माखनलाल कैंपस में महाभारत
पंडित माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय एक मर्तबा फ़िर विवादों में है। अपने स्थापना से लेकर अब तक पत्रकारिता का यह तीर्थस्थल किसी ना किसी वजह से खबरों में रहा है। अपनी साख के संकट से जूझ रही यूनिवर्सिटी के कुलपति बी. के. कुठियाला की कार्यशैली ताज़ा असंतोष की वजह बन गई है। कुरुक्षेत्र से आए प्रोफ़ेसर कुठियाला के फ़ैसलों से पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कैंपस में "महाभारत" छिड़ गई है। असंतुष्ट खेमा कुलपति के खिलाफ़ मोर्चा खोल चुका है। सूचना के अधिकार के तहत हासिल जानकारियों ने आग में घी का काम किया है।
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति ने इस साल जनवरी में ही कामकाज संभाला है और चंद शुरुआती फैसलों ने ही उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया है। देश के इस सबसे बड़े पत्रकारिता विवि में कुलपति के पद पर प्रो. कुठियाला के चयन की प्रक्रिया पर ही सवाल उठते रहे हैं। तमाम आपत्तियों के बावजूद प्रो. कुठियाला को कुलपति बनाने की मूल वजह संघ के भारी दबाव को माना जाता है। विरोधी खेमे का आरोप है कि विवि की कार्यप्रणाली और परिसर के माहौल तक में आये परिवर्तन प्रो.कुठियाला की संघ से नजदीकियों की तस्दीक करते हैं। पर बात यहीं खत्म नहीं होती है। विश्वविद्यालय में अपने चहेतों, भाजपा और संघ परिवार से जुड़े लोगों की भर्ती का मामला भी तूल पकड़ता जा रहा है। करीब दो माह पहले संघ से जुड़े एक स्वनामधन्य पत्रकार और तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ता की पत्नी को मीडिया असिस्टेंट की कुर्सी पर आसीन किया गया है। पत्नी को फ़िट कराने के बाद ये महोदय खुद भी विश्वविद्यालय परिसर में दाखिल होने की जुगत भिड़ा रहे हैं।
पिछले दिनों विश्वविद्यालय के कर्मचारियों ने अध्ययन केंद्र के संचालकों के साथ मिलकर कैंपस में ही कुलपति के खिलाफ नारेबाजी की। सेंटर संचालकों का तर्क है कि कोर्ट के आदेश को दरकिनार कर नए सेंटर खोलने के लिए आवेदन मँगाए गये। सेंटर संचालकों का कहना है कि वे पहले से ही छात्रों की कमी से जूझ रहे हैं, ऎसे में नये अध्ययन केन्द्र खुलने से उनकी स्थिति बदतर हो जायेगी। रीवा और सतना से आये सेंटर संचालकों ने तो निरीक्षणकर्ताओं पर चौथ वसूली का खुल्लमखुल्ला आरोप लगाया। उन्होंने मनमाफ़िक रिपोर्ट तैयार करने के एवज़ में भाजपा और कुलपति के नाम पर दो-दो लाख रुपए की माँग का खुलासा तक कर डाला।
गुज़रते वक्त के साथ कुलपति के खिलाफ़ आरोपों की फ़ेहरिस्त भी लम्बी होती जा रही है। काम का बोझ बढ़ने से नाराज़ कर्मचारी और शिक्षक वर्ग भी कुलपति पर आँखें तरेर रहे हैं। गेस्ट फ़ेकल्टी बुलाने पर अंकुश लगाने का आदेश भी शिक्षकों को रास नहीं आ रहा है । अब छात्रों का एक बड़ा तबका भी असंतुष्टों के खेमे में जा खड़ा हुआ है । विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र भी कुलपति के विरुद्ध लामबंद हो रहे हैं। आमने-सामने की लड़ाई के लिये बाकायदा रणनीति बनाई गई है। प्रो. कुठियाला के काम करने के तौर तरीकों से खफ़ा विश्वविद्यालय के कुछ शिक्षक और कर्मचारी भी उनकी मदद कर रहे हैं। इस लड़ाई में जहाँ विरोधी सोशल नेटवर्किंग साइट फ़ेसबुक पर मुहिम छेड़े हुए हैं, वहीं कुलपति महोदय स्थानीय चैनलों के ज़रिये अपनी बात रख रहे हैं।
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने एक मर्तबा कहा था कि जब बड़ा पेड़ गिरता है, तो धरती हिलती है। यह बात विश्वविद्यालय के मौजूदा हालात पर सटीक बैठती है । बरसों से एक ही ढ़र्रे पर चल रहे विश्वविद्यालय की रीति-नीति में एकाएक आमूलचूल परिवर्तन की तैयारी ने जमे जमाये लोगों में खलबली मचा दी है। मीडिया में आ रहे बदलाव की चुनौतियों से निपटने का विज़न लेकर आगे बढ़ रहे कुलपति के लिये फ़िलहाल तो छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों के गठजोड़ से निपटना ही बड़ी चुनौती साबित हो रहा है।
प्रो. कुठियाला के आलोचकों की आपत्ति नए शिक्षा सत्र में बिना टीचर और क्लासरूम के 14 नए कोर्स शुरू करने को लेकर भी है । वे बताते हैं कि पहले से चल रहे 8 कोर्स के लिए ही गेस्ट फैकल्टी बुलाना पड़ रही है। यूनिवर्सिटी के भोपाल सेंटर में चल रहे 8 कोर्स में 300 स्टूडेंट्स हैं। 14 नए पाठ्यक्रमों के बाद लगभग इतने ही छात्र और बढ़ जाएँगे। ऐसे में छात्रों को बैठाने का इंतज़ाम प्रबंधन के लिये खासा चुनौती भरा काम है। हैरानी की बात यह है कि अभी तक यह भी तय नहीं हो सका है कि इन पाठ्यक्रमों में अध्यापन कौन और कैसे करेगा ? शिक्षण सत्र शुरु करने में हो रही देरी भी छात्रों के असंतोष का सबब बन गई है ।
उधर प्रदेश कांग्रेस भी कुलपति पर विश्वविद्यालय परिसर का भगवाकरण करने का आरोप लगा रही है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय की प्लेसमेंट सहायक की हाल ही में हुई परीक्षा में पूछे गये सवालों का हवाला देते हुए कांग्रेस ने कहा है कि अधिकांश प्रश्न भाजपा और उससे समर्थित संगठनों से जुडे हुये थे। मसलन जनसंघ के संस्थापक कौन थे? बीएचयू के संस्थापक कौन थे? स्वर्णिम मध्यप्रदेश योजना पर अपने विचार लिखें? एकात्म मानववाद के प्रणेता कौन थे और २५ दिसम्बर किस राजनेता का जन्म दिन होता है? वगैरह-वगैरह। परीक्षार्थियों के समक्ष एक वर्ग विशेष को समर्पित संकीर्ण विचारधारा परोसने का आरोप लगाते हुए कांग्रेस ने जानना चाहा है कि पत्रकारिता विश्वविद्यालय में एक विचारधारा को लेकर परीक्षार्थियों से पूछे गए प्रश्न किस पवित्र शैक्षणिक परंपराओं के प्रतीक हैं?
इस पूरे बवाल के बीच प्रो. कुठियाला बेफ़िक्र नज़र आते हैं। विवाद को लेकर विरोधी खेमे के तल्ख तेवरों के बीच कुलपति का पक्ष भी कमज़ोर नहीं है। अममून यूनिवर्सिटी कैंपसों और कला-साहित्य संगठनों पर वामपंथी विचारधारा से जुड़ाव रखने वालों का बोलबाला रहता है। माखनलाल विश्वविद्यालय के कुलपति का संघ की विचारधारा की ओर झुकाव अपनी तरह का संभवतः अनोखा मामला है। शिक्षण संस्थान में संघ परिवार का धीरे-धीरे बढ़ता दखल कइयों के आँखों की किरकिरी बना हुआ है। मनपसंदों को यूनिवर्सिटी में काम देने का मसला हो या कथित भ्रष्टाचार के आरोप, कई प्रतिस्पर्धियों को पछाड़कर कुलपति बनने वाले प्रो.कुठियाला चाहे-अनचाहे अपने सरपरस्तों की बात मानने को मजबूर दिखाई देते हैं। जहाँ तक उनकी योग्यता पर उठाई जा रही अँगुलियों का सवाल है, पत्रकारिता किसी डिग्री की मोहताज नहीं है स्वयं पंडित माखनलाल चतुर्वेदी, (जिनके नाम पर विश्वविद्यालय बनाया गया है) गणेश शंकर विद्यार्थी और आज के दौर के कई सफ़ल पत्रकार इस बात की तस्दीक करते हैं। फिर भी यह बवाल विश्वविद्यालय की गरिमा को बढ़ाने की बजाय गिरायेगा ही इसमें कोई संदेह नहीं।
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Body
- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
- नये निजाम के दामन पर है ज्यादा बड़ा दाग
- अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
- अपने होने पर ही हैरान
- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
- एनसीपी के 'दादा' का दांव
- पीएमओ वाले पृथ्वीराज
- गोली लगने के बाद क्या गांधी ने कहा था- हे राम ?



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बस अब और कुछ कहने को बाकी नहीं रह गया है…। किसको, किस कारण से और कैसी मिर्ची लगी है, यह उपरोक्त दो लाइनों से स्पष्ट हो जाता है…
स्वनामधन्य पत्रकार और तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ता को "स्थापित या "बडा" बनने के लिये क्या करना चाहिये ? क्या ऎसे लोगो को विवाहित नही होना चाहिये, क्या ऎसे लोगो की पत्नी होना "सबसे बडी अयोग्यता और अक्षमता" है ? क्या ऎसी "पत्नियो" को ह्मेशा के लिये "अनफिट" ही माना जाये. स्वनामधन्य पत्रकारो और तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ताओ को जिन्दा रहने का भी हक है या नही ? जिन्दा रहे भी तो कैसे, क्या करे? कुछ इसपर भी मार्गदर्शन करे तो और अच्छा लगेगा.
आलेख को बैलेंस करने की अच्छी कोशिश की है आपने. बहुत-बहुत धन्यवाद !
वामपंथी की विचारधारा के वैज्ञानिक दर्शन तो हमें केरल और पश्चिम बंगाल में आये दिन होते ही रहते हैं… इसलिये उसे छोड़िये…
लेकिन वामपंथ के अलावा बाकी सभी को हमेशा से कमतर समझना, खासतौर पर संघ के लोगों के साथ अछूत जैसा व्यवहार करना, संघ के लोगों को कम-अक्ल और दोयम दर्जे का समझना जैसे "वैज्ञानिक दर्शन" भी आजकल काफ़ी चलन में हैं… :)
यदि वाकई वैज्ञानिक दर्शन(?) होता, तो आज भारत के अधिकतर विश्वविद्यालयों, अकादमिक संस्थाओं और शोध संस्थानों की इतनी बुरी दुर्गति न होती, क्योंकि अधिकतर समय तो तथाकथित वामपंथी ही इनमें काबिज रहे हैं…
यहाँ बात यह है ही नहीं कि किन राज्यों में स्थिति बेहतर है या नहीं है। असल दिक्कत "विचारधारा" और "सत्ता पर पकड़ बनाये रखने" के बारे में है। संघ की पृष्ठभूमि वाला व्यक्ति यदि कितना भी योग्य और उम्दा प्रशासक हो उसे हमेशा दुत्कारा ही जायेगा (साक्षात उदाहरण नरेन्द्र मोदी)। यहाँ भी मामला यही है…
कुठियाला जी चाहे जैसे भी हों, उनसे पहले भी कई कुलपति आये और आगे भी आते रहेंगे… (ऐसा भी नहीं है कि सभी दूध के धुले थे) लेकिन "संघी का विरोध हर कीमत पर…" यही मानसिकता गलत है… और देश के लिये घातक है।
आप जिन वामपंथ के झंडाबरदार बने घूम रहे हैं, उसका दोगलापन किसी से छिपा नहीं है । इन भाजपाइयों का दब्बूपन भी क्या खूब है ? तभी तो इन्हें पानी पी - पी कर कोसने वाले वामपंथियों को पाले रहते हैं आस्तीन के साँप की तरह । आप तो ताउम्र बैंक की नौकरी करते रहे और अब इन्हीं डरपोक भाजपाइयों की बदौलत राज्य स्तरीय पत्रकार की सरकारी अधिमान्यता का तमगा लटका कर घूम रहे हैं । आपकी इसी अदा को लाल सलाम.....!
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