रामदेव के नटवरलाल!
1 of 1
बाबा रामदेव आजकल अपनी बातचीत में विश्व बैंक से लेकर मुद्रा कोष तक का हवाला देते हुए काला धन वापस लाने और देश का जीडीपी बढ़ा देने की वकालत करते हैं. उनका तर्क है कि ऐसा तभी हो सकता है जब राजनीति में व्यवस्था परिवर्तन हो. बाबा रामदेव के इन वक्तव्यों और भाषणों के मूल प्रेरणास्रोत का नाम है राजीव दीक्षित. राजीव दीक्षित ही वो व्यक्ति हैं जो बाबा रामदेव को राजनीति का पाठ पढ़ा रहे हैं. लेकिन खुद राजीव दीक्षित का अपना इतिहास क्या है?
बाबा रामदेव से राजीव दीक्षित की पहली मुलाकात फरवरी 2004 में हुई. कोशिश बाबा रामदेव ने ही की क्योंकि देश में आर्थिक गुलामी पर राजीव दीक्षित के भाषणों से संभवत: वे प्रभावित थे और चाहते थे कि उनके योग शिविरों में आजादी बचाओ आंदोलन का साहित्य रखा जाए. महाराष्ट्र में हुई मुलाकात के बाद यह सिलसिला शुरू भी हो गया लेकिन यह लंबा चला नहीं. बाबा रामदेव पर आंदोलन के कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाना शुरू कर दिया कि वे आंदोलन के साहित्य का अपने नाम से उपयोग कर रहे हैं. उधर बाबा रामदेव के मैनेजमेन्ट को यह भी शिकायत हो रही थी कि पुस्तकों और अन्य सामग्री की बिक्री से जो कमीशन उन्हें मिलना चाहिए वह मिल नहीं रहा है. इसलिए दिसंबर आते आते आंदोलन और बाबा के बीच हुआ समझौता खत्म हो गया. लेकिन इसके बाद भी राजीव दीक्षित बाबा रामदेव के संपर्क में बने रहे. 2005 में राजीव दीक्षित ने फिर बाबा से मुलाकात की और देश में व्यवस्था परिवर्तन की पहल शुरू की. तीन साल तक राजीव दीक्षित नेपथ्य में रहकर बाबा रामदेव का साथ देते रहे. तीन साल बाद 2008 में राजीव दीक्षित खुलकर बाबा रामदेव के प्रिय प्रचारक हो गये और उनके मंचों से भी बोलना शुरू कर दिया. अब राजीव दीक्षित आजादी बचाओ आंदोलन नहीं बल्कि बाबा रामदेव के साथ थे. इसी के साथ भारत स्वाभिमान आंदोलन का जन्म भी हुआ जो कि बाबा रामदेव का राजनीतिक कर्म था.
लेकिन इस मेल मिलाप का आंदोलन के कार्यकर्ताओं ने विरोध शुरू किया. उनका तर्क था कि राजीव दीक्षित ने उनके साथ धोखा किया है इसलिए बाबा रामदेव उन्हें अपने साथ न लें. अब सवाल लाजिम है कि समाजकर्म में लगे इन लोगों को स्वामी रामदेव से शिकायत क्या है? आखिर क्यों ये लोग स्वामी रामदेव को शक की निगाह से देखने लगे हैं? तो इसका उत्तर यह है कि रामदेव इन दिनों एक ऐसी खोखली शख्सियत को साफ-पाक बताते और उसे महापुरुष बनाते दिख रहे हैं जिसकी छवि समाजकर्म के क्षेत्र में महाठग नटवरलाल की सी बनने लगी है। वह हैं--राजीव दीक्षित। दो शब्दों का यह नाम हिंदी भाषी इलाकों के लिए भले ही ज्यादा जाना-पहचाना न हो, पर महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, राजस्थान और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में यह किसी सेलीब्रिटी से कम नहीं रहा है। राजीव दीक्षित के लिए यह छोटी उम्र में बड़ी उपलब्धि ही कही जाएगी कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लूट, डब्ल्यूटीओ, विश्वबैंक-मुद्राकोष, भारतीयता, स्वेदशी-स्वावलंबन जैसे गंभीर और नीरस से विषयों पर भी उनके भाषण भारी भीड़ जुटाऊ होते रहे हैं। यहीं पर यह भी बताते चलें कि राजीव दीक्षित अंतरराष्ट्रीय गणित परिषद के पूर्व अध्यक्ष और जाने-माने गांधीवादी प्रो. बनवारीलाल शर्मा की दर्जन भर लोगों की उस टीम के शुरुआती सदस्य रहे हैं जिसने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के एक विभाग ‘गांधी भवन’ में वैश्वीकरण का पूर्वाभास करते हुए सन्-88-89 में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुद्दे पर शोध और जन अभियान की बुनियाद रखी। तब राजीव इलाहाबाद विश्वविद्यालय के जे.के. इंस्ट्टीट्यूट से बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे, पर धीरे-धीरे उन्होंने समाजकर्म को ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया और पूरी तरह बहुराष्ट्रीय कंपनियां विरोधी आंदोलन को समर्पित हो गए। वक्ता वे अच्छे थे। सो, आंदोलन का विस्तार होना शुरू हुआ तो स्वाभाविक रूप से सभाओं-गोष्ठियों को संबोधित करने की खास जिम्मेदारी उनके हिस्से ही आई। देश के जिन-जिन हिस्सों में वे गए उनको मनोयोग से सुना गया। स्वामी रामदेव तो खैर उनसे इस कदर प्रभावित रहे कि उन्हें प्रायः अपने योग शिविरों में भाषण देने के लिए बुलाते ही रहे हैं। गुजरात, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में उनकी बढ़ती लोकप्रियता का आलम यह रहा कि उन्हें ‘राष्ट्रबंधु राजीव दीक्षित’ कहा जाने लगा। इन राज्यों के कुछ अखबारों ने तो उनके भाषणों को धारावाहिक तौर पर भी छापा।
ऐसे में सवाल यह है कि आजादी बचाओ आंदोलन के जो सैकड़ों कार्यकर्ता राजीव दीक्षित में क्रांतिकारी नेतृत्व की छवियां देख रहे थे, अचानक ऐसा क्या हुआ कि उन्हें उनमें महाठग नटवरलाल का अक्स दिखाई देने लगा? इस संदर्भ में आंदोलन के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से बातचीत में जो जानकारियां और दस्तावेज सामने आए हैं उनका लब्बोलुआब यह है कि राजीव दीक्षित ने अपनी वक्तृत्व कला का इस्तेमाल राष्ट्रनिर्माण के बजाय भावनाशील लोगों को अपने जाल में फंसाकर देशसेवा के नाम पर अपनी निजी संपत्ति खड़ी करने में की। आनन-फानन में सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए उन्होंने अपने भाषणों में अपनी शिक्षा और योग्यता के बारे में झूठ बोला। उन्होंने प्रचारित यही किया कि वे एक वैज्ञानिक के तौर पर सीएसआईआर में काम कर चुके हैं और आईआईटी डिग्रीधारी हैं। जबकि, यह पूरी तरह मिथ्या है। इतिहासकार धर्मपाल के जुटाए गए भारतीय इतिहास संबंधी लगभग 56 हजार दस्तावेजों को प्रायः वे खुद का जुटाया हुआ बताते रहे। बल्कि, धर्मपाल की अनुमति लिए बिना उनकी अनुपस्थिति में चोरी-छिपे उनके बहुमूल्य दस्तावेजों को रातोंरात दीक्षित बंधुओं ने फोटोकॉपी करा कर अपने पास रख लिया। इसके अलावा भाषणों के दौरान अपना प्रभाव जमाने के लिए देश के अन्यान्य हिस्सों में विभिन्न संगठनों द्वारा किए गए रचनात्मक कामों को भी वे प्रायः खुद की प्रेरणा से किया गया बताते रहे हैं। उनके भाषणों में जगह-जगह बोले गए झूठ की तो एक लंबी सूची ही उनके खिलाफ मोर्चा खोल चुके कार्यकर्ताओं ने बना डाली है। इन्हें झुठलाया इसलिए नहीं जा सकता, क्योंकि यह सब राजीव दीक्षित की आवाज में ही उनकी कैसेटों और सीडियों में मौजूद है।
कार्यकर्ताओं का आरोप है कि आमजन की देशप्रेम की भावनाओं का फायदा उठाकर समाजसेवा को धंधा बनाने का काम राजीव दीक्षित और प्रदीप दीक्षित दोनों भाइयों ने किया। इन दोनों भाइयों ने करोड़ों की संपत्ति खड़ी की और उसे छिपाए रखने के लिए कार्यकर्ताओं से बार-बार झूठ बोला। असल में दीक्षित बंधुओं पर संदेह की हल्की-फुल्की रेखाएं खिंचनी तब शुरू हुईं जबकि उन्होंने सेवाग्राम जैसी सस्ती जगह में अनुमानतः लगभग 40 से 50 लाख रुपये (20 लाख राजीव दीक्षित के अनुसार) की लागत का महल जैसा दोमंजिला निजी मकान बनवाया। जब कुछ कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाए कि गांधीजी की झोपड़ी वाली जीवनशैली की वकालत करने वाले व्यक्ति को क्या महलनुमा मकान बनवाना चाहिए, तो दीक्षित बंधुओं ने इसे मां-पिता के पैसे बनवाया गया बताया और उसमें कार्यकर्ताओं के मन में गुरु की छवि वाले प्रसिद्ध इतिहासकार धर्मपाल (अब स्वर्गीय) का आवास बनाने की भी बात कही।इसी सिलसिले में फरवरी, 2005 में भीलवाड़ा (राजस्थान) में अग्रिम पंक्ति के लगभग सवा सौ कार्यकर्ताओं का एक सम्मेलन बुलाया गया ताकि राजीव सारी शंकाओं पर स्पष्टीकरण देकर कार्यकर्ताओं को संतुष्ट करें और उनके नेतृत्व पर किसी को अविश्वास न रह जाए। लेकिन यहां अपनी कोई गलती स्वीकरने या स्पष्टीकरण देने के बजाय उन्होंने उल्टे कार्यकर्ताओं को ही धमकी दी कि जिसकी इच्छा करे रहे, जो चाहे जाए। मुकुंदगिरी जैसे एक अति ईमानदार छवि वाले कार्यकर्ता के लिए तो प्रदीप दीक्षित ने यहां तक कह दिया कि -‘इतने ईमानदार आदमी की आंदोलन में कोई जरूरत नहीं है।’ असल में इस कार्यकर्ता ने स्वामी रामदेव के शिविरों में ज्यादा बिकने वाले आंदोलन साहित्य को कमीशन बचाने के लिए कम बिका हुआ बताने से इनकार कर दिया था। दीक्षित बंधुओं के इस रवैये से दुखी होकर ही इस सम्मेलन के बाद राजीव दीक्षित की छवि बनाने और उन्हें प्रखर वक्ता के रूप में आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले इलाहाबाद के उनके शुरुआती दिनों के एक वरिष्ठ साथी सन्त समीर ने उनका साथ छोड़ने की घोषणा कर दी तो यह भी उनकी विश्वसनीयता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा गया। इसी के साथ दुर्लभ गोरिया, मुकुंद गिरी जैसे प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं ने भी राजीव दीक्षित का साथ छोड़ने की घोषणा कर दी और फिर धीरे-धीरे दीक्षित के एक और शुरुआती दिनों के वरिष्ठ साथी अभय प्रताप सहित महावीर जैन, डॉ. हर्षद मेहता जैसे लोगों ने भी आंदोलन से किनारा कर लिया। रही सही कसर तब पूरी हो गई जब राजीव दीक्षित ने किसी बात पर नाराज होकर अपने ही घर में सेवक की तरह रह रहे एक बुजुर्ग कार्यकर्ता जनकभाई जोशी की मां-बहन की गालियां देते हुए 25 सितंबर, 2007 को जमकर पिटाई कर दी। कार्यकर्ता बताते हैं कि गांधीवाद और अहिंसा नीति की हिमायत करते न थकने वाले दीक्षित का यह रूप देखकर यवतमाल के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता जितेंद्र लोड़ाया को इतना गहरा सदमा पहुंचा कि हृदयगति रुकने से उनकी मृत्यु ही हो गई।
जाहिर है इन घटनाओं ने आंदोलन के कार्यकर्ताओं का विश्वास लगभग पूरी तरह डिगा दिया, फिर भी एक क्षीण सी उम्मीद बनी रही कि गांधी विचार में आस्था जताने वाले राजीव दीक्षित एक न एक दिन अपनी गलतियां स्वीकर करेंगे और आत्मविश्लेषण और प्रायश्चित द्वारा आत्मसुधार करके अपने पुराने तेवर के साथ पुनः आंदोलन की अगुवाई करेंगे। उम्मीद की एक वजह यह भी थी कि 11 दिसंबर, 2008 को भोपाल में हुई एक महत्त्वपूर्ण बैठक में दीक्षित ने कार्यकर्ताओं के इन सुझावों को स्वीकार किया कि- (1) वे कम से कम अगले छह माह तक किसी आध्यात्मिक गुरु के सानिध्य में रहकर साधना करेंगे और मानवीय विकारों से मुक्त होने के बाद ही सार्वजनिक जीवन में पुनः व्याख्यान प्रारंभ करेंगे। (2) उनके परिवार के जीवनयापन की जिम्मेदारी आंदोलन की रहेगी। (3) आंदोलन के पैसे से अर्जित संपत्ति आंदोलन के उपक्रम ‘भारत पीठम’ को दे दी जाएगी। (4) वे ‘भारत पीठम’ का अध्यक्ष पद छोड़कर सिर्फ न्यासी रहेंगे तथा प्रदीप दीक्षित आंदोलन से पूरी तरह अलग रहेंगे। (5) आंदोलन व भारत पीठम का कार्यालय वर्धा से कोटा (राजस्थान) स्थानांतरित कर दिया जाएगा।
इन स्वीकारोक्तियों के बाद राजीव दीक्षित ने भारत पीठम के अध्यक्ष पद से इस्तीफा तो दे दिया, पर कार्यकर्ताओं का आरोप है कि यह सब इतनी आसानी से सिर्फ उन्होंने कार्यकर्ताओं को बेवकूफ बनाने के लिए किया। इसका खुलासा इस बात से हुआ कि बाद में संपत्ति हस्तांतरण के किसी दबाव से बचने के लिए उन्होंने सन् 2007 में उद्घाटित हो चुके भारत पीठम के वर्धा कार्यालय का स्वामी रामदेव के हाथों एक बार फिर 9 जनवरी-2009 को दोबारा उद्घाटन कराने का नाटक रचा। दीक्षित बंधुओं को उम्मीद थी कि स्वामी रामदेव के हाथों उद्घाटन होने से वर्धा में उनकी स्थिति साफ-सुथरी और मजबूत बन जाएगी और उनके खिलाफ विद्रोह की सुगबुगाहट शांत हो जाएगी। पर इस चालाकी भरे काम से उलटे कार्यकर्ताओं में उनके प्रति अविश्वास और बढ़ा।
आजादी बचाओ आंदोलन के विभिन्न राज्यों के सुशील अजमेरा, उत्तम माहेश्वरी, हीरालाल शर्मा, अनूप बंसल, राजकुमार बरड़िया, अतुल देशमुख, उदय मेघाड़ी, अजय चौधरी, विनीत अग्रवाल, अभिषेक झंवर, संजीव झा और सुनील आगीवाल जैसे अग्रिम पंक्ति के सैकड़ों कार्यकर्ताओं का यही कहना है कि--”बढ़ते विद्रोहात्मक स्वर के बावजूद हम राजीव दीक्षित को एक उदात्त चरित्र वाले गुरुतुल्य व्यक्ति के रूप में ही देखना चाहते थे, सो उनको सुधारने की अपेक्षा से हमने स्वामी रामदेव से निवेदन किया, जिसे उन्होंने माना भी। इस सिलसिले में राजीव दीक्षित द्वारा की गई धोखाधड़ियों के संबंध में स्वामी रामदेव को लंबे-लंबे पत्र लिखे गए। 7 जनवरी, 2009 को नागपुर एयरपोर्ट पर उनके साथ आंदोलन के प्रतिनिधियों की पहली वार्ता हुई। इसके बाद 21 मार्च, 2009 को हरिद्वार के पतंजलि योगपीठ ट्रस्ट में देश भर से पहुंचे आंदोलन के 40 प्रमुख कार्यकर्ताओं के साथ स्वामी रामदेव की कई घंटे लंबी एक और वार्ता चली। इस वार्ता में स्वामी रामदेव ने भरोसा दिलाया कि राजीव दीक्षित की ऊर्जा का देश को लाभ मिलना चाहिए, सो वे उनके चारित्रिक सुधार का प्रयत्न करेंगे और जल्दी ही अप्रैल तक धन-संपत्ति आदि की गड़बड़ियों का समाधान करवाएंगे। लेकिन अब हमारी इस आखिरी उम्मीद पर भी पानी फिरता दिख रहा है जबकि हम देख रहे हैं कि कई महीने बीत जाने के बाद भी स्वामी रामदेव की ओर से अभी तक कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं आई है। उल्टे वे राजीव दीक्षित के भाषण अपने साथ टीवी चैनल पर करा ही रहे हैं और उन्हें साफ़-पाक बता रहे हैं।“
जाहिर है, बाबा रामदेव और राजीव दीक्षित का साथ वैचारिक नहीं बल्कि व्यावसायिक है. दोनों एक दूसरे से फायदा उठाने के लिए साथ आये हैं. इसमें कोई हर्ज भी नहीं है. आज आजादी बचाओ आंदोलन के बिखरे हुए कार्यकर्ता अपने साथ हुए विश्वासघात के बाद राजीव दीक्षित को नटवरलाल की संज्ञा देते हैं और कहते हैं कि यह राजीव दीक्षित ही हैं जो बाबा रामदेव को राजनीति के जरिए परिवर्तन की सलाह दे रहे हैं. आंदोलन के कार्यकर्ताओं का कष्ट है कि जो व्यक्ति उन लोगों को धोखा दे सकता है, वह बाबा रामदेव का कितना साथ देगा, कहना मुश्किल है. संभवत: बाबा रामदेव भी इस बात को समझते हैं लेकिन संबंध व्यावसायिक हैं इसलिए दोनों ही एक दूसरे से फायदा उठा रहे हैं. अपवित्र ही सही गठबंधन तो है.
Title :
Body
- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
- नये निजाम के दामन पर है ज्यादा बड़ा दाग
- अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
- अपने होने पर ही हैरान
- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
- एनसीपी के 'दादा' का दांव
- पीएमओ वाले पृथ्वीराज
- गोली लगने के बाद क्या गांधी ने कहा था- हे राम ?



del.icio.us
Digg
पहले देखे
१. एक योगी के रूप में उन्होंने अपने आप को स्थापित किया और अपने जीवन में उन आदर्शो को स्थापित करके दिखाया जिसे आम आदमी अपने लिए संभव नहीं मानता और आप जैसे आलोचकों के लिए तो ये एक सपना ही है
२. एक उद्योगपति के रूप उन्होंने अपने आप को स्थापित किया और दिखाया की ईमानदारी से भी उद्योग और व्यापार किया जा सकता है और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को चुनौती दी और देश किस सरकारों को चुनौती दी की वे उन्हें गलत साबित करके दिखाए
३. एक साधारण योगगुरु के रूप में राजसत्ता को चुनौती देना इतना आसान नहीं हालाँकि ये बात तो आप समझते है मैं मानता हूँ की वो इसमें असफल हो सकते है लेकिन इतना नैतिक दबाव तो उन्होंने बना ही दिया है की राजनितिक पार्टिया सदमे में आ गयी है की क्या करे
अब आप कुछ बातें तो बताएँगे ही तो लिखने से पहले सोचियेगा की स्वामी जी ने वो जानबूझ कर की है या वो स्वाभाविक गलतिया है जैसा की मानव स्वभाव है
अगर आपको थोड़ी भी शर्म आती है तो कुछ भी गलत लिखने से पेल्हे हजार बार सोचोगे....
दरअसल संघ और विहिप यह कभी नहीं चाहता कि साधू समाज में वोट की राजनीति उनके अलावा कोई करे। विहिप के इस राजनीति के शिकार बनारस के रामनरेशाचार्य के अतिरिक्त कई साधू जमात हो चुका है। विहिप को निश्चित तौर पर रामदेव से भय है। खैर रामदेव से भय कांग्रेस और मुलायम, लालू को भी है। क्योंकि रामदेव के पास वे लोग भी आएंगे जो सेक्यूलर है। क्योंकि रामदेव ने योग के साथ जड़ता और कट्टरवाद को नहीं जोड़ा है। वे हिंदुत्व के वैज्ञानिक रुप को लेकर सामने आए है न कि पुरातनपंथी रूप को। रामदेव पिछड़ी जाति से संबंधित है और इससे भाजपा और अन्य दलों को भारी खतरा है। रामदेव अगर हिंदुओं की पिछड़ी जातियों का एक बड़ा वोट बैंक ले गए तो भाजपा जैसे सांप्रदायिक दल ही नहीं सेक्यूलर दलों को भी भारी नुकसान होगा। फिलहाल राजीव दीक्षित नटवर लाल है या नहीं मुझे नहीं पता। पर यह तय है कि राजनीतिक दलों में नटवर लालों की कमी नहीं होती है और अगर राजीव दीक्षित जैसे नटवर लाल को इतना महत्व देते है तो यह भी जानिए कि राजीव दीक्षित से बड़े नटवर लाल देश के राजनीतिक दलों में मौजूद है। राजीव दीक्षित ने आजादी बचाओ आंदोलन का एक हिस्सा ही खाया। इस देश में तो लोगों ने धन के लिए आजादी ही बेच डाली। खैर मैं नहीं समझता कि राजीव दीक्षित जैसे नटवर लाल के कारण रामदेव के स्वाभिमान आंदोलन को कोई नुकसान होगा। अगर रामदेव शुचिता को राजनीति में लाना चाहते है तो।
लेकिन एक बात बताना चाहूँगा .ये पढ़े लिखे नौजवान अतिवाद का शिकार होकर आंदोलनों सामाजिक कार्यक्रमों मैं लग जाते हैं इस कारन कोई रोजगार नहीं कर पाते और फिर धीरे धीरे वही सामाजिक कार्य इनका रोजगार बन जाता है . यात्रा ,फ़ोन .जीवन यापन के लिए पैसा तो लगता ही है फिर जो टॉप पर है पैसा तो समाज उसे ही देगा उससे नीचे स्तर के कार्यकर्ता जो नए नए खून के होते हैं उनकी नाराजगी जायज है इसलिए आप सभी से मेरी प्रार्थना है पहले अपना रोजगार जमाओ ,घर बसाओ उसके बाद समाज का काम करो यदि आप व्यवसाय मैं टॉप पर हैं तो इन छोटे आरोप से बच सकते हो .
प्रकाश चंडालिया
Post your comment