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लोहियावाद के हत्यारे

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लालू ,मुलायम सरीखे धुरंधरों ने खुद को लोहियावादी बताते हुए लोकतंत्र की छाती पर अपने मड़हे ताने ,उन मडहों में अपने भाई, भतीजों सालों, बीबियों और बच्चों का भरा पूरा कुनबा बसाया और खुद सिंहासन पर जा बैठे। भारत के इतिहास में किसी व्यक्ति के नाम को भुनाने का ये अब तक का सबसे बड़ा उदहारण था, देश में जितनी राजनीति लोहिया का नाम लेकर की गयी उतनी राजनीति न तो गाँधी और न ही इंदिरा गाँधी का नाम लेकर की गयी, मगर अफ़सोस लोहिया का नाम लेकर राजनीति करने वालों ने उनकी विचारधारा की बार बार गण हत्या की और कुर्सियों के अंकगणित के लिए देश के सबसे उपजाऊ हिस्से में कुकुर भिडंत शुरू करा दी।

इधर बीच संसद के भीतर और बाहर महिला आरक्षण को लेकर लालू ,मुलायम और उनके समर्थकों द्वारा जो हो हल्ला किया जा रहा है वो सिर्फ एक शोर नहीं है वो डॉ लोहिया के विचारधाराओं की निरंतर हो रही हत्याओं की  श्रृंखला का एक हिस्सा है। महिला आरक्षण को लेकर लालू और मुलायम का नजरिया प्रमाणित करता है कि इन दोनों नेताओं के पास बिरादरियों की गैरबराबरी ही वोट पाने का एकमात्र और अंतिम विकल्प है ,एक ऐसे देश में जहाँ संसाधनों पर सवर्णों के एकाधिकार, नेताओं की धूर्तता और नौकरशाहों की शोषक प्रवृति ने दलितों को पिछड़ों को आरक्षण के वास्तविक लाभ से हमेशा वंचित रखा, उस देश में महिला आरक्षण के परिप्रेक्ष्य में भाजपा और कोंग्रेस के शिखंडीपने से ज्यादा खतरनाक लालू मुलायम की अवसरवादिता है, लालू और मुलायम देश में एक तरह के नाजीवाद को जन्म देने के आरोपी हैं, और आने वाले दिनों में इन्हें लोहिया की विचारधारा के पोषक के रूप में नहीं  के लिए नहीं बल्कि व्यक्तिगत हितों के लिए  सहमति और समझौते करने वाले के रूप में जाना जायेगा।

डॉ लोहिया आरक्षण को विशेष अवसर का सिद्धांत मानते थे। वो अगर आज जीवित होते तो महिलाओं के लिए ३३ फीसदी नहीं ५० फीसदी आरक्षण की मांग करते। वो साठ सैकड़ा के सिद्धांत पर विश्वास रखते थे। उनके लिए आरक्षण दिए जाने का पैमाना सिर्फ जाति या लिंग नहीं था। वो चाहते थे कि रंग, वर्ण और अमीरी गरीबी सभी के आधार पर आरक्षण हो। डॉ लोहिया का मानना था कि महिलाओं को पूरे ५० फीसदी आरक्षण दिया जाना चाहिए और बाकी सबकी १० फीसदी हिस्सेदारी होनी चाहिए। पुराने सोशलिस्ट अभी भी शायद डॉ लोहिया के साठ सैकड़े के सिद्धांत को नहीं भूले हों ,लोहिया की  विचाधारा को अपना राजनैतिक धरम मानने वालों  की आखिरी पीढ़ी में शामिल स्वर्गीय जनेश्वर मिश्र से जब हमने एक बार पूछा कि आप लोग महिला आरक्षण का विरोध क्यूँ करते हैं  तो उनका कहना था" मै व्यक्तिगत तौर पर महिलाओं को अधिकाधिक आरक्षण दिए जाने का समर्थक हूँ परन्तु इस बात का भी अध्ययन भी करना होगा कि कहीं ये आरक्षण  आगे चलकर एक और तरह के सामाजिक विभेद को तो नहीं पैदा करेगा? छोटे लोहिया का ये कहना बिलकुल सही था इस पर चिंतन किया भी जाना चाहिए  था। लेकिन अफ़सोस  लालू और मुलायम ने इस  मामले में अपनी उस अंकगणितीय सोच का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया जिसके इस्तेमाल से वो दोनों उत्तर प्रदेश और बिहार का बंटाधार कर चुके थे,उनका साठ सैकड़ा लोहिया के साठ सैकड़े से पूरी तरह भिन्न और समाज में गैरबराबरी को बढ़ावा देने वाला था।

डॉ लोहिया की दृष्टि आरक्षण को लेकर बिलकुल साफ़ थी उसमे किसी प्रकार का संशय नहीं होना चाहिए। उनका मानना था कि देश में वंचित तबकों को जिनमे महिलायें भी शामिल हैं आरक्षण का लाभ तब तक दिया जाना चाहिए जब तक पूरी तरह से गैरबराबरी को ख़त्म न कर दिया जाए ,लेकिन निश्चित तौर पर अगर दीर्घकाल तक आरक्षण को समाज का हिस्सा बनाये रखा गया तो इसके गंभीर परिणाम सामने आयेंगे। लेकिन ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि लालू और मुलायम ही नहीं बल्कि सभी राजनैतिक दलों ने जिनके लिए  सत्ता ही सब कुछ  है आरक्षण उनकी अपनी राजनीति का एक अनिवार्य हिस्सा बन गया। जहाँ तक लालू और मुलायम का प्रश्न है  आरक्षण को विशेष अवसर का सिद्धांत कहना भी पाप समझते हैं। एक सच ये भी है कि मौजूदा समय में आरक्षण चाहे वो पूरे समाज के लिए  हो महिलाओं के लिए हो या फिर पुरुषों के लिए हो निस्संदेह बेहद जरुरत है और ये भी सच है आने वाले १५-२०  वर्षों से पूर्व शायद ही बराबरी के बारे में सोचा जा सके ,लेकिन एक सच ये भी तो है कि मौजूदा राजनीति ने आरक्षण को सफल बनाने के लिए जरुरी तकनीक पर बिलकुल भी काम नहीं किया गया ,जहाँ शिक्षा ,रोजगार ,चिकित्सा ,भोजन आवास  जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए बनाये गए ढाँचे में आधारभूत कमियां हों वहां आरक्षण का लाभ किसको दिया जा सकेगा और कहाँ तक दिया जा सकेगा ?डॉ लोहिया जाति की घृणा पर आधारित आरक्षण के सख्त विरोधी थे उनका साफ़ तौर पर कहाँ था कि गरीब सवर्ण और गरीब दलित दोनों एक दूसरे को मिल कर ऊपर उठायें,लेकिन उनके बाद के लोगों ने लोहिया की इस विचारधारा को एक सिरे से ताक पर रख दिया और एकपक्षीय होने से जुड़े लाभ के लालच को नहीं छोड़ पाए।

डॉ लोहिया देश की महिलाओं की दुश्वारियों से पूरी तरह से वाकिफ थे, और वे उन दुश्वारियों के व्यवहारिक निस्तारण में ज्यादा विश्वास करते थे अगर वो जीवित होते तो शायद आरक्षण से पहले पूरे देश में महिलाओं के लिए सुलभ पखाने और धुंआ रहित चूल्हे की व्यवस्था सुनिश्चित करते। वे महिलाओं के दर्द की ईमानदार समझ रखने वाले देश के एकमात्र नेता थे न तो उनके पहले न ही उनके बाद राजनैतिक तौर पर किसी ने भी उस हद तक इमानदार स्त्री विमर्श किया |पिछड़े को विशेष अवसर तथा नर नारी समता का लोहिया का नारा दूरगामी सोच का प्रतीक था। भारत की तीन चौथाई आबादी को समाज में शिक्षा व व्यवसाय का अधिकार नहीं था। वह केवल मेहनत मजदूरी ही कर सकती थी इसमें महिलायें भी शामिल थी जिन्हें समाज में समान अधिकार प्राप्त नहीं था। डॉ.लोहिया ने पिछड़ा पावे सौ मे साठ का नारा देकर देश की संपूर्ण आबादी को योग्य व सक्षम बनाने की दिशा में प्रयास किया । डॉ लोहिया ने तो ग्वालियर की महारानी के समक्ष हरिजन महिला सुखो रानी को चुनाव मैदान में उतार दिया था क्या लालू और मुलायम से ये उम्मीद की जा सकती है कि वो अपनी पत्नी और बहु की जगह किसी बेहद गरीब और उपेक्षित महिला को टिकट देंगे? शायद नहीं ,क्यूंकि ये पिटना स्वीकार नहीं कर सकते। लोहियावादी वह जो पिटना जाने, हारना जाने, लेकिन लालू और मुलायम अब सिर्फ जीतना जानते हैं। उनकी राजनीति का एकमात्र उद्देश्य अपने खानदान को एक सशक्त राजनैतिक विरासत देना है। आरक्षण का समर्थन या विरोध  भी इन दोनों नेताओं के व्यक्तिगत हितों से जुड़ा हुआ मामला  है।

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Madhukar Panday on 13 March, 2010 16:37;20
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आवेश जी आप की बातों से कोई भी सदबुद्धि वाला व्यक्ति सहमत हुए बिना नहीं रह सकता......जिस देश की जनसँख्या का लगभग ५० % हिस्सा देश की मुख्य धारा से अलग हो वहां देश की शक्ति भी ५०% से ज्यादा कम रहेगी.......इन नेताओं को अपने दिन समाप्त होते दिख रहे हैं इसी लिए बिना मतलब का बवाल मचाये घूम रहे हैं.........इनके लिए स्त्री केवल एक भोग्या है,
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शहरोज़ on 13 March, 2010 16:57;40
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राम मनोहर लोहिया की सभी बातों से सहमती अनिवार्य नहीं .यही नजरिया मेरा सम्पूर्ण क्रांती के जनक माने जाने वाले लोक नायक जे पी के लिए है.
आवेश भाई मैं महज़ यही कहना चाहता हूँ , जो लोहिया का कहना था.
उनका मानना था कि जब तक सामाजिक नजरिया नहीं बदलेगा घर और रसोई के बंधन से नारी मुक्त नहीं हो सकती संवैधानिक अलाप ढोंग , व्यर्थ है!!

और हाँ एक बात और:

उनका नारी का आदर्श या प्रतिमान सीता की बजाय द्रौपदी है, जो महाभारत भी करवा सकती है.
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Jabbar Patel on 14 March, 2010 00:40;25
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Now a days Socialist become a big joke..!!
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image awesh tiwari मेरे लिए खबरें सिर्फ सूचनाओं को कलमबंद करने का जरिया नहीं है ,ये जरुरी है कि जिनके लिए भी हम खबरें लिख रहे हैं उनको उन ख़बरों से कुछ मिले |पिछले एक दशक से उत्तर भारत के सोन-बिहार -झारखण्ड क्षेत्र में आदिवासी किसानों की बुनियादी समस्याओं ,नक्सलवाद ,विस्थापन ,प्रदूषण और असंतुलित औद्योगीकरण को लेकर की गयी अब तक की रिपोर्टिंग में हमने अपने इस सिद्धांत को जीने की कोशिश की है | विगत २ वर्षों से लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित 'डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट ' में ब्यूरो प्रमुख। awesh29@gmail.com
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