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अनीति का शिकार छात्र राजनीति

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जुलाई में देशभर के विश्वविद्यालय और कालेज खुल गए हैं और नए छात्रों के आगमन के साथ ही परिसरों में छात्र संघ चुनावों की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं. देश में एक धारणा बनने लगी है कि छात्र राजनीति और छात्र संघ गुंडागर्दी का पर्याय बनता जा रहा है इसलिए इसपर पाबंदी लगा देनी चाहिए। क्या इस धारणा में कोई सच्चाई है या फिर समाज के एक वर्ग विशेष द्वारा फैलाई गयी भ्रांति के अलावा कुछ नहीं है?

छात्र राजनीति पर चर्चा करने से पहले आपको एक वाकया सुनाते हैं जिसे दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) के पूर्व अध्यक्ष जयवीर सिंह राणा ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जे एम लिंगदोह को सुनाई थी. खासतौर से उन अभिभावकों के लिए जो छात्र संघ का विरोध करते हैं और अपने बेटे-बेटियों को इससे दूर रहने की सलाह देते हैं. सन 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने छात्र संघ चुनाव में सुधार की सिफारिश के लिए जे एम लिंगदोह की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की थी. बड़ी मशक्कत के बाद लिंगदोह कमेटी ने डूसू के पूर्व पदाधिकारियों को अपनी बात रखने के लिए दस मिनट का समय दिया था. डूसू के पूर्व पदाधिकारियों से लिंगदोह का छूटते ही सवाल था, "क्यों न छात्र संघ पर पाबंदी लगा दी जाए?"  तब इसके जवाब में जयबीर राणा ने दिल्ली के एक निजी इंजीनियरिंग कालेज के आत्महत्या करने वाले एक छात्र की आप बीती सुनाई,  तो 10 मिनट की बजाए लिंगदोह ने छात्र संघ और उस की प्रासंगिगता पर डेढ़ घंटे चर्चा की. 

दरअसल, निजी इंजीनियरिंग कालेज के उस छात्र ने आत्महत्या इसलिए की थी की प्रशासनिक लापरवाही के चलते उसका भविष्य बर्बाद हो रहा था और उसकी मदद की बजाए पूरा तंत्र कालेज प्रशासन के साथ खड़ा हो गया था. किसी क्लर्क की गलती से उस छात्र को एक विषय की परीक्षा में अनुपस्थित दिखा दिया गया था. छात्र की लाख मिन्नतों के बाद भी कि उसने सभी विषयों की परीक्षा दी है,  कालेज प्रशासन ने उसकी एक न सुनी और आखिरकार उसे फेल घोषित कर दिया. वह छात्र एक गरीब परिवार से था और एजूकेशन लोन के जरिए बेहतर भविष्य का सपना बुनते हुए इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था. जयबीर राणा कहते हैं, "उस छात्र ने अपने सुसाइट नोट में कालेज प्रशासन के आगे अपनी बेबसी और लाचारी का न केवल जिक्र किया था बल्कि लिखा था कि अगर उसके कालेज में स्टूडेंड यूनियन होती तो उसे यह खतरनाक कदम नहीं उठाना पड़ता. उसने अपने सुसाइट नोट में यह सुझाव भी दिया था कि हर कालेज में अनिवार्य रूप से स्टूडेंट यूनियन का गठन होना चाहिए.”       

यह वाकया सुनने के बाद लिंगदोह कमेटी के सदस्य डूसू पदाधिकारियों से छात्र संघ पर प्रतिबंध लगाने की बजाए, छात्र संघ को कैसे बेहतर और प्रभावी बनाया जाए, इस पर घंटे भर चर्चा करते रहे.  यह एक आम धारणा है कि छात्र संघ गुंडा और अराजकतत्वों का अड्डा बन गया है. शायद इसी धारणा के शिकार जे एम लिंगदोह भी थे. तभी उन्होंने डूसू पदाधिकारियों से सीधे छात्र संघ पर प्रतिबंध लगाने की बात की. लिंगदोह कमेटी की सिफारिशे देशभर में लागू हो चुकी हैं. यह अलग बात हैं कि कमेटी की बहुत सारी सिफारिशे अव्यवहारिक और छात्र आंदोलनों को कमजोर करने वाली हैं. इस पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है. लेकिन हकीकत यही है कि लाख कमियों के बावजूद छात्र संघ आज भी न केवल छात्र हितों के लिए कार्य कर रहे हैं बल्कि समय समय पर वे दबाव समूह के रूप में कई स्थानीय, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय मुद्दों पर हस्तक्षेप भी करते हैं और रचनात्मक व सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा भी देते हैं. जिस तरह से देश में निजी विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों की भरमार होती जा रही है, ऐसे में छात्रों को इनके शोषण से बचाने के लिए छात्र संघ की कहीं ज्यादा जरूरत है. पूर्व छात्र नेता श्रीकांत शर्मा कहते हैं, "छात्र संघ छात्रों को शिक्षकों और कालेज व विश्वविद्यालय प्रशासन की मानमानियों से बचाता है. दरअसल, छात्र संघ छात्र हितों के लिए ढ़ाल की तरह काम करता है. विश्वविद्यालय और कालेज प्रशासन के कामकाज में पारदर्शिता लाने में छात्र संघों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है. मौजूदा हालात में तो छात्र संघ कहीं ज्यादा प्रासंगिक हैं.” 

यह सच है कि छात्र संघों में अपराधी तत्वों की घुसपैठ हुई है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं की गुंडा तत्वों की सफाई करने के बदले छात्र संघ पर प्रतिबंध लगा दिया जाए. इसके और रास्ते निकाले जा सकते हैं. दरअसल, छात्र संघ की एक ऐसा मंच है जो कालेज व विश्वविद्यालय प्रशासन की मनमानी के खिलाफ आवाजा उठाता है. उनकी कारगुजारियों को उजागर करता है. यही वजह है कि शिक्षक और विश्वविद्यालय के ब्यूरोक्रेट नहीं चाहते हैं कि कैंपस में राजनीति को बढ़ावा मिले. इसके लिए दो उदाहरण देना लाजिमी है. दिल्ली विश्वविद्यालय में दिल्ली दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (डूटा) ने 1999 में 21 दिन लंबी हड़ताल की थी. इससे छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हुई. तब तत्कालीन डूसू अध्यक्ष जयबीर सिंह राणा ने कालेज में कम से कम 180 दिन की पढ़ाई की मांग को लेकर आंदोलन चलाया और विश्वविद्यालय प्रशासन को परीक्षा से पहले छात्रों का सिलेबस खत्म कराने के लिए मजबूर किया. दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि शनिवार और रविवार को कालेजों में पढ़ाई हुई. दूसरी घटना ने तो विश्वविद्यालय में तहलका ही मचा दिया था. जयबीर सिंह राणा कहते हैं, "दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्रों के लिए 75 फीसदी उपस्थिति अनिवार्य है. लेकिन यह नियम शिक्षकों पर लागू नहीं होता था. तब हमने एक सर्वे कराया और पाया की 71 शिक्षक ऐसे थे, जो कालेज न के बराबर आते थे. हमने इसकी शिकायत वीसी से की. जब कोई कार्रवाई नहीं हुई तो हमने उन शिक्षकों का नाम एक होर्डिंग पर लिखवा कर परिसर के क्रांति चौक पर टंगवा दिया. इसका परिणाम यह हुआ की अगले दिन से कालेजों में शिक्षकों की उपस्थिति बढ़ गई. ” 

जेपी का छात्र आंदोलन इस बात का गवाह है कि छात्र राजनीति से निकले लोगों ने देश का नेतृत्व किया है और कर रहे है. इस आंदोलन से निकले हुए तमाम नेता आज संसद में मौजूद हैं. युवा तुर्क कहे जाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चंद्रशेखर छात्र संघ की ही देन थे. जिसने आपातकाल में इंदिरा गांधी का सिंहासन हिला दिया था. अरुण जेटली, अजय माकन, सीतारा येचुरी, प्रकाश कारत, लालू प्रसाद के अलावा कई केंद्रीय नेता और मंत्री छात्र संघ की देन हैं.छात्र संघ केवल छात्रों की समस्याओं को हल करने का जरिया भर ही नहीं है.  यह लोकतंत्र की पहली सीढ़ी है. जहां छात्र न केवल लोकतंत्र का ककहरा सीखता है बल्कि छात्र संघ चुनावों में मतदान के जरिए वह लोकतंत्र में सीधे हस्तक्षेप करना भी सीखता है. इसलिए छात्र संघ के महत्व को संकीर्णता की बजाए व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए. कालेज और विश्वविद्यालय परिसर केवल शिक्षा के गढ़ ही नहीं रहे हैं, बदलाव और क्रांति के वाहक भी रहे हैं.  दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह भी है. देश में जब आपातकाल लगा तो इसके विरोध की चिनगारी विश्वविद्यालय परिसरों से ही उठी. जब देश में भ्रष्ट नेताओं और गंदी राजनीति का बोलबाला बढ़ रहा है, तब ऐसे में छात्र संघों के जरिए युवाओं और नौजवानों का देश की राजनीति में हस्तक्षेप समय की जरूर बन गई है.  छात्र संघ से निकल कर सक्रिय राजनीति में शामिल हुए युवा भाजपा नेता कुलजीत सिंह चहल कहते हैं, "छात्र राजनीति देश के युवाओं की टीस को समझने का एक माध्यम हैं. जिस देश की आबादी में दो तिहाई हिस्सा युवाओं का है वहां आप छात्र संघों पर रोक लगाने की बात कर रहे हैं. आज देश में अशिक्षित और अपराधी किस्म के नेताओं की भरमार है. इनका सफाया करना है तो छात्र राजनीति को बढ़ावा देना होगा. देश को पढ़े लिखे और नौजवान नेता विश्वविद्यालय के परिसरों में ही मिलेंगे.” छात्रों की ताकत का महत्व समझने के लिए आसाम के पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत की चर्चा जरूरी है. छात्र नेता महंत के नेतृत्व में आसाम में विदेशी भगाओं आंदोलन इस कदर परवान चढा की छात्रों ने वहां की सत्ता ही पलट दी.  चुनाव में प्रफुल्ल की पार्टी असम गण परिषद को भारी बहुमत मिला. सारा आंदोलन और चुनाव विश्वविद्यालय परिसर और छात्रावासों से संचालित किया गया. प्रफुल्ल कुमार महंत ऐसे छात्र नेता थे, जो छात्रावास से निकल कर सीधे मुख्यमंत्री निवास में पहुंचे थे.  समाजवादी छात्र सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. संजय लाठरा एक वाजिब सवाल उठाते हैं, "विश्वविद्यालय जब देश को डाक्टर, इंजीनियर. वैज्ञानिक और नौकरशाह देता है तो नेता क्यों नहीं? आज तो देश को सबसे ज्यादा जरूरत अच्छे नेताओं की है. इसलिए शिक्षकों और विश्वविद्यालय प्रशासन को छात्र संघ पर प्रतिबंध लगाने की बजाए छात्रों को राजनीति में जाने के लिए प्रेरित करना चाहिए.”    

आज के अभिवावक यह चाहते हैं की देश की राजनीति में सुधार हों और अच्छे नेता ही संसद में पहुंचे लेकिन यह कतई नहीं पसंद करते कि उनका बेटा या बेटी छात्र राजनीति और छात्र संघ चुनाव में हिस्सेदारी करे. लेकिन वे इस बात से अनभिज्ञ होते हैं कि छात्र संघ विद्यार्थियों में न केवल राजनीतिक चेतना पैदा करता ही है बल्कि उनके समग्र विकास मे महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाता है.  हैदराबाद के जवाहर लाल नेहरू टेक्नालॉजिकल यूनिवर्सिटी, हैदराबाद के छात्र नेता टी मोहनचारी कहते हैं,  "छात्र राजनीति से न केवल जागरुकता बढ़ती है बल्कि देश-दुनिया के मुद्दों पर समझ भी विकसित होती है. छात्र राजनीति हममें नेतृत्व क्षमता तो विकसित करती ही है, साथ ही हालात से लड़ने और चुनौतियों से सामना करना भी सीखाती है.”  इसलिए निजी विश्वविद्यलयों और कालेजों को भी छात्र संघ के गठन और अन्य कार्यों में छात्रों की सहभागिता पर विचार करना चाहिए. यंग लीडर्स कलेक्टिव के अध्यक्ष मधुकिश्वर देसाई कहते हैं,  "आईआईएम और एनयूजेएस जैसे देश के चोटी के  शिक्षण संस्थानों में अनुशासन समिति से लेकर अकादमिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में छात्रों की सक्रिय भूमिका रहती है. ये छात्र चुनाव द्वारा या फिर सर्वसम्मति से चुने जाते हैं.  इन संस्थानों को शिखर तक पहुंचाने में छात्रों की भी भूमिका होती है. अगर दूसरे निजी शिक्षण संस्थान और विश्वविद्यालय इस शिखर को छूना चाहते हैं तो उन्हें भी अपने छात्रों का शसक्तीकरण करना होगा और इस तरह की आजादी देनी होगी.”  
 
भारत में छात्र संघ का इतिहास बहुत ही सुनहरा रहा है. पिछले दो दशकों में इसमें गिरावट जरूर आई है. बावजूद इसके महत्व और इसकी प्रासंगिगता से इनकार नहीं किया जा सकता. लेकिन अब  विश्वविद्यालय प्रशासन और नौकरशाहों द्वारा छात्र संघों को खत्म करने की साजिश की जा रही है. लिंगदोह कमेटी की सिफारिशे भी काफी हद तक इसके लिए जिम्मेदार हैं. छात्र राजनीति से यूथ कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव तक का सफर तय करने वाले युवा नेता नदीम जावेद कहते हैं,  "सुप्रीम कोर्ट ने छात्र संघ चुनाव में सुधार के लिए लिंगदोह कमेटी का गठन किया था. जिसमें चुनाव खर्च, प्रत्याशियों के चयन और प्रचार के तरीकों पर अपनी सिफारिशें दी हैं, जिनमें कई अव्यवहारिक और छात्र संघ को कमजोर करने वाली हैं. विश्वविद्यालय और कालेज प्रशासन इन सिफारिशों की आड़ में छात्र संघ और छात्र राजनीति को समाप्त करने में लगा हुआ है. अपनी बौद्धिक चर्चा और युवा नेतृत्व पैदा करने के लिए चर्चित रहे जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में तो पिछले दो साल से छात्र संघ चुनाव ही नहीं हुए हैं.” सवाल,  केवल छात्र संघ चुनाव का नहीं है. सवाल है देश को युवा नेतृत्व देने का. यह नेतृत्व अगर कहीं से निकल कर आएगा तो वह विश्वविद्यालय परिसर ही है. संजय लाठरा कहते हैं, "होनहार और युवा नेतृत्व पैदा करने के लि्ए कालेजों में लोकतांत्रिक शिक्षा नाम से एक विषय अनिवार्य रूप से पढ़ाया जाना चाहिए. ताकि छात्रों में राजनीति के साथ साथ लोकतांत्रिक व्यवस्था की समझ विकसित की जा सके.”

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sanjay sharma on 28 July, 2010 18:20;30
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आपने सही लिखा है की समय समय पर वे दबाव समूह के रूप में कई स्थानीय, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय मुद्दों पर हस्तक्षेप भी करते हैं और रचनात्मक व सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा भी देते हैं. जिस तरह से देश में निजी विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों की भरमार होती जा रही है, ऐसे में छात्रों को इनके शोषण से बचाने के लिए छात्र संघ की कहीं ज्यादा जरूरत है.

लोग छात्र राजनीति को सिर्फ राजनीति न समझे ये युवाओ को आने वाले समय में किस प्रकार से राजनीति में भाग लेना है इस सबकी जानकारी देने वाली पाठशाला है| छात्रों को सिर्फ इस बात का ध्यान रखना चाहिए की राजनितिक दल उनका शोषण न कर सके और ये तभी संभव है जब छात्र स्वयं की बुद्धि और विवेक का प्रयोग कर निर्णय ले और आने वाले कल के लिए खुद को तैयार करे|
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RAJ SINH on 29 July, 2010 00:35;00
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बहुत संतुलित लेख . जो मैं कहना चाहता था आपने सब कह दिया .
अगर गुंडागर्दी के लिए छात्र संघों पर प्रतिबन्ध लगाना जरूरी है तो समूची राजनीती और लोक सेवा आयोग सहित सभी सरकारी तंत्र पर पाबंदी लगानी पड़ेगी जो भ्रष्ट व्यवस्था के लिए सब से ज्यादा जिम्मेदार है .
और देश को सिर्फ सम्पूर्ण क्रांति की और बढ़ना चाहिए जो नौजवान ही कर सकते हैं , अपनी लाश ढोते नेता नहीं .
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shailendra kumar on 29 July, 2010 23:46;46
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बेहतरीन लेख
आपको बहुत बहुत धन्यवाद्
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image अनिल पाण्डेय पत्रकारिता में मास्टर डिग्री. नई दिल्ली से प्रकाशित दैनिक समाचारपत्र जनसत्ता में पांच साल तक संवाददाता. इसके बाद माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में पांच साल तक व्याख्याता के तौर पर कार्य किया. वर्तमान में 13 भाषाओं में प्रकाशित साप्ताहिक पत्रिका द संडे इंडियन में प्रमुख संवाददाता के रुप में कार्यरत.
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