वार्ता में भारत की उदारता का अनादर
प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने पुणे में हुए विस्फोट के बावजूद, भाजपा और अन्य दलों के विरोध के बावजूद पाकिस्तान के साथ बातचीत आगे बढ़ाने का फैसला किया था। उन्होंने अपनी राजनैतिक साख को दांव पर लगा दिया था। लेकिन बातचीत का नतीजा क्या निकला? कहीं ऐसा तो नहीं है कि भारत की उदारता का पाकिस्तान अनावश्यक अनादर कर रहा है?
बजट प्रावधानों के शोर में भारत और पाकिस्तान के विदेश सचिवों की मुलाकात पर किसी ने गौर नहीं किया। शायद उसमें गौर करने लायक बहुत कुछ था भी नहीं। भारत और पाकिस्तान शायद अकेले ऐसे देश हैं जिनके बीच होने वाली वार्ताओं के परिणाम उनके शुरू होने से पहले ही स्पष्ट होते हैं। क्योंकि उनके परिणाम होते ही नहीं। दोनों देश कई बार साझा बयान तक जारी करने में नाकाम रहे। और कुछ मौकों पर ऐसे बयान आए भी तो बाद में वे उसके इस या उस प्रावधान से पीछे हट गए। विदेश सचिवों की ताजा बैठक भी कमोबेश इसी श्रृंखला की कड़ी थी।
हालांकि बातचीत बड़े अनमने माहौल में हुई लेकिन इसे लेकर उम्मीदें तो थी हीं। खासकर इसलिए क्योंकि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने पुणे में हुए विस्फोट के बावजूद, भाजपा और अन्य दलों के विरोध के बावजूद अपने पड़ोसी के साथ बातचीत आगे बढ़ाने का फैसला किया था। उन्होंने अपनी राजनैतिक साख को दांव पर लगा दिया था। हालांकि कुछ पाकिस्तानी नेताओं ने इस बात के लिए उनकी प्रशंसा तो की लेकिन वे भारत की भावना का इसी अंदाज में जवाब देने में नाकाम रहे। भारत-पाक वार्ता एक बार फिर दोनों देशों के लिए पुरानी बातों को दोहराने और घरेलू मोर्चे पर अंक अर्जित करने का अखाड़ा बनकर रह गई। पाकिस्तानी विदेश सचिव ने जिस उग्र अंदाज में बात की उसने भारत को चौंकाया है। उन्होंने हाफिज मोहम्मद सईद के बारे में भारत की ओर से दिए गए ताजा दस्तावेजों को ‘सबूत नहीं साहित्य‘ करार दिया। उन्होंने आतंकवाद को कोई मुद्दा ही मानने से इंकार कर दिया और भारतीय विदेश सचिव निरूपमा राव की इस बात को काट दिया कि वार्ता के दौरान कश्मीर पर ‘संक्षिप्त‘ चर्चा हुई। और तो और उनका यह भी कहना था कि ‘पाकिस्तान सिर्फ दिखावटी बातचीत के पक्ष में नहीं है। वह आतंकवाद के मुद्दे पर भारत से ‘लेक्चर‘ सुनने को भी तैयार नहीं है।
इस किस्म की उग्रता परवेज मुशर्रफ के आगरा दौरे के समय ही देखी गई थी। आंतकवाद के मुद्दे पर भारत की चिंताएं स्वाभाविक हैं और इनके जवाब में श्री बशीर ने कहा कि कोई हमें यह या वह करने के लिए नहीं कह सकता। उनके संकीर्ण दृष्टिकोण को देखते हुए भारतीय पक्ष ने भी खुद को अपने जाने-पहचाने मुद्दों तक ही सीमित कर लिया और उसने आतंकवाद, मुंबई हमलों की जांच जैसे मुद्दों पर ध्यान केेंद्रित रखा। जब बात अंक बटोरने तक सीमित रह गई तो फिर भारत ने मुंबई हमले पर कुछ और डोजियर सौंप कर पल्ला झाड़ लिया।
वापसी का एजेंडा साथ लाए थे
पाकिस्तानी विदेश सचिव ने बाद में दावा किया कि विदेश सचिवों की बैठक में दोनों पक्षों ने अस्सी फीसदी से ज्यादा समय कश्मीर पर चर्चा की और बलूचिस्तान और अन्य पाकिस्तानी क्षेत्रों में चल रही आतंकवादी गतिविधियों में भारत की कथित भूमिका पर भी बात हुई। यह एक असंभव सी बात थी। लेकिन श्री बशीर एक एजेंडा साथ लेकर आए थे। ऐसा एजेंडा जिसका इस्तेमाल पाकिस्तानी जनता के उपभोग के लिए होना था। उन्होंने कश्मीरी अलगाववादी नेताओं से गर्मजोशी भरी मुलाकात भी की। असल वे भारत से एक किस्म की ‘विजय यात्रा‘ करके लौटने के लिए आए थे। ऐसा लगता है कि पाकिस्तानियों के लिए कश्मीर और बलूचिस्तान पर बात करना भर बहुत बड़ी उपलब्धि बन गया है। लेकिन यदि दोनों पक्ष तमाम किस्म के विरोधाभासों और प्रतिकूल हालात के बाद होने वाली वार्ता में भी अगर अपनी-अपनी बात को दोहराकर ही इतिश्री कर लेते हैं तो ऐसी वार्ताओं का क्या अर्थ है?
श्री बशीर ने न सिर्फ राजनयिक दृष्टि से बहुत बड़ी गलती की बल्कि उन्होंने माहौल सुधारने के लिए मिला एक बेशकीमती मौका भी खोे दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री की सदाशयता के प्रति ऐसे अनादर का इजहार किया है जो बहुत कम देखने को मिलता है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी और पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने हाल ही में प्रधानमंत्री डॉ. सिंह की इस बात के लिए तारीफ की थी कि वे एक दूरदृष्टि वाले संजीदा इंसान हैं जो वाकई आपसी संबंधों को सुधारना चाहते हैं। लेकिन पाकिस्तान का अपना रुख क्या है? सदाशयता की उम्मीद क्या एक पक्ष से ही की जाती है? पाकिस्तान के शीर्ष नेता पिछले कई महीनों से भारत के साथ बातचीत दोबारा शुरू करने का आग्रह कर रहे थे। भारत इसे आतंकवाद से जोड़कर देख रहा था और वह बातचीत के लिए तैयार नहीं था। लेकिन अंततः प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हमेशा की तरह उदारता दिखाते हुए बातचीत आगे बढ़ाने का फैसला किया तो पाकिस्तानियों का रुख ही बदल गया। उन्होंने कहा कि हमें भारत का निमंत्रण तो मिल गया है लेकिन यह फैसला करना हमारे हाथ में है कि बात करें या न करें। भारत की पेशकश को पाकिस्तानी मीडिया और नेताओं की सभाओं में पाकिस्तान की बहुत बड़ी जीत के रूप में प्रचारित किया गया। इस तरह की छोटी-छोटी ‘जीत‘ में ही जश्न मना लेने वाले पाकिस्तानी नेता क्या हमारी उदारता का कोई अर्थ समझते हैं?
यही होता है हर बार
और ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। राजग शासन में जब पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने बंद पड़ी वार्ता प्रक्रिया को दोबारा शुरू किया तब क्या हुआ? श्री वाजपेयी के पाकिस्तान दौरे के समय परवेज मुशर्रफ ने उनके प्रति अनादर दिखाया और जब राष्ट्रपति बनने के बाद मुशर्रफ को भारत आने का न्यौता दिया गया तो उन्होंने आगरा में अपने उग्र और असहयोगपूर्ण नजरिए का परिचय दिया। बातचीत नाकाम रही लेकिन मुशर्रफ ने कहा कि उन्होंने कश्मीर को बुनियादी मुद्दा बना दिया है। भारत संबंधों को जिस व्यापक स्तर पर ले जाना चाहता है, क्या पाकिस्तान उससे कोई इत्तेफाक रखता है? शायद नहीं।
शर्म अल शेख में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने पाकिस्तानियों को बलूचिस्तान का मुद्दा उठाने दिया। उन्होंने कहा कि यदि वहां कोई समस्या है तो हमें उस पर बात करने में आपत्ति नहीं है। इसे भारत में उनकी कूटनीतिक विफलता करार दिया गया और संभवतः इसे डॉ. सिंह की अब तक की नाकामियों में से एक माना गया। लेकिन क्या पाकिस्तान ने उनकी उदारता का महत्व समझा? नहीं। पाकिस्तान लौटते ही यूसुफ रजा गिलानी ने जोर-शोर से इस बात को प्रचारित किया कि अब हमने भारत-पाक वार्ता का एजेंडा उलट दिया है। जो भारत आतंकवाद के लिए हमें दोषी ठहराता आया है, हमने उसे ही इस मुद्दे पर कटघरे में खड़ा कर दिया है। पाकिस्तानी नेताओं का मकसद फौरी प्रचार और घरेलू स्तर पर कुछ अंक बटोर लेने तक सीमित दिखता है। विदेश सचिवों के बीच हुई ताजा वार्ता भी इससे अलग नहीं है। भारत में अधिकांश दलों ने सरकार को वार्ता का यह दौर न करने की सलाह दी थी। वार्ता हुई और पाकिस्तानी विदेश सचिव अपने मुद्दे उठाकर, माहौल को लिजलिजा बनाकर घर लौट गए। मगर प्रतिकूल माहौल में भी यह जोखिम उठाकर भारत को क्या मिला?
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- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
- नये निजाम के दामन पर है ज्यादा बड़ा दाग
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- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
- एनसीपी के 'दादा' का दांव
- पीएमओ वाले पृथ्वीराज
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चाहे हम हों कितने तगड़े , मुंह वो हमारा धूल में रगड़े,
पटक पटक के हमको मारे , फाड़ दिए हैं कपड़े सारे ,
माना की वो नीच बहुत है , माना वो है अत्याचारी ,
लेकिन - बात चीत रहेगी जारी , बात चीत रहेगी जारी .
जब भी उसके मन में आये , जबरन वो घर में घुस जाए ,
बहू बेटियों की इज्ज़त लूटे, बच्चों को भी मार के जाए ,
कोई न मौका उसने छोड़ा , चांस मिला तब लाज उतारी ,
लेकिन - बात चीत रहेगी जारी , बात चीत रहेगी जारी .
हम में से ही हैं कुछ पापी , जिनका लगता है वो बाप ,
आग लगाते हुए वे जल मरें , तो भी उसपर हमें ही पश्चाताप ?
दुश्मन का बुरा सोचा कैसे ??? हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी ???
अब तो - बात चीत रहेगी जारी , बात चीत रहेगी जारी .
बम यहाँ पे फोड़ा , वहां पे फोड़ा , किसी जगह को नहीं है छोड़ा ,
मरे हजारों, अनाथ लाखों में , लेकिन गौरमेंट को लगता थोडा ,
मर मरा गए तो फर्क पड़ा क्या ? आखिर है ही क्या औकात तुम्हारी ???
इसलिए - बात चीत रहेगी जारी , बात चीत रहेगी जारी .
लानत है ऐसे सालों पर , जूते खाते रहते हैं दोनों गालों पर ,
कुछ देर बाद , कुछ देर बाद , रहे टालते बासठ सालों भर ,
गौरमेंट करती रहती है नाटक , जग में कोई नहीं हिमायत ,
पर कौन सुने ऐसे हाथी की , जो कोकरोच की करे शिकायत ???
इलाज पता बच्चे बच्चे को , पर बहुत बड़ी मजबूरी है सरकारी ,
इसीलिये - बात चीत रहेगी जारी , बात चीत रहेगी जारी .
वैसे हैं बहुत होशियार हम , कर भी रक्खी सेना तैयार है ,
सेना गयी मोर्चे पर तो - इन भ्रष्ट नेताओं का कौन चौकीदार है ???
बंदूकों की बना के सब्जी , बमों का डालना अचार है ,
मातम तो पब्लिक के घर है , पर गौरमेंट का डेली त्योंहार है
ऐसे में वो युद्ध छेड़ कर , क्यों उजाड़े खुद की दुकानदारी ???
इसीलिये - बात चीत रहेगी जारी , बात चीत रहेगी जारी .
सपूत हिंद के बहुत जियाले , जो घूरे उसकी आँख निकालें ,
राम कृष्ण के हम वंशज हैं , जिससे चाहें पानी भरवालें ,
जब तक धर्म के साथ रहे हम , राज किया विश्व पर हमने ,
कुछ पापी की बातों में आ कर , भूले स्वधर्म तो सब से हारे ,
जाग गए अब, हुए सावधान हम , ना चलने देंगे इनकी मक्कारी ,
पर तब तक - बात चीत रहेगी जारी , बात चीत रहेगी जारी .
रचयिता : धर्मेश शर्मा
मुंबई / दिनांक २०.०९.२००९
संशोधन, संपादन : आनंद जी. शर्मा
Aapka Ajit
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