नालंदा पर 'नकारा' सांसदों की ग्रेट डिबेट
आमतौर पर हम मानते हैं कि हमारी संसद और हमारे सांसद दोनों ही देश के सिर पर बोझ हैं. लेकिन नालंदा पर राज्यसभा में जो बहस हुई है उसे देख सुनकर ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि हमारे सांसद हमारे हैं ही नहीं. शुक्रवार को राज्यसभा में केन्द्र सरकार द्वारा बिहार के नालंदा में प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के लिए विधेयक पेश किया गया. इस विधेयक पर जो बहस हुई वह इतनी उम्दा थी कि उपसभापति महोदय को भी कहना पड़ा कि बहस इतनी स्तरीय थी कि वे घड़ी देखना ही भूल गये.
राज्यसभा में विदेश राज्यमंत्री प्रणीत कौर ने विश्वविद्याल की संकल्पना प्रस्तुत करते हुए कहा कि 15 जनवरी 2007 को ईस्ट एशिया समिट, फिलीपीन्स में जिस अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय बनाने के प्रस्ताव पर विचार हुआ था उसी विचार को आकार देने के लिए यह विधेयक प्रस्तुत किया जा रहा है. बिहार सरकार इस विश्वविद्यालय को बनाने के लिए उत्सुक है लेकिन क्योंकि यह एक अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय होगा इसलिए इसे बनाने की जिम्मेदारी केन्द्र सरकार की होगी. केन्द्र सरकार में भी इस विश्वविद्यालय को मानव संसाधन विकास मंत्रालय नहीं बल्कि विदेश मंत्रालय के अधीन रखा जाएगा क्योंकि इस प्रस्तावित विश्वविद्यालय में 15 देशों की बौद्धिक, आर्थिक हिस्सेदारी होगी. राज्यमंत्री के प्रस्ताव के अनुसार बिहार सरकार ने इस प्रस्तावित विश्वविद्यालय के जरूरी 446 एकड़ जमीन अधिगृहित कर ली है और ईस्ट एशिया समिट में प्रस्ताव के बाद 2007 में ही एक मेन्टर ग्रुप की स्थापना की जा चुकी है जिसके अध्यक्ष अमर्त्य सेन हैं. मेन्टर ग्रुप गया सहित अन्य स्थानों पर अब तक नौ मीटिंग कर चुकी है. सरकार प्रस्तावित विश्वविद्यालय में सात विषयों पर ज्ञान अर्जन के लिए समर्पित होगा जिसमें- बौद्ध अध्ययन, इतिहास, अंतरराष्ट्रीय संबंध एवं शांति अध्ययन, जनआधारित विकास, साहित्य और भाषा, पर्यावरण तथा मेन्टर ग्रुप की सलाह पर सूचना तकनीकि की भी पढ़ाई होगी.
हालांकि 150 मिलियन डॉलर की लागत वाला यह विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय बौद्ध समाज की रुचि के कारण दोबारा अस्तित्व में आ रहा है और इस विश्वविद्यालय के लिए पैसा भी अधिकांश वही उपलब्ध करा रहे हैं लेकिन इस प्रस्तावित विधेयक पर सांसदों ने जो बहस की वह पार्टी की विचारधारा और निजी राजनीतिक लाभ हािन से ऊपर उठकर थी. मसलन बहस की शुरूआत भाजपा के बाल आप्टे ने की. बाल आप्टे ने कहा कि आजादी के बाद से ही हमारे देश में जो कुछ सोच विचार और काम हुआ है यूरोप केन्द्रित रहा है. ऐसे में प्रस्तावित विश्वविद्यालय इस बात का संकेत है कि हम पश्चिम की बजाय पूरब की ओर देख रहे हैं. सौभाग्य से हमारे पास आफ्टा, साफ्टा और आसियान जैसे फोरम हैं जिनके द्वारा हम अपने आप पास के देशों के साथ बेहतर आर्थिक और राजनयिक संबंध स्थापित कर सकते हैं. बाल आप्टे ने कहा कि पिछले साल दिल्ली में दक्षिण एशिया विश्वविद्यालय बनाने का एक्ट पास कर दिया गया लेकिन इसके लिए सदन में कोई बहस नहीं की गयी. सौभाग्य से नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ ऐसा नहीं किया जा रहा है. नालंदा विश्वविद्यालय के प्रस्ताव पर सदन में चर्चा हो रही है. उन्होंने एक महत्वपूर्ण सुझाव देते हुए कहा कि इसे विश्वविद्यालय कहने की बजाय विद्यापीठ कहा जाए तो वह नालंदा की गरिमा के अनुकूल होगा. आप्टे ने कहा कि इक्कीसवीं सदी में जब दुनिया नालेज सोसायटी के रूप में विकसित हो रही है, यह प्रस्ताव निश्चित रूप से भारत को इस सोसायटी का महत्वपूर्ण हिस्सा होने में अहम भूमिका अदा करेगा. आप्टे ने कहा कि दुनियाभर से लोग भारत केवल धन की खोज में ही नहीं आते थे बल्कि वे ज्ञान की खोज में भी भारत आते थे. दुनिया में विश्वविद्यालय विकसित करने की अवधारणा भारत ने दी. नालंदा, तक्षशिला ज्ञान के ऐसे अग्रणी केन्द्र थे जहां दुनिया भर से स्कालर आते थे. बाल आप्टे ने एक महत्वपूर्ण बात यह मानी कि बिहार सभ्यता विकास के केन्द्र में है. आज जितनी भी सभ्यताएं भारत में फल फूल रही हैं उसके मूल में बिहार ही है.
बहस की अगली कड़ी में कांग्रेस के राज्यसभा सांसद डॉ कर्ण सिंह ने कहा कि हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक फैले विस्तृत भारतीय भूभाग ने सभी धर्मों पंथों को फलने फूलने का मौका दिया है. भारत में मुख्यरूप से चार धर्मों का जन्म हुआ है. हिन्दू, बौद्ध, जैन और सिख. हिन्दू और बौद्ध दो ऐसे धर्म हैं जिन्होंने देश के बाहर अपनी शिक्षाओं को लेकर गये हैं. उन्होंने याद दिलाया कि आपने अंकोरवाट का नाम सुना होगा. कम्बोडिया स्थित अंकोरवाट मंिदर का निर्माण एक हजार साल पहले किया गया था. उस वक्त यह एक वैष्णव और शैव मंदिर था. बाद में यह बौद्ध मंदिर हो गया. करीब एक वर्गकिलोमीटर में फैसे इस मंदिर परिसर में हिन्दू से बौद्ध होने की प्रक्रिया में कोई हिंसा नहीं हुई, कोई जोर जबर्दस्ती नहीं हुई. और यही हमारे धर्म की सबसे बड़ी खूबसूरती है कि हम शास्त्र के लिए शस्त्र का प्रयोग नहीं करते हैं. आप इण्डोनेशिया चले जाएं. वहां 95 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम आबादी है लेकिन वहां आज भी शिव और विष्णु के मंदिर उसी सम्मान के साथ मौजूद हैं जैसे वे बनाये गये थे. वहां राम के चरित्र का जो मंचन होता है वह हमारे यहां होनेवाली फूहड़ रामलीलाओं से बहुत खूबसूरत और सारगर्भित है. नालंदा विश्वविद्यालय के बारे में बताते हुए डॉ कर्ण सिंह ने कहा कि आठ सौ साल पहले ध्वस्त हुए इस विश्वविद्यालय में दुनियाभर से 2000 शिक्षक अध्ययन अध्यापन में रत थे. आज के हार्वर्ड और आक्सफोर्ड को मिला दें तो जितनी प्रतिष्ठा बनती है उतनी प्रतिष्ठा आठ सौ साल पहले नालंदा विश्वविद्यालय की थी. चीन, जापान, मंगोलिया, मध्य एशिया, बुखारा, अफगानिस्तान और तिब्बत से पढ़ने के लिए छात्र यहां पर आते थे. लेकिन आठ सौ साल पहले बख्तियार खिलजी की सेना ने इस विश्वविद्यालय को तहस नहस कर दिया. करीब दस हजार बौद्ध भिक्षुओं को जिन्दा जला दिया गया या काट डाला गया. नालंदा विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी छह महीने तक जलती रही. आप सोचिए नालंदा ज्ञान का कितना समृद्ध विश्वविद्यालय रहा होगा. लेकिन यह सब आठ सौ साल पहले की बात है. अब हमें नालंदा विश्वविद्यालय को फिर से स्थापित करना है. हां, सरकार को यह जरूर ध्यान रखना चाहिए कि विश्वविद्यालय का शिल्प पीडब्लूडी के अधिकारियों के भरोसे न तैयार किया जाए. इसका शिल्प और निर्माण सबकुछ हमारी ऐतिहासिकता को परिलक्षित करनेवाला होना चाहिए.
उत्तर प्रदेश से सांसद प्रमोद कुरील ने बहस में हिस्सा लेते हुए कहा कि नालंदा वर्तमान आक्सफोर्ड या हार्वर्ड जैसा था, कहने की बजाय आक्सफोर्ड और हार्वर्ड नालंदा जैसे हैं, कहना चाहिए. कुरील ने कहा कि आज से हजार दो हजार साल पहले भारत में उन विषयों का उच्चस्तरीय अध्ययन हो रहा था जो आज बहुत आधुनिक विषय समझे जाते हैं. उनमें एस्ट्रोनोमी, प्रबंधन और शिल्प भी शामिल था. कुरील ने कहा कि जब दुनिया अंधेरे से गुजर रही थी तब नालंदा पूरी दुनिया को ज्ञान का प्रकाश बांट रहा था. कुरील ने कहा कि हमारी परंपराएं, हमारा ज्ञान हमारी स्मृतियों में निहित है यही कारण है कि आज हम एक बार फिर नालंदा विश्वविद्यालय को पुन: स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. कुरील ने भी कहा कि प्रस्तावित विश्वविद्यालय का स्थापत्य ऐसा होना चाहिए जो नालंदा और भारत की स्थापत्य परंपरा के अनुकूल हो. नालंदा विश्वविद्यालय एक ऐसे विश्वविद्यालय के रूप में दोबारा स्थापित हो कि आनेवाले दिनों में दुनियाभर से आनेवाले विद्यार्थी यह कहकर गर्व का अनुभव कर सकें कि वे नालंदा से पढ़कर आये हैं. प्रमोद कुरील ने सवाल उठाया कि नालंदा विश्वविद्यालय की गवर्निंग बाडी सरकारी अधिकारियों का जमावड़ा भर न हो. यह गवर्निंग बॉडी ऐसी हो जिसमें ज्ञान, विज्ञान, साहित्य और कलाक्षेत्र से जुड़े लोगों के हाथ में नियंत्रण रहे. हालांकि कुरील के सवाल के बाद भी यह संभावना बनी रहती है कि सरकारीकरण होने के कारण यह नालंदा उस नालंदा के कितने करीब होगा यह तो आनेवाला वक्त ही बताएगा. फिर भी उनका एक सुझाव बहुत अच्छा था कि दलाई लामा को इस गवर्निग बॉडी में जरूर रखना चाहिए क्योंकि वे बौद्ध धर्म के नैतिक अधिष्ठान हैं.
सीताराम येचुरी ने बहस में भाग लेते हुए कहा कि इस अध्यादेश का समर्थन करते हुए मैं कहना चाहता हूं कि हमें यह सोचने की जरूरत है कि अतीत में भारत ने दुनिया को क्या दिया है और भविष्य में हम दुनिया को क्या दे सकते हैं? डॉ कर्ण सिंह जी ने सही कहा है कि बख्तियार खिलजी ने बर्बरतापूर्ण तरीके से नालंदा को समाप्त कर दिया था. इसी तरह हूणों ने भी रोमन साम्राज्य को खत्म कर दिया था. लेकिन क्या हम इसी को याद रखेंगे. ये घटनाएं इतिहास की ऐसी घटनाएं हैं जिन्हें याद करने से कोई निर्माण नहीं होता है. हां, हमें इस बारे में जरूर विचार करना चाहिए कि ऐसा क्यों हुआ कि बौद्ध ज्ञान और दर्शन गुफाओं में जाने के लिए मजबूर हो गया. येचुरी ने महत्वपूर्ण सवाल उठाते हुए कहा कि हम अतीत में ही कब तक झांकते रहेंगे? हम भविष्य की ओर कब देखना शुरू करेंगे? पीछे भारतीय सभ्यता की उपलब्धियां गिनने की बजाय हमें यह सोचने की जरूरत है कि वे ऐसे कौन से कारक हैं जिसके कारण भारतीय समाज में ज्ञान की आराधना अवरुद्ध हो गयी. निश्चित रूप से लाजिमी सवाल है. बहस में भाग लेते हुए सपा से सांसद मोहन सिंह ने कहा कि उस वक्त की नगरीय सभ्यता, ज्ञान परंपरा विलुप्त हो गयी, उसे दोबारा सामने लाने की जरूरत है. मोहन सिंह ने भी सीताराम येचुरी की तर्ज पर ही चिंता व्यक्त की कि अगर आयुर्वेद पर शोध अवरुद्ध न हुआ होता तो आज आयुर्वेद सर्वोत्कृष्ट चिकित्सा व्यवस्था होती. उन्होंने कहा कि भारतीय वांग्मय को नुकसान तो बहुत हुआ है लेकिन उसे दोबारा पुनर्जीवित करने की जरूरत है और आगे उसमें और शोध करने की दिशा में पहल करने की भी जरूरत है. मोहन सिंह ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक धारा का अध्ययन और उसके विकास की आज के युग में बहुत जरूरत है.
बहस में हिस्सा लेते हुए सैफुद्दीन सोज ने कहा कि नालंदा विश्वविद्यालय को पुन: स्थापित करने का स्वागत होना चाहिए लेकिन कश्मीर के इतिहास को भी याद करने की जरूरत है. उन्होंने कर्ण सिंह की ओर इशारा करते हुए कहा कि अगर नालन्दा याद है तो शारदा विश्वविद्यालय को हम क्यों भूल जाते हैं? शारदा विश्वविद्यालय ने भी भी भारतीय सभ्यता और संस्कृति के अध्ययन में महत्वपूर्ण योगदान किया है. सोज़ ने कहा कि कश्मीर ने देश को कल्हण दिया है, इब्नेबतूतता दिया है. भारत के पांच हजार साल के लिखित इतिहास में कश्मीर से अहम रोल है जिसे नहीं भूलना चाहिए. बहस में अन्य कई सांसदों ने भी हिस्सा लिया जिसमें लगभग सभी महत्वपूर्ण दलों के प्रतिनिधि शामिल थे. इस बहस को पढ़ने के बाद लगता है कि अक्सर हम सब इस बात को लेकर चिंतित रहते हैं कि भारत के निचले सदन में तो छोड़िये उच्च सदन में उच्चस्तरीय बहस नहीं होती है. लेकिन नालंदा विश्वविद्यालय के अध्यादेश पर जो बहस हुई वह इस आलोचना को बौना कर देता है. हमारी संसद और हमारे सांसद शायद इतने भी "नकारा" नहीं हैं जितना कारपोरेट सोसायटी हमें समझाने की कोशिश करती है. (पूरी बहस आप नीचे दिये गये लिंक से डाउनलोड कर सकते हैं.)
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