .
कपिल सिब्बल का ढोंग इस देश के वंचित बच्चों को लगातार गुलाम बना इंडिया की सेवा में लगाना भर है और एक षड्यंत्र है देश दुनिया को गुमराह करने का.सही बात तो यह होनी चाहिए की सभी बच्चों को समान सिक्छा का अधिकार हो .फिर वह शिक्छा कुछ भी हो .
आपके तर्कों को काट पाना किसी के लिए संभव नहीं होगा .
आपके उद्देश और आपकी कलम को नमन !
Thumbs Up Thumbs Down
2
total: 2 | displaying: 1 - 2

Post your comment comment

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
image शिरीष खरे मासक्मयुनिकेशन में डिग्री लेने के बाद चार साल डाक्यूमेंट्री फिल्म आरगेनाइजेशन में शोध और लेखन.उसके बाद दो साल "नर्मदा बचाओ आन्दोलन, बडवानी" से जुड़े रहे. सामाजिक मुद्दों को सीखने और जीने का सिलसिला जारी है. फिलहाल ''चाइल्ड राईट्स एंड यू, मुंबई'' के ''संचार विभाग'' में से जुड़कर सामाजिक मुद्दों को समझने की कोशिश कर रहे हैं.
Rate this article
5.00
More from जनता दरबार
Previous
image
भारत से धंधा, पाक को चंदा
अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने अपना तीन दिवसीय दौरा पूरा कर लिया. मुंबई उतरकर दिल्ली दरबार तक उनकी दस्तक भारत पर अमेरिका के मजबूत पकड़ की मिसाल बन गया. निश्चित रूप से उनका दौरा भारत के लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना खुद अमेरिका के लिए है. मंदी के दौर से जूझ रहे अमेरिका को "कारपोरेट" जगत का धंधा दिलाने के लिए उन्होंने न केवल भारत को महाशक्ति करार दे दिया बल्कि सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का समर्थन भी कर दिया....
image
मत्था टेकने की मानसिकता
वैसे तो किशनलाल की गांधी से अधिक श्रद्धा अपने कारोबार पर है और ओबामा से अधिक डर अपनी पत्नी का है. लेकिन आज न तो उनका कारोबार आड़े आया और न ही पत्नी. सुबह नौ पैंतीस पर वे राजघाट जा रहे थे. पूछने पर बोल पड़े मत्था टेकने जा रहे हैं. गांधी की समाधि के प्रति किशनलाल की इतनी अगाध श्रद्धा कि उन्होंने 'मत्था टेकने' की ऊंचाई दे दी. लेकिन वहां तो आज 10.20 पर बराक ओबामा आ रहे हैं. वहां जाने नहीं देंगे. उन्होंने कहा कि जब "वो" चले जाएंगे तब आधे घण्टे बाद राजघाट खोल देंगे उसके बाद सबसे पहले हम मत्था टेकेंगे. ...
image
'गांधीवादी' ओबामा पर भारी अमेरिकी आर्थिक लाचारी
अगर आपने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के मणिभवन यात्रा की फोटो देखी हो तो आपको उस फोटो में बराक ओबामा और पत्नी मिशेल ओबामा के चित्र में गांधी की पोती से हाथ मिलाते वक्त जो श्रद्धा दिख रही है उसमें अमेरिकी बनावट की मिलावट कहीं से नहीं है. गांधी के प्रति ओबामा की श्रद्धा किसी व्यक्ति के प्रति श्रद्धा नहीं बल्कि उस विचार के प्रति है जिसे बीसवीं सदी में अंग्रेजों से लड़ते हुए गांधी ने पुन: परिभाषित किया था. ...
image
लालू भी चाहिए नीतीश भी
बिहार के मतदाता इन दिनों अपने लिए एक बेहतर नेता चुनने में जुटे हैं. एक ऐसा नेता जो अगले पांच साल के लिए उनके अंदर छुपी बदलाव की खदबदाहट को दिशा दे सके और विकास के रास्तों के कंटक हटा सके. लोगों के सामने दो विकल्‌प है लालू या नीतीश. इस बार हो सकता है भावावेश में जनता एक को चुन ले और दूसरे को रिजेक्ट कर दें. पर जहां तक मेरी राय इनमें से किसी एक नेता से बिहार का काम चलने वाला नहीं. बिहार को दोनों चाहिए, लालू भी और नीतीश भी. आखिर क्यों ?...
image
विकास की बिसात पर कैसे हो नीतीश की मात
बिहार में चुनाव हो तो क्या मुद्दा होना चाहिए? निश्चित रूप से बिहार से बाहर रहनेवाले लोग विकास और जातिमुक्त बिहार की आदर्शवादी कल्पना पिछले कई चुनाव से बिहार के लिए मुद्दा बनाने की बातें करते रहे हैं. लेकिन साथ में यह भी जोड़ देते हैं कि बिहार चुनाव में विकास शायद ही मुद्दा बने? लेकिन इस बार यह कमाल दिखाई दे रहा है. पक्ष में हो या विपक्ष में केन्द्रीय मुद्दा विकास ही है. असल में बिहार की विपक्षी पार्टियां नीतीश को रिप्लेक्स करने के लिये तैयार ही नहीं है. लोगों को यह बात अतिशयोक्तिपूर्ण लगती है. मगर आप ही बतायें कि ”या विकास को मुद्दा बनाकर नीतीश से चुनावी समर जीता जा सकता है?...
image
गिलानी की गुगली और हिन्दुस्तान की गफलत
अभी-अभी हुर्रियत कांफ्रेंस के गरमपंथी धड़े के नेता सैयद अली शाह गिलानी अपने विस्फोटक सेमीनार के जरिए दिल्ली और देश में अच्छा-खासा आक्रोश और विवाद पैदा करके गए हैं। अपने अलगाववादी नजरिए पर टस से मस न होने के लिए कुख्यात गिलानी ने दिल्ली में हुए इस कार्यक्रम में न सिर्फ कश्मीर की ‘आजादी‘ की पारंपरिक मांग दोहराईं बल्कि एक कदम आगे बढ़कर ‘स्वतंत्र कश्मीर‘ बनने के बाद की ‘नीतियों‘ का खाका भी पेश कर गए। ‘कश्मीर की आजादी ही एकमात्र विकल्प‘ नामक विषय के इर्द-गिर्द केंद्रित सेमीनार में उन्होंने देशद्रोह के दायरे में आने वाली दर्जनों टिप्पणियां कीं और ‘अभिव्यक्ति की आजादी‘ का फायदा उठाकर आराम से कश्मीर की ओर निकल लिए।...
image
कांग्रेस का दाना, नीतीश की ना-ना
बिहार में चुनाव के दो चरण बीत चुका है. नक्सालियों के दखल के अलावा कहीं कोई खलल नहीं है. जनता भी निश्चिंत है और नेता भी. जैसा किसी पूर्व निर्धारित पटकथा पर सारे किरदार अपनी भूमिका निभाने में जुटे हों. नेशनल न्यूज चैनलों ने सर्वे जारी कर जरूर थोड़ी सी गहमा-गहमी क्रियेट की है मगर लोकल मीडिया में कहीं कोई सनसनी नहीं है....
image
विकीलीक्स ने फिर साबित किया अमेरिका को हत्यारा
इराक में अमेरिकी सेना ने अपने आपरेशन के दौरान ना सिर्फ निर्दोष नागरिकों की हत्या की बल्कि युद्ध की कवरेज कर रहे पत्रकारों को भी मौत के घात उतार दिया। विकिलिक्स ने अमेरिका में इराकी आपरेशन को लेकर पेंटागन के जो डाटाबेस और रिकार्ड जारी किये हैं उनमे अमरीकी सेना के अपाची हेलीकाप्टर्स (क्रेजी हार्स 18) जो कि टेक्सास स्थित यु एस आर्मी के २२७ रेजिमेंट के फर्स्ट बटालियन का हिस्सा है के बारे में चौका देने वाले खुलासे किये हैं। विकिलीक्स द्वारा जारी किये गए एक वीडियो में अमेरिकी जवानों को सिर्फ खबरिया एजेंसी रायटर के दो जांबाज पत्रकारों की गलत सूचना देकर हत्या किये जाने बल्कि उनकी मौत पर ठहाके भी लगाये देखा जा सकता है।...
image
बिहार चुनाव में चौराहे पर खड़ा मुसलमान
बिहार चुनाव में पसमांदा मुसलमान एक बार फिर चौराहे पर खड़े हैं। पसमांदा मुसलमानों में किसी पार्टी या गठबंधन को लेकर कोई उत्साह नहीं हैं। ज़्यादातर पसमांदा वोटर ख़ामोश हैं। कभी पसमांदा आंदोलन के अगुआ रहे लोग इस चुनाव में आश्चर्यजनक रूप से निषक्रिय हैं। कई पार्टियों की तरफ़ से बुलावा आने को बावजूद उन्होंने पार्टियों के दफ़्तर जाना या नेताओं से मिलना तक मुनासिब नहीं समझा। वजह साफ है पसमांदा मुसलमान तमाम पार्टियों की वादा ख़िलाफी से ऊब चुके हैं।...
image
पपेट प्रधानमंत्री का एक और पापकर्म
देश में एक वर्ग विशेष को तुष्ट करने के लिए सरकार कहां तक गिर सकती है उसका हालिया उदाहरण है शत्रु संपत्ति विधेयक-2010 का विरोध करना फिर उसमें मुस्लिम नेताओं के मनमाफिक संसोधन को केन्द्रीय कैबिनेट द्वारा स्वीकृति देना। कठपुतली (पपेट) प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में बुधवार को केंद्रीय कैबिनेट की बैठक आयोजित की गई थी। इसमें इसी बैठक में केंद्रीय गृह मंत्रालय के प्रस्ताव पर शत्रु संपत्ति (संसोधन एवं विधिमान्यकरण) विधेयक-2010 में संसोधन को स्वीकृति प्रदान की गई।...
image
चुनाव आयोग के सामने बिहार चुनाव की चुनौती
पिछले विधानसभा में स्वतंत्र और भयमुक्त चुनाव होने का असर राजनैतिक दलों और नेताओं पर साफ देखने को मिल रहा है। चुनाव आयोग की सख्ती का साफ असर इस बार भी नेताओं और पार्टियों कार्यालयों में देखा जा रहा है। विभिन्न पार्टियों के नेता काफी चौकस है कि इस दौरान किसी भी सूरत में चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन नहीं हो। मुख्यमंत्री आवास एक अणे मार्ग में नीतीश कुमार से मुलाकात करने जा रहे नेता भी वहां किसी तामझाम के पहुंच रहे हैं। लालू प्रसाद यादव भी अपने नेताओं को यह समझाया कि सभी सरकार आवास पर नहीं, पार्टी कार्यालय में मिले।...
image
दशहरा रैली का दम
शिवाजी पार्क शिवसेना और शिवसेनाप्रमुख के बीच दशकों पुराना अटूट संबंध है. शिवेसना की पहली जनसभा 19 जून 1966 को इसी शिवाजी पार्क में हुई थी. तत्कालीन राजनीतिक विश्लेषकों का मत था कि 1960 और 1966 के बीच व्यंगचित्र साप्ताहिक मार्मिक के माध्यम से ठाकरे परिवार ने स्थानीय लोकाधिकार के लिए जो अलख जगाया था, उससे उपजे राजनीतिक विचार से जन्मी शिवेसना की पहली जनसभा में अधिकतम दस हजार स्रोता जमा होंगे....
image
जांच होगी पर आंच किसी को नहीं आयेगी
कामनवेल्थ खेलों के समापन के अगले दिन ही खेलों की तैयारियों में हुई हेराफेरी की जांच का आदेश देकर केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर संभावित राजनीतिक पैंतरेबाजी पर लगाम लगा दिया है लेकिन इस जांच की गंभीरता पर सवाल किये जाने लगे हैं. दिल्ली में सत्ता के गलियारों में सक्रिय ज़्यादातर लोग इस खेल में शामिल थे. पूना वाले बुड्ढे नौजवान ने मामला इस तरह से डिजाइन किया था कि दिल्ली के सभी अमीर उमरा ७० हज़ार करोड़ रूपये की लूट में थोडा बहुत हिस्सा पा जाएँ....
image
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों का आतंक
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव चल रहे हैं. इन चुनावों को नजदीक से देखने और जानने की जरूरत है. दो चरण पूरे हो चुके हैं। तीसरा और अन्तिम चरण 20 अक्टूबर को पूरा हो जाएगा. जब उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव की अधिसूचना जारी हुई तो मेरठ के एक पॉश इलाके में बसपा कार्यालय पर बसपा के समर्थन से चुनाव लड़ने वाले इच्छुक लोगों की भीड़ लगी थी। महंगी लग्जरी गाड़ियों का रैला था। गाड़ियों में सवार हष्टपुष्ट आदमी थे। कुर्ता-पायजामा की जगह झक सफेद पेंट-शर्ट के साथ सफेद जूते में दिखनेवाले नेता हमें माफियाओं के आस पास होने का आभास दे रहे थे. उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों का आंतक के शुरूआत की घोषणा हो चुकी थी. ...
image
विपक्ष का कार्य सरकार गिराना ही नही है
दक्षिणी दुर्ग में बनी भाजपा की पहली सरकार गहरे संकट में है। मुख्यमंत्री येदियुरप्पा शुरु से ही सकटों से घिरे रहे है। यह संकट बाहरी कम अंदरुनी ज्यादा रहे है। कुछ समय पहले बंगलौर निकाय चुनावों में भी भाजपा को जोरदार सफलता मिली थी। ईसाई समुदाय को छोड़कर किसी और वर्ग को भाजपा सरकार से कोई खास नराजगी नही रही है। चर्च का एक हिस्सा पिछले कुछ समय से राज्य में युदियुरप्पा सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग करता रहा है इसके लिए यह वर्ग राज्यपाल हंसराज भारद्वाज को कई ज्ञापन भी दे चुका है।...
image
यह उमर और ऐसी गलती?
यह राजनीतिक पूतों के पांव हैं जो पालने में दिख रहे हैं. पहले राहुल गांधी का बयान और अब उमर अब्दुल्ला की गलती. जम्मू कश्मीर विधानसभा में बोलते हुए उन्होंने कश्मीर के भारत में विलय को ही अधूरा बता दिया. देशभर में विरोध हुआ लेकिन राहुल गांधी ने चुप रहने में भलाई नहीं समझी, उमर की तारीफ करने मैदान में कूद पड़े. कश्मीर इनके पुरखों की विरासत है, लेकिन पुरखों की इस विरासत से कैसा खिलवाड़ कर रहे हैं ये दो नौजवान? शेष नारायण सिंह का विश्लेषण-...
image
बिहार चुनाव में बच्चों के लिए नदारद है नारा
बिहार के विधानसभा की घमाचान में हर पार्टी के झोले के भीतर से एक-एक करके हर एक के लिए मुद्दे ही मुद्दे और नारे ही नारे बाहर आ रहे हैं. मगर बच्चों के लिए इस बार भी कोई मुद्दा और नारा नहीं गूंज रहा है. ऐसे में क्राई ने बच्चों के मुद्दों को सूचीबद्ध करते हुए सभी राजनैतिक दलों से बच्चों के अधिकारों को वरीयता देने के लिए संवाद का सिलसिला शुरू किया है. इसके तहत बाल अधिकारों का एक घोषणा-पत्र तैयार किया जा चुका है और अब बच्चों के मामले में राजनैतिक दलों पर जल्द से जल्द अपना-अपना रूख स्पष्ट करने के लिए दबाव बनाना तय हुआ है....
Next
Tags
No tags for this article
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम में प्रकाशित सामग्री पर हमारी ओर से कोई कापीराइट नहीं है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2