स्वागत से शुरू हुई सुगबुगाहट
राजस्थान में इस बार 5 वर्षो के बाद छात्रसंघों के चुनाव होने जा रहे हैं। चुनावों को लेकर विधार्थियों से लेकर राजनैतिक दलों में सरगर्मियाँ तेज हो गई है। नवागुंतकों का जोर से स्वागत किया जा रहा है तो तमाम तरह की माँगे भी सरकार के सामने रखी जा रही है। राजनीति की पहली पाठशाला के हो रहे चुनावों की एक रिपोर्ट।
राजस्थान के विश्वविधालयों,महाविधालयों में इस बार माहौल बदला हुआ है। नवागंतुक छात्र छात्राओं का गर्मजोशी से स्वागत सत्कार किया जा रहा है। छात्र राजनीति की दुकान चलाने वालों के यहाँ खूब भीड हो रही है। कस्बों की गलियों से शहरों तक दीवारों पर चिकने चुपडें चेहरों के पोस्टर भरे परे है। विधार्थी भी माहौल का पूरा आनन्द ले रहे हैं। काँलेजों में छात्र सहायता केन्द्र खुले हुये है । वही विधार्थियों को अपने संगठनों से जोडने के नाम पर सदस्यता अभियान चलाये जा रहे है। छात्र राजनीति के दलीय संगठन भी सकि्य होकर कार्यकताओं में जोश भरने की कोशिशों में लगें हुये है। उन्हें कार्यकताओं को ढूढना पड रहा है। 5सालों से राजनीति की पहली पाठशाला के चुनाव बंद थे तो कार्यकर्ता भी संगठनों को भूल गये। प्रदेश में विपक्षी भाजपा छात्रसंघ चुनावों के बहाने अपने युवा कैडर में नई जान डालने की कोशिश कर रही है। इस सब के बीच एक सवाल फिर खडा है कि क्या अब चुनाबों के हालातों में कोई बडा बदलाब नजर आयेगा ? शायद नहीं । अभी तक के नजारों को देखकर तो यही लग रहा है। तो फिर इन चुनावों को रोकने के पीछे क्या कारण रहे? जब हमारी व्यवस्थाऐं लोकतंत्र के अपने पंचायत, विधानसभा और लोकसभा चुनावों में कोई सुधार नहीं कर पा रही है तो फिर सुधारों के नाम पर विधार्थियों को अपना प्रतिनिधि चुनने से इतने दिनों क्यों वंचित रखा गया?
शिक्षण सत्र 2004,05 के बाद इस बार चुनाब होंगे। 5 शिक्षण सत्रों के गुजर जाने के बाद हो रहे चुनाबों को देखते हुये छात्रों में खासा उत्साह नजर आ रहा है। ऐसे में कमैटी की सिफारिशों की धज्जियाँ उडने के आसार अभी से साफ नजर आना शुरू हो गया है। सवाल फिर वही खडा होगा कि फिर इतने समय चुनावों पर रोक लगाने का आखिर औचित्य क्या रहा। सत्ताधारी काग्रेंस भी सरकार गठन के बाद हो रहे इन चुनावों को लेकर सकि्र्य नजर आ रही है। उसकी छात्र इकाइयों के कार्यकर्ता सत्ताधारी दल की धौंस में नजर आ रहे हैं। वही दूसरी ओर विपक्षी भाजपा भी इस बहाने अपने युवा कैडर में फिर से जान फूँकने की पुरजोर कोशिश कर रही है।
शिक्षण सत्र 04,05 में 4 अगस्त को वोट डाले गये थे। इस बार राज्यसरकार ने 25 अगस्त की तिथि तय की है। 2008 के विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेंस ने अपने घोषणा पत्र में छात्र संघ चुनावों का वायदा किया था। कांग्रेस की सरकार बनने के बाद इस दिशा में कुछ पहल शुरू हुई उसी का परिणाम है कि इस बार चुनाब कराये जा रहे है। 5 दिसम्बर 2009 को उच्च न्यायालय जोधपुर की वृहद पीठ ने ‘लिंगदोह कमेटी’ की सिफारिशों के अनुरूप चुनाब कराने को लेकर हरी झंडी दे दी थी।
राजस्थान उच्च न्यायालय ने चुनावों के दौरान लडाई झगडे,मारपीट और छेडखानी की घटनाओं को लेकर प्रकाशित खबरों के आधार प्रसंज्ञान लेते हुये छात्रसंघ चुनावों पर रोक लगा दी थी। दिसम्बर 2008 में कांग्रेस सरकार बनने पर इस बात की उम्मीद बढ गई थी कि 2009 में छात्र संघों के चुनाव करा दिये जाऐगें। कांग्रेंस की छात्र ईकाई की ओर से कुछ प्रयास भी किये गये मगर उनमें कोई दम नहीं रहा। ऐसे में छात्रों को एक और साल अपने प्रतिनिधि चुनने का मौका नहीं मिल पाया।अब ये चुनाव इतने अंतराल के बाद 25 अगस्त को सम्पन्न होने जा रहे है। छात्र संध चुनावों को लेकर प्रदेश भर में जुलाई माह से ही माहौल दिखाई देने लग गया है। एक ओर नवांगुतकों के स्वागत का कार्यक्रम चल रहा है वही दूसरी ओर काँलेजों में तालाबंदी और ज्ञापनों को देने का सिलसिला चल पडा है। कहीं किसी को सीटें बढवानें की चिंता सता रही है तो कोई कालेजों में विषय,सैक्शन बढवाने की माँग कर रहा है। इससे पूर्व इन कामों की बीते वर्षो में किसी को कोई सुध नहीं रही।
छात्र संघ चुनावों पर रोक क्यों लगी? ये सवाल आज भी लोगों की जुबान पर है। क्या वाकई इन चुनावों में धन और भुजबल का प्रयोग होता है? क्या वास्तव में छात्रसंघों के चुनावों से उच्च शिक्षा के प्रतिष्ठानों का माहौल खराब होता है? या फिर कुछ और ही कारण हैं। इस मामले को तूल देने वालों को इस बात की ओर भी ध्यान देना चाहिये कि हमारे लोकतंत्र के दूसरे चुनावों में आखिर क्या हो रहा है। देश में दर्जनों शिक्षकों के संघ राजनैतिक विचारधारा के साथ जुडकर काम कर रहे है। और ऐसे शिक्षक कक्षाओं में महीनों तक नजर नहीं आते हैं। विधार्थियों को अपने प्रतिनिधि चुनने से रोकना उनके लोकतांत्रिक संविधानप्रद अधिकारों से वंचित करने से अधिक और कुछ नहीं है।
राज्य सरकार ने इस बर्ष होने वाले चुनावों के लिए कार्यक्रम की घोषणा कर दी हैं। 16 अगस्त से 25 तक पूरा चुनाव कार्य सम्पन्न होना हैं। इसके लिए राज्य सरकार की ओर से भी पूरी तैयारी कर ली गई है। उधर छात्र संगठनों और विधार्थियों की ओर से जोर शोर से तैयारियाँ चल रही हैं। हम सब को ये उम्मीद करनी चाहिये कि राजनीति की पहली पाठशाला का ये पर्व सकुशल पूर्ण हो जाये। सरकार और विधार्थी सभी दिशा निर्देशों का वखूबी पालन करें और भविष्य में कभी भी फिर से इन चुनावों पर रोक की नौबत नहीं आये।
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