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पूरा हुआ आधी आबादी का आधा सफर

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इतिहास नहीं बना, दोहरा इतिहास बनाया गया। चौदह साल में सरकारें आईं-गईं पर महिला बिल ढाई कोस भी नहीं चला लेकिन अबके संसद ने दोहरा इतिहास रचा। महज दो दिन में आधी आबादी का आधा सफर तय हो गया। पर मंजिल अभी आसान नहीं। राज्यसभा ने प्रचंड बहुमत के साथ संविधान के 108वें संशोधन को मंजूरी दे दी। पक्ष में 186 वोट पड़े, तो विरोध में महज एक, पर बिल के पैरोकार हों या विरोधी, राजनीतिक खुशी की लहर सबमें दौड़ी।

नेताओं के बीच अब जनता के बीच जाकर श्रेय लेने की होड़ मचेगी। शुरुआत तो राज्यसभा से ही हो गई। जब खुद पीएम ने कहा- 'आगाज को कोई पूछता नहीं, गर अंजाम अ'छा हो।' यानी इशारा साफ, बिल को अंजाम तक कांग्रेस ने पहुंचाया। पर सब-कुछ लुटा के होश में आए, तो क्या आए। सोमवार को मौका था। पर सरकार ने कदम पीछे खींच लिए। पीएम-प्रणव को सरकार की फिक्र थी। तो सोनिया गांधी को बिल की। फिर भी प्रणव दा ने खूब दलीलें दीं। बीजेपी-लेफ्ट के राजनीतिक पैंतरे को समझाने की कोशिश की। वित्त विधेयक पर लटकी तलवार का हौवा दिखाया। पेट्रोल-डीजल की बढ़ी कीमतों पर विपक्षी एकजुटता की दुहाई दी। पर सोनिया ने किसी बात की परवाह नहीं की। अलबत्ता बिल पास कराने का फरमान दे दिया। सो कांग्रेसी रणनीतिकारों को सारी रणनीति बदलनी पड़ी। आखिर में वही फार्मूला रास आया, जो सोमवार को अरुण जेतली ने सुझाया था। यानी बवाली सांसदों को बाहर करो, फिर बहस कर बिल पारित। पर रणनीतिकार जोर-जबरदस्ती के खिलाफ थे, सो सोमवार को सिर्फ बलवा हुआ। सोनिया की दो-टूक हिदायत आ गई तो मंगलवार को राज्यसभा ने दोहरा इतिहास रच दिया।

बवाली सात सांसद बेधड़क निलंबित किए। पूरी प्रक्रिया के साथ बिल पास भी हो गया। पर निलंबित सात सांसदों ने भी कसर नहीं छोड़ी। मुलायमवादी कमाल अख्तर, वीरपाल यादव, नंदकिशोर यादव, आमिर आलम खान, लालूवादी सुभाष यादव, पासवानवादी साबिर अली और जदयू के निलंबित एजाज अली। सातों निलंबन के खिलाफ वैल में ही बैठ गए। फिर सदन की कार्यवाही दो बजे ठप हुई पर तीन बजे सरकार पुख्ता बंदोबस्त के साथ आई। पहले तो कोशिश हुई, बिन बहस हंगामे में ही बिल पारित हो जाए। ताकि जोर-जबरदस्ती न करनी पड़े। पर बीजेपी के रणनीतिकार अरुण जेतली पहले ही पासा फेंक चुके थे, सो बहस पर जोर दिया तो आखिरकार मार्शल बुलाने पड़े। धड़ाधड़ सदन में 50-60 मार्शल घुस गए। धरने पर बैठे निलंबित सांसदों को जबरन उठाना शुरू कर दिया। छह सांसद तो मार्शलों ने बाहर कर दिए पर कमाल अख्तर को बाहर करने में पसीने छूट गए। कमाल ने खूब कमाल दिखाया, वैल से सीधे पहली पंक्ति की बीच वाली सीट पर पहुंच गए। फिर कमाल ने पीने को पानी मांगा तो मार्शल ने कांच के गिलास में पानी दिया। बस फिर क्या था, इधर कमाल के गले से नीचे पानी उतरा। उधर गिलास टेबल पर दे मारा। हिंसक होने की कोशिश की तो मार्शलों के पास बल प्रयोग के सिवा कोई चारा नहीं बचा। पहली बार राज्यसभा में मार्शल का इस्तेमाल हुआ ताकि महिला बिल के विरोधी पुरुष सांसदों को बाहर किया जा सके।

अब बिल तो पास हो गया। पर बीजेपी की रणनीति में सरकार फंस गई। विरोधियों की मांग बिल में पिछड़ी-मुस्लिम महिलाओं का कोटा फिक्स कराने की थी। मुलायम हों या लालू, इन्हीं में अपना खोया आधार लौटाने की कोशिश कर रहे। सो जबरन बाहर निकाले गए सांसदों ने यही कहा, देखो, मुस्लिमों को बाहर कर दिया। बीजेपी यही चाहती थी। ताकि कांग्रेस की अल्पसंख्यक राजनीति पर चोट हो। तभी तो जितने खुश बिल के समर्थक हैं, उतने ही विरोधी भी। प्रणव दा यही तो समझाने की कोशिश कर रहे थे। कैसे लालू-मुलायम फिर 'माई' समीकरण की धार तेज करेंगे। पर सोनिया ने ठान ली, इतिहास रचना है। सो बिल पास होने के बाद उन ने दो-टूक कहा- 'जब भी कोई क्रांतिकारी कदम उठता है, तो विरोध होता ही है। सो जैसे हमने पहले जोखिम लिए, अबके भी लिया।' अब भले सोनिया गांधी ने जोखिम लिया। पर सदन की मर्यादा तो तार-तार हो गई। रणनीतिकार समझ ही नहीं पाए, कब-क्या कदम उठाना। सो पराए तो अपने हो गए, अपनों ने दगा दिया। ममता बनर्जी को पीएम ने सर्वदलीय मीटिंग का भरोसा दिलाया था। पर सोनिया की हिदायत पर ऐसी हड़बड़ी दिखाई कि ममता को पूछना भूल गए।

कांग्रेस ने लेफ्ट-बीजेपी को साथ लेकर हल्ला बोल दिया तो ममता ने आंखें तरेर लीं। सपा-राजद ने तो बिल का विरोध किया ही। महिला बिल का विरोध दो ऐसी पार्टियों ने किया, जिनकी कर्ताधर्ता खुद महिला। यानी ममता और मायावती। ममता की दलील में भी दम। एक तो पूछा नहीं, दूसरा मार्शल के इस्तेमाल पर। ममतावादी दिनेश-सुदीप ने कह दिया- 'आज यहां हुआ, कल बंगाल में आवाज बुलंद करने वाले विरोधियों को ऐसे बाहर फेंकना शुरू कर दें। तो लोकतंत्र का क्या होगा।' पर बीजेपी को देखिए, मार्शल के इस्तेममाल पर कितनी खुश। शायद भूल गई, जब दिसंबर 2005 में घूसखोर सवाली सांसद बर्खास्त हुए। तो आडवाणी ने बहुमत के आधार पर सांसद बर्खास्त करने को अनुचित ठहराया था। पर पुरानी बात छोड़ो। अब राज्यसभा में यह हाल, तो लोकसभा में क्या होगा। लोकसभा में तो हुड़दंगी बिना बिल ही हुड़दंग कर रहे। सो राज्यसभा में वृन्दा कारत और माया सिंह ने शक जाहिर किया। कहीं ऐसा तो नहीं, राज्यसभा से तो पास करा लिया। लोकसभा में टाल दें। वैसे भी राज्यसभा में सोमवार नहीं, मंगल को पास बिल मांगलिक तो हो ही गया।

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image संतोष कुमार मीडिया में माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय से मास्टर डिग्री. अमर उजाला, यूनिवार्ता और नवज्योति का कार्य अनुभव. दिल्ली में रहकर दिल्ली की रिपोर्टिंग और नवज्योति में नियमित इंडिया गेट कालम का लेखन. पत्रकार के साथ साथ समालोचक. विस्फोट के लिए विशेष लेखन.
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