Home | जनता दरबार | लोकतंत्र को खारिज करने की साज़िश

लोकतंत्र को खारिज करने की साज़िश

image

गोधरा में ट्रेन के एक डिब्बे में लगी आग के बाद जिस तरह से खून खराबा हुआ, उससे दुनिया भर में तकलीफ महसूस की गयी थी. उसके बाद से लोकतंत्र के औचित्य पर सवाल उठाने लगे थे. कई पुरस्कारों से सम्मानित लेखिका, अरुंधती रॉय ने पहला हमला किया था. उन्होंने लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए मुख्यमंत्री, नरेन्द्र मोदी के गोधरा के बाद के काम को निशाने में लेकर यह तर्क दिया था कि कल्याणकारी राज्य की स्थापना कर सकना लोकतंत्र के बूते की बात नहीं है.

यहाँ नरेंद्र मोदी को सही ठहराने का कोई इरादा नहीं है लेकिन उनके बहाने से पूरे लोकतंत्र को खारिज करने की कोशिश को भी रोके जाने की ज़रुरत है. अरुंधती रॉय एक विद्वान लेखिका मानी जाती हैं. उनका मीडिया प्रोफाइल बहुत ही ऊंचा है और उन्हें हम लोगों की तरह अपनी रोटी-पानी के लिए रोज़ संघर्ष नहीं करना पड़ता. उनके पास जुगाड़ है,  कई साल तक के भोजन-भजन का इंतज़ाम है. लेकिन इस देश में आबादी का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जिसे लोकतंत्र बहुत कुछ देता है. लोकतंत्र के बड़े बड़े ठेकेदार गरीब आदमी की रोटी-पानी की  बात करते देखे गए हैं. आजकल भी सत्ताधारी पार्टी, राग ' आम आदमी ' में अपनी बात कह रही है लिहाज़ा लोकतंत्र के खिलाफ लाठी भांजने का वक़्त शायद अभी नहीं आया है. २००२ में जब अरुंधती रॉय का लोकतंत्र विरोधी लेख छपा था तो मुझे एक महात्मा जी का प्रवचन  बहुत याद आया था जो मेरे  कस्बे में वर्षों पहले पधारे थे. उन्होंने  रामराज्य का ज़िक्र किया था और कहा था कि वर्तमान राज-काज बिलकुल बेकार है. हमें रामराज्य के लिए प्रयास करना चाहिए जिससे चारों तरफ दूध-दही की नदियाँ बहेंगीं, लोग सुखी रहेंगें और कहीं कोई कष्ट नहीं होगा. महात्मा जी का प्रवचन ख़त्म हुआ, तम्बू उखड गया, वहां बिछी हुई दरी वगैरह हटा दी गयी. जो मजदूर इस काम में लगे थे उनको न्यूनतम मजदूरी मिली, उन लोगों ने दुकान वाले को पिछला बकाया अदा किया और नया उधार लेकर अपने घर  चले गए.सूखी रोटी, प्याज के साथ खाई और सो गए. महात्मा जी प्रवचन के आयोजकों के यहाँ पधारे, वहां दिव्य भोजन किया, भक्तों ने उनके चरण की सेवा की और वे सो गए.

उनके लिए तो रामराज्य  के सुख का बंदोबस्त हो चुका था लेकिन उन मजदूरों के लिए रामराज्य अभी बहुत दूर था. उनका संघर्ष लम्बा चलेगा तब कहीं उन्हें रामराज्य के सुख का दर्शन होगा. अरुंधती रॉय जैसे लोगों का लोकतंत्र के खिलाफ दिया गया प्रवचन उन्हीं महात्मा जी के प्रवचन जैसा है जो हकीकत से दूर रह कर अपने ख्याली पुलाव को वाताविकता की तरह  स्वीकार करने का आग्रह करता नज़र आता है. अरुंधती रॉय अपने उस आग्रह पर आज भी कायम हैं क्योंकि एक नामी पत्रिका में छपे अपने उस लेख को उन्होंने अपनी ताज़ा किताब में ज्यों का त्यों छाप दिया है. उनके अलावा भी कुछ चिंतकों ने लोकतंत्र के खिलाफ तर्क देना शुरू कर दिया है और एकाधिकारवादी पूंजी और गुंडों की राजनीतिक सफलता का उदाहरण दे कर वे लोकतंत्र के खिलाफ तर्क देने की कोशिश करते हैं. यह सच है कि सत्ता के सबसे ऊंचे मुकाम पर बैठे लोगों तक पूंजीवादी  शक्ति के प्रतिनिधियों की पंहुच आसानी से हो जाती है, वे कई बार ऐसे  फैसले भी करवा लेते हैं जो जनविरोधी होते हैं. यह भी सच है कि आजकल चुनाव जीतने वालों में ऐसे लोग भी शामिल हो जाते हैं जो अपराधी हैं या जिनका सामाजिक उत्थान से कोई लेना देना नहीं होता. कई बार यह अपराधी लोग विकास के लिए निर्धारित  रक़म को अपने निजी स्वार्थ के लिए हड़प भी लेते हैं. इन अपराधियों, नेताओं, अफसरों और बड़ी पूंजी वालों के गठजोड़ का हवाला देकर भी लोकतंत्र के खिलाफ  माहौल बनाया जा रहा है लेकिन इस सबके बावजूद अभी लोकतंत्र के खिलाफ सुनी जा रही  खुसुर-फुसुर को समर्थन देना ठीक नहीं होगा. ज़रुरत इस बात की है कि सार्थक बहस की शुरुआत की जाए और लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ बन रहे माहौल को दबाने की कोशिश की जाए. लोकतंत्र के पक्ष में सबसे बड़ी बात तो यही है कि इस व्यवस्था में अपराधी और जनविरोधी टाइप लोगों को बेदखल करने के अवसर उपलब्ध हैं. दूसरी बात यह है कि जो लोग भी लोकतंत्र के खिलाफ माहौल बना रहे हैं उनके पास कोई वास्तविक विकल्प नहीं है. उनके पास विकल्प के नाम पर वही महात्मा जी वाला कार्यक्रम है.

सच्ची बात यह है कि लोकतंत्र की अवधारणा किसी की कृपा से नहीं आई है. इसके लिए आम आदमी ने सैकड़ों वर्षों तक संघर्ष किया है. और अभी लोकशाही के सभी पक्ष सामने नहीं आये हैं. लोकतंत्र के बड़े केंद्र अमरीका में अभी लोकतंत्र की बुनियादी बातें भी नहीं आई हैं. चुनाव व्यवस्था शुरू होने के कई सौ वर्षों की परंपरा के बाद पिछले चुनाव में वहां यह सोचा गया कि क्या कोई काला यानी दलित आदमी राष्ट्रपति हो सकता है या कि कोई महिला सर्वोच्च पद पर पंहुच सकती है. अभी ५० साल पहले तक अमरीका में सभी नागरिकों को वोट देने का अधिकार नहीं था. उन्होंने अपने दलितों को चुनाव प्रणाली से बाहर रखा था, महिलाओं को भी बहुत देर से वोट देने का अधिकार मिला. इसी तरह से बाकी देशों एक लोकतंत्र में भी विकास की अलग अलग अवस्थाएं हैं. लेकिन एक बात पक्की है कि जो कुछ भी हासिल होगा उसके लिए संघर्ष करना पडेगा. आज जो भी लोकतंत्र का स्वरूप है उसके विकास में एक लम्बा वक़्त लगा है. इसमें दो राय नहीं है कि लोकतंत्र की अभी बहुत सी संभावनाएं खुलना बाकी हैं. लोकशाही के जो बुनियादी सिद्धांत हैं वे फ्रांसीसी क्रान्ति के बराबरी, भाईचारा और स्वतंत्रता के नारों से विकसित हुए हैं. आज दुनिया के किसी भी लोकतंत्र में यह लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सका है. ज़ाहिर है कि उसे हासिल करने के लिए राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल होकर ही कोशिश करनी पड़ेगी. उसके खिलाफ माहौल बना कर नहीं.

हमारे अपने लोकतंत्र में भी अभी बहुत सारी संभावनाएं हैं. सही बात यह है कि अभी तक  दलितों और मुसलमानों को लोकशाही की मुख्यधारा में शामिल होने का मौक़ा नहीं मिला है. एक मायावती को मुख्यमंत्री पद मिला है लेकिन उसकी वजह से दलितों की मुक्ति की लड़ाई एक इंच भी आगे नहीं बढ़ी है. आज़ादी के साथ वर्षों बाद भी पिछड़ी और दलित महिलाओं को राजनीतिक सत्ता में भागीदारी दिलाने के लिए संघर्ष चल रहा है. पंचायतों में कुछ भागीदारी का काम हुआ है लेकिन मर्दवादी सोच के पुरुषों ने वहां भी स्त्री को सत्ता के बाहर रखने की सारे गोटें बिछा रखी हैं. आजकल जो नक्सलवाद के खिलाफ सारी सत्ता जुटी हुई है. उस नक्सलवाद को शुरू होने से ही रोका जा सकता था. अगर दलितों और आदिवासियों को उनका हक दिया गया होता तो वे कभी भी वह राह न अपनाते. वरना आज वे लोग ही दिग्भ्रमित मार्क्सवादियों की राजनीतिक डिजाइन को पूरा करने के लिए आगे कर दिए  गए हैं. वे अति वामपंथी आंतंकवादी सोच के लिए शील्ड का काम कर रहे हैं. उनके खिलाफ तोप चलाने वाली सरकारों को चाहिए कि उनका इस्तेमाल करने वाले हिंसक वामपंथियों और उनका राजनीतिक लाभ लेने वाली जमातों को अलग थलग करें.

यह भी सच है कि राजनीतिक लोकतंत्र की सीमाएं हैं. वह पूरी तरह से कल्याणकारी निजाम नहीं कायम कर सकता लेकिन लोकतंत्र को कम करने के नतीजे भी भयानक होंगें. लोकतंत्र को कम करने का नतीजा यह होगा कि तानाशाही प्रवृत्तियाँ  बढ़ेगी. इसलिए लोकतंत्र की मात्रा बढ़ा कर चाहे थोड़ी तकलीफ भी हो लेकिन उसको ही आगे किया जाना चाहिए और राजनीतिशास्त्र के बारे में शौकिया प्रवचन करने वाले महात्मा टाइप लोगों की बात को गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए.

Subscribe to comments feed Comments (11 posted):

Ajit on 05 March, 2010 22:08;52
avatar
Dhanywaad, is achche lekh ke liye
Thumbs Up Thumbs Down
1
Jeet Bhargava on 06 March, 2010 02:27;37
avatar
गुरू, बड़ा ही धाँसू लेख लिखा है. आजकल देश में अरुंधती राय जैसे लोगो का बोलबाला है, जो परोक्ष और अपरोक्ष रूप से लोकतंत्र को खारिज करके माओराज का मार्ग प्रष्ट करने के लिए आतुर हैं. जबकि माओवाद की असलियत नीचे दी लिंक को पढ़कर आसानी से जानी जा सकती है, कि उनके इरादे कितने खतरनाक हैं.
http://in.jagran.yahoo.com/news/national/politics/5_2_6231563.html

कभी कभी तो शक होता है कि आखिर अरुंधती जैसे लोग किसके लिए काम कर रहे हैं. वह कभी कश्मीर पाक्सितान को दे देने की सलाह देती हैं तो कभी आउटलुक में काल्पनिक कहानी को हकीकत बताकर परोसती हैं और कभी नक्सल व माओवाद की पैरवी करती हैं तो कभी संसद के हमलावरों की तरफदारी.

खैर आपके साहसी लेख के लिए हार्दिक साधुवाद.
Thumbs Up Thumbs Down
2
Samar Singh on 06 March, 2010 02:59;11
avatar
आपने बहुत बढ़िया लिखा है. लेकिन ध्यान रहे कल अरुंधती जैसे 'प्रगतिशील-जनवादी' बुद्धीजीवी (?) लोग आपको फासिस्ट नहीं करार दें.!! उदयप्रकाश जैसे लोग तो प्रगतीशीलो की अश्लील गालियाँ सुन चुके हैं. बावजूद आपने हिम्मत की, जिसकी दाद देनी चाहिए. अरुंधती जैसे लोगो के अनुसार लोकतंत्र खराब है और और इसका विकल्प या तो खूनी संघर्ष के जरिए कम्युनिस्ट शासन में है या फिर कट्टर शरीयत कानूनों में. धन्य हो प्रभू, धन्य हो भारत की जनता जो हम अरुंधती जैसे लोगों को झेल रहे हैं.
Thumbs Up Thumbs Down
2
Vicky G on 06 March, 2010 13:00;37
avatar
वैचारिक मतभेद अपनी जगह, लेकिन इस चक्कर में देश के हितों की बलि नहीं चढाई जानी चाहिए. वास्तव में लोकतंत्र का कोई विकल्प नहीं है. अरुंधति अगर लोकतंत्र का विरोध करती हैं तो उनकी बुद्धि पर तरस ही खाया जा सकता है और उन लोगों की बुद्धि पर भी जो उन्हें महान लेखिका बताते हैं. देश में "कम्युनिस्टवाद" लाने के लिए ये लोग तो धर्मांध ज़िहादियों और आतंकवादियों से भी हाथ मिला चुके हैं. थू-थू.
Thumbs Up Thumbs Down
2
उदय राज on 06 March, 2010 14:50;10
avatar
इस शेष नारायण सिंह का दिमाग खराब हो गया है ! अरुंधती रॉय का विरोध करके धंधा चलाने वाले बहुत सारे लोग हैं ! यह भी उसी में शामिल है ! अरुंधती जब लोकतंत्र का विरोध करती हैं तो वे संघी राज का समर्थन नहीं करती ! वे वास्तव में आगे की बात कर रही हैं ! यह बात शेष नारायण जैसे यथास्थितिवादी की समझ के परे है ! क्रान्तिकारी सोच संघी दिमाग में गुस ही नहीं सकती. यह शेष नारायण तो ओ टी सी ट्रेंड है, शुद्ध संघी हैं .
Thumbs Up Thumbs Down
-3
Vicky G on 06 March, 2010 16:56;25
avatar
उदय राज की भाषा से साफ़ ज़ाहिर है कि वह पक्का कम्युनिस्ट है. ऐसे लोग अपनी कट्टर विचारधारा से रत्तीभर भी अलग विचार को ज़रा भी सहन नहीं कर पाते. ऐसे बंद दिमाग कम्युनिस्ट पहले तो गालियां बकते हैं और सत्ता मिल जाने के बाद विरोधियों को गोली मारने लगते हैं. यही असली वामपंथ है, बाकी तो सब लफ़्फ़ाज़ी है.
Thumbs Up Thumbs Down
2
Jeet Bhargava on 07 March, 2010 00:14;13
avatar
लो कर लो बात, उदयराज जी फरमाते हैं कि 'शेषजी ओटीसी ट्रेंड संघी हैं.' और वह यह आरोप ऐसे मढ़ रहे हैं जैसे शेषजी ने पाक अधिकृत काश्मीर में जाकर जेहाद की ट्रेनिंग ली हो! भाई उदयराज क्या ओटीसी टैनिंग लेना कोइ गुनाह है? और आपको ओटीसी के बारे में लेश मात्र भी ज्ञान होता तो ऐसी बेसिर-पैर की बाते नहीं करते. क्या शेषजी का कम्युनिस्ट नहीं होना गुनाह है? निरपेक्ष भाव से लिखना गुनाह है? लगता है इस देश में कम्युनिस्ट नेता और लेखक ही सुरक्षित रहेंगे. बाकी सब की इहलीला ये खूनी लाल क्रान्तिवाले समाप्त कर देंगे. बेहतर होता कि शेषजी ने लोकतंत्र के सामने खड़े जिस खतरे का इशारा किया है, उसे समझकर आलोचना की जाती. बाकी क्या फर्क पड़ता है कि शेषजी संघी है या कम्युनिस्ट. वैसे भी मीडिया में इतने सारे कम्युनिस्ट घुसे हुए है, ऐसे में एकाद-दो 'शेष' रह जाए और निष्पक्ष बात कर दे तो इतना बवाल क्यों?
मजे कि बात है कि ऊपर एक पाठक समर सिंह ने अपनी प्रतिक्रया में शेषजी को आगाह किया था कि: '....ध्यान रहे कल अरुंधती जैसे 'प्रगतिशील-जनवादी' बुद्धीजीवी (?) लोग आपको फासिस्ट नहीं करार दें.!!'
और उदयराज के कमेन्ट से यह आशंका सच साबित हो गयी है.
Thumbs Up Thumbs Down
2
ghakki on 07 March, 2010 00:40;43
avatar
yaron ak baat bataoo kya hum arundhti rai ko export kar sakte hai pakistan ya china kya kharch aayega??/
Thumbs Up Thumbs Down
1
सोनू on 08 March, 2010 23:00;50
avatar
उदयराजजी कहते हैं: "अरुंधती रॉय का विरोध करके धंधा चलाने वाले बहुत सारे लोग हैं"।
इस तरह पैसे कैसे कमाए जा सकते हैं? क्या कोई भामाशाह अरुंधतिजी को कोसने पर पैसे बाँटता फिरता है?

दूसरे:"अरुंधती जब लोकतंत्र का विरोध करती हैं तो वे संघी राज का समर्थन नहीं करती ! वे वास्तव में आगे की बात कर रही हैं !"
आगे कौन सी नीति दिखती है?
Thumbs Up Thumbs Down
1
एक एक्स-कम्युनिस्ट on 09 March, 2010 01:26;43
avatar
किसी ने सच कहा है कि..अगर आप युवावस्था में कम्युनिस्ट नहीं रहे तो अमानवीय होंगे, लेकिन उसके बाद भी कम्युनिस्ट रहे तो अव्वल दर्जे के मूर्ख होंगे.
अरुंधती ही नहीं कई और कम्युनिस्ट भी हैं जो अपनी मूर्खताओं का बार-बार परिचय देते हैं. और हम यानी महामूर्ख की तरह उन्हें झेल रहे हैं. सम्मान दे रहे हैं.
अस्तु..एक उम्दा लेख के लिए बधाई.
Thumbs Up Thumbs Down
1
1 2 next total: 11 | displaying: 1 - 10

Post your comment comment

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
image शेष जी शेष नारायण सिंह मूलतः इतिहास के विद्यार्थी हैं. शुरू में इतिहास के शिक्षक रहे. .बाद में पत्रकारिता की दुनिया में आये...प्रिंट, रेडियो और टेलिविज़न में काम किया. इन्होने १९२० से १९४७ तक की महात्मा गाँधी की जीवनी के उस पहलू पर काम किया है जिसमें वे एक महान कम्युनिकेटर के रूप में देखे जाते हैं..1992 से अब तक तेज़ी से बदल रहे राजनीतिक व्यवहार पर अध्ययन करने के साथ साथ विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी की. अब मुख्य रूप से लिखने पढने के काम में लगे हैं. एक अखबार में काम और विस्फोट.कॉम के सम्मानित स्तंभलेखक.
Rate this article
5.00
More from जनता दरबार
Previous
image
भारत से धंधा, पाक को चंदा
अमेरिका के राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने अपना तीन दिवसीय दौरा पूरा कर लिया. मुंबई उतरकर दिल्ली दरबार तक उनकी दस्तक भारत पर अमेरिका के मजबूत पकड़ की मिसाल बन गया. निश्चित रूप से उनका दौरा भारत के लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना खुद अमेरिका के लिए है. मंदी के दौर से जूझ रहे अमेरिका को "कारपोरेट" जगत का धंधा दिलाने के लिए उन्होंने न केवल भारत को महाशक्ति करार दे दिया बल्कि सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का समर्थन भी कर दिया....
image
मत्था टेकने की मानसिकता
वैसे तो किशनलाल की गांधी से अधिक श्रद्धा अपने कारोबार पर है और ओबामा से अधिक डर अपनी पत्नी का है. लेकिन आज न तो उनका कारोबार आड़े आया और न ही पत्नी. सुबह नौ पैंतीस पर वे राजघाट जा रहे थे. पूछने पर बोल पड़े मत्था टेकने जा रहे हैं. गांधी की समाधि के प्रति किशनलाल की इतनी अगाध श्रद्धा कि उन्होंने 'मत्था टेकने' की ऊंचाई दे दी. लेकिन वहां तो आज 10.20 पर बराक ओबामा आ रहे हैं. वहां जाने नहीं देंगे. उन्होंने कहा कि जब "वो" चले जाएंगे तब आधे घण्टे बाद राजघाट खोल देंगे उसके बाद सबसे पहले हम मत्था टेकेंगे. ...
image
'गांधीवादी' ओबामा पर भारी अमेरिकी आर्थिक लाचारी
अगर आपने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के मणिभवन यात्रा की फोटो देखी हो तो आपको उस फोटो में बराक ओबामा और पत्नी मिशेल ओबामा के चित्र में गांधी की पोती से हाथ मिलाते वक्त जो श्रद्धा दिख रही है उसमें अमेरिकी बनावट की मिलावट कहीं से नहीं है. गांधी के प्रति ओबामा की श्रद्धा किसी व्यक्ति के प्रति श्रद्धा नहीं बल्कि उस विचार के प्रति है जिसे बीसवीं सदी में अंग्रेजों से लड़ते हुए गांधी ने पुन: परिभाषित किया था. ...
image
लालू भी चाहिए नीतीश भी
बिहार के मतदाता इन दिनों अपने लिए एक बेहतर नेता चुनने में जुटे हैं. एक ऐसा नेता जो अगले पांच साल के लिए उनके अंदर छुपी बदलाव की खदबदाहट को दिशा दे सके और विकास के रास्तों के कंटक हटा सके. लोगों के सामने दो विकल्‌प है लालू या नीतीश. इस बार हो सकता है भावावेश में जनता एक को चुन ले और दूसरे को रिजेक्ट कर दें. पर जहां तक मेरी राय इनमें से किसी एक नेता से बिहार का काम चलने वाला नहीं. बिहार को दोनों चाहिए, लालू भी और नीतीश भी. आखिर क्यों ?...
image
विकास की बिसात पर कैसे हो नीतीश की मात
बिहार में चुनाव हो तो क्या मुद्दा होना चाहिए? निश्चित रूप से बिहार से बाहर रहनेवाले लोग विकास और जातिमुक्त बिहार की आदर्शवादी कल्पना पिछले कई चुनाव से बिहार के लिए मुद्दा बनाने की बातें करते रहे हैं. लेकिन साथ में यह भी जोड़ देते हैं कि बिहार चुनाव में विकास शायद ही मुद्दा बने? लेकिन इस बार यह कमाल दिखाई दे रहा है. पक्ष में हो या विपक्ष में केन्द्रीय मुद्दा विकास ही है. असल में बिहार की विपक्षी पार्टियां नीतीश को रिप्लेक्स करने के लिये तैयार ही नहीं है. लोगों को यह बात अतिशयोक्तिपूर्ण लगती है. मगर आप ही बतायें कि ”या विकास को मुद्दा बनाकर नीतीश से चुनावी समर जीता जा सकता है?...
image
गिलानी की गुगली और हिन्दुस्तान की गफलत
अभी-अभी हुर्रियत कांफ्रेंस के गरमपंथी धड़े के नेता सैयद अली शाह गिलानी अपने विस्फोटक सेमीनार के जरिए दिल्ली और देश में अच्छा-खासा आक्रोश और विवाद पैदा करके गए हैं। अपने अलगाववादी नजरिए पर टस से मस न होने के लिए कुख्यात गिलानी ने दिल्ली में हुए इस कार्यक्रम में न सिर्फ कश्मीर की ‘आजादी‘ की पारंपरिक मांग दोहराईं बल्कि एक कदम आगे बढ़कर ‘स्वतंत्र कश्मीर‘ बनने के बाद की ‘नीतियों‘ का खाका भी पेश कर गए। ‘कश्मीर की आजादी ही एकमात्र विकल्प‘ नामक विषय के इर्द-गिर्द केंद्रित सेमीनार में उन्होंने देशद्रोह के दायरे में आने वाली दर्जनों टिप्पणियां कीं और ‘अभिव्यक्ति की आजादी‘ का फायदा उठाकर आराम से कश्मीर की ओर निकल लिए।...
image
कांग्रेस का दाना, नीतीश की ना-ना
बिहार में चुनाव के दो चरण बीत चुका है. नक्सालियों के दखल के अलावा कहीं कोई खलल नहीं है. जनता भी निश्चिंत है और नेता भी. जैसा किसी पूर्व निर्धारित पटकथा पर सारे किरदार अपनी भूमिका निभाने में जुटे हों. नेशनल न्यूज चैनलों ने सर्वे जारी कर जरूर थोड़ी सी गहमा-गहमी क्रियेट की है मगर लोकल मीडिया में कहीं कोई सनसनी नहीं है....
image
विकीलीक्स ने फिर साबित किया अमेरिका को हत्यारा
इराक में अमेरिकी सेना ने अपने आपरेशन के दौरान ना सिर्फ निर्दोष नागरिकों की हत्या की बल्कि युद्ध की कवरेज कर रहे पत्रकारों को भी मौत के घात उतार दिया। विकिलिक्स ने अमेरिका में इराकी आपरेशन को लेकर पेंटागन के जो डाटाबेस और रिकार्ड जारी किये हैं उनमे अमरीकी सेना के अपाची हेलीकाप्टर्स (क्रेजी हार्स 18) जो कि टेक्सास स्थित यु एस आर्मी के २२७ रेजिमेंट के फर्स्ट बटालियन का हिस्सा है के बारे में चौका देने वाले खुलासे किये हैं। विकिलीक्स द्वारा जारी किये गए एक वीडियो में अमेरिकी जवानों को सिर्फ खबरिया एजेंसी रायटर के दो जांबाज पत्रकारों की गलत सूचना देकर हत्या किये जाने बल्कि उनकी मौत पर ठहाके भी लगाये देखा जा सकता है।...
image
बिहार चुनाव में चौराहे पर खड़ा मुसलमान
बिहार चुनाव में पसमांदा मुसलमान एक बार फिर चौराहे पर खड़े हैं। पसमांदा मुसलमानों में किसी पार्टी या गठबंधन को लेकर कोई उत्साह नहीं हैं। ज़्यादातर पसमांदा वोटर ख़ामोश हैं। कभी पसमांदा आंदोलन के अगुआ रहे लोग इस चुनाव में आश्चर्यजनक रूप से निषक्रिय हैं। कई पार्टियों की तरफ़ से बुलावा आने को बावजूद उन्होंने पार्टियों के दफ़्तर जाना या नेताओं से मिलना तक मुनासिब नहीं समझा। वजह साफ है पसमांदा मुसलमान तमाम पार्टियों की वादा ख़िलाफी से ऊब चुके हैं।...
image
पपेट प्रधानमंत्री का एक और पापकर्म
देश में एक वर्ग विशेष को तुष्ट करने के लिए सरकार कहां तक गिर सकती है उसका हालिया उदाहरण है शत्रु संपत्ति विधेयक-2010 का विरोध करना फिर उसमें मुस्लिम नेताओं के मनमाफिक संसोधन को केन्द्रीय कैबिनेट द्वारा स्वीकृति देना। कठपुतली (पपेट) प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में बुधवार को केंद्रीय कैबिनेट की बैठक आयोजित की गई थी। इसमें इसी बैठक में केंद्रीय गृह मंत्रालय के प्रस्ताव पर शत्रु संपत्ति (संसोधन एवं विधिमान्यकरण) विधेयक-2010 में संसोधन को स्वीकृति प्रदान की गई।...
image
चुनाव आयोग के सामने बिहार चुनाव की चुनौती
पिछले विधानसभा में स्वतंत्र और भयमुक्त चुनाव होने का असर राजनैतिक दलों और नेताओं पर साफ देखने को मिल रहा है। चुनाव आयोग की सख्ती का साफ असर इस बार भी नेताओं और पार्टियों कार्यालयों में देखा जा रहा है। विभिन्न पार्टियों के नेता काफी चौकस है कि इस दौरान किसी भी सूरत में चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन नहीं हो। मुख्यमंत्री आवास एक अणे मार्ग में नीतीश कुमार से मुलाकात करने जा रहे नेता भी वहां किसी तामझाम के पहुंच रहे हैं। लालू प्रसाद यादव भी अपने नेताओं को यह समझाया कि सभी सरकार आवास पर नहीं, पार्टी कार्यालय में मिले।...
image
दशहरा रैली का दम
शिवाजी पार्क शिवसेना और शिवसेनाप्रमुख के बीच दशकों पुराना अटूट संबंध है. शिवेसना की पहली जनसभा 19 जून 1966 को इसी शिवाजी पार्क में हुई थी. तत्कालीन राजनीतिक विश्लेषकों का मत था कि 1960 और 1966 के बीच व्यंगचित्र साप्ताहिक मार्मिक के माध्यम से ठाकरे परिवार ने स्थानीय लोकाधिकार के लिए जो अलख जगाया था, उससे उपजे राजनीतिक विचार से जन्मी शिवेसना की पहली जनसभा में अधिकतम दस हजार स्रोता जमा होंगे....
image
जांच होगी पर आंच किसी को नहीं आयेगी
कामनवेल्थ खेलों के समापन के अगले दिन ही खेलों की तैयारियों में हुई हेराफेरी की जांच का आदेश देकर केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर संभावित राजनीतिक पैंतरेबाजी पर लगाम लगा दिया है लेकिन इस जांच की गंभीरता पर सवाल किये जाने लगे हैं. दिल्ली में सत्ता के गलियारों में सक्रिय ज़्यादातर लोग इस खेल में शामिल थे. पूना वाले बुड्ढे नौजवान ने मामला इस तरह से डिजाइन किया था कि दिल्ली के सभी अमीर उमरा ७० हज़ार करोड़ रूपये की लूट में थोडा बहुत हिस्सा पा जाएँ....
image
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों का आतंक
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव चल रहे हैं. इन चुनावों को नजदीक से देखने और जानने की जरूरत है. दो चरण पूरे हो चुके हैं। तीसरा और अन्तिम चरण 20 अक्टूबर को पूरा हो जाएगा. जब उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव की अधिसूचना जारी हुई तो मेरठ के एक पॉश इलाके में बसपा कार्यालय पर बसपा के समर्थन से चुनाव लड़ने वाले इच्छुक लोगों की भीड़ लगी थी। महंगी लग्जरी गाड़ियों का रैला था। गाड़ियों में सवार हष्टपुष्ट आदमी थे। कुर्ता-पायजामा की जगह झक सफेद पेंट-शर्ट के साथ सफेद जूते में दिखनेवाले नेता हमें माफियाओं के आस पास होने का आभास दे रहे थे. उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों का आंतक के शुरूआत की घोषणा हो चुकी थी. ...
image
विपक्ष का कार्य सरकार गिराना ही नही है
दक्षिणी दुर्ग में बनी भाजपा की पहली सरकार गहरे संकट में है। मुख्यमंत्री येदियुरप्पा शुरु से ही सकटों से घिरे रहे है। यह संकट बाहरी कम अंदरुनी ज्यादा रहे है। कुछ समय पहले बंगलौर निकाय चुनावों में भी भाजपा को जोरदार सफलता मिली थी। ईसाई समुदाय को छोड़कर किसी और वर्ग को भाजपा सरकार से कोई खास नराजगी नही रही है। चर्च का एक हिस्सा पिछले कुछ समय से राज्य में युदियुरप्पा सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग करता रहा है इसके लिए यह वर्ग राज्यपाल हंसराज भारद्वाज को कई ज्ञापन भी दे चुका है।...
image
यह उमर और ऐसी गलती?
यह राजनीतिक पूतों के पांव हैं जो पालने में दिख रहे हैं. पहले राहुल गांधी का बयान और अब उमर अब्दुल्ला की गलती. जम्मू कश्मीर विधानसभा में बोलते हुए उन्होंने कश्मीर के भारत में विलय को ही अधूरा बता दिया. देशभर में विरोध हुआ लेकिन राहुल गांधी ने चुप रहने में भलाई नहीं समझी, उमर की तारीफ करने मैदान में कूद पड़े. कश्मीर इनके पुरखों की विरासत है, लेकिन पुरखों की इस विरासत से कैसा खिलवाड़ कर रहे हैं ये दो नौजवान? शेष नारायण सिंह का विश्लेषण-...
image
बिहार चुनाव में बच्चों के लिए नदारद है नारा
बिहार के विधानसभा की घमाचान में हर पार्टी के झोले के भीतर से एक-एक करके हर एक के लिए मुद्दे ही मुद्दे और नारे ही नारे बाहर आ रहे हैं. मगर बच्चों के लिए इस बार भी कोई मुद्दा और नारा नहीं गूंज रहा है. ऐसे में क्राई ने बच्चों के मुद्दों को सूचीबद्ध करते हुए सभी राजनैतिक दलों से बच्चों के अधिकारों को वरीयता देने के लिए संवाद का सिलसिला शुरू किया है. इसके तहत बाल अधिकारों का एक घोषणा-पत्र तैयार किया जा चुका है और अब बच्चों के मामले में राजनैतिक दलों पर जल्द से जल्द अपना-अपना रूख स्पष्ट करने के लिए दबाव बनाना तय हुआ है....
Next
Tags
No tags for this article
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम में प्रकाशित सामग्री पर हमारी ओर से कोई कापीराइट नहीं है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2