कूटनीति पर भारी पाकिस्तानी कुटिलता
पूरी दुनिया जानती है कि ओसामा बिन लादेन, मौलाना उमर, हाफिज सईद, उमर शेख, मसूद अजहर समेत दुनिया के क्रूरतम आतंकवादी उसी पाकिस्तान के प्रश्रय में पलते हैं जिस पाकिस्तान को देखकर अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरान दांत पीसते हैं. उसी पाकिस्तान का विदेशमंत्री 26/11 की घटना में पाकिस्तान की सेना के शामिल होने के तमाम सबूतों के बावजूद अगर हिन्दुस्तानी विदेश मंत्री एस एम कृष्णा को मौन साधने पर मजबूर कर दे तो यह उसकी व्यावहारिकता का श्रेष्ठतम प्रदर्शन ही कहा जाएगा. हिन्दुस्तान तमाम अनुकूल परिस्थितियों के बावजूद हमेशा अंतरराष्ट्रीय राजनय के मंच पर पाकिस्तानी हुक्मरानों से क्यों हार जाता है? क्या यह पराजय केवल एस एम कृष्णा तक ही सीमित है?
एस एम कृष्णा और सत्तारूढ़ कांग्रेस को आरोपों को पिजड़े में खड़ा करनेवाली देश की मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा 1998 से 2004 तक जब सत्ता में थी, तब भी अंतरराष्ट्रीय राजनय के मंच पर परवेज मुशर्रफ अटल बिहारी वाजपेयी की तुलना में कहीं ज्यादा सफल नजर आते थे. 2001 में संसद पर जैश-ए-मोहम्मद द्वारा प्रायोजित हमले के बाद हिन्दुस्तान की सेना सीमा पर डट गयी थी. राजनयिक वार्ता के सारे द्वार बंद कर दिये गये थे. पाकिस्तान की भौगोलिक सीमा से हिन्दुस्तानी विमानों का आना जाना बंद हो गया था. आयुध समाचारों के वैश्विक जर्नल परमाणु युद्ध की आशंकाएं व्यक्त करने लगे थे. ऐसे में एक दिन अचानक पता लगा कि पाकिस्तान को हड़काने वाला हिन्दुस्तान अचानक यू टर्न ले बैठा और परवेज मुशर्रफ अपने विमान पर हिन्दुस्तान का उल्टा झंडा लटकाए हुए आगरा उतरे. अटल बिहारी वाजपेयी को कश्मीर पर प्रवचन सुनाया और नायक की तरह पाकिस्तान लौट गये. परवेज मुशर्रफ बड़ी बारीकी से आगरा वार्ता की विफलता का ठीकरा लालकृष्ण आडवाणी के सिर पर फोड़ने में भी कामयाब हुए थे. परवेज मुशर्रफ ने जिस तरह आडवाणी को अपनी राजनयिक सफलता का सामान बनाया ठीक उसी तरह से महमूद कुरैशी जी के पिल्लई को सारा दोष देने में कामयाब हो गये. उन दिनों सत्तारूढ़ दल में ब्रिजेश मिश्रा लालकृष्ण आडवाणी पर उसी तरह बिदक रहे थे जिस तरह आजकल एस एम कृष्णा जी के पिल्लई को देखकर तुनक रहे हैं. पाकिस्तान हमारी सीमा में आतंकवादी भेजकर हमला करता है, अंतरराष्ट्रीय मंच पर हिन्दुस्तान को बदनाम करता है, हम उसके खिलाफ कबाइलियों से लेकर हेडली तक आक्रांता होने का सबूत जमा करते हैं. नई दिल्ली से लेकर न्यूयार्क तक चीखतें हैं, फिर भी दुनिया हमारी सुनने की बजाय उल्टा हमें ही सुधरने की नसीहत देने लगती है.
हेडली के मुद्दे पर भी अमेरिका का विदेश मंत्रालय हिन्दुस्तान को फटकार रहा है कि उससे पूछताछ करने का अवसर गोपनीयता की शर्त पर दिया गया था तो जी के पिल्लई हेडली के बयान को विदेश मंत्रियों की वार्ता के पहले सार्वजनिक करने का दुस्साहस कैसे करते हैं? आकार प्रकार में भले ही पाकिस्तान हमसे उन्नीस हो लेकिन पाकिस्तान का इतिहास देखें तो नतीजा यह दिखता है कि पाकिस्तान हमें मारता रहा है और रोने पर दुनियाभर में बदनाम भी करता रहा है. पाकिस्तान को यह सफलता अपने जन्मदाता मुहम्मद अली जिन्ना की नीतियों से ही प्राप्त है जबकि हिन्दुस्तान का रोना महात्मा गांधी के जमाने से ही जारी है. हिन्दुस्तान के इस मर्ज को समझने के लिए मोहम्मद अली जिन्ना और महात्मा गांधी के तुलनात्मक अध्ययन की आवश्यकता है. जिन्ना और गांधी दोनों मूलत: गुजरात के काठियावाड़ क्षेत्र के निवासी थे. जिन्ना का खानदान काठियावाड़ के पानेली नामक गांव से आता है तो महात्मा गांधी उस गांव से ठीक 30 किलोमीटर उत्तर से हैं. दोनों की मातृभाषा गुजराती थी, दोनों का बाल विवाह हुआ था, दोनों लंदन से वकालत पढ़कर भारत आये थे. संयोग से दोनों के राजनीतिक गुरू गोपाल कृष्ण गोखले थे. पूरे तीन दशकों तक महात्मा गांधी मोहम्मद अली जिन्ना पर राजनीतिक रूप से हावी रहे. खिलाफत आंदोलन के समय तो महात्मा गांधी मुसलमानों में इतने लोकप्रिय थे कि जिन्ना को यह देश छोड़कर जाना पड़ा था. उन दिनों तो अकबर इलाहाबादी को भी महात्मा गांधी पर लिखना पड़ा था-
बुद्धू मियां भी हजरते गांधी के साथ हैं
गोया कि मुश्ते खाक है, पर आंधी के साथ है
लेकिन जब मोहम्मद अली जिन्ना ने मुस्लिम कार्ड खेला तो अपनी वाकपटुता आरोपित करने की क्षमता और संवैधानिक ज्ञान के चलते दुनिया की नजरों में महात्मा गांधी को सिर्फ हिन्दुओं का नेता साबित करने में कामयाब हो गये. एक ऐसा समय था जब मौलाना हुसैन अहमद मदनी, मौलाना अबुल कलाम आजाद, मौलाना अब्दुल बारी, अली बंधू, डॉ अब्दुसमत खां, मौलाना मजरुल हक, जीएम सैयद, डॉ सैफुद्दीन किचलू, डॉ जाकिर हुसैन, हाफिज मोहम्मद इब्राहिम और डॉ के जी सैयदैन जैसे नेता सारे के सारे गांधी के समर्थक और अनुयायी थे. मौलाना मौदूदी तक जिन्ना के सख्त विरोधी थे और इसी के चलते पाकिस्तान बनने के बाद लंबे अर्से तक मौदूदी को वहां की जेल में रहना पड़ा था. खिलाफल आंदोलन के दौरान मौलाना मोहम्मद अली गांधी से इतने अभिभूत थे कि उन्होंने यहां तक कह दिया था कि पैगम्बर मोहम्मद साहब के बाद वे केवल गांधी को मानते हैं. लेकिन जब जिन्ना ने गांधी अपने तर्कों के बल पर सांप्रदायिक साबित कर दिया, उनके रामराज्य की संकल्पना को हिन्दू साम्राज्यवाद की संज्ञा दे दी, मुस्लिम लीग को खाक से जिन्दा करने में सफलता प्राप्त कर ली तब इन्ही मौलाना मोहम्मद अली ने कहा कि मैं गांधी को किसी भी भ्रष्टतम मुसलमान से भी ज्यादा नीच मानता हूं. यह करने में जिन्ना सफल क्यों हुए? क्योंकि जिन्ना ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति की जरूरत को गांधी से ज्यादा चतुराई से पहचानने में कामयाबी पायी थी.
महात्मा गांधी ने प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान लोकमान्य तिलक जैसे नेताओं के विरोध के बावजूद अंग्रेजी सेना में हिन्दुस्तानी सैनिकों की भर्ती का समर्थन किया था. लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान वही गांधी हिन्दुस्तानियों की भर्ती के मुखालिफ हो गये. जिन्ना ने इस अवसर को बखूबी पहचाना और अंग्रेजों के युद्ध प्रयासों को हर तरह के सहयोग के प्रति वचनबद्ध होकर अंग्रेजी शासन से निकटता हासिल कर ली. जब 1942 में गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा की तो चर्चिल समेत पूरा ब्रिटिश समुदाय गांधी यानी हिन्दू भारत के खिलाफ और जिन्ना यानी मुस्लिम पाकिस्तान के समर्थन में खड़ा हो गया. इसी रणनीतिक कुशलता को कालांतर में जिन्ना के सियासी वारिश भुनाने में कामयाब हुए. 1954 में पाकिस्तान साउथ इस्ट एशियन ट्रीटी आर्गेनाइजेशन और 1955 में सेन्ट्रल ट्रीटी आर्गेनाइजेशन का सदस्य बन गया. ये दोनों अमेरिका और ब्रिटेन समेत तत्कालीन विश्व व्यवस्था के अगुओं के एशियाई संगठन थे. हिन्दुस्तान उस समय गुट निरपेक्ष बना रहा जिसका खामियाजा उसे सन 2000 तक भुगतना पड़ा. 1965 में पाकिस्तान पर हिन्दुस्तान कुछ समय के िलए भारी पड़ा. कारण था िक तत्कालीन पाकिस्तानी विदेश मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो का चीन प्रेम अमेरिका को खटक गया. उस समय भी जुल्फिकार अली भुट्टो हिन्दुस्तान के तत्कालीन विदेश मंत्री सरदार स्वर्ण सिंह पर अंतरराष्ट्रीय राजनय के परिदृश्य पर भारी नजर आये. अमेरिका 1965 के युद्ध में साफ साफ हिन्दुस्तान के पक्ष में नजर आ रहा था. 1965 में अमेरिका ने हिन्दुस्तान को 246.6 मिलियन डॉलर का कर्ज और अनुदान और 38.2 मिलियन डॉलर के आयात निर्यात कर्ज दिये थे. इस अवधि में उसने पाकिस्तान 182.3 मिलियन डॉलर का कर्ज दिया जबकि आयात निर्यात का बैंक लोन देने से साफ मुकर गया. लेकिन जुल्फिकार अली भुट्टो चीन के चाउ एन लाई को पटाकर हिन्दुस्तान को हड़काने में कामयाब हुए थे. 16 सितंबर 1965 को चीन ने साफ शब्दों में चेतावनी दी थी कि अगर तीन दिन में हिन्दुस्तान ने युद्ध नहीं रोका तो चीन सिक्किम की सीमा पर चढ़ जाएगा. जब अमेरिका हिन्दुस्तान को छिपी मदद दे रहा था तब भी जुल्फिकार अली भुट्टो सरदार स्वर्ण सिंह पर और जनरल अय्यूब लाल बहादुर शास्त्री पर बीस साबित हुए. ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि लालबहादुर शास्त्री उन महात्मा गांधी के अनुयायी थे जो जन आंदोलन तो जानते थे लेकिन राजनीति के कुटिल दांव पेंचों में पारंगत होने का प्रशिक्षण नहीं था.
लोग बताते हैं कि उस समय जब जुल्फिकार अली भुट्टो स्वर्ण सिंह से वार्ता करते थे तो स्वर्ण सिंह के उच्चारण का भी खुलकर मजाक उड़ाते थे. जुल्फिकार अली भुट्टो कहते थे कि बहुसंख्यक मुस्लिमों वाला कश्मीर पाकिस्तान का अंग मानने से हिन्दुस्तान को क्या परहेज? हिन्दुस्तान कश्मीर पाकिस्तान को सौंप दे और विभाजन की प्रक्रिया को पूर्ण करके दक्षिण एशिया में शांति का झंडा फहराने का अवसर दे. तब सरदार स्वर्ण सिंह हिन्दुस्तान सेकुलर देश है के अलावा कोई तर्क नहीं रख पाया करते थे. भुट्टो की टीम सरदार स्वर्ण सिंह के सेकुलर शब्द के उच्चारण का भी मजाक उड़ाया करती थी. ये बात दीगर है कि सरकार स्वर्ण सिंह जुल्फिकार अली भुट्टो को अपनी खांटी राजनीति के बल पर पछाड़ने में अंतत: कामयाब रहे. जुल्फिकार अली भुट्टो मोहम्मद अली जिन्ना की तरह ही ब्रिटेन में उच्च शिक्षा प्राप्त पाकिस्तानी जमींदार थे, जबकि सरदार स्वर्ण सिंह एक किसान परिवार के ईमानदार राजनेता. इसी तरह 1989 में जब हिन्दुस्तानी विदेश मंत्री इंद्र कुमार गुजराल और पाकिस्तानी विदेश मंत्री साहिबजादा याकूब खान के बीच वार्ता हुई तो मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि वाले गुजराल पर सामंती पृष्ठभूमि और ब्रिटिश शिक्षा से लैस साहिबजादा याकूब खान वार्ता की टेबल पर भारी नजर आते थे. आगारा शिखर वार्ता के दौरान निम्न मध्यवर्गीय परिवार की पृष्ठभूमि वाले अटल बिहारी वाजपेयी को पाकिस्तान के उच्च कुल से आनेवाले परवेज मुशर्ऱफ की वार्ता को शेखर गुप्ता जैसे विश्लेषक भी 286 प्रोसेसर से पेन्टियम का मुकाबला बताते हैं. मतलब साफ है कि परवेज मुशर्रफ जंग के मैदान में राजनीतिक परिस्थितियों में वाजपेयी से कमजोर थे लेकिन उनकी जबान वाजपेयी की लाठी की तुलना में तलवार की तरह चल रही थी. एसएम कृष्णा और शाह महमूद कुरैशी के बीच भी वाजपेयी और मुशर्रफ जैसा अंतर दिखाई दिया.
एस एम कृष्णा भले ही फुल ब्राइट के फेलो रहे हों और डिजाइनज शूट धारण करने की क्षणता के कारण विद्वान नजर आते हों लेकिन कैम्ब्रिज शिक्षित शाह महमूद की तुलना में कर्नाटक के ओक्कालिगा किसान ही नजर आये. शाह महमूद कुरैशी पाकिस्तान की सामंती व्यवस्था का शासक है. कुरैशी मुल्तान के बहाउद्दीन जकारिया की दरगाह के सज्जादा नशीं है और उनकी हैसियत का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि उनको बीते वर्ष में उनका हाथ चूमनेवालों ने छह करोड़ रुपये का चढ़ावा चढ़ाया था. हाथ चुमवानेवाला सज्जादानशीं जब कैब्रिज से पढ़कर लौटता है तो वार्ता की टेबल पर वह मध्यमवर्गीय किसान जो कि एक विदेशी महिला की दया पर निर्भर होकर राजनीति करने का अभ्यस्त हो, पर भारी ही पड़ेगा. शर्म अल शेख में डॉ मनमोहन सिंह पर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री युसुफ रजा गिलानी कुछ इसी अंदाज में भारी पड़े थे. वहां भी गिलानी की सामंती पृष्ठभूमि के समक्ष डॉ मनमोहन सिंह का मध्यवर्गीय तेवर आक्रांता के समक्ष समझौतापरस्त चेहरा बनकर उभरा. मोहम्मद अली जिन्ना के सामने हमेशा महात्मा गांधी के सामने समझौते का पर्चा पेश करते रहे. जिन्ना की तुलना में गांधी को जनमानस का बेहतर ज्ञान था लेकिन वैश्विक हाकिमों को संवैधानिक भाषा में तार्किक ढंग से प्रसन्न करने की क्षमता गांधी की तुलना में जिन्ना के पास बेहतर थी. सरदार स्वर्ण सिंह पाकिस्तान की सेना पर भारी पड़ चुके भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे लेकिन पीढ़ी दर पीढ़ी रियाया को नियंत्रित करने के गुण धर्म और अंतरराष्ट्रीय राजनय की दीक्षा में बेहतर जुल्फिकार अली भुट्टो वार्ता की टेबल पर स्थिति को पलटने में कामयाब रहे. अटल बिहारी वाजपेयी जन मानस का मर्म किसी भी परवेज मुशर्रफ से बेहतर जानते हैं लेकिन मुशर्रफ जार्ज बुश को डील करने में वाजपेयी की तुलना में बेहतर साबित हुए. एस एम कृष्णा चुनाव जीत सकते हैं, कांग्रेस के राजनीति की सर्वाइवल पालिटिक्स के वे निष्णात नेता हैं लेकिन जब वैश्विक मंच पर घेरेबंदी की बात होगी तो शाह महमूद कुरैशी अपनी कुटिल वाक पटुता से कृष्णा के मुंह पर कालिख पोतने में कामयाब हो जाते हैं.
विदेश नीति के मामले में हिन्दुस्तान हमेशा आदर्शवादी नीतियों के चलते कुटिल पाकिस्तान के समक्ष मात खाता रहा है. महात्मा गांधी 1940 में यदि ब्रिटेन और अमेरिका को पटाने में कामयाब हुए होते तो हिन्दुस्तान शायद विभाजित ही नहीं होता. वे जिन्ना की कुटिलता के समक्ष अपने आदर्शवाद के शिकार हुए. अय्यूब खान विपरीत परिस्थिति में सोवियत भूमि ताशकंत जाने में भी संकोच नहीं करता और वहां भी वह लालबहादुर शास्त्री को झटका देने में कामयाब होता है. भुट्टो 1971 में हार की पीड़ा को सीने में दफन कर शिमला पहुंचता है और मनचाहा फैसला करवाकर वापस पाकिस्तान जाता है. परवेज मुशर्रफ मौका पड़ते ही अमेरिका की शरण में जाकर हिन्दुस्तान को अपने इशारे पर चलने के लिए मजबूर कर लेता है. 26/11 के आतंकी हमलों के बाद पाकिस्तानी अमेरिका को हिन्दुस्तानियों की तुलना में स्वयं को महत्वपूर्ण साबित कर लेते हैं. अमेरिका दबाव में शर्म-अल-शेख में डॉ मनमोहन सिंह इतने दब जाते हैं कि उनके विदेश सचिव शिव शंकर मेनन त्रुटिपूर्ण ड्राफ्ट को बातचीत का हिस्सा बना लेते हैं. शाह महमूद कुरैशी अमेरिका और ब्रिटेन की नजर में पाकिस्तान की महत्ता को निर्विकल्प साबित करने की क्षमता के बल पर ही एस एम कृष्णा के मुंह पर जी के पिल्लई की तुलना हाफिज सईद से करता है लेकिन अमेरिकी चौधरी कुरैशी को फटकारने की बजाय हेडली के मुद्दे पर हिन्दुस्तान को ही धमकी चमकी देते हैं. यह क्यों? शायद इसलिए कि हम महात्मा गांधी के आदर्शवाद में उलझकर अंतरराष्ट्रीय राजनय की आवश्यकता (जिन्ना जैसी कुटिलता) को धारण नहीं कर पाते हैं.
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यही बात हम भारतवासियों के साथ है…, पाकिस्तान और चीन जैसों से मुकाबला करने के लिये गाँधीगिरी की नहीं खालिस कमीनेपन की जरुरत है, पता नहीं कब समझेंगे… "वार्ताकार" लोग।
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