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नरेगा के नाम एक और कलंक

image प्रशिक्षण में महिला सरपंचों के पीछे बेठे सरपंचपति

राजस्थान, देश के गामीण विकास मंत्री का प्रदेश. यहाँ कांग्रेस की सरकार है. प्रदेश में पार्टी के अध्यक्ष भी मंत्री जी है. अपना पूरा समय भी प्रदेश को दे रहे है. इतना ही नहीं नरेगा को बजट देने में कोई कोताही उनके यहाँ नहीं है. हर एक पंचायत को औसत सालाना एक करोड का बजट दिया है.

उसी राजस्थान में घोटालों की लम्बी फेहरिस्त  है. कलक्टर से लेकर मैट सब पर आरोप है. मास्टर,थानेदार और डाक्टरों के नाम से भुगतान हो रहे है. उसी राजस्थान में पंचायतीराज के हाल में सम्पन्न चुनावों के बाद नवनिर्वाचित सरपंचों को नरेगा प्रशिक्षण दिया गया. प्रशिक्षण की गुणवत्ता और सरपंचों के विचारों से तो लगता है हालात बहुत खराब है. दो दिवसीय प्रशिक्षण का आखों देखा हाल देखकर तो ऐसा ही लगता है.

कार्यशाला के शुभारम्भ  का संचालन भी उन्होंने किया. कुछ लच्छेदार कशीदे भी पढे. तो बाद में प्रशिक्षणार्थियों के बीच बोले भी वही. कहा ये कानून ऐसा है जिसमें जेल भी हो सकती है. आपको धुँआधार काम कराने है. काम करवाओगे तभी कुछ...... जब हमने उनसे प्रशिक्षण में उनकी भूमिका के बारे में पूछा. तो साफ  जबाब था. यहाँ कोई बोलने वाला नहीं है. सभी जगह मुझे ही खडा कर देते है. मैं तो उधोग प्रसार अधिकारी हूँ. मेरा यहाँ कोई काम नहीं है. ये हालात है प्रदेश में महानरेगा को लेकर चल रहे नव र्निवाचित सरपंचों के प्रशिक्षणों के. जहाँ अधिकारी नदारद है. और बोलने वाले बकवास कर खानापूर्ति कर रहे है.

नरेगा को लेकर कार्यशाला की सूचना थी. पूरे प्रदेश में अप्रेल माह के दौरान नव निर्वाचित सरपंचों को सरकार द्वारा दो दिवसीय कार्यशालाओं में प्रशिक्षण दिया गया. ये  सोचकर कि कुछ अच्छी जानकारियाँ मिलेगी. नरेगा को और बेहतर जानने समझने का मौका मिलेगा. मैं भरतपुर जिले की एक पंचायत समिति में निर्धारित बताये समय जा पहुँचा. प्रदेश में इन दिनों सरकारी कार्यालयों का समय 9.30 बजे है. इक्का दुक्का लोग इधर उधर घूम रहे थे. सभागार का ताला लगा था. ये इंतजार बहुत लम्बा रहा. 11 बजे से कुछ सरपंचों ने आना शुरू किया. 12 बजे अतिथि आये. एक कोने में स्थायी रूप से कुर्सी पर रखी हुई सरस्वती प्रतिमा को माला पहनाई. दीपक तो जलते ही बुझ गया. शायद यही संकेत था प्रशिक्षण और उसकी गुणवत्ता का. कोई भी जिम्मेदार सरकारी नुमाईंदा वहाँ मौजूद नही. अतिथि भी बिना कुछ बोले, कहे, चले गये. सभागार में न तों माइक था और न ही प्रशिक्षण को बताने वाला कोई  बैनर. शुभारम्भ की इस औपचारिकता में बुलाये 45 में से 23 सरपंच उपस्थित दिखे. जिनमें आठ महिलाऐं सहमी सी बैठी थी.

अब जिन्हें बोलना आता था उन्होंने बोलना शुरू किया. उनकी सूचना के अनुसार सरपंचों का ये पहला मौका था. ऐसे में परिचय सत्र जरूरी था. बिना अपना परिचय दिये उन्होंने सबका अता पता पूछा. जब एक सज्जन ने कहा कि वो तो सरपंच पति है. तो एक मजेदार बात हुई. ‘‘ अरे आप  अपना परिचय जरूर दो. भाई आगे काम तो आप ही से पडेगा’’ 30 मिनिट का परिचय सत्र 8 मिनिट में पूरा हो गया. धीरे से एक सरपंच ने इतना ही कहा. हमसे तो पूछ लिया अपना कुछ बताया नहीं. उनकी बात किसी ने नहीं सुनी. सुनता भी कौन,एक वो ही बोलने वाले थे. जिन्हें खुद के बोलने से फुरर्सत मिले तो वो किसी और की सुनें. इस बीच दूसरे एक कर्मचारी ने उपस्थित जनों को दो सरकारी किताबें, एक पैड और पेन देकर जैसे तैसे दस्तखत करा लिये. लेने वालों ने उलट पुलट कर देखा और कोई जरूरी चीज समझकर अपने पास रख लिया.

अब बारी आई. पंचायत समिति के नरेगा कार्यकम अधिकारी की. दो साल से नरेगा को अपनी उँगलियों के इशारे चलाने वाले, दर्जनों मामलों की जाँच कर चुके उन सहाब ने एक सरकारी किताब को अपने हाथ में ले लिया. और लगे नरेगा का क ख ग बोलने. सबसे पहले राजस्थान के मुख्यमंत्री की ओर से चुने हुये सरपंचो को बधाई दी. साथ में अपनी ओर से भी जोड दी. फिर लगे फर्राटे से किताब पढने. एक पन्ना जल्दी जल्दी पढ दिया. सामने बैठे 4-6 को छोड दिया जाये तो किसी को नहीं पता चला कि उन्होंने कहा क्या है? पीछे से ,सुनाई नहीं दे रहा,ऐसी कुछ आवाज भी आई मगर एक बार फिर उसे किसी ने नहीं सुना. इस बीच जाँब कार्ड का बनना, काम माँगना, काम कराना और हरित राजस्थान,राजीव गाँधी केन्द्र जैसे महत्वपूर्ण जानकारियाँ दी जा चुकी थी. किताब के पढने के बीच कहीं नरेगा में ठेकेदारों से सामान सप्लाई कराने और टैण्डर होने जैसी बातें आ गई. जो सरपंच पहले से जानकारी रखते थे, या कहें अब सरपंच पति के रूप बैठे थे, ने बात को पकड लिया. यहाँ गौरतलब बात ये है कि सरकार ने प्रदेश भर में टैण्डर प्रक्रिया ये सामान सप्लाई की कार्यवाही शुरू की हुई है. लेकिन सरपंचों के विरोध के चलते अभी तक ये प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई है. आगामी दिनों में इसके फिर होने की संभावना है. इस बात की जानकारी मिलते ही सरपंचों के बीच फिर से कानाफूसी शुरू हो गई. और बोलने वाले सहाब ने कार्यक्रम अधिकारी से कमान अपने हाथ में ले ली.इसी गपशप के बीच 1.30 हो गये.

अब एक जरूरी सूचना दी गई. आपको भूख लग आई होगी. हमने आपके लिए खाने की व्यवस्था की है. पीछे खाने के पैकेट रखे है अब आप खाना खा ले. कुछ और बातें बाद में करेगें. पूडी,तीन सब्जी और मिठाई. ये था खाने का पैकेट. सरपंच साहिवानों ने पैकेट लिये. कुछ ने तो एक से अधिक पर भी हाथ मारा. पति और बच्चे जो साथ थे. कर्मचारियों ने भी अपने हिस्से को कहाँ पीछे छोडा. खाना ही तो था. फिर भी कुछ पैकेट कार्टून में बच गये. इस बीच शिक्षकों के एक बडे समूह ने आकर सभागार को अपने कब्जे में ले लिया. वहाँ भी  होने वाले किसी   प्रशिक्षण में खाने के मीनू को लेकर खींचतान होने लग गई. सरपंच तब तक बाहर जा चुके थे.

हमने बोलने वाले सहाब से आगामी सत्रों के बारे में जानकारी ली तो उनका साफ कहना था. अब सरपंच ही लौट कर नहीं आयेगें. अब तो कल ही होगा. कुछ लोगों को बोलने के लिए बाहर से बुलबाया है. आज तो यहाँ और कोई है भी नहीं. पंचायत समिति में वैसे नरेगा के तीन जेईएन,एईन,और दर्जनों अधिकारी कर्मचारी है. मगर प्रशिक्षण कक्ष की ओर किसी ने आना जरूरी नहीं समझा. हमने नरेगा के ही एक सज्जन से पूछा तो उनका जबाब बडा सटीक था. ‘‘ सरपंचों को सब पता है क्या और कैसे करना है. इन्होंने भी लाखों रूपये चुनाबों में यों ही नहीं खर्च किये है. जब हमारे पास आयेगे तो सब समझा देगे. कि भरपाई कैसे होगी ’’ प्रशिक्षणों में क्या धरा है?
प्रशिक्षण का दूसरा दिन. समय सुबह के 10 बजे. प्रशिक्षण के सभागार पर अब भी ताला लगा था. 11.30 बजे ताला खुला तो हम भी अन्दर जाकर बैठ गये. इससे पहले  बुजुर्ग सरपंच पूरन सिंह जाटव  से मुलाकात हो गई. उनसे जब प्रशिक्षण के बारे में पूछा था तो उनके जबाब ने सारी स्थिति और अधिक स्पष्ट कर दी. ‘‘ काहे का प्रशिक्षण है. कमीशन दो और काम लो याई कौ प्रशिक्षण है ई." एक और सरपंच कल्लीराम जो पहले दिन नहीं आये थे हमने उनसे पूछा तो उनका भी साफ कहना था.‘‘ क्या हुआ कल नहीं आये तो. दस्तखत तो हो ही गये. सब फौरमल्टी है ’’ इनको अपने पैसे बनाने है और हमें पैसे देकर काम कराने है.
12 बजे एक बार फिर कल बोलने वाले सहाब आये. कमरे में झाँक कर देखा और 5 लोगों को बैठा देख चल गये. 12.20 पर आज विकास अधिकारी आये. इतने में सरपंचों की संख्या 12 हो गई. जिनमें 2 महिलाऐं. मौके की नजाकत देख उन्होंने बोलना शुरू किया. सबसे पहले तो पीछे बैठी महिलाओं को आगे बुलाया. फिर बोले. सरकार आपको ट्रेण्ड करना चाहती है. आपका पद बहुत उँचा है. जनता की आपसे बहुत उम्मीद है. आपको अपनी सोच के अनुसार गाँव का विकास करना है. इसके लिए नरेगा बहुत अच्छा है. इससे आप गाँव की कायापलट कर सकते है. इतने में पीछे से एक सरपंच बोले. ऐसी कोई बात बताओं जाते अपनी कायापलट होय. बहुत खर्चा हो गयो है. इस बीच फिर गपशप का दौर शुरू हो गया.

अब 1.30 का समय हो गया. भोजन की सूचना दी गई. भोजन के पैकेट बाँट दिये गये. लोग खाने में मशगूल हो गये.  कार्यशाला के शुभारम्भ की ही तरह उसका समापन भी हो गया. हमने प्रशिक्षण के सरकारी बजट की जानकारी लेने की कोशिश में हाथ पैर मारना शुरू किया. बमुशिकल कुछ जानकारी मिली. जो मिली चौकाने बाली थी. प्रति सरपंच 45 रूप्ये की डायरी पैन. 100 रूपये भोजन. 20 रूपये किराया. 400 रूपये प्रति सत्र दक्ष प्रशिक्षकों का भुगतान. हजारों रूपये का अलग से प्रशासनिक व्यय. और भी कई खर्चे थे जिन्हें बताने वालों ने शायद नहीं बताया.

अब पंचायती राज के स्तर पर राजस्थान प्रदेश को समझने की कोशिश करते है. देश में क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बडे प्रदेश में करीब 250 पंचायत समिति क्षेत्रों में लगभग 9200 ग्राम पंचायतें है. जहाँ नरेगा के ऐसे प्रशिक्षण कराये गये. इन प्रशिक्षणों में खर्चे के तौर पर करोडों रूपये के खर्च हुये. प्रदेश में हर एक महीने की 5 और 20 तारीख ग्राम पंचायतों की बैठक के लिए अनिवार्य रूप से तय तिथि है. जिस प्रशिक्षण की हमने यहाँ चर्चा की है. उसके समापन की तिथि भी 20 अप्रेल थी. आयोजकों ने इस बात का भी ध्यान नहीं रखा.

हमने तो बानगी के तौर पर एक प्रशिक्षण को नजदीक से देखने और समझने की कोशिश की थी. हम ये सोच सकते है कि और प्रशिक्षण इससे बेहतर हुये होगें. और ये भी हो सकता है कि इससे बदतर हालात रहे होगें जहाँ कागजों में ही खानापूर्ति कर दी गई होगी. सवाल यही से खडा होता है कि क्या ऐसे प्रशिक्षणों से राजस्थान का महानरेगा जो एक प्रकार से महाघोटाला बन चुका है कुछ उबर पायेगा. या हालात और बद से बदतर होते चले जाऐगें. इस प्रशिक्षण और दूसरे प्रशिक्षणों की जब स्थानीय अखबारों में फोटो सहित शानदार खबरें पढी तो एक दुख का कारण और सामने आया. कहीं अव्यवस्थाओं के लिए चौथा स्तम्भ भी तो जिम्मेदार नहीं है. मुझे तो ऐसा ही लगता है. आप के पास कोई और कारण हो तो मुझे भी बताना.

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इकवाल on 24 April, 2010 00:59;25
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इस भयावह सच से रूवरू कराने के लिए धन्यवाद। राजस्थान में नरेगा को लेकर हालात बहुत ही खराब है। सरकारी तंत्र में पूरी तरह से भ्रष्टाचार व्याप्त हो गया है। मीडिया के लिए भी नरेगा फायदे का सौदा हो गया है। खबरों के लिए पैसा दिया जाता है। कुछ पत्रकार नरेगा के विज्ञापनों के दबाब में सही खबरें नहीं देते है। प्रशिक्षणों के ऐसे हालात है तो फिर जमीनी सच्चाई तो वास्तव में सोचने लायक होगी। मंत्री जी संभालो अपने राजस्थान को। कहीं थरूर की तरह तुम्हारा गुरूर भी नहीं चला जाये। सरपंचों ने इस बार बहुत खर्चे किये है। आगे हालात बदतर ही रहने वाले है। सरकारी बाबू ही बतायेगें उन्हें तरकीब।
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Rahul Jain on 25 April, 2010 02:19;00
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राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार नकारा साबित हो गयी है. केंद्र में कोंग्रेस के ही राज के बावजूद कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई है. बड़ी-बड़ी योजनाये ठप्प हैं. बाहरी निवेश भी कम होता जा रहा है. गहलोत कभी इस किरोड़ी को संभालने में लग जाते हैं तो कभी उस किरोड़ी को. इसके अलावा सी पी जोशी और गिरिजा व्यास से कुर्सी छीन जाने का भय अलग. कोंग्रेस ने जिस जातिवादी राजनीति को हवा दी थी अब वही उसके गले की हड्डी बन गया है. अपनी बची खुची ऊर्जा भी गहलोत साहब वसुंधरा राजे को कोसने में लगा देते हैं.
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image राजीव शर्मा राजीव शर्मा राजस्थान में रहकर मुक्त पत्रकारिता कर रहे हैं.इससे पूर्व कइ अखवारों के लिए रिपोटिंग कर चुके हें। राजनीति के अलावा पानी-पर्यावरण के मुद्दे पर संवेदनशील रिपोर्टिंग के लिए प्रयासरत। विस्फोट के लिए राजस्थान से नियमित लेखन और रिपोर्टिंग. rsmediaraj@gmail.com
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