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'आडवाणी के हत्या की योजना इसलिए असफल हो गई क्योंकि...'

image बंगलौर पुलिस द्वारा गिरफ्तार अब्दुल नासिर मदनी

मुंबई, जेहादी आतकवादियों का पसंदीदा निशाना रहा है। आखिरकार यह देश की राजधानी जो है। दो वर्ष पूर्व से उन्होंने अपना ध्यान बंगलौर की तरफ किया है जो भारत का तेजी से विकसित हो रहा आई.टी.-सूचना प्रोद्योगिकी- का केन्द्र है। जुलाई, 2008 में इस शहर में श्रृंखलाबध्द बम विस्फोट हुए थे।

मुझे स्मरण है कि इसके तुरंत बाद मैंने शहर का दौरा किया था और उन सभी स्थानों पर गया जहां-जहां बम विस्फोट हुए थे और अंत में अस्पताल गया जहां सैकडों बम विस्फोट से पीड़ित लोगों का उपचार हो रहा था। पुलिस जांच से संकेत मिले कि बंगलौर ऑपरेशन केरल के अब्दुल नसीर मदनी के दिमाग की उपज था और जिसे उसके एक सहयोगी ही टी. नसीर ने अंजाम दिया । मदनी केरल की एक उग्रवादी मुस्लिम पार्टी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी का चेयरमैन है,जिसे कांग्रेस और वामपंथी लगातार अपनी ओर लुभाने की कोशिश करते रहे हैं। जब मदनी जेल में था तब केरल विधानसभा ने उसकी रिहाई की मांग करते हुए एक सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित किया था। न्यायालय ने 2008 के बम विस्फोट कांड के सिलसिले में ही मदनी के विरुध्द वारंट जारी किया जिस पर गत् सप्ताह कर्नाटक पुलिस ने अमल किया। यही वह नाम है जो मुझे मेरी जिदंगी की एक न भूलने वाली घटना का स्मरण करा देता है।

***
कर्तव्यनिष्ठ पत्रकार बहुत आग्रही हो सकता है। राजनीतिक व्यक्तियों के लिए यह कई बार झुंझला देने वाला होता है। लेकिन मैं एक ऐसा अवसर कभी नहीं भूल सकता जब हैदराबाद स्थित एक टी.वी. समाचार चैनल ई.टी.वी. की ऐसी जिद मेरे लिए वरदान सिध्द हुई और वास्तव में मेरे जीवन की रक्षा की। यह घटना फरवरी, 1998 में तब घटी जब मैं उस वर्ष होने वाले लोकसभा के चुनावों में प्रचार हेतु तमिलनाडू गया था। तमिलनाडू में आल इण्डिया अन्नाद्रमुक से हमारा चुनावी समझौता था। 13 फरवरी को मैं चेन्नई में था। 14 फरवरी को मुझे दो रैलियों-एक दिन के समय कोयम्बटूर और दूसरी शाम को तिरुचि में सम्बोधित करना था जिसमें अन्नाद्रमुक की प्रमुख डा. जयललिता को भी सम्बोधित करना था।

कोयम्बटूर रवाना होने से कुछ क्षण पहले ही एक ई.टी.वी. का संवाददाता, जिस होटल में मैं ठहरा था आया और उसने मुझे बताया कि मेरे दिल्ली ऑफिस ने चैनल को आश्वस्त किया था कि जब मैं चेन्नई आऊंगा तब मैं उन्हें विस्तृत साक्षात्कार दूंगा। मुझे ऐसे किसी आश्वासन की जानकारी नहीं थी। राज्य इकाई द्वारा तय किए कार्यक्रम में ज्यादा फेरबदल की गुंजायश नहीं छोड़ी गई थी क्योंकि विशेष रुप से तिरुची पहुंचने का मेरा समय अन्नद्रमुक के नेताओं के कार्यक्रम के साथ तय करके बनाया गया था। परन्तु ईटीवी की जिद के आगे मुझे झुकना पड़ा। लेकिन इससे मेरा कार्यक्रम ऐसा बिगड़ा कि जिस विशेष विमान से मुझे कोयम्बटूर पहुंचना था वह अपने गंतव्य पर दो घंटे से ज्यादा विलम्ब से पहुंचा।

कोयम्बटूर हवाई अड्डे पर भारी मात्रा में पुलिस जनों को देख मुझे आश्चर्य हुआ। एक डरावनी शांति छाई हुई थी जब कि कुछ पुलिस अधिकारियों को एक कोने में इकट्ठे खड़े देखा जा सकता था। एक वरिष्ठ अधिकारी मुझसे मिले और सूचित किया कि रैली के स्थान पर सिलसिलेवार बम विस्फोट हुए हैं ओर शहर के अन्य हिस्सों में भी। उन्होंने मुझे बताया कि समूचे शहर में धारा 144 लागू कर दी गई है और मुझे शहर में जाने की अनुमति नहीं है। मैंने अपने पार्टी कार्यकर्ताओं से मिलने की जिद की जसे हवाई अड्डे के बाहर थे। उन्होंने मुझे बताया कि विस्फोटों में लगभग 50 लोग मारे गए और करीब 200 लोग घायल हुए हैं। उन्होंने मुझे यह भी बताया कि एक व्यक्ति जो स्पष्टतया एक मानव बम था, का जब पुलिस ने पीछा किया तो उसने अपने को उड़ा दिया। मैंने डी.एम. को बताया कि ये जो 200 लोग घायल हुए हैं वे निश्चित रुप से मेरी रैली के लिए आए होंगे, अत: मुझे लगता है कि यह मेरा कर्तव्य है कि मैं उस अस्पताल जाऊं जहां उनका इलाज हो रहा है। शुरु में मेरे अनुरोध पर आपत्ति हुई लेकिन अंतत: इसे स्वीकार कर लिया गया। मैं अस्पताल गया और अनेक घायलों से मिला।

चेन्नई के द हिन्दु समूह द्वारा प्रकाशित की जाने वाली मासिक पत्रिका ‘फ्रंटलाइन‘ के मई 1998 में प्रकाशित रिपोर्ट को यहां पुन: उद्धृत करना उचित रहेगा। 9-22 मई, 1998 में प्रकाशित इस रिपोर्ट का शीर्षक था मानव बम और मानव कमियां (Human bombs and human error) : ”क्या 14 फरवरी को आर. एस. पुरम, कोयम्बटूर जहां एल. के. आडवाणी को भारतीय जनता पार्टी की चुनावी सभा को सम्बोधित करना था, में उन्हें (आडवाणी) मारने को मानव बम तैयार रखे गए थे? शहर में सिलेसिलवार बम विस्फोटों के बाद साथ ही आडवाणी द्वारा यह दावा करने कि उस दिन की सभा के स्थल पर मानव बम का लक्ष्य वह थे ने इस प्रश्न ने एक विवाद को जन्म दिया है।”

तमिलनाडू पुलिस के क्राइंम ब्रांच-क्रिमिनल इन्वेस्टीगेशन डिपार्टमेंट (सीबी-सीआईडी) द्वारा दो महीनों से ज्यादा की जांच सेअब एक निश्चित उत्तर उपलब्ध है: उस दिन तीन बम आडवाणी को निशाना बनाए हुए थे, पुलिस के सुविज्ञ सूत्रों ने उन्हें तमिलनाडु के तिरुनलवेली के निकट मेलायालायम के अमजद अली (19 वर्ष); एन.एस. रोड, कोयम्बटूर का मोहम्मद जमेशाह (22 वर्ष); और मेलापालायम का ही अमानुल्लाह (22 वर्ष) के रुप में शिनाख्यात की हैं। तीनों ही एक मुस्लिम कट्टरपंथी संगठन अल-उम्मा से सम्बन्धित थे। पुलिस के अनुसार 14 फरवरी को कोयम्बटूर के बम विस्फोट ‘अल-उम्मा द्वारा ” पूर्व नियोजित और किए गए थे तथा इसकी योजना इसके नेता एस.ए.बाशा ने कोयम्बटूर में 30 नवम्बर/1 दिसम्बर, 1997 में मारे गए 19 मुस्लिमों का बदला लेने के उद्देश्य से बनाई।”

अमजद अली और मोहम्मद जमेशाह पकड़े गए जबकि अमानुल्लाह फरार है। पुलिस के सूत्रों का कहना है कि तीनों ने पीईटीएन (PETN) विस्फोटक से भरी बेल्ट पहनी हुई थी। बम का डिजाइन बसित ने बनाया था जो कि मेलापालायम का ही है। फरार बसित बाशा का सहयोगी है। पुलिस के अनुसार बेल्ट बम को बाशा के सेकण्ड-इन-कमाण्ड एम0 मो0 अंसारी ने” फिक्स” किया था। उनका मानना है कि इस विस्फोटक की ”करारे” राजू ने आपूर्ति की जो केरल का है। सूत्रों का कहना कि असम राइफल के भगोड़े राजू को पी0ई0टी0एन0 देश से आतंकवाद प्रभावित उत्तर पूर्वी क्षेत्र से मिला होगा। सूत्रो के मुताबिक अमजद अली को विशेष रुप से आडवाणी को निशाना बनाना था और मोहम्मद जमेशाह तथा अमानुल्लाह को विकल्प के रुप में तैयार रहना था । एक सूत्र कहता है: वे सभा स्थल पर बैठे थे लेकिन पुलिस घेरे के चलते मंच के निकट नही पंहुच पाए। वे मंच से लगभग 400 मीटर दूरी पर थे। वंहा कुछ अन्य भी मदद के लिए मौजूद थे।”

आडवाणी की हत्या की योजना इसलिए असफल हो गई क्योंकि उनका विमान कोयम्बटूर में विलम्ब से उतरा। इस बीच अज-उम्मा द्वारा कारों, दो पहियों, और फलों के ठेलो में रखे गए बम सभा स्थल के आस-पास और शहर के विभिन्न स्थानों पर रखे जिनसे करीब 50 लोगों की मौत हुई। सभास्थल के आस-पास कोहराम मचा हुआ था और अमजद अली वहां से फरार हो गया।

पुलिस के इंसपेक्टर-जनरल परमवीर सिंह की अध्यक्षता में सीबीसीआईडी की सघन जांच में बम विस्फोटों के पीछे के षडयंत्रों का पर्दाफाश किया। षड्यंत्र में शामिल 167 चिन्हित किए गये लोगों में से 110 को गिरफ्तार किया गया। जिसमें एसए बाशा (48), अल-उम्मा का कार्यवाहक अध्यक्ष ताजुद्दीन (38) और इस्लामिक डिफेंश फोर्स (IDF) के नेता अली अब्बदुल्ला शामिल थे। ताजुद्दीन ने अक्तूबर, 1997 में बाशा के स्थान पर अल-उम्मा के कार्यवाहक अध्यक्ष का कार्य संभाला था। पुलिस के मुताबिक ताजुद्दीन, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता अब्दुल नासीर मदनी से केरल में मिला और उसके माध्यम से राजू से। मदनी को 31 मार्च को केरल पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया गया।

सन् 2001 के विधानसभाई चुनाव में डीएमके हार गई और एआईएडीमके सत्ता में लौटी। अक्तूबर, 2001 में कोयम्बतूर केस में आरोपियों के विरुध्द अभियोग लगाए गए। एसआईटी के अभियोग पत्र 17000 पृष्ठों में समाया हुआ था, 1300 से ज्यादा गवाहों से जिरह की गई। अंतत: फैसला अगस्त, 2007 में सुनाया गया। न्यायालय ने प्रतिबंधित अल-उम्मा के नेता सैयद अहमद बाशा और उसके 71 सहयोगियों को दण्डित किया। हालांकि इस केस में मुख्य अभियुक्त अब्दुल नसीर मदनी को अपर्याप्त साक्ष्यों के चलते बरी कर दिया।

अब देश उत्सुकता के साथ देख रहा है कि कर्नाटक के मुकदमें में क्या होता है?

लाल कृष्ण आडवाणी
नयी दिल्ली
२२ अगस्त, २०१०

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priy ranjan on 23 August, 2010 17:43;41
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मुंबई, जेहादी आतकवादियों का पसंदीदा निशाना रहा है। आखिरकार यह देश की राजधानी जो है। जी हाँ बीजेपी के वरिष्ट नेता अडवानी जी मुंबई को "देश की राजधानी" बता रहे हैं.

कृपया बीजेपी के सभी कार्यकर्ता उनकी इस बात को किताब में दर्ज करते चले. उन्होंने अपनी जमात वालों के सामान्यकोष में एक नई जानकारी देकर बड़ा उपकार किया है.

इस पहली पंक्ति के साथ ही बाकी के आलेख का स्तर और समझ को समझा जा सकता है.

जय हो
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KG Sharma on 23 August, 2010 18:19;47
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आर्थिक राजधानी होना चाहिए लेकिन हमें उस पर नहीं बल्कि आतंकवादी साजिश, घटना, और पत्रकार जिसने उन्हें इन्तेर्वु के लिए रोका, जिससे वे लेट हुए और बच सके, हमें उस पर ध्यान देना चाहिए ये भी सोचने की बात है की आगे ऐसे आतंकी मनसूबे सफल न हो और देश सुरक्षित रहे.
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Jai Prakash on 23 August, 2010 18:43;58
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अडवानी जी आपके जमाने से ही देश सबसे ज्यादा असुरक्षित रहा है. आपको ऐसी बातें शोभा नहीं देती. जाइए ऊँचे मीनारों और मोती दीवारों के बीच मजे लूटिये. आम आदमी का देश आम आदमी संभाल ही रहा है. आपके और आपके विचारों के भरोसे रहे तो लुट गए राम..
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अनिल on 23 August, 2010 19:23;58
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शर्म है कि मदनी अभी भी ज़िंदा है.
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Suresh on 23 August, 2010 19:35;49
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अडवानी जी के राज में आतंकवादी संसद तक घुस आये थे. अडवानी जी को शर्म है कि नहीं आती.
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jagdish shah kolkata on 24 August, 2010 13:54;52
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aadvaniji jinna ka bhut abhi bhi aapke dimag mein hai ya nahi?
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saleem akhter siddiqui on 24 August, 2010 17:09;21
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अब देश उत्सुकता के साथ देख रहा है कि कर्नाटक के मुकदमें में क्या होता है?
desh aur bahut saare muqdmon kee tarf dekh raha hai. kee unka kya hota hai.
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shankar on 24 August, 2010 17:29;38
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आपकी बात तो सही है सलीम साहब. मगर उस पर कोई बेतुका आलेख लिखकर आप इस मामले की मिटटी पलीत एक न कर दीजिएगा.वैसे आशंका अब यही है की आप उस पर एक आलेख लिखे बगैर नहीं मानेगे तो लिखिए वैसे भी अनिल और आपको गंभीरता से लेता कौन है ?
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ओमनाथ शुक्ला on 24 August, 2010 18:50;45
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प्रियरंजन जी,
हर चीज को वामपंथी चश्मे से मत देखिए..विस्फोट की भी गलती हो सकती है...आप ......मत कीजिए महाराज
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प्रियरंजन on 24 August, 2010 18:54;48
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चलिए हमने वामपंथी चश्मा हटा लिया महाराज. अब आप संघी चस्मा हटाते हुए यह बतलाइये की यह आडवाणी की गलती है या विस्फोट की- यह कैसे पता चलता है ?
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image lal advani भारतीय राजनीति में मीलपत्थर देश के एकमात्र ऐसे राजनेता हैं जिन्होंने सूचना तकनीकि का इस्तेमाल अपने विचारों को आगे ले जाने के लिए किया है. पंद्रहवीं लोकसभा में सूचना तकनीकि का व्यापक तौर पर इस्तेमाल किया भले ही उसके आशानुकूल परिणाम न मिले हों लेकिन चुनाव के बाद भी वे सक्रिय रूप से ब्लाग लेखन के जरिए अपने विचार लोगों तक पहुंचाते हैं. आडवाणी जी के ब्लाग का पता-blog.lkadvani.in
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