गैरसरकारी पर सवाल कितना जरूरी?
महात्मा गांधी ने ग्रामीण विकास में स्वयंसेवी प्रयासों की भूमिका को यह कहकर प्रोत्साहित करने का प्रयास किया था कि ‘राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ सामाजिक दायित्व’ भी आवश्यक है।’ हम भले ही राजनीतिक स्वतंत्रता हासिल कर चुके हों, लेकिन विडंबना ही कहा जायेगा कि परोपकार का जो काम कभी भारतीय समाज में नैतिक जिम्मेदारी समझ कर किया जाता था आज वह संगठित जरूर है, लेकिन कई किस्म की विकृतियां उसमें घर गई हैं और अब इसमें सुधार की जरूरत महसूस की जा रही है।
देश भर में 400 लोगों पर एक एनजीओ है। एक अंग्रेजी दैनिक में प्रकाशित इस खबर का कुल मिलाकर लब्बोलुवाब यह था कि इतनी बड़ी संख्या में गैर सरकारी संगठनों की मौजूदगी के बाद भी भारत में बड़े पैमाने पर गरीबी, अशिक्षा एवं पिछड़ेपन की समस्या आखिर बरकरार क्यों है? सवाल लाजिमी है और समय की भी मांग है कि गैरसरकारी संगठनों के बारे में हम विचार करें कि इन संगठनों पर सवाल कितने जरूरी है? जो स्वैच्छिक संगठनों को कटघरे में खड़ा करता है। एक सरकारी अध्ययन की रिपोर्ट को आधार बताकर प्रकाशित इस ख़बर के मुताबिक 2009 तक भारत में ऐसे संगठनों की संख्या 33 लाख तक बताई गई है। इस कथित रिपोर्ट के मुताबिक स्वैच्छिक संगठनों को 40 हजार करोड़ से 80 हजार करोड़ रुपये का अनुदान मिल रहा है। ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में 18 हजार करोड़ रुपये का अनुदान सामाजिक क्षेत्र के लिए घोषित किया गया था। जबकि 2007-08 में स्वैच्छिक संगठनों को मिली विदेशी अनुदान राशि 9,700 करोड़ रुपये बताई जा रही है। वहीं 1,600 से 2,000 करोड़ रुपये बड़े धार्मिक संस्थानों को दानस्वरूप दिये गए हैं। लेकिन इन सब आंकड़ों के आधिकारिक स्रोत का सही उल्लेख नहीं किये जाने से स्वयंसेवी संगठनों में फिलहाल इस ख़बर को सनसनी भर माना जा रहा है।
इस बीच कई तरह के सवाल इस बीच उठने लगे हैं, मसलन- ‘क्यों न गैर सरकारी संगठनों को आरटीआई के दायरे में लाया जाये? क्या इन संगठनों को सीएजी के अंतर्गत नहीं लाना चाहिए? क्या इन संगठनों के संचालन के लिए किसी नियामक बॉडी या फिर नोडल एजेंसी की स्थापना होनी चाहिए? स्वैच्छिक संगठनों की विश्वसनीयता, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक व्यवस्था के सम्पोषण के निमित्त इन संस्थाओं की स्वायत्तता से जुड़े तमाम सवालों पर जानकारों की अपनी अपनी राय है।
भारत में गैर सरकारी संगठनों के रजिस्ट्रेशन के लिए बने कानूनों में-‘सोसायटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट-1860, इंडियन ट्रस्ट एक्ट-1882, पब्लिक ट्रस्ट एक्ट-1950, इंडियन कंपनीज एक्ट-1956 (धारा-25), रिलीजियस एण्डोमेंट एक्ट-1863, चैरीटेबल एण्ड रिलिजीयस ट्रस्ट एक्ट-1920, मुस्लिम वक्फ़ एक्ट-1923, वक्फ़ एक्ट-1954 और पब्लिक वक्फ़ (एक्टेंशन ऑफ लिमिटेशन एक्ट) एक्ट-1959 शामिल हैं। इन अलग-अलग करीब दर्जन भर कानूनों के तहत स्वैच्छिक संगठनों का पंजीकरण किया जाना ही समस्या की जड़ माना जा रहा है। समग्र रूप से देखें तो स्वैच्छिक संगठनों के तौर पर रजिस्टर्ड इन संस्थाओं के आंकड़ों की सूची में कार्पोरेट्स द्वारा चलाए जा रहे प्राईवेट फांउडेशन, अरबों रुपये की संपत्ति वाले धार्मिक ट्रस्ट, वक्फ़ बोर्ड, करोड़ों रुपये की लागत से बने अस्पताल और शिक्षा के नाम पर मोटी रकम वसूलने वाली शैक्षिक सोसायटियां भी शामिल हैं। सवाल उठता है कि क्या इस प्रकार की संस्थाओं को जमीनी स्वैच्छिक संगठनों की श्रेणी में रखा जाना चाहिए? क्योंकि स्वैच्छिक संगठनों की विश्वसनीयता की असल समस्या यहीं से उपजती है। सवाल यह है कि विभिन्न स्वरूपों एवं उद्देश्यों वाली संस्थाओं को यदि एक ही वर्ग में रखकर इनके बीच 40 हजार करोड़ रुपये से 80 हजार करोड़ रुपये के लेनदेन अथवा अनुदान के आंकड़ों का पुलिंदा खड़ा कर दिया जाये तो क्या भिन्न-भिन्न वर्गों की संस्थाओं की सही तस्वीर सामने आ पायेगी? इस रिपोर्ट के मुताबिक 1970 में भारत में 1.44 लाख सोसायटीज रजिस्टर्ड थी, वर्ष 2000 में यह संख्या बढ़कर 11.22 लाख तक पहुंच चुकी थी। भूलना नहीं चाहिए कि इन आंकड़ों में धार्मिक संस्थान, वक्फ़ बोर्ड व गुजरात पोर्ट जैसे ट्रस्ट भी शामिल हैं, जबकि जमीनी स्तर पर समाज कल्याण या फिर विकास कार्यों से सीधे तौर पर इनका कितना सरोकार है, यह सर्वविदित है।
भारत की सामाजिक परंपरा के अनुसार परोपकार यहां की समाज व्यवस्था में निहित रहा है। लेकिन आधिकारिक तौर पर देखा जाये तो इसकी शुरुआत 1860 में अंग्रेजों द्वारा बनाये गए सोसायटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट से होती है। शुरुआती दिनों में इस क्षेत्र में क्रिश्चियन मिशनरीज का बोलबाला रहा। 1905 में ‘सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया’ नामक पहली सेकुलर एनजीओ गठित किए जाने का जिक्र इतिहास के पन्नों में दर्ज है। स्वतंत्रता के पश्चात् भारत सरकार ने समाज कल्याण एवं विकास कार्यों का सूत्रपात किया तो सिविल सोसायटीज संगठनों की भूमिका को वैकल्पिक एवं पूरक प्रयासों के तौर पर महत्वपूर्ण माना गया। पहली पंचवर्षीय योजना के दौरान यह साफ तौर पर कहा गया कि- ‘किसी भी प्रकार के सामाजिक एवं आर्थिक पुर्निमाण के कार्य में इन संगठनों की महती भूमिका रहेगी और सरकार उनके प्रयासों को मजबूत बनाने मंे पूरा सहयोग देगी।’ 1953 में सामाजिक विकास कार्यों से जुड़ी गतिविधियों को स्वयंसेवी संगठनों की मदद से अंजाम देने के लिए केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड का गठन हुआ। इस प्रकार की आधिकारिक मान्यता एवं फंडिंग के बाद तो गैर सरकारी संगठनों की संख्या भारत में निरंतर बढ़ती चली गई। 1958 में बड़ी स्वैच्छिक संस्थाओं के संघ के तौर पर ‘एसोशिएसन फॉर वाल्युन्टरी एजेंसीज फॉर रूरल डेव्लपमेंट’ (अवार्ड) का गठन किया किया गया। 1965-66 और 1966-67 में पड़े सूखे के दौरान राहत कार्यों के लिए कई अंतर्राष्ट्रीय स्वयंसेवी संगठनों ने भारत में प्रवेश किया और बाद में वे यहीं के होकर रह गए।
धीरे-धीरे सामुदायिक सशक्तिकरण, जनभागीदारी, लोकतांत्रिक निकायों के सशक्तिकरण और बुनियादी सुविधाओं की पहुंच आम आदमी तक सुनिश्चित करने में सरकार व गैर सरकारी संगठनों के प्रयास लगभग एकसार से दिखने लगे। जबकि नौकरशाही की तरह स्वयंसेवी संगठन एक ही कलेवर में नहीं बंधे होते, बल्कि इन सभी संगठनों की अपनी एक विशेषता होती है और लचीलेपन के कारण स्थानीय जरूरतों को पूरा करने में ये अधिक सक्षम होते हैं।
विदेशी पूंजी जब भारतीय स्वयंसेवी संगठनों को मिलने लगी तो उनके कार्य और स्वरूप में भी परिवर्तन आने लगा। 70 के दशक में ग्रामीणों तक जब बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने की मुहिम जोर पकड़ रही थी तो कुछेक एजेंसियां अस्तित्व में आई। ‘पीपुल्स एक्शन फॉर डेव्लपमेंट ऑफ इंडिया’ भी इन्हीं में से एक एजेंसी थी, जिसमें विदेशों में प्रशिक्षित लोग शामिल थे। इस तरह के प्रयासों से एक प्रोफशनल वातावरण भारत के स्वैच्छिक जगत में उभरने लगा था। 1970 और 80 के दशक मंे स्वयंसेवी संगठनों को विकास कार्यों में राज्य के सहभागी के तौर पर मान्यता मिलने लगी। जमीनी स्तर पर विकास कार्य, एडवोकेसी और विभिन्न स्तरों पर वंचितों को उनके अधिकारों के प्रति सजग बनाने में इन संगठनों का बड़ा हाथ रहा।
गैर सरकारी संगठनों के क्षेत्र में 1990 का दशक व्यवस्थित बंदोबस्त का दौर माना जाता है। अब दूसरे देशों से आने वाला पैसा सीधे तौर पर सरकार, एनजीओ नेटवर्क और बड़े कार्पोरेट एनजीओ को जाने लगा। जिसके कारण समुदाय के स्तर पर सामाजिक एवं आर्थिक शोषण के कारण उभरे छोटे-मोटे नागरिक संगठन एवं सामुदायिक प्रयास हाशिये पर चले गए। ‘पार्टीसिपेटरी रिसर्च इन एशिया’ (प्रिया) द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक 73.4 प्रतिशत संस्थाओं के पास अधिक से अधिक एक वैतनिक कर्मचारी होता है। ‘प्रिया’ द्वारा किया गया सर्वे इस बात का भी खुलासा करता है कि 26.5 फीसदी गैर सरकारी संगठन धार्मिक गतिविधियों में संलग्न हैं। जबकि सामुदायिक क्षेत्र में कार्य करने वाले गैर सरकारी संगठनों की संख्या 21.3 फीसदी ही है। पांच मंे से एक गैर सरकारी संस्था शिक्षा क्षेत्र में कार्य करती है, जबकि 17.9 फीसदी संस्थाएं खेल व संस्कृति को बढ़ावा देने के काम में जुटी हैं। वहीं स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्य करने वाली संस्थाओं की संख्या महज 6.6 फीसदी है।
आज गैर सरकारी संगठनों केे गठन से लेकर उनकी गतिविधियों एवं फंडिंग पर तमाम तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं। हालांकि पूरी तस्वीर का अंदाजा किसी को नहीं है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में गैर सरकारी संगठनों की संख्या में बहुत तेजी से बढ़ोत्तरी हो रही है। लेकिन इन संगठनों से संबंधित आधिकारिक डाटाबेस तैयार करने की अभी कोई पहल नहीं हुई है और न ही उनकी गतिविधियों और फंडिंग से जुड़े मामलों में पारदर्शिता कायम रखने के लिए कोई प्रयास किया गया है। हालांकि कुछ संस्थाओं ने अपनी साफ-सुथरी छवि बनाये रखने के लिए वार्षिक रिपोर्ट बनाना और गतिविधियों का लेखा-जोखा प्रकाशित करना शुरु कर दिया है। कुछेक गैर सरकारी संगठनों ने स्वैच्छिक जगत की संस्थाओं के कामकाज में पारदर्शिता की स्थापना के लिए प्रयास भी किए हैं। ‘वाणी’ ने इन संगठनों की पारदर्शिता को लेकर कुछेक मापदंड तय किये हैं, जिसे ‘क्रेडिबिल्टी अलायंस’ द्वारा क्रियान्वित किये जाने का प्रयास किया जा रहा है। कुछ समय पहले ‘सीएसओ पार्टनर्स’ ने भी कामकाज में पारदर्शिता बरतने वाली कई संस्थाओं को पुरस्कृत किया था।
2007 में स्वैच्छिक क्षेत्र के लिए राष्ट्रीय नीति बनाई गई। इस नीति को स्वैच्छिक संगठनों की स्वायत्तता एवं पहचान को बिना प्रभावित किये, सरकार एवं स्वैच्छिक क्षेत्र के बीच एक नया कार्यशील संबंध विकसित करने की प्रक्रिया का आगाज माना जाता है। योजना आयोग ने देश के विकास में सिविल सोसायटी संगठनों की प्रभावशाली भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए स्वायत्त नियामक बॉडी गठित करने की पहल की थी, लेकिन मामला अधर में लटक गया। 1990 के बाद योजना आयोग की पहल पर ही सरकार एवं गैर सरकारी संगठनों के बीच संवाद कायम करने के लिए बातचीत का दौर शुरु हुआ। 1990 के बाद ‘कपार्ट’ को विकेन्द्रीकृत किया जाने लगा, जिससे कि गैर सरकारी संगठनों की उल्लिखित सेवाओं का लाभ वंचितों एवं गरीबों तक अधिक मात्रा में पहुंचाया जा सके। उल्लेखनीय है कि 1986 में कपार्ट का गठन ग्रामीण विकास के कार्य में स्वयंसेवी संगठनों के प्रयासों के प्रोत्साहन एवं सहयोग के उद्देश्य से किया गया था।
गैर सरकारी संगठनों की फंडिंग के लिए सरकार ने खादी एवं ग्रामोद्योग कोऑपरेटिव, केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड, नेशनल वेस्टलैण्ड डेव्लपमेंट बोर्ड और कपार्ट जैसी संस्थाएं गठित की हैं। जिसके कारण नागरिक संगठनों के प्रयासों की निर्भरता राज्य पर निरंतर बढ़ती चली गई। इस तरह की परिस्थितियों के कारण गैर सरकारी संगठनों का महत्व एवं स्वायत्तता ख़तरे में पड़ती नज़र आती है। कई बार ऐसा लगता है कि गैर सरकारी संगठन कहीं सार्वजनिक क्षेत्र की परियोजनाओं को कार्यान्वित करने के औजार भर बनकर तो नहीं रह गए हैं। देखा जाये तो सरकार के साथ गैर सरकारी संगठनों की भिन्न-भिन्न प्रकार की जुगलबंदी देखने को मिलती है। इसमें तीव्र विरोध से लेकर करीबी एवं सहयोगपूर्ण साझेदारी दोनो पक्षों के बीच देखने को मिलती है और यही वह परिस्थिति है जो समाज सेवा के काम जुटे नौकरशाहों एवं गैर सरकारी संगठनों की भूमिका को संदिग्ध बनाती है।
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- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
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- अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
- अपने होने पर ही हैरान
- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
- एनसीपी के 'दादा' का दांव
- पीएमओ वाले पृथ्वीराज
- गोली लगने के बाद क्या गांधी ने कहा था- हे राम ?



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और यह भी कि हम वोट क्यों देते हैं और किसे देते हैं जिसके बाद आखिर कौन बनता है गैर सरकारी संगठन या सरकार ? क्या आपको नहीं लगता कि आपके इस बचकाने सवाल के चक्कर में कहीं न कहीं हम न केवल सरकार की जवाबदारियों से उसे बचा रहे हैं, बल्कि उसकी भूमिका उसके फलक को भी कम करके आंक रहे हैं ?
कहीं आप दूसरा बचकाना सवाल यह न कर दे तो कि भाई साहब फिर गैर-सरकारी संगठनों का क्या काम होता है ? तो भाई साहब अगर आपने स्कूल के दिनों में नागरिक शास्त्र की किताब पड़ी हो तो उसमें एक शब्द बार-बार आता है- "दबाव समूह". लोकतंत्र में इस दबाव समूह की बड़ी अहम् भूमिका होती है. मगर अफ़सोस कि आप इस भूमिका में गैर-सरकारी संगठनों के लेकर हाज़िर हो गए हैं. आप का तर्क उतना ही बेतुका है, जितना मेरा यह कहना कि "इतनी बड़ी संख्या में मीडिया संस्थानों की मौजूदगी के बाद भी भारत में बड़े पैमाने पर गरीबी, अशिक्षा एवं पिछड़ेपन की समस्या आखिर बरकरार क्यों है?" क्योंकि मीडिया को भी लोकतंत्र में एक जरूरी दबाव समूह माना गया है. इसलिए इसका भी काम गरीबी दूर करना नहीं बल्कि गरीबी के पीछे छिपे कारणों की पड़ताल करना है.
आप सरकार की भूमिका और उसकी बराबरी में इन गैर सरकारी संगठनों को क्यों रख रखे है ? अगर बन पड़े तो इसका जवाब जरूर दीजिएगा. बाकी आपके आलेख में ही बहुत से विरोधाभास छिपे हैं, जिनकी बातें बाद में..
भूमिकाजी आपने एक महत्वपूर्ण बात कही है कि अगर सब कुछ संस्थाएं ही कर दें तो सरकार क्या करेगी. दरअसल सारा काम सरकार को ही करना है, देश में स्वयंसेवी संस्थाओं की कोई जरूरत ही नहीं है. संस्थाएं जो जो काम करती हैं उसे सरकार को करना चाहिए. मगर अब सरकार इन कार्यों से यह कह कर पल्ला झाड़ लेती है कि इसके लिए तो एनजीओ हैं हीं और एनजीओ क्या करते हैं यह उमाशंकरजी ने बता ही दिया.
आपने दवाब समूह कि बात अच्छी उठाई. वाकई एनजीओ को अपनी भूमिका दवाब समूहों तक ही सीमित कर लेनी चाहिए मगर वे देश को अशिक्षा, गरीबी, भुखमरी आदि से मुक्त करने का दावा करने से नहीं चूकते. इसके लिए सरकार और अन्य एजेंसियों से जम कर फंड लेते हैं मगर जब रिजल्ट कि बात आती है तो हाथ खड़े कर देते हैं.
मेरे पास तो इस सम्बन्ध में इतना ही ज्ञान है, मगर योगेश दीवानजी ने रविवार.कॉम पर इस सम्बन्ध में बड़ा जबरदस्त आलेख लिखा है...इस लिंक पर देख लें.
http://raviwar.com/news/363_public-private-partnership-yogesh-diwan.श्त्म्ल
वैसे आपकी टिपण्णी पढ़ कर लगता है कि आपके पास भी ज्ञान कि कमी नहीं है, पर शायद ज्ञान से अधिक ज्ञान का दंभ है यह आपकी भाषा से लगता है...
दंभ नुकसानदेह होता है, उमाशंकरजी इतने भी बचकाने नहीं हैं...
अगर ये जरूरी हैं तो क्यों और अगर नहीं है तो क्यों नहीं ?
मेरी उत्सुकता है कि इस बारे में लेखक की अपनी समझ क्या है, और कितनी है ?
मगर उमाशंकर जी तो अपनी भूमिका में ही एनजीओ की भूमिका को गलत रेखांकित कर रहे हैं, मेरी आपत्ति भी केवल उसी तक सीमित है। आप आलेख की भमिका की अंतिम लाइन देखिए, लेखक तो संगठनों के वजूद पर ही सवाल खड़े कर रहे हैं, ऐसा कहते हुए उन्हांने कहीं भी संगठन और संगठन के भीतर के फर्क को स्पष्ट नहीं किया है। जबकि योगश दीवान जी ने किया है, इससे भ्रांतियां पनपती हैं, मेरी चिंता यही तक है। उमाशंकर जी के हिसाब से तो देश में संगठन नाम की चिड़िया होनी ही नहीं चाहिए, क्या पुष्यामित्र जी भी इस बात पर इत्तेफाक रख सकते हैं ?
यहां पूरा आलेख भूमिका के मुताबिक नहीं है। जहां भमिका में गैर सरकारी संगठनों के होने या न होने पर सवाल उठाया गया है, वहीं इसके बाद से लेखक इस सवाल से जैसे कन्नी काटते हुए आगे चलते हैं, और मौजूदा परिस्थितियों से इतर इतिहास में केवल जाने के लिए जाते हैं, आकड़े भी रखने के लिए रखते हैं, मगर इस इतिहास और उनके आकड़ों के पीछे का क्या मकसद और तर्क हैं, यह भी समझ आता तो अच्छा रहता।
यह सच है कि भारत में कई तरह के संगठन पनप रहे हैं, मगर सभी गैर सरकार संगठनों को एक जैसा मानते हुए (एक भी जगह जाहिर नहीं किया गया है कि कुछ संगठन अलग भी है और ऐसे हैं ) यह कह देना कि ये संगठन कितने जरूरी है, जायज नहीं है। तो फिर उमाशंकर जी बताएं कि सूचना के अधिकार से लेकर, मनरेगा, मिड डे मील, राइट टू एजुकेशन से लेकर राष्ट्रीय पुनर्वास नीति तक के इतिहास और आकड़ों को वह किस रुप से लेंगे ? और इनके मौजूदा मूल्यांकन को भी वह किस रुप में लेंगे ? और राईट टू फूड को लेकर सरकार पर जो दवाब बन रहा है, और विस्थापन से लेकर भष्ट्राचार की जगह-जगह जो लड़ाईयां लड़ी जा रही हैं, क्या नाम देंगे ?
जबाव के इंतजार में....
मुझे लगता है कि पत्रकारों को केवल आलेख लिखने के लिए आलेख नहीं लिखना चाहिए, बल्कि जब भी आलेख लिखने बैठे तो यह भी सोचे कि उनकी मूलभूत दृष्टि क्या है, और उनके पुराने आलेख क्या हैं, क्या इस आलेख से नए आलेखों पर असर पड़ेगा ? सवाल केवल आइडिया और एंगेल का नहीं है, सवाल पूरी विचारधारा का भी है। यहीं आकर योगेश दीवान, सुनील और उमाशंकर के आलेखों में अंतर हो जाता है।
एक भाई ने मिड डे मील, मनरेगा, राइट टू एजुकेशन आदि का जिक्र किया है. क्या वे इन योजनाओं के अंजाम से परिचित नहीं हैं. एक भाई कहते हैं कि अगर एनजीओ की जरुरत नहीं तो मीडिया और विपक्ष की क्या जरुरत है. यहाँ सवाल जरुरत का नहीं है सवाल एकाउंटेबिलिटी का है. मीडिया किसी से फंड नहीं लेता है, विपक्ष संवैधानिक जरूरत है. मगर एनजीओ न संवैधानिक जरूरत है और न ही अपनी आय से चलता है. यह दुनिया को बदलने के लिये सरकार और दूसरे लोगों से पैसे लेता है. ऐसे में क्या इनके काम का आकलन नहीं होना चाहिये, यह तय नहीं किया जाना चाहिये कि इन्होंने जितने पैसे खर्चे उसका क्या परिणाम निकला.
जब हम और आप ऐसे सवाल करने लगेंगे तो खुद ब खुद फर्जी संस्थाएं भाग खड़ी होंगी. ये संस्थाएं सिर्फ फाइनेंशियल आडिट करवा कर सोचती हैं कि ये पाक साफ हो गई जबकि इन्हे इस बात का भी हिसाब देना होगा कि इन्होंने दूसरें से फंड लेकर जो काम किये उसका रिजल्ट कैसा रहा.
नंबर दो- पुष्या जी ने यहां बहुत के ज्ञान में अतिरिक्त बढ़ोतरी की है। भाई बोलते हैं कि यहां सवाल जरूरत का नहीं है, सवाल केवल एकांउटीबिली का है, मगर वह साथ-साथ यह भी जता जाते कि मीडिया और विपक्ष को इस एकांउटीबिली से दूर क्यों ले जा रहे हैं तो अच्छा होता, खैर। वह आगे कहते हैं- मीडिया किसी से फंड नहीं लेता। सभी जन इस अहम तथ्य पर गौर फरमाएं और इसका सारा श्रेय पुष्या जी को देना न भूले कि: मीडिया बगैर फंड के चलता है। वह आगे कहते हैं विपक्ष संवैधानिक जरूरत है। मगर इसके आगे वह यह भी जता जाते कि गैर सरकारी संगठन संवैधानिक जरूरत क्यों नहीं तो अच्छा होता, खैर। गैर सरकारी संगठन संवैधानिक की तुलना करते हुए वह यह पचा जाते हैं कि विपक्ष को चलने के लिए भी किसी आय की जरूरत होती है या नहीं होती है।
जबकि सच यही है कि न केवल गैर सरकारी संगठन बल्कि चलने के लिए सभी को सरकारी या दसरों की आय के भरोसे ही रहना है। इसके बावजूद पुष्या जी तीनों को एक-दूसरे से अलग-अलग किए देते हैं, और दिलचस्प है कि बगैर किन्हीं तर्कों और तथ्यों के। और जबकि सच यही है कि तीनों सरकारी या दूसरी आय के भरोसे ही हैं तो उसमें से दो यानी मीडिया और विपक्ष पैसे के खर्च के परिणाम से भी बचे तो क्यों बचे ? साथ ही साथ कृप्या यह भी स्पष्ट हो तो अच्छा है।
मैं भी फर्जी एनजीओ के खिलाफ हूं मगर जल, जमीन, जंगल की लड़ाई, विस्थापन से लेकर भष्ट्राचार की लड़ाई और नीतिगत बदलाव की लड़ाई को जनआंदोलनों और जनसंगठनों की जीत के तौर पर देखना चाहिए। मगर यहां तो उसकी समीक्षा से लेकर बदलावों को भी फर्जी एनजीओ की भुमिका के तौर पर देखा जा रहा है। यह बचकाना है या नहीं ?
अन्यथा ऐसे सरसरी आलेखों से आम जनता के बीच काफी गलतफहमियां फैलती हैं और अप्रत्यक्ष रुप से जिसका फायदा कारर्पोरेट और सरकार को ही मिलता है। यह दोनों चाहते भी हैं कि सभी गैर सरकारी संगठनों को एक कतार पर खड़ा कर दिया जाए।
Pls check link :
http://samatavadi.wordpress.com/2010/04/19/foreign_hand_ngos/
अस्तु।
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