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जनसत्ता सोसायटी की अनकही कहानी

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अभी हाल में ही एक मीडिया वेबसाइट (भड़ास4मीडिया) के पत्रकार मुझसे बात करने आये थे. बातचीत में उन्होंने एक सवाल पूछा कि किन बातों के कारण मुझे दुख होता है. मैंने उनसे कहा कि जब कोई विश्वासघात करता है तो बहुत दुख होता है, जैसे अंबरीश कुमार. अंबरीश कुमार बतौर पत्रकार एक्सप्रेस समूह के लखनऊ कार्यालय में कार्यरत हैं और उनका नाम मैं अनायास नहीं ले रहा हूं. जनसत्ता सोसायटी के बनने-बिगड़ने के दौरान अंबरीश का व्यवहार मेरे साथ और सोसायटी के सदस्यों के साथ जैसा था वह विश्वासघात ही था. मैं अनुभव करता हूं कि मैंने अति विश्वास किया जिसका खामियाजा सोसायटी के पूरे सदस्यों को उठाना पड़ा. जनसत्ता सोसायटी की दास्तान क्या है, इसे समझने के लिए मैं पूरा घटनाक्रम आपके सामने रख रहा हूं आप खुद निर्णय करिए कि अंबरीश कुमार ने विश्वासघात किया या नहीं?

जनसत्ता सोसायटी के पांच सालों का यह संक्षिप्त ब्योरा है। पूरा ब्योरा बहुत लंबा होगा, वह मैं नहीं दे रहा हूं। इसमें खास-खास बातें आपको बताना चाहता हूं। इस प्रबंध समिति का कार्यकाल खत्म हो गया है। चुनाव की प्रक्रिया के लिए रजिस्ट्रार को अनुरोध किया जा चुका है। प्रबंध समिति का जल्दी ही चुनाव हो जाएगा। नई प्रबंध समिति और सदस्यों को मालूम होना चाहिए कि सोसायटी कैसे बनी और अब तक किस तरह चलती रही। इससे सोसायटी को चलाने में मदद मिल सकती है।

कई अवसरों पर मैंने बताया है, उसे दोहरा रहा हूं। जनसत्ता सोसायटी बनाने की पहल जिन लोगों ने की वे मेरे पास आए। उनका अनुरोध था कि मैं इसमें शामिल हो जाऊं। पहले मना किया और बाद में कुछ लोगों की सलाह पर सोसायटी में शामिल होने की हां कर दी। यह प्लाट सोसायटी बननी थी। इसकी पहल अंबरीश कुमार और कुमार संजय सिंह ने की थी। 24 फरवरी 1997 को प्रस्तावित जनसत्ता सहकारी आवास समिति की पहली बैठक हुई। उसमें समिति का गठन हुआ। 21 सदस्य थे। उस बैठक में कुल 25 प्रस्ताव पारित किये गए जो सोसायटी बनाने के लिए आवश्यक होते हैं। उनमें सभापति, मुख्य प्रवर्तक, सचिव प्रबंध समिति, कोषाध्यक्ष आदि के बारे में फैसले हुए। सोसायटी का निबंधन 5 अप्रैल 1997 को हुआ।

प्रबंध समिति की दूसरी बैठक में प्लाट के बजाय अपनी सोसायटी ग्रुप हाउसिंग में बदल गई। इस बारे में जानने की जरूरत है कि ऐसा क्या हुआ। उसमें सदस्यों को यह विकल्प दिया गया कि वे ग्रुप हाउसिंग में अगर शामिल होना नहीं चाहते तो अपना पैसा वापस ले सकते हैं। 8 मई 1997 के बाद दो सदस्यों संजय सिन्हा और संजय सिंह ने छोड़ने का फैसला किया। यह विषय प्रबंध समिति की बैठक में आया। उसके बाद सोसायटी के वास्तविक कर्ता-धर्ता अंबरीश कुमार से मैंने कहा कि मैं भी छोड़ना चाहता हूं। सोसायटी का चरित्र बदलने जा रहा था। ग्रुप हाउसिंग में फ्लैटों के निर्माण की जिम्मेदार हम पर आ रही थी। इसमें मैं समय नहीं लगा सकता था। जब मेरे बार-बार कहने पर अंबरीश ने तर्क दिया कि आपके निकलते ही सोसायटी बैठ जाएगी, इस कारण मैं सदस्य बना रहा। सोसायटी के कामकाज संभालने का जिम्मा अंबरीश निभाएंगे इस नाते मेरी समझ थी कि मुझे ज्यादा समय इसमें नहीं लगाना होगा। अंबरीश कुमार की बातों पर मैंने भरोसा किया। उससे ही मैं और पूरी सोसायटी एक भंवर में पड़ी हुई है। आप ही फैसला करिए कि मैंने भरोसा कर गलती की? हमारे मित्र उमेश जोशी, सुशील कुमार सिंह और अनेक सदस्यों ने सोसायटी छोड़ी वे ऐसा कर सकते थे। मैं मुख्य प्रवर्तक होने के नाते भी बधा हुआ था।

जैसे ही अपनी सोसायटी की कैटेगिरी बदली सदस्यों की संख्या बढ़ाने का फैसला हुआ। आवास विकास परिषद को जमीन आवंटित करने के लिए अनुरोध किया गयां उसके बाद 26 सितम्बर को सोसायटी के लिए जमीन के आवंटन का पत्र मिला। सोसायटी का काम शुरू हुआ। 29 सितम्बर को दूसरी आम सभा हुई। उसमें 19 सदस्य उपस्थित थे। उसी बैठक में रिक्त हुए स्थानों पर पूरक सदस्यता देने का फैसला हुआ। इसी से राम कृपाल सिंह, कमरवहीद नकवी, मनोहर लाल, अरूण पांडे और हरे कृष्ण यादव सदस्य बने। इनके अलावा और भी नये सदस्यों के आने का क्रम चला। सोसायटी के लिए पहला काम आर्किटेक्ट का चयन था। इसके लिए एक तकनीकी समिति बनी। वैसे देखा जाए तो तकनीकी समिति में मेरा नाम भी है। जहां तक मुझे याद है, किसी बैठक में मैं नहीं था। यह सोचकर कि इस बारे में मेरी कोई समझ नहीं है। तकनीकी समिति ने आर्गेनिक इंडिया को आर्किटेक्ट चुना। यह 24 मार्च 1998 की बात है। इसके बाद दूसरा काम ठेकेदार का चयन था। उसी दौर में ठेकेदार का चयन हुआ। जिस दिन टेंडर खोला जाना था मैं बुखार में था। लेकिन अंबरीश कुमार के आग्रह पर वहां उपस्थित रहा। 24 जुलाई 1998 को आिर्कटेक्स के घर कई सदस्यों की उपस्थिति में टेंडर खुला। ठेकेदार का चयन हुआ। इंटरनल ऑडिट की रिपोर्ट से यह संदेह पैदा हुआ है कि पहले से मिलीभगत थी। दो दिन बाद आम सभा हुई। मैं बुखार के चलते उसमें शामिल नहीं हो सका। अगले दिन अंबरीश कुमार ने मुझे वह फोल्डर भिजवाया जो हर सदस्य को दिया गया था।

जिस आर्किटेक्ट को हमने चुना था उसकी लापरवाह कार्यशैली के लक्षण जल्दी ही दिखने लगे। नक्शे और फ्लोर एरिया पर विवाद पैदा हुआ जो कई महीने चला। अध्यक्ष के नाते उन दिनों मुझे एक उपसमिति बनानी पड़ी। उस समय कई बार ऐसा हुआ जब हम नक्शे पर विचार के लिए आर्किटेक्ट का इंतजार करते रहे। न तो आर्किटेक्ट आए और न ही उसकी सूचना दी। कई महीने के गतिरोध के बाद एक फैसला हो सका। यह सोचा गया कि निर्माण कार्य शुरू होना चाहिए ताकि तय समय सीमा के पहले ही काम पूरा हो जाए। इसके लिए हम लोगों में हर तरह से वरिष्ठ और श्रेष्ठ जो-जो हैं उनकी सलाह भी ली गई। मुझे याद है कि 16 जनवरी 1999 को एक बैठक प्रभाष जी के साथ कराई। उस समय के विवादों की भविष्य पर छाया न रहे और काम सुचारू ढंग से चले इसके लिए उन्होंने कई समितियों के सुझाव रखे। एक समाधन समिति बनी। दूसरी एक कार्यालय व्यवस्था की समिति बनी। तीसरी वित्त समिति बनी और चौथी निर्माण समिति बनी। हर समिति का एक व्यक्ति प्रभारी बनाया गया। वे नाम क्रमश: ये हैं- राम बहादुर राय, राम कृपाल सिंह, सत्य प्रकाश त्रिपाठी और अंबरीश कुमार। यह व्यवस्था चल नहीं पाई, क्यों ऐसा हुआ, इस पर छानबीन की जरूरत है। जिस व्यवस्था में निर्माण काम सहित सोसायटी को पूरा होना था उसे अंबरीश कुमार पहले ही बिगाड़ चुके थे। चाटर्ड एकाउंटेंट चंदन झा को प्रबंध समिति की बैठकों में बुलाना बंद कर दिया था। उपाध्यक्ष और कोषाध्यक्ष से इतनी दूरी बना ली थी कि ये लोग चुपचाप अलग हो गए। इसकी जानकारी बाद में मिली। उसी दौरान एक बैठक में सोसायटी के बैंक एकाउंट को चलाने के लिए दूसरे हस्ताक्षर पर मेरे नाम का प्रस्ताव प्रबंध समिति में आया। उसे बिना किसी स्पष्टीकरण के मंजूर कर दिया गया। यह नई व्यवस्था क्या बनाई गई? इसे इतने दिनों बाद ही सही अंबरीश कुमार ही बता सकते हैं। सोसायटी के खातों से जो पैसा निकाला गया है और हिमांशु चौधरी ने गबन किया है उसका इससे संबंध है। मुझे साजिश का संदेह है। इसकी शिकायत पुलिस में है। इसके अलावा भी जांच होनी चाहिए। फिलहाल यह कह सकता हूं कि सोसायटी में परस्परता का अभाव रहा। यहीं मुझे अपने दो साथियों से शिकायत है। वे मुझे चुपचाप अलग होते समय आगाह कर सकते थे।

निर्माण काम जैसे-तैसे 22 जनवरी 1999 से प्रारम्भ हुआ। भूमि पूजन 10 अगस्त 1998 को हुआ था। लक्ष्य था कि जनवरी 2000 तक काम पूरा हो जाए। उस समय काम पूरा होने की रिपोर्ट देने के बजाय प्रबंध समिति की एक बैठक में सचिव ने जानकारी दी कि फ्लैट लागत बढ़ाने की जरूरत पड़ रही है। वह प्रस्ताव आर्किटेक्ट और सचिव का था। यह सुनकर पहली बार मैं अपने को रोक नहीं पाया। पूछा कि क्या निर्माण सामग्री की कीमत बाजार में बढ़ी है, जवाब मिला कि नहीं। मेरा कहना था कि फिर निर्माण लागत बढ़ाने की जरूरत नहीं है। सदस्य इसे स्वीकार नहीं करेंगे। प्रबंध समिति को छानबीन करनी चाहिए। आर्किटेक्ट ने प्रबंध समिति को अपने अलग-अलग आकलन से उलझाए रखा। इस पर एक जांच समिति मैंने बैठाई। उसकी रिपोर्ट पर लागत बढ़ाने का फैसला हुआ। वह रिपोर्ट आर्किटेक्ट और बिल्डर की दी गई जानकारी पर आधारित थी।

सोसायटी का ढांचा खड़ा कर ठेकेदार चाहता था कि आवंटन जल्दी करा दिया जाए। तत्कालीन सचिव यही आग्रह प्रबंध समिति में तब रखने लगे थे। उस समय आवंटन हो या नहीं यह विवाद पैदा हुआ। जनसत्ता के साथी दो खेमे में बंट गए। कुछ सदस्यों ने आवंटन रोकने के लिए चिट्ठी दी। तत्कालीन सचिव ने जवाबी ज्ञापन कुछ सदस्यों से दिलवाया। मैं समझता था कि आवंटन हो जाने से दो फायदे होंगे। काम जल्दी पूरा होगा और सदस्य अपने फ्लैट को मन मुताबिक तैयार करा सकेंगे। सामूहिकता बढ़ेगी। प्रबंध समिति में आम राय थी। आवंटन कराने का फैसला हुआ। उन बातों पर नजर दौड़ाने के बाद आज महसूस करता हूं कि ठेकेदार जल्दी आवंटन कराकर भागना चाहता था और अंबरीश कुमार रायपुर जाने की जल्दी में थे। उनकी चालों को हम नहीं समझ पाए। एक बात और आर्किटेक्ट ने भी अपनी प्रोफेशनल सलाह नहीं दी जो उसका बाकायदे काम था। क्या यह उन लोगों की मात्र लापरवाही थी? मेरा मत है कि तत्कालीन सचिव, ठेकेदार, आर्किटेक्ट, साईट इंजीनियर और एकाउंटेंट आपस में मिले हुए थे। आवंटन से ठेकेदार को मनमानी करने का अवसर मिल गया। सदस्यों को नुकसान हुआ।

आम सभा 30 जुलाई 2000 को हुई। उससे पहले की शाम को प्रबंध समिति में इस बात पर पूरा विचार हुआ कि आम सभा में कौन क्या जिम्मेदारी संभालेगा। एक प्रक्रिया बनाई गई। जो सदस्य आम सभा में थे उन्हें याद होगा कि सचिव अंबरीश कुमार ने अचानक माइक संभाल लिया और प्रबंध समिति के फैसले धरे रह गए। जो सदस्य कुछ स्पष्टीकरण चाहते थे उनको मौका नहीं मिला। आम सभा की कार्यवाही शुरू हो गई थी जब मैं बाहर ही था। उस समय हस्तक्षेप करना अनुचित लगा। आम सभा हुई और उसके बाद आवंटन का काम पूरा हुआ। आपको बता दूं कि बढ़ी लागत के बारे में जांच समिति की रिपोर्ट 31 अगस्त 2000 को मिली।

आवंटन के साथ सोसायटी का काम पूरा हो जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। आवंटन होने तक सोसायटी सचिव सचिव अंबरीश कुमार केिन्द्रत थी। उनके रायपुर चले जाने के बाद सदस्यों ने मुझसे सोसायटी के कामकाज के बारे में पूछना शुरू किया। यह मेरे लिए नई समस्या थी। समस्या समाधान की जिम्मेदारी में निर्माण काम भी जुड़ता हुआ लगा। मेरी पहली कोशिश रही कि अंबरीश कुमार को रायपुर से बुलाकर यहां रहने के लिए कहा जाए और वे बचे हुए काम पूरा कराएं। प्रबंधन से बात हुई। उन्हें छुट्टी मिल जाएगी और जनसत्ता सोसायटी जरूरत पड़ने पर उनके वेतन का बोझ उठा लेगी यह तय हो गया था। वे इसके लिए तैयार नहीं हुए लेकिन बीच-बीच में आते रहे। वे और ठेकेदार बार-बार काम पूरा होने की तारीखें बढ़ाते रहे। अंबरीश कुमार के सुझाए नाम पर सहमत होकर कार्यकारी कई कार्यकारी सचिव एक के बाद दूसरे बनाए गए। उस समय यह बात भी आई कि अंबरीश कुमार को सचिव पद से हटा दिया जाए। अनुभवी सदस्यों की सलाह मानकर यह नहीं किया क्योंकि उनका जोर होता था कि अंबरीश कुमार को सचिव पद पर बनाए रखिए वही काम पूरा कराएंगे।

इस दौरान जब देखा कि सोसायटी का काम आगे नहीं बढ़ रहा है, पूरा होने की बात ही दूर है और पैसे का हिसाब भी साफ नहीं था। सात महीने निकल गए थे। ठेकेदार, आर्किटेक्ट, साईट इंजीनियर और ईंट आदि की सप्लाई करने वाले जब तब पैसे की मांग कर रहे थे। अपनी जवाबदेही से ध्यान हटाने की इनकी यह तरकीब थी। अंबरीश कुमार उन्हें पैसे दिलवाए चले जा रहे थे। कई बार प्रबंध समिति की बैठक में साईट इंजीनियर दुलीचंद ईंट भट्ठे वालों को लेकर पैसा दिलाने आ जाता था। उससे पूरी बातचीत ही बदल जाती थी। ऐसी बाधाएं बार-बार आ रही थी। सचिव अंबरीश कुमार के खिलाफ सदस्य खुलकर बोलने लगे थे क्योंकि वे निराश होते जा रहे थे। सोसायटी के कर्मचारी उन दिनों मालिक की तरह बर्ताव कर रहे थे। उस समय एक ही उपाय सूझा कि हिसाब ठीक कराने के लिए एक योग्य चार्टर्ड एकाउंटेंट की मदद ली जाए। (जारी...)

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जागरूक पाठक on 25 May, 2009 06:39;50
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संजय जी, क्या विस्फोट अब इन्हीं कामों के लिए रह गया है। ऐसे ही लेख छापने हैं,तो अच्छा होता कि इसपर अल्पकालिक नहीं स्थायी विराम लगा देते। व्यक्तिगत लड़ाई झगड़े और सफाई की सीरिज छापना अगर आपकी मजबूरी है,तो ऐसी मजबूरी में फंसा संपादक नहीं चाहिए। बड़े लोगों की बड़ी बात। पता नहीं आपसी लड़ाई को सार्वजनिक कर लेखक महोदय क्या बताना चाहते हैं। सोसाईटी का पैसा जुटाना भी ज्यादातर पत्रकारों के बूते से बाहर की बात है। क्यों उपहास उड़ा रहे हैं उन पत्रकारों का जनसत्ता के सम्पन्न पत्रकारों की छांव तक नहीं हैं।
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manoj sharma on 25 May, 2009 21:41;02
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राम बहादुर इमान्दार बाकि वे सब बेइमान जो सन्घ वाले न हो।राम बहदुर ने चार सदस्य बनाये और चारो भुमिहार दो पोलिस और दो सान्सद
चार्टर्ड एकाउंटेंट भी अपना सन्घी सथी ले आये जो उन्हे बेदाग बतये ।जब मामला अदालत मे है तो आप क्यो अदालत लगकर सफ़ाई देते घुम रहे हो ।जै हो राय साब्।
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ali anwar on 26 May, 2009 06:27;16
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चोर की दाढ़ी में तिनका
विश्वासघात किसने किया, यह सभी को जानना चाहिए। अपने दो दशक पुराने सहयोगी के खिलाफ फर्जी मुकदमा दर्ज कराना और वह भी उसे बिना बताए विश्वासघात होता है। अपने रिश्तेदार आईजी के दबाव से आरोप पत्र दाखिल कराना दूसरा विश्वासघात होता है। एक भ्रष्ट और धंधेबाज चाटर्ड एकाउंटेंट को सोसाइटी में घुसाकर अपने किए-दिए की सजा किसी निर्दोष को दिलवाना विश्वासघात होता है। जहां तक अंबरीश कुमार की बात है, हमने उन्हें छत्तीसगढ़ में उस सत्तारूढ़ दल के खिलाफ लड़ते देखा है जिसने पत्रकारों की बोलती बंद कर रखी थी। उनके कार्यालय पर हमला भी किया गया। पर वे कभी नहीं झुके और महाशय आपकी पत्रकारिता चंद्रशेखर से शुरू होकर चंद्रशेखर के ट्रस्ट कब्जाने की कोशिशों पर खत्म हो गई। बेहतर हो कि आप इस तरह कींचड़ उछालना बंद कर पत्रकारों में टकराव को दूर करने का प्रयास करें। आपकी पूरी पत्रकारिता पर देश की एक प्रमुख पत्रिका में वरिष्ठ पत्रकार कुमार प्रशांत पहले ही रोशनी डाल चुके हैं। हर जगह तथ्यों के साथ गड़बड़ घोटाला न किया करें।
अली अनवर
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visfot news network on 26 May, 2009 10:58;52
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अली अनवर बिहार से राज्यसभा सांसद हैं. उनका बेजा नाम इस्तेमाल करके जिसने भी यह कमेन्ट किया है उसे अंदाज नहीं है कि उसे यह कितना भारी गलती की है. यह कमेन्ट मैं हटा भी सकता हूं लेकिन हटा इसलीए नहीं रहा हूं कि हिन्दी पत्रकारों का असली स्वभाव भी लोगों को पता चलना चाहिए.

रायसाहब ने उस सोसायटी के बारे में जो लिखा है खुलकर लिखा है वे अपने लिखे के शब्द-दर-शब्द से सहमत हैं और स्वीकार करते हैं. अगर कमेन्ट करनेवाले भी खुलकर कहना चाहते हैं तो कम से कम अपने नाम से लिखें.

तीनमूर्ति लेन की जिस कोठी से यह कमेन्ट लिखा गया है कम से कम अली अनवर वहां नहीं रहते. और उन्हें कंप्यूटर का कखग भी नहीं आता. फिर फर्राटेदार तरीके से यूनिकोड में लिखने का सवाल ही नहीं पैदा होता. जिसे जो कहना है, खुलकर कहे लेकिन इतनी हिम्मत दिखाए कि अपने असल नाम से कहे. शायद तब हम ज्यादा सटीक तरीके से सही-गलत का निर्णय कर पायेंगे.
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RAJKUMAR SINGH on 27 May, 2009 01:03;47
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संजय जी मैं 'जागरुक पाठक ' से सहमत हूँ .

अगर मामला कचहरी तक पहुँच गया है तो सफाई उधर ही दी जाये .अगर राय जी सही भी हों तब भी , ऐसे लेख 'विस्फोट' के लायक तो नहीं ही हैं .


रामबहादुर राय या कोई भी अन्य वरिष्ठ पत्रकार अभी हाल में संपन्न हुए चुनाओं में और अब तक जारी मीडिया की भूमिका पर क्यों नहीं सवाल उठा रहा जहाँ पाठकों के साथ 'अधमतम ' विश्वास घात हो
रहा है .प्रेस काउन्सिल इस पर क्या कर रही है यह क्यों नहीं मुद्दा है.क्या इस हम्माम में सभी नंगे हैं ?

आपने ही रपट दी है 'विस्फोट' में . लिखित शिकायतें

taक आयी हैं .पूरे मीडियाकर्मी कटघरे में हैं. उनकी विश्वसनीयता जो भी थी ,वह भूतल पर जा पहुँची है .
जब सभी ( बहुजन पढें ) 'धंधे' में लगे हैं तो यह तो स्वाभाविक छोटी मोटी खुजली है , जिसे 'विस्फोट' न खुजलाये तो ही अच्छा ! आय से ज्यादा संपत्ति में
इस 'धंधे' के लोग नहीं हैं ? बन सकता है मुद्दा ? खबर देने वालों से ख़बरदार होने की जरूरत नहीं है ? अगर जो इमानदार हैं वाकई , इस बाबत क्यों नहीं खुल कर आते ? आपके लायक यह विषय होना चाहिए .
यह बयानबाजी आपके और 'विस्फोट' के लायक विषय नहीं . हाँ यह सब हर सोसाईटी बाजी में होता है , तो पूरे परिवेश पर लिखा जाए तो और बात .
'विस्फोट' खुला मंच है पर यह व्यक्तिगत मामला उसके उद्देश को छोटा बनाता है .

भले ई पत्रकारिता में छपाई के लिए पेपर और स्याही न लगती हो तब भी .

मै पत्रकार जगत का हिस्सा नहीं पर एक पाठक की हैसियत से तो यह बात कह ही सकता हूँ.
आशा है की मेरे कथन को अन्यथा न लें ,क्योंकि मैं राम बहादुर राय सहित किसी को भी नहीं जानता न उनकी व्यवसायिक पेशेगत इमानदारी ,बेईमानी के आलावा मेरा किसी से कोई व्यक्तिगत मतलब ही है .

डर ये लगता है कि जैसे विगत में हुआ और यहीं पर फिर से शुरू हुआ चाहता है ,गंभीर पाठक इसकी सराहना न कर पाएंगे .भले सब की नग्नता जानने को उत्सुक हो जाएँ कि कौन किसको कितना गरिया सकता है .
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Kundan Sehgal on 27 May, 2009 04:43;36
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yah sara mamla jansatta ki andaruni rajiniti se juda hua hai. iski shuruaat tab hui thi jab prabhash joshi ko jaansatta ke editor pad se hataya ja raha tha. tab jo union unke samarthan me aai uske neta ambarish kumar the.jansatta me 2 kheme rahe hai
ek khema amnarish kumar k sath raha hai jo ab ram bahadur roy ke sath ho.
aur bhai sahab, suna hai ki RB roy to khud hi is jansatta society se apni jagah bech-bach kar nikal liye hai. 3-adalat me mamle chal rahe hai.

adalti mamlo ko adalt me hi chalne dein to bhalaa hoga.
kyon aise personal mamle ko yaha lakar apni aur apne portal ki image kharab kar rahe ho.



gharo ki rajniti ko patrakar sadak par ( webiste) par suljhane likh raha hai. afsos.

iske prabandh samiti k chunav me 13 editor aur 39 samvad-data shamil huye the, jahir hai ki vaha rajniti ki jadein kitni gehari hai.
behatar ho ki aise vivado se apne aap ko bachana chahiye

kya agli kadi me visfot pati-patni k jo mamle adalat me chal rahe hai unhe yaha pesh karega??
visfot jaisi web portal kya ab sirf charitra hanan hi karega?
is se to accha jo apne asthayi kary viram ko ghoshna ki thi us par kayam rahiye. lekin apni aur visfot ki jo thodi bahut sakh apne banai hai use yu na gavaiye.
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आलोक तोमर on 28 May, 2009 00:52;41
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राय साहब के साथ मैंने भी काम किया है...अम्बरीश भी सहकर्मी और मित्र रहे हैं और आज भी हैं..राय साहब को मैंने आदर्श, तपस्वी होने की हद तक साहसी और ईमानदार पाया है..गुस्सा उन्हें आता है तो वह तो दुर्वासा को भी आता था...फिर भी उनके ऋषि होने में कौन संदेह करेगा...अम्बरीश दुनादार इंसान हैं और जो दुनियादार नहीं होगा वह जनसत्ता सोसायटी बनाने जैसा बड़ा काम नहीं कर सकता..अम्बरीश पत्रकारिता अपने सरोकार से कर रहे हैं..वर्ना बिल्डर भी बन सकते थे..जनसत्ता सोकाय्ती का सदस्य मैं भी था...पैसे का अकाल पड़ा तो सदस्यता वापस ले ली. मुझे सदस्यता छोड़ने के लिए प्रोत्साहित बल्कि वाध्य करने वाले ( अब मतंग सिंह की जिन्दगी में मनोरंजन की भूमिका निभा रहे) कुमार संजय सिंह का फ्लैट शायद अब भी है.

मुझे तकलीफ है कि अपनों की बातें सपनों में आरही हैं और ये सपने सार्वजानिक हो रहे हैं. राय साहब आदरणीय हैं और में इस कुटुंब के मुखिया प्रभाष जी से निवेदन कर रहा हूँ कि इस कथा के दुखांत होने से पहले हस्तक्षेप करें. राय साहब, अगर मैंने तथ्यों की कोइ भूल की हो तो माफ़ कीजिये. संजय जी आप ही प्रभाष जी से एक बार बात कर लें. एक तरफ चन्दा ले कर काम कर रहे हैं और दूसरी और परकारिता के राजमार्ग पर केले के छिलके फिंकवा रहे हैं...
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visfot news network on 28 May, 2009 02:01;33
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बार-बार लोग यह कह रहे हैं कि जनसत्ता सोसायटी के बारे में यह रपट प्रकाशित करके मैंने साख गंवा दी है या केले के छिलके लिए घूम रहा हूं.

आलोक जी, मेरे हाथ में कोई केले का छिलका नहीं है. मीडिया वेबसाईट पर रायसाहन ने जो कहा उसे अंबरीश जी ने दवाब डलवाकर हटवा लिया. अगर अंबरीश जी मानते हैं कि मामला और वे पाकसाफ हैं तो फिर उस वेबसाईट से अपने बारे में रायसाहब की टिप्पणी हटवाने के लिए उन्होंने इतना जोर क्यो लगाया?

दूसरी बात, अदालत में मामला है और सुनवाई चल रही है. लेकिन यहां जो कुछ रायसाहब ने लिखा है यह उस रिपोर्ट का हिस्सा है जो उन्होंने जनसत्ता सोसायटी के सदस्यों के सामने रखा था. क्योंकि आरोप अब सार्वजनिक हो रहे हैं इसलिए उन्होंने तय किया कि वे जवाब भी सार्वजनिक देंगे. यह सब तक की बातें है जब अदालती कार्रवाई शुरू नहीं हुई थी. यहां दिया भी उतना ही गया है जनता की अदालत में बात साफ होनी चाहिए न कि अदालत की कार्रवाई में दखल हो. अदालत में जो कुछ चल रहा है उसका यहां जिक्र तक नहीं किया गया.

प्रभाष जी से हम क्या बात करेंगे? अपनी इतनी पहुंच और क्षमता नहीं है. रायसाहब और अंबरीश दोनों ही प्रभाष जी के अनन्य करीबी हैं. वे खुद से कुछ करें तो करें.
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Siddharth Kalhans on 29 May, 2009 04:28;41
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तो यह थी कहानी सर्वशकितमान अंबरीष कुमार की। महोदय खुद को आंदोलन से जनमें, जमाने की परवाह नकर सच की अलख जगाने वाले और जाने क्या कहलाते रहे हैं आप और जिस सोसायटी में खुद मुख्तार रहे वहीं गड़बड़ी होते देखते रहे और कुछ कर न सके। अगर कोई गड़बड़ी हुयी तो जाहिर है आप की मिलीभगत के बगैर नही हुयी क्योकि आप सारे पेंच जानने का दावा भी कर रहे हैं और सारे मौकाएवारदात का तफसिरा भी सुना रहे हैं। बराय मेहरबानी खुद को खुदा बता दूसरे पर कीचड़ उछालने से बाज आएं। आपका ये दत्तक पुत्र विस्फोट क्या इन्हीं उलटबासयों के लिए बचा है। और एक बात और पत्रकारों की सोसायटी वो भी जनसत्ता की, उसमे कोई एक अपनी कर गुजरे यह आप बीच गंगा में खड़े होकर कहें तो भी कोई मान नही सकता।
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kundal sehgal on 29 May, 2009 04:37;53
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kyon sanjay ji, visfot kab se kisi ke comment ko katar-byont kar dene laga?
kal hamne dekha to ye siddharth nam wala comment pura tha, aur aaj dekha to aadha hi baki hai, baki comment ko kyn edit kar diya gaya bhai?
aur kitna niche girenge aap?
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image आर बी राय पत्रकार. छात्र आंदोलन से राजनीति और राजनीति से पत्रकारिता में आये रामबहादुर राय हिन्दी में खोजी पत्रकारिता के शीर्षपुरूष समझे जाते हैं. वर्तमान में प्रथम प्रवक्ता के संपादक और विस्फोट.कॉम के सम्मानित स्तंभलेखक. संपर्क- 09350972403
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लालू भी चाहिए नीतीश भी
बिहार के मतदाता इन दिनों अपने लिए एक बेहतर नेता चुनने में जुटे हैं. एक ऐसा नेता जो अगले पांच साल के लिए उनके अंदर छुपी बदलाव की खदबदाहट को दिशा दे सके और विकास के रास्तों के कंटक हटा सके. लोगों के सामने दो विकल्‌प है लालू या नीतीश. इस बार हो सकता है भावावेश में जनता एक को चुन ले और दूसरे को रिजेक्ट कर दें. पर जहां तक मेरी राय इनमें से किसी एक नेता से बिहार का काम चलने वाला नहीं. बिहार को दोनों चाहिए, लालू भी और नीतीश भी. आखिर क्यों ?...
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विकास की बिसात पर कैसे हो नीतीश की मात
बिहार में चुनाव हो तो क्या मुद्दा होना चाहिए? निश्चित रूप से बिहार से बाहर रहनेवाले लोग विकास और जातिमुक्त बिहार की आदर्शवादी कल्पना पिछले कई चुनाव से बिहार के लिए मुद्दा बनाने की बातें करते रहे हैं. लेकिन साथ में यह भी जोड़ देते हैं कि बिहार चुनाव में विकास शायद ही मुद्दा बने? लेकिन इस बार यह कमाल दिखाई दे रहा है. पक्ष में हो या विपक्ष में केन्द्रीय मुद्दा विकास ही है. असल में बिहार की विपक्षी पार्टियां नीतीश को रिप्लेक्स करने के लिये तैयार ही नहीं है. लोगों को यह बात अतिशयोक्तिपूर्ण लगती है. मगर आप ही बतायें कि ”या विकास को मुद्दा बनाकर नीतीश से चुनावी समर जीता जा सकता है?...
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गिलानी की गुगली और हिन्दुस्तान की गफलत
अभी-अभी हुर्रियत कांफ्रेंस के गरमपंथी धड़े के नेता सैयद अली शाह गिलानी अपने विस्फोटक सेमीनार के जरिए दिल्ली और देश में अच्छा-खासा आक्रोश और विवाद पैदा करके गए हैं। अपने अलगाववादी नजरिए पर टस से मस न होने के लिए कुख्यात गिलानी ने दिल्ली में हुए इस कार्यक्रम में न सिर्फ कश्मीर की ‘आजादी‘ की पारंपरिक मांग दोहराईं बल्कि एक कदम आगे बढ़कर ‘स्वतंत्र कश्मीर‘ बनने के बाद की ‘नीतियों‘ का खाका भी पेश कर गए। ‘कश्मीर की आजादी ही एकमात्र विकल्प‘ नामक विषय के इर्द-गिर्द केंद्रित सेमीनार में उन्होंने देशद्रोह के दायरे में आने वाली दर्जनों टिप्पणियां कीं और ‘अभिव्यक्ति की आजादी‘ का फायदा उठाकर आराम से कश्मीर की ओर निकल लिए।...
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कांग्रेस का दाना, नीतीश की ना-ना
बिहार में चुनाव के दो चरण बीत चुका है. नक्सालियों के दखल के अलावा कहीं कोई खलल नहीं है. जनता भी निश्चिंत है और नेता भी. जैसा किसी पूर्व निर्धारित पटकथा पर सारे किरदार अपनी भूमिका निभाने में जुटे हों. नेशनल न्यूज चैनलों ने सर्वे जारी कर जरूर थोड़ी सी गहमा-गहमी क्रियेट की है मगर लोकल मीडिया में कहीं कोई सनसनी नहीं है....
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विकीलीक्स ने फिर साबित किया अमेरिका को हत्यारा
इराक में अमेरिकी सेना ने अपने आपरेशन के दौरान ना सिर्फ निर्दोष नागरिकों की हत्या की बल्कि युद्ध की कवरेज कर रहे पत्रकारों को भी मौत के घात उतार दिया। विकिलिक्स ने अमेरिका में इराकी आपरेशन को लेकर पेंटागन के जो डाटाबेस और रिकार्ड जारी किये हैं उनमे अमरीकी सेना के अपाची हेलीकाप्टर्स (क्रेजी हार्स 18) जो कि टेक्सास स्थित यु एस आर्मी के २२७ रेजिमेंट के फर्स्ट बटालियन का हिस्सा है के बारे में चौका देने वाले खुलासे किये हैं। विकिलीक्स द्वारा जारी किये गए एक वीडियो में अमेरिकी जवानों को सिर्फ खबरिया एजेंसी रायटर के दो जांबाज पत्रकारों की गलत सूचना देकर हत्या किये जाने बल्कि उनकी मौत पर ठहाके भी लगाये देखा जा सकता है।...
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बिहार चुनाव में चौराहे पर खड़ा मुसलमान
बिहार चुनाव में पसमांदा मुसलमान एक बार फिर चौराहे पर खड़े हैं। पसमांदा मुसलमानों में किसी पार्टी या गठबंधन को लेकर कोई उत्साह नहीं हैं। ज़्यादातर पसमांदा वोटर ख़ामोश हैं। कभी पसमांदा आंदोलन के अगुआ रहे लोग इस चुनाव में आश्चर्यजनक रूप से निषक्रिय हैं। कई पार्टियों की तरफ़ से बुलावा आने को बावजूद उन्होंने पार्टियों के दफ़्तर जाना या नेताओं से मिलना तक मुनासिब नहीं समझा। वजह साफ है पसमांदा मुसलमान तमाम पार्टियों की वादा ख़िलाफी से ऊब चुके हैं।...
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पपेट प्रधानमंत्री का एक और पापकर्म
देश में एक वर्ग विशेष को तुष्ट करने के लिए सरकार कहां तक गिर सकती है उसका हालिया उदाहरण है शत्रु संपत्ति विधेयक-2010 का विरोध करना फिर उसमें मुस्लिम नेताओं के मनमाफिक संसोधन को केन्द्रीय कैबिनेट द्वारा स्वीकृति देना। कठपुतली (पपेट) प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में बुधवार को केंद्रीय कैबिनेट की बैठक आयोजित की गई थी। इसमें इसी बैठक में केंद्रीय गृह मंत्रालय के प्रस्ताव पर शत्रु संपत्ति (संसोधन एवं विधिमान्यकरण) विधेयक-2010 में संसोधन को स्वीकृति प्रदान की गई।...
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चुनाव आयोग के सामने बिहार चुनाव की चुनौती
पिछले विधानसभा में स्वतंत्र और भयमुक्त चुनाव होने का असर राजनैतिक दलों और नेताओं पर साफ देखने को मिल रहा है। चुनाव आयोग की सख्ती का साफ असर इस बार भी नेताओं और पार्टियों कार्यालयों में देखा जा रहा है। विभिन्न पार्टियों के नेता काफी चौकस है कि इस दौरान किसी भी सूरत में चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन नहीं हो। मुख्यमंत्री आवास एक अणे मार्ग में नीतीश कुमार से मुलाकात करने जा रहे नेता भी वहां किसी तामझाम के पहुंच रहे हैं। लालू प्रसाद यादव भी अपने नेताओं को यह समझाया कि सभी सरकार आवास पर नहीं, पार्टी कार्यालय में मिले।...
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दशहरा रैली का दम
शिवाजी पार्क शिवसेना और शिवसेनाप्रमुख के बीच दशकों पुराना अटूट संबंध है. शिवेसना की पहली जनसभा 19 जून 1966 को इसी शिवाजी पार्क में हुई थी. तत्कालीन राजनीतिक विश्लेषकों का मत था कि 1960 और 1966 के बीच व्यंगचित्र साप्ताहिक मार्मिक के माध्यम से ठाकरे परिवार ने स्थानीय लोकाधिकार के लिए जो अलख जगाया था, उससे उपजे राजनीतिक विचार से जन्मी शिवेसना की पहली जनसभा में अधिकतम दस हजार स्रोता जमा होंगे....
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जांच होगी पर आंच किसी को नहीं आयेगी
कामनवेल्थ खेलों के समापन के अगले दिन ही खेलों की तैयारियों में हुई हेराफेरी की जांच का आदेश देकर केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर संभावित राजनीतिक पैंतरेबाजी पर लगाम लगा दिया है लेकिन इस जांच की गंभीरता पर सवाल किये जाने लगे हैं. दिल्ली में सत्ता के गलियारों में सक्रिय ज़्यादातर लोग इस खेल में शामिल थे. पूना वाले बुड्ढे नौजवान ने मामला इस तरह से डिजाइन किया था कि दिल्ली के सभी अमीर उमरा ७० हज़ार करोड़ रूपये की लूट में थोडा बहुत हिस्सा पा जाएँ....
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उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों का आतंक
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव चल रहे हैं. इन चुनावों को नजदीक से देखने और जानने की जरूरत है. दो चरण पूरे हो चुके हैं। तीसरा और अन्तिम चरण 20 अक्टूबर को पूरा हो जाएगा. जब उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव की अधिसूचना जारी हुई तो मेरठ के एक पॉश इलाके में बसपा कार्यालय पर बसपा के समर्थन से चुनाव लड़ने वाले इच्छुक लोगों की भीड़ लगी थी। महंगी लग्जरी गाड़ियों का रैला था। गाड़ियों में सवार हष्टपुष्ट आदमी थे। कुर्ता-पायजामा की जगह झक सफेद पेंट-शर्ट के साथ सफेद जूते में दिखनेवाले नेता हमें माफियाओं के आस पास होने का आभास दे रहे थे. उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों का आंतक के शुरूआत की घोषणा हो चुकी थी. ...
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विपक्ष का कार्य सरकार गिराना ही नही है
दक्षिणी दुर्ग में बनी भाजपा की पहली सरकार गहरे संकट में है। मुख्यमंत्री येदियुरप्पा शुरु से ही सकटों से घिरे रहे है। यह संकट बाहरी कम अंदरुनी ज्यादा रहे है। कुछ समय पहले बंगलौर निकाय चुनावों में भी भाजपा को जोरदार सफलता मिली थी। ईसाई समुदाय को छोड़कर किसी और वर्ग को भाजपा सरकार से कोई खास नराजगी नही रही है। चर्च का एक हिस्सा पिछले कुछ समय से राज्य में युदियुरप्पा सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग करता रहा है इसके लिए यह वर्ग राज्यपाल हंसराज भारद्वाज को कई ज्ञापन भी दे चुका है।...
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यह उमर और ऐसी गलती?
यह राजनीतिक पूतों के पांव हैं जो पालने में दिख रहे हैं. पहले राहुल गांधी का बयान और अब उमर अब्दुल्ला की गलती. जम्मू कश्मीर विधानसभा में बोलते हुए उन्होंने कश्मीर के भारत में विलय को ही अधूरा बता दिया. देशभर में विरोध हुआ लेकिन राहुल गांधी ने चुप रहने में भलाई नहीं समझी, उमर की तारीफ करने मैदान में कूद पड़े. कश्मीर इनके पुरखों की विरासत है, लेकिन पुरखों की इस विरासत से कैसा खिलवाड़ कर रहे हैं ये दो नौजवान? शेष नारायण सिंह का विश्लेषण-...
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बिहार चुनाव में बच्चों के लिए नदारद है नारा
बिहार के विधानसभा की घमाचान में हर पार्टी के झोले के भीतर से एक-एक करके हर एक के लिए मुद्दे ही मुद्दे और नारे ही नारे बाहर आ रहे हैं. मगर बच्चों के लिए इस बार भी कोई मुद्दा और नारा नहीं गूंज रहा है. ऐसे में क्राई ने बच्चों के मुद्दों को सूचीबद्ध करते हुए सभी राजनैतिक दलों से बच्चों के अधिकारों को वरीयता देने के लिए संवाद का सिलसिला शुरू किया है. इसके तहत बाल अधिकारों का एक घोषणा-पत्र तैयार किया जा चुका है और अब बच्चों के मामले में राजनैतिक दलों पर जल्द से जल्द अपना-अपना रूख स्पष्ट करने के लिए दबाव बनाना तय हुआ है....
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