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मंहगाई की मार, रिलायंस जिम्मेदार

image रिलायंस फ्रेश स्टोर में मुकेश अंबानी

आम आदमी का जीना मुहाल कर देने वाली महंगाई पर तरह-तरह के विश्लेषण किए गए हैं लेकिन किसी ने भी यह जहमत उठाने की कोशिश नहीं की है कि आखिर हमारे देश में प्रचुर उत्पादन के बावजूद एकाएक शक्कर के साथ अन्य सभी खाद्य पदार्थों की कीमतों में क्यों बढ़ोत्तरी हुई है। आखिर ऐसा क्यों है कि रिलायंस समूह खुदरा बाजार के जिस कारोबार पर हाथ रख देता है उस वस्तु के दाम आसमान छूने लगते हैं?

कुछ दिन पहले जब रिलायंस फ्रेश के सर्वेसर्वा मुकेश अंबानी ने यह घोषणा की कि उनकी कंपनी जल्द ही दूध का कारोबार भी शुरू करेगी. तब माथा ठनका और महंगाई बढ़ने का कारण समझ में आने लगा। मुकेश की इस घोषणा के एक-दो दिन बाद ही कृषि मंत्री की तरफ से यह बयान आ गया कि उत्तर भारतीय इलाकों में दूध के उत्पादन में कमी हुई है लिहाजा कभी भी दूध के दाम बढ़ सकते हैं। कृषि मंत्री का यह बयान देना था कि अचानक शक्कर लॉबी की तरह मजबूत होती जा रही दूध लॉबी ने भी दामों को बढ़ा दिया और आम आदमी मन मसोसकर रह गया। वह बेचारा कर ही क्या सकता है सिर्फ सरकार के साथ अपने भाग्य को कोसने के।

अभी से करीब 3 साल पहले तक मौसम की मार से या किसी प्राकृतिक आपदा की बदौलत देश में किसी एकाध कृषि उपभोक्ता वस्तु की कीमतों में बढ़ोतरी हो जाया करती थी, मसलन कभी प्याज तो कभी आलू या फिर कोई भी दाल-दलहन। ऐसा कोई उदाहरण देखने को नहीं मिलता कि मौसम अथवा प्राकृतिक आपदा के कारण सभी खाद्य पदार्थों की उपलब्धता प्रभावित हुई हो, लेकिन बीते 3 वर्षों में देश में पैदा होने वाली लगभग सभी कृषि जीन्सों की भरपूर पैदावार होने के बावजूद फसल आने के समय भी दामों में किसी प्रकार की कमी दिखाई नहीं दे रही है। यदि कभी-कभार ऐसी स्थिति बनती भी है तो कृषि मंत्री यह बयान देकर पूरी कर देते हैं कि मौसम की मार से कृषि उत्पादन प्रभावित हुआ है और दामों में बढ़ोत्री होना संभव है। उनका यह बयान देना होता है कि बाजार से एकाएक उस कृषि जीन्स की मांग बढ़ जाती है और कल तक जो सर्व-सुलभ वस्तु थी, वह गायब हो जाती है। इस बात के लिए कृषि मंत्री को चुनौती दी जा सकती है कि वे बताएं कि कौन से वर्ष में कृषि आधारित सभी फसलों की कमी की वजह से हर उत्पाद के दामों में दो गुनी तक वृद्धि हुई थी। यदि वे इसका संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाते हैं तो यही माना जाना चाहिए कि उन्होंने इरादतन किसी उद्योग घराने को लाभ पहुंचाने की खातिर और देश की जनता को गुमराह करने के उद्देश्य से ऐसे बयान देकर आम आदमी को महंगाई की आग में झोंका है। लोकतंत्र के चौथे महत्वपूर्ण स्तंभ कहे जाने वाले आत्ममुग्ध मीडिया के किसी भी संस्करण (प्रिंट अथवा इलेक्ट्रानिक) ने इस बात के लिए कृषि मंत्री से सवाल तक करना जरूरी समझा है कि आखिर कौन से कारण रहे हैं जिनकी बदौलत लगातार तीन साल से सरकार और खासकर कृषि मंत्री महंगाई थामने में विफल रहे हैं?

पूरी सरकार मानों रिलायंस और कुछ बड़े जींस कारोबारियों के हित साधन में लगी हुई है. बार बार यह सवाल उठाये जाने के बाद कि जीन्स का वायदा कारोबार बंद किया जाना चाहिए, सरकार ने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है. पहले वामपंथी दलों ने इस बारे में सवाल उठाये और अब खुद भाजपा जीन्स पर वायदा कारोबार के रोक की मांग कर रही है जिसके शासनकाल में अनाज को शेयर बाजार पहुंचाया गया था. लेकिन सरकार इसी एक उपाय को न करने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई दे रही है जिससे आम आदमी पर मंहगाई की मार पड़ रही है और पूंजीपति पैसा पीट रहे हैं.

30 सितंबर 2006 को मुकेश अंबानी ने यह घोषणा की कि वे अपने परंपरागत उद्योग-धंधों के साथ अब देश में मौजूद विशाल खुदरा बाजार में तेल-गुड़ के साथ फल-सब्जी भी बेचना शुरू करेंगे। खुदरा बाजार पर अपनी पकड़ बनाने के लिए उन्होंने 4 साल के अंदर 25 हजार करोड़ रुपए निवेश करने की योजना बनाई थी। यदि इस निवेश को आसान शब्दों में समझाना हो तो इसका मतलब यह निकलता है कि हर भारतीय पर कम से कम 22 सौ रुपए का निवेश किया। इस योजना के मुताबिक देश के 14 प्रदेशों के खास 80 शहरों में 50 लाख उपभोक्ताओं को उचित गुणवत्ता का खाद्य सामान उपलब्ध करवाने के लिए 900 से अधिक स्टोर खोले जाने का लक्ष्य था। उनके द्वारा निर्धारित समय की सीमा पूर्ण होने में अभी तकरीबन 6 माह का समय और बचा है. लेकिन इन साढ़े तीन सालों में महंगाई ने अपना असली रूप दिखा दिया है और देश की तकरीबन 20 फीसदी आबादी को दाने-दाने के लिए सोचने पर मजबूर कर दिया है। केवल 50 लाख लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए रिलायंस फ्रेश के इस व्यापार में कूद जाने से अब हालात कितने भयावह हो गए हैं।

यहां यह बताना गैरजरूरी नहीं है कि वर्ष 2006-07 में मुंबई की प्रति व्यक्ति आय 65 हजार 361 रुपए थी, जो देश की औसत प्रति व्यक्ति आय 29 हजार 382 रुपए के मुकाबले दोगुनी होती है। देश में सबसे अधिक प्रति व्यक्ति आय होने के बावजूद अकेले मुंबई की दस फीसदी आबादी (करीब 10 लाख लोग) की आय 20 रुपए प्रतिदिन भी नहीं, बल्कि केवल 591.75 पैसे ही है। ऐसे परिवारों के पास टीवी, फ्रिज, पंखा तो दूर की बात है घरों शौचालय, पानी की आपूर्ति का स्रोत अथवा अपना वाहन तक की कोई सुविधा नहीं है। ऐसे में देश के केवल 50 लाख लोगों को सुविधाएं देने नाम पर 25 हजार करोड़ रुपए के निवेश के जरिए आम आदमी को महंगाई की भट्टी में झोंक देने को क्या कहा जाएगा।

मीडिया में बेकाबू होती महंगाई पर खूब लिखा जा चुका है, लेकिन खास बात यह है कि किसी ने भी इसका विश्लेषण करने की जहमत नहीं उठाई है कि आखिर ऐसा क्या हो गया जिसने अर्थशास्त्र के सिद्धांतों तक को दरकिनार कर दिया है। अर्थशास्त्र के सामान्य सिद्धांत के अनुसार बाजार में मांग और धन का प्रवाह बढ़ने पर मुद्रास्फीति की दर के साथ महंगाई में भी बढ़ोत्री होती है लेकिन कुछ माह पहले (गत वर्ष जून में) तक तो मुद्रास्फीति की दर ऋणात्मक थी, बावजूद इसके बाजार में न सिर्फ कृषि उत्पाद मसलन दाल, चावल, शक्कर और अनाज की कीमत में कोई कमी दिखी। दिलचस्प बात यह है कि इससे पहले मुद्रास्फीति की ऋणात्मक दर वर्ष 1978 के आसपास हुई थी और उस समय शक्कर सहित अन्य सभी कृषि आधारित वस्तुओं की कीमतें बेहद कम हो गई थी। आपातकाल के दौरान भी शक्कर की कीमत काफी बढ़ी हुई थी और राशन दुकानों पर कम कीमत पर शक्कर उपलब्ध कराई जाती थी। उस समय (वर्ष 1978) ऋणात्मक मुद्रास्फीति ने शक्कर की कीमतों को राशन दुकान पर उपलब्ध कीमत से भी कम पर ला दिया था लेकिन इस बार की ऋणात्मक मुद्रास्फीति ने ऐसा कोई कारनामा अंजाम नहीं दिया उल्टे सभी वस्तुओं के दाम स्थिर ही बने रहे। मतलब यह कि जिस तेजी से कृषि उत्पादों की कीमतें बढ़ रही थी, केवल उनका बढ़ना भर रुका था। इसका कारण साफ था कि यह सब जमाखोरी के चलते संभव हो पाया था और आज भी सरकार इस पर अंकुश लगा पाने में पूरी तरह नाकामयाब ही दिखती है वह केवल लोगों को यह बयान देकर अपने कर्तव्य को पूरा करने में लगी है कि सरकार द्वारा महंगाई को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए जा रहे हैं जल्द ही लोगों को महंगाई से निजात मिलेगी लेकिन ठोस उपाय करने के नाम पर मौद्रिक नीति में थोड़ा उलटफेर कर दिया जाता है।

महंगाई के मुद्दे पर सभी दलों की खामोशी ने यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि शासन करने की मौजूदा नीति केवल उद्योगपतियों के साथ नेताओं और अफसरों के लिए ही फायदेमंद साबित हो रही है, आम आदमी तो बस जल्द ही अपने गरीबी की रेखा में आने का इंतजार कर रहा है और तैसे-तैसे अपने दिन गुजारने को मजबूर है. मौजूदा महंगाई में सामान्य आदमी अपना गुजारा कैसे चला पा रहा है, यह उससे बेहतर और कोई नहीं जान सकता है और शासन-प्रशासन ने जनता को तो भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है.

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अंकुर गुप्ता on 22 February, 2010 20:52;47
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भारतीयों को इंडियन बनाकर उन्हे अपने ही लोगों के खिलाफ़ उपयोग करने की साजिश १८३५ में ही रची जा चुकी थी. मैकाले का कहा हुआ कथन देखिए: We must do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we govern; a class of persons, Indian in blood and colour, but English in taste, in opinions, in words and in intellect" (Macaulay 1835)

आज भी हम गुलाम हैं फ़र्क ये है कि आज जो हमारा शोषण करते हैं उनकी चमड़ी का रंग भारतीय है.
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Jitendra Dave on 23 February, 2010 01:57;12
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Totally agree with Sri Ankur Gupta.
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Rajesh sharma on 23 February, 2010 11:40;02
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इंडियनो के बीच में भारतीयता कहीं कोने में दुबकी आंसू बहाने को विवश है, क्योंकि देश में बोलबाला इंडियनों और इंडिया का हो गया है. जो अंग्रेजी जानता है उसके लिए कम से कम १० हजार और अधिकतम की सीमा नहीं का रोजगार मौजूद है पर जो हिंदी के बूते नौकरी करना चाहे उसके लिए अधिकतम ५ हजार पर आकर सारे रास्ते बंद हो जाते हैं. यह अंतर ही देश में विभाजन पैदा कर चूका है. वह दिन दूर नहीं जब इन सबकी बदौलत वर्ग-संघर्ष के हालात पैदा होंगे.
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Dr. Mukesh Jaiswal on 23 February, 2010 12:27;08
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Mr. Kuldeep Sharma Analyze this situation very deeply and I totaly agree with his view. keep it up. India need more such type of media persons.
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aayush on 23 February, 2010 12:27;37
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समरथ (समर्थ) को नहीं दोष गुसाँई वाली कहावत सही साबित होती है मेरे भाई। चाहकर भी कुछ नहीं किया जा सकता। जिसकी लाठी उसकी भैंस।
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jitendra sachadev on 23 February, 2010 15:08;42
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महंगाई बढ़ाने में उद्योगपति, नेता और नौकरशाही की तिकड़ी काम करती है. उद्योगपति अपना मुनाफा कमाने के लिए नेता की शरण में जाकर नौकरशाह से संरक्षण पाकर लोगों को लूटने में लगता है. यही देश की नियति बन गई है.
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Bhupinder Singh Brar on 27 February, 2010 17:41;56
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बिलकुल सही लिखा मेरे भाई
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chandan goswami on 02 March, 2010 12:14;24
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dear KULDIP JI, AAPNE BILKUL SAHI LIKHA HEI, LEKIN ESME MEI KUCH SUDHAR KARNA CHAATA HU, ES MENGAI KO BADANE ME JITNA HAAT AMBANI KA HEI OOTNA HI HAAT BIYANI. ADANI, JAISE PRAMUKH BADE BAZARO KE PUNJIPATIO KA BHEE HEI,YEH JITNE NI HEI OOTANE UPA SARKAR KE KARBI HEI, ENKI SEETING BADI JABARDAST HEI TABHI TOO EK TARAF DESH MEHANGAI KE LIEA CHILLA RAHA HEI WAHI UPA KE MANTRIO KE KANNO PER KISI PRAKAR KI GUNJ SUNIEA NAHI PAD RAHE HEI, CHAAE OPPESTION KITNA BHI CHILLAYE, ABHI HAAL HI FINANCE MINISTER NE KHUD BUDJET KE 1 DIN PAHLE MENGAI KE BARE ME STATEMENT DEKAR ESKO BADAVA DIEA,WAY YAHA TAK NAHI RUKE OONHONE PETROL AUR DIESEL KE RATE BHI BADA DIEA, JISSE MAL BHADO MEI VRDHHI HONGI AUR AAM ADMAI, DESHVASI. AUR PISENGA ENHE KYA YEH TOO SIRF KUCH PUJIPATRIO OR SATTA MARKET JAISE NCDX ,MCX JAISE TURMNIAL KO BADAVA DE RAHE HEI, AUR APNI KARGUJAREA CHOOTE VYPAREIO , KE MATTHE MADKAR DESHVASEIO KA DHYAN BATA RAHE HEI,
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kuldeep on 03 March, 2010 11:46;23
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श्रीमान चन्दन गोस्वामी जी, कितना अच्छा होता यदि आपकी साईट पर संपर्क हो पता. अपना मेल आप kalkshepee@gmail.com पर भेज सकते हैं. कुलदीप
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image कुलदीप शर्मा मैं कुलदीप शर्मा हूँ, अंग्रेजों के शासन को कोसते हुए ली गई आजादी के बाद परोक्ष रूप से देश आज भी गुलाम ही है. इसके एक नहीं अनेक उदहारण दिए जा सकते हैं. लेकिन अंग्रेजों द्वारा बनाई गई इस व्यवस्था में हर कोई ऐसा ढल चुका है कि आम आदमी की मुश्किलों से उसका कोई सरोकार नहीं रह गया है. आजादी के बाद से हुई देश की दुर्दशा पर पुस्तक लेखन के साथ इन दिनों थोडा-बहुत लिख लेता हूँ. संपर्क: kalkshepee@gmail.com
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