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परमाणु हादसाग्रस्त न्यूक्लियर कामर्स

image चेर्नोबिल हादसे की एक दर्दनाक झलक

मैक्सिको की खाड़ी में ब्रिटिश पेट्रोलियम के तेल कुएं से जो रिसाव हुआ था उसके लिए बहुराष्ट्रीय ब्रिटिश पेट्रोलियम को 34 अरब डॉलर का हर्जाना भरने के लिए कहा गया है. बीपी कंपनी केवल तैयार ही नहीं हुई है बल्कि उसने 20 अरब डॉलर (करीब 92,000 करोड़) रूपये का हर्जाना अदा भी कर दिया है. मैक्सिको की खाड़ी में हुए तेल रिसाव और किसी परमाणु रियेक्टर में भारी पानी के रिसाव में आप किसे ज्यादा खतरनाक मानेंगे? अगर परमाणु भट्टी में रिसाव को आप ज्यादा खतरनाक मानते हैं तो भला बताइये कि मैक्सिको खाड़ी में हुए तेल रिसाव से कितने गुने अधिक मुआवजा तय किया जाना चाहिए?

अधिक तो छोड़िए भारत सरकार भविष्य में किसी परमाणु बिजलीघर में संभावित परमाणु हादसे के लिए अधिकतम मुआवजे की जो राशि निर्धारित कर रही है वह महज 1500 करोड़ रुपये होगा. इसमें भी जो कंपनी शामिल होगी उसके हिस्से में अधिकतम 300 करोड़ अदा करने की जिम्मेदारी होगी और ऐसा ही कोई हादसा परमाणु शोध केन्द्र पर हो जाए तो उक्त शोध कंपनी को केवल 100 करोड़ अदा करके अपनी जिम्मेदारी से मुक्ति मिल जाएगी. जिस विभाग द्वारा किसी संभावित परमाणु हादसे के लिए यह मुआवजा निर्धारित किया जा रहा है उस विभाग के मुखिया कोई और नहीं बल्कि हमारे दयाल, शांत, शर्मीले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हैं. 18 अगस्त को प्रधानमंत्री द्वारा संभाले जा रहे एटामिक एनर्जी विभाग द्वारा तैयार किये गये ड्राफ्ट को भारतीय संसद के दोनों सदनों में रख दिया गया. टी सुब्बीरामी रेड्डी की अध्यक्षतावाली संसदीय समिति पहले ही इस ड्राफ्ट पर अपने सहमति की मुहर लगा चुकी थी. लेकिन प्रशासन से जुड़े कुछ ऐसे लोग भी हैं जो कह रहे हैं कि उनसे पूछा तक नहीं गया है. ये वो लोग हैं भारत सरकार की संरचना में इस प्रस्तावित ड्राफ्ट से अपनी जिम्मेदारियों को जुड़ा हुआ महसूस करते हैं. और उनकी जिम्मेदारियां जुड़ी हुई हैं भी. स्वास्थ्य, पर्यावरण, श्रम और जल संसाधन ऐसे विभाग या मंत्रालय हैं जिनकी सहमति लिये बिना इस ड्राफ्ट को अंतिम रूप नहीं दिया जा सकता था. लेकिन उनकी सहमति नहीं ली गयी. विज्ञान और तकनीकि मामलों की इस संसदीय समिति का तर्क है कि उसने संबंधित मंत्रालयों और विभागों को पत्र भेजे थे लेकिन मंत्रालय या विभाग ने बहुत नकारात्मक रुख अख्तियार किया इसलिए ड्राफ्ट पर समिति ने 25 पेज की अपनी रिपोर्ट संसद को सौंप दी.

असल में आज जिसे नागरिक परमाणु सुरक्षा विधेयक बताकर संसद की मुहर लगवाने की कोशिश की जा रही है उसके लिए एक 25 सदस्यीय समिति का गठन किया गया था जिसने बेसिक ड्राफ्ट तैयार किया है. इस समिति का निर्माण फिक्की ने किया था जिसके अध्यक्ष न्यूक्लियर पॉवर कारपोरेशन आफ इंडिया के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक डॉ एस के जैन थे. इस समिति ने एक 57 पेज का ड्राफ्ट तैयार किया. फिक्की द्वारा गठित इस समिति का मकसद था कि कैसे परमाणु बिजली निर्माण के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को निर्बाध रूप से प्राप्त किया जा सके. इस समिति की बैठकों का मुख्य लक्ष्य था कि सन 2022 तक 35,000 मेगावाट और उसके दस साल बाद 2032 तक 60 हजार मेगावाट परमाणु बिजली उत्पादन का लक्ष्य कैसे हासिल किया जा सकता है. इसी पर बातें भी हुईं. फिक्की कैसा संगठन है इसे बताने की जरूरत नहीं है. हालांकि यह अपने आपको एक गैरसरकारी एवं गैरमुनाफाखोर संगठन बताता है लेकिन यह बड़ी कंपनियों के लिए लॉबिंग करनेवाला एक भीमकाय संगठन है जिसमें देश के लगभग सभी प्रभावशाली व्यावसायिक घरानों के मालिक जुड़े हुए हैं. फिक्की से लगभग 83 हजार छोटे बड़े व्यावसायिक घराने सदस्य के रूप में जुड़े हैं. फिक्की ऐसा संगठन है जो अपने सदस्यों के हित के लिए न केवल सरकार में लाबिंग करता है बल्कि अपने अंतरराष्ट्रीय संपर्कों का उपयोग करके भारत सरकार की नीतियों को भी प्रभावित करता है. परमाणु नागरिक सुरक्षा विधेयक के लिए ड्राफ्ट तैयार करते वक्त फिक्की द्वारा गठित समिति ने ऐसी परिस्थितियों में किसका ध्यान ज्यादा रखा होगा इसे समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है.

और केवल फिक्की ही क्यों? सरकार में बैठे हुक्मरान किसके हुक्म की तालीम कर रहे हैं? डॉ श्रीकुमार बनर्जी परमाणु उर्जा आयोग के अध्यक्ष हैं जिन्होंने अनिल काकोदकर के बाद यह जिम्मेदारी संभाली है. बनर्जी ने इस विधेयक को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है, वे मानते हैं कि यह विधेयक निर्विवाद है. जब उनके प्रधानमंत्री और संबंधित संसदीय समिति इस विधेयक पर अपनी मंशा जाहिर कर चुके हैं तो बनर्जी भला क्यों उस राय अलग रखेंगे? लेकिन उनकी सहमति को गृहसचिव जी के पिल्लई यह कहते हुए खारिज कर देते हैं कि डॉ बनर्जी अमेरिकी परमाणु उर्जा कंपनियों द्वारा पीछे की गयी गलतियों को नजरअंदाज कर रहे हैं. अमेरिकी परमाणु उर्जा कंपनियां दावा करती हैं कि परमाणु हादसा कोई ऐसा संकट नहीं है जिसका तत्काल हल न निकाला जा सके. ये कंपनियां मानती हैं कि भविष्य में अगर कोई ऐसा हादसा होता है तो तत्काल उसे निष्प्रभावी किया जा सकता है. अमेरिकी कंपनियों की मान्यता तब थोड़ी और जटिल हो जाती है जब वे औद्योगिक हादसे को परमाणु हादसों से बड़ा संकट बताने लगती हैं. जी के पिल्लई इन्हीं आधारों पर डॉ बनर्जी की मंशा पर सवाल उठाते हैं कि आखिर वे प्रस्तावित विधेयक को लेकर इतनी जल्दी में क्यों है? पिल्लई कहते हैं कि यह विधेयक कई विस्तृत पहलुओं को छूता है लेकिन विधेयक में लगभग सभी महत्वपूर्ण बातों को ऩजरअंदाज कर दिया गया है. सुरक्षा के सवाल पर केवल गृहसचिव ही सवाल नहीं उठा रहे हैं. जल संसाधन सचिव यू एन पांजियार की भी आपत्ति है कि हमारे मंत्रालय के पास पानी में किसी संभावित न्यूक्लियर कंटामिनेशन को जांचने परखने की कोई सुविधा ही नहीं है. यह काम एटामिक एनर्जी रेगुलेटरी बोर्ड के जिम्मे है. लेकिन एईआरबी परमाणु विकिरण को पकड़ने में कितना सक्षम है इसका ताजा उदाहरण दिल्ली के दिल में हुए एक कबाड़ी बाजार में विकिरण के बाद सामने आया था. मायापुरी में रेडियोएक्टिव पदार्थ मिलने के बाद अपनी जांच पड़ताल में एईआरबी ने इलाके को सुरक्षित घोषित कर दिया लेकिन उसके बाद हफ्तों वहां से रेडियोएक्टिव सामग्री बरामद होती रही. अगर यह विभाग एक कबाड़ी बाजार की पड़ताल नहीं कर सकता तो क्या किसी परमाणु बिजली घर के आपदाग्रस्त होने पर लोगों के जानमाल को सुरक्षित कर पायेगा?

स्वास्थ्य मंत्रालय की सचिव सुजाता राव की भी आपत्ति है कि नागरिक परमाणु सुरक्षा विधेयक को तैयार करने से पहले उनसे कोई सलाह नहीं ली गयी. परमाणु उर्जा विभाग ने उनके मंत्रालय से कोई सलाह नहीं ली. यही वह मंत्रालय होगा जो किसी भी परमाणु हादसे के वक्त लोगों के जान की रक्षा करेगा. लेकिन परमाणु उर्जा विभाग ने ड्राफ्ट तैयार करते समय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को यह पूछना भी जरूरी नहीं समझा कि अगर कोई हादसा हो ही जाता है तो भारत के अस्पताल उस हादसे से निपटने के लिए तैयार हैं? अगर सरकार पीड़ितों को मुआवजा भी बांटना चाहेगी तो उसके लिए अस्पताल ही निर्धारित करेंगे कि किसको कितना नुकसान हुआ है और बदले में उन्हें कितना मुआवजा मिलना चाहिए. लेकिन सुजाता राव कहती हैं कि इस विधेयक में ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं किया गया है कि हादसे के स्थान पर अस्पताल की कैसी सुविधा होगी या फिर ऐसे किसी संभावित हादसे से निपटने के लिए उपकरणों, डॉक्टरों की क्या व्यवस्था होगी? एक और मंत्रालय है जिसकी सलाह नहीं ली गयी. खाद्य आपूर्ति मंत्रालय की सचिव डॉ अलका सिरोही ने भी अपना विरोध दर्ज कराते हुए साफ कहा है कि किसी भी संभावित परमाणु हादसे से अन्न और पौधों पर विकिरण का असर होगा. कृषि सचिव प्रबीर कुमार बासु का भी कहना है कि उनके विभाग से सलाह नहीं ली गयी. बासु का कहना है कि अगर चेर्नोबिल जैसा कोई हादसा कभी होता है तो तीस से 100 किलोमीटर के दायरे की जमीन पर उसका सीधा असर होगा. ऐसे में संबंधित मंत्रालय उस खतरे से कैसे निपटेगा, उसका क्या प्रावधान आगामी विधेयक में होना चाहिए, इसके बारे में उनके विभाग से भी कोई सलाह मशविरा नहीं किया गया.

असल में परमाणु हादसों की संभावना होते हुए भी भारत सरकार के शीर्ष पर बैठे लोग इसकी अनदेखी कर रहे हैं. शर्मीले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जानते हैं कि वे आग की ऐसी भट्टी पर उर्जा की खेती करने जा रहे हैं जिसमें थोड़ी सी भी चूक फसल ही नहीं पूरे खेत को खा जाएगा. लेकिन वे न्यूक्लियर कामर्स के ट्रैप में बुरी तरह से फंसे हैं और जब कभी कोई हादसा होगा तो कम से कम मनमोहन सिंह उसे देखने भुगतने के लिए तो नहीं रहेंगे. वे सीधे सीधे अमेरिकी कंपनियों के दबाव में हैं और तुरत-फुरत परमाणु उर्जा उत्पादन को हकीकत बना देना चाहते हैं, भले ही इसके लिए देश को कोई भी कीमत चुकानी पड़े. जहां तक परमाणु उर्जा आयोग और परमाणु उर्जा से जुड़े अन्य विभागों का सवाल है तो वे प्रधानमंत्री के आदेश पर न्यूक्लियर कामर्स के रास्ते की हर बाधा को दूर करने की कोशिश कर रहे हैं. 26 अप्रैल 1986 को चेर्नोबिल परमाणु हादसे के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दो कन्वेंशन हुए. 1995 में जेनेवा में और 2001 में कीव, यूक्रेन में. इन दोनों कन्वेंशन में क्या बातें हुई, क्या समझा और समझाया गया वह आज तक आम जन के लिए टॉप सीक्रेट बना हुआ है. लगता है हमारे संबंधित विभागों और प्रधानमंत्री ने भी चेर्नोबिल हादसे को जानबूझकर नजरअंदाज कर दिया, ठीक वैसे ही जैसे आईएईए से हाथ मिला लेने के बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन भी न्यूक्लियर कामर्स का समर्थक बन बैठा है. पूंजी और प्रभाव के इस खेल में आम आदमी की भला क्या बिसात? भोपाल हादसे के छब्बीस साल बाद आये फैसले को देखकर हम कल्पना कर सकते हैं कि हमारे प्रधानमंत्री हमें नर्क की किस भट्टी में झोंकने की तैयारी कर रहे हैं. हम न सही, हमारी नस्लें किसी न किसी दिन उस हादसे का शिकार जरूर होंगी जिसका दस्तावेज आज तैयार किया जा रहा है.

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पुष्यमित्र on 25 August, 2010 09:27;53
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इस मामले में भाजपा की मंशा भी गड़बड़ लगती है...वह महज 15 सौ करोड़ रुपये की अधिकतम मुआवजा राशि पर सरकार के साथ खड़ी नजर आ रही है...इस बीच भारतीय सप्लायरों ने इस मुद्दे पर विधेयक में किसी बदलाव का विरोध शुरू कर दिया है...देखें आज की बहस क्या रंग लाती है...
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RAJ SINH on 25 August, 2010 15:58;52
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सवाल यह है की अमेरिकी हांथों में बिकी सरकार और उसके सरदार को कौन रोकेगा ? भाजपा भी उसी गिरोह की ' बी ' टीम बन गयी है . देश की जनता की ऐसी अनदेखी हो रही है और विरोध के नाटक के सिवा सब ओर मौन पसरा सन्नाटा है .
यह मुल्क दुर्भाग्य के हवाले कर दिया गया है .
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on 26 August, 2010 00:40;32
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भइये सांसदों की चिंता देख रहे हो १५०० करोड़ का मुआवजा देखे की अपनी तनखा के लिये बहस करे कोए जनता के लिए संसद में गया है या अपने लिए | अक यही विधेयक है जो सर्व्संमती से पास हो जाता है | .............मेरा भारत महान|
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image गोपाल कृष्ण पानी और पर्यावरण पर काम करनेवाले गोपालकृष्ण शिपब्रेकिंग उद्योग, एसबेस्ट्स और कचरा प्रबंधन में घातक तकनीकि से उत्पन्न खतरों पर लगातार सक्रिय लेखन और आंदोलन कर रहे हैं. बैन एसबेस्टस नेटवर्क के संयोजक. जेएनयू में पब्लिक हेल्थ पर शोधरत.
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