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एक खेल इंसानियत के खिलाफ

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कॉमन वेल्थ गेम की तैयारियों में हुए भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने के लिए भावुकता और देशभक्ति का सहारा लिया जा रहा है। कांग्रेसी नेता राजीव शुक्ला कहते हैं कि 'भ्रष्टाचार की बात करने से पहले सबसे ज्यादा जरुरी है कि सब मिल जुल कर खेलों को कामयाब बनाने के लिए जुट जाएं। कॉमन वेल्थ गेम देश की इज्जत का सवाल है। खेल कामयाबी के साथ सम्पन्न हो जाएं तो फिर भ्रष्टाचार की बात भी होगी'।

इस तरह की बात करने वाले राजीव शुक्ला अकेले नहीं है। दरअसल, राजीव शुक्ला जैसे लोग चाहते यह हैं कि किसी तरह से खेल बिना किसी बाधा के सम्पन्न हो जाएं, फिर भ्रष्टाचार का मामला नेपथ्य में चला जाएगा। पूरा देश और मीडिया भ्रष्टाचार को भूलकर खेलों के भव्य आयोजन के लिए सरकार के हक में कसीदे पढ़ेगा। लेकिन यहां सवाल भ्रष्टाचार का ही नहीं है। सवाल बहुत सारे हैं। क्या उस देश में, जहां 64 करोड़ लोग गरीबी की रेखा से जीने के लिए मजबूर हों, 46 प्रतिशत बच्चे और 55 प्रतिशत महिलाएं कुपोषण का शिकार हों, चिकित्सा का सर्वथा अभाव हो, स्कूल खंडहरनुमा इमारतों और टेंटों में चलते हों, पीने का साफ पीना मुहैया न हो, वहां पैंतीस हजार करोड़ का खजाना कॉमन वेल्थ गेम पर लुटा देना कहां की इंसानियत है? कॉमनवेल्थ गेम का बजट 1, 899 करोड़ रुपए का था, जो बढ़कर पैंतीस करोड़ हो गया है यानि सीधे-सीधे 1800 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। पैंतीस हजार करोड़ रुपए से न जाने कितने अस्पताल, स्कूल और कालेज खोले जा सकते थे। कॉमन वेल्थ गेम के आयोजन से सबसे बड़ी मार गरीबों पर ही पड़ रही है। सड़क पर खाना बेचने वाले और वहां खाना खाने वाले दोनों ही गरीब होते है। सड़क पर बने स्थायी और अस्थायी ढाबों को बंद किया जा रहा है। एक गरीब आदमी का रोजगार बंद हो गया, दूसरे के हाथ से सस्ता खाना चला गया। दस से बीस रुपए में अपना पेट भरने वाला आदमी कैसे अपना पेट भरेगा ?

कांग्रेस नेता मणिशंकर अयर का यह कहना कहीं से भी गलत नहीं है कि 'कॉमन वेल्थ गेम छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में क्यों नहीं कराए गए जहां, खेलों के साथ ही वहां का विकास भी हो जाता'? मणिशंकर इंगलैंड के मानचेस्टर का उदाहरण देकर कहते हैं कि 'ईस्ट मानचेस्टर जैसे पिछड़े इलाके में 2002 में कॉमन वेल्थ गेम कराए गए। इसका नतीजा यह हुआ कि इस बहाने वहां का विकास हुआ और रोजगार बढ़ा'। दंतेवाड़ा तो एक उदाहरण भर है। कह सकते हैं कि वहां नक्सल समस्या के चलते ऐसा सम्भव नहीं था। लेकिन देश में ऐसे बहुत से इलाके हैं, जो आजादी के बाद से ही विकास को तरस रहे हैं। ऐसे की किसी इलाके में खेल कराकर वहां का विकास किया जा सकता था। लेकिन सरकार का अभिजात्य वर्ग कब यह चाहता है कि वो देश के दूर दराज के पिछड़े इलाके में जाकर धूल फांके? हां, विकास के नाम पर पूरी दिल्ली को को खोद डालना उन्हें मंजूर है। दिल्ली में भी उन्हीं इलाकों को और ज्यादा चमकाया जा रहा है, जो पहले से चमकते रहे हैं, जहां आभिजात्य वर्ग निवास करता है। मलिन बस्तियों की सुध नहीं ली जा रही है।

दिल्ली में ही खेल कराने की मजबूरी थी तो समय से पहले ही तैयारी पूरी क्यों नहीं की गईं? तैयारी इतनी अधूरी है कि शक होता है कि खेल हो भी पाएंगे या नहीं? भ्रष्टाचार के कीचड़ को नजरअंदाज करने की बात कहने वाले लोग पता नहीं दिल्ली के उन इलाकों में जाते हैं कि नहीं जहां, विकास के नाम पर सड़कों को खोद कर डाल दिया गया है। वे लोग कभी उधर से गुजरें तो अपनी आंखों से दिल्ली में फैली धूल और कीचड़ देखने की जहमत करें। कनॉट प्लेस की सूरत बिगाड़ दी गयी है। मैं पूरे दो साल से हर हफ्ते देखता हूं कि कनॉट प्लेस को चमकाने की कोशिश की जा रही है। लेकिन काम पूरा नहीं हुआ। ऐसा लगता भी नहीं कि अक्टूबर तक पूरा हो जाएगा। शिवाजी स्टेडियम की निर्माण प्रगति देखकर कोई यह कहने का साहस नहीं कर सकता कि ये पचास दिन में पूरा जो जाएगा। दिल्ली को 'इंटरनेशनल लुक' देने के नाम पर उसका

वास्तविक स्वरूप भी बिगाड़ा जा रहा है। काम इतनी धीमी गति से हो रहा है कि देखकर कोफ्त होती है। सच तो यह है कि कॉमन वेल्थ गेम के लिए दिल्ली को समय से लगभग छह महीने पहले तैयार हो जाना चाहिए था। यह तय है कि आधी-अधूरी तैयारियों के बीच खेल सम्पन्न होने के बाद अधूरे काम कभी पूरे नहीं होंगे। यह जरुर होगा कि ठेकेदार अपना पैसा वसूल कर लेगा। यह कहकर नहीं बचा जा सकता कि बारिश की वजह से काम बाधित हुआ। सबको पता है कि उत्तर भारत में जौलाई से लेकर अक्टूबर मध्य तक बरसात का मौसम होता है। दुनिया को यह भी पता है कि मात्र दो घंटे की बारिश से दिल्ली की सड़कें तालाब में तब्दील हो जाती हैं। भयंकर जाम लग जाता है। ट्रेफिक सिगनल काम करना बंद कर देते हैं।

कॉमन वेल्थ गेम का समय भी ऐसा है, जिसमें बारिश हो सकती है। जरा सोचिए यदि उस समय दो-चार घंटे बारिश हो गयी तो तब देश की इज्जत का क्या होगा? इससे इतर, इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि दिल्ली में गुरबत दिखाई न दे। इसके लिए गरीबों को दिल्ली से बाहर खदेड़ा जा रहा है। भिखारियों को उठा कर बंद किया जा रहा है। क्या कीचड़ पर कालीन बिछा देने से कीचड़ का वजूद खत्म हो जाएगा ? क्या दुनिया को नहीं पता कि भारत में कितनी गुरबत है? क्या दुनिया को यह नहीं पता कि भारत जैसे गरीब देश में अभी तक अनाज भंडारण की भी सही व्यवस्था नहीं है? कॉमन वेल्थ गेम पर पानी की तरह पैसा बहाने वाली सरकार को यह सुध क्यों नहीं आती कि अनाज को सुरक्षित रखना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए ? विडम्बना देखिए कि अनाज के सुरक्षित भंडारण का ख्याल एक मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल को आता है। संगठन सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करता है।

सुप्रीम कोर्ट सरकारों को अनाज के सुरक्षित भंडारण के लिए नए गोदाम बनाने की सलाह के साथ ही खुले में सड़ रहे अनाज को गरीबों में बांट देने की सलाह देता है। इस देश में कॉमन वेल्थ गेम कराना ऐसे ही जैसे एक मजदूर शाम को अपनी मजदूरी को जुए और शराब में उड़ा दे और उसके बच्चे भूखे ही सो जाएं।

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priy ranjan on 23 August, 2010 17:37;47
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कॉमन वेल्थ गेम का समय भी ऐसा है, जिसमें बारिश हो सकती है। जहाँ तक हम भारतीय को जानकारी है की यह आयोजन अक्टूबर के पहले हफ्ते से शुरू हो रहे हैं, और दिल्ली में तो इस मौसम में बारिश होती नहीं है, सलीम अख्तर सिद्दीक़ी है कि उस समय दो-चार घंटे बारिश का अंदेशा जता रहे हैं- मिया जी ने ऐसे ही न जाने कितने कुतर्क अपने आलेख में रखे हैं. यक़ीनन कॉमन वेल्थ गेम्स पर पैसा फूँका भारत जैसे गरीन देश को शोभा नहीं देता. मगर यहाँ कॉमन वेल्थ गेम्स करवाने वालों से ज्यादा तरस सलीम साब की अकल पर तरस पर आता है.
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image सलीम अख्तर देश के अनेक समाचार-पत्रों में सामायिक मुद्दों पर लेख आदि लिखने के साथ ही टेक्निकल पुस्तकों का स्वतन्त्र लेखन। लेखन या पत्रकारिता का कोई कोर्स नहीं किया। लिखने की शुरुआत 1984 से दिल्ली से प्रकाशित होने वाले 'हिन्दुस्तान' और 'नवभारत टाइम्स' में सम्पादक के नाम पत्रों से की थी। हौसला बढ़ा तो सम्पादकीय पेज पर छपने के लिए लिखना शुरु किया। मशहूर पत्रकार स्व0 उदयन शर्मा मेरे आइडियल रहे हैं। इसलिए कलम का इस्तेमाल हमेशा ही फिरकापरस्त ताकतों के खिलाफ और दबे-कुचले लोगों के पक्ष में चली है। जनवादी लेखक संघ से भी जुड़ा हुआ हूँ। संपर्क: saleem_iect@yahoo.co.in
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