मूंछ का बाल, नाक का सवाल...एक बार फिर
कर्नल बैंसला एक बार फिर सक्रिय हो गये हैं. आगामी 10 जून को भरतपुर के बयाना में वे महापंचायत करने जा रहे हैं. महापंचायत की घोषणा उन्होंने पीलूपुरा के शहीद गुर्जरों को श्रद्धांजलि देते हुए की. लेकिन पिछले साल की तुलना में इस बार गुर्जर समाज ही एकजुट नहीं है. महापंचायत की घोषणा करते हुए कर्नल ने कहा कि 'गुर्जर समाज का बहुत बडा कर्ज मेरे उपर है और मैं उस कर्ज को चुकाने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्व हूं लेकिन मैं ऐसा तभी कर पाउँगा जब हमेशा की तरह समाज मेरे पीछे खडा मुझे दिखाई देगा.' साफ है कर्नल को भी अहसास है कि इस बार पूरा गुर्जर समाज उनके साथ एकजुट नहीं है.
फिर भी पीलुपुरा में मारे गये गुर्जरों को श्रद्धांजलि देते हुए भावनात्मक रूप से लोगों को प्रेरित करने के लिए उन्होंने कहा ' आज भी उस मॉ को मैं हर पल याद करता हूं जो उस समय पत्थर लेकर पुलिस के सामने खडी हो गई जब पुलिस मुझे गिरफतार करने आ रही थी। मुझे उसका भी सम्मान करना है।' कर्नल बैंसला अपने आंदोलन को जारी रखने की मंशा जताते हुए कहते हैं कि 'गुर्जर समाज को एसटी दर्जा दिलाने की हमारी मांग आज भी कायम है लेकिन पहले हमें उस पॉच प्रतिशत विशेष आरक्षण को लेना है जिसे राज्य विधानसभा ने विधेयक पारित कर हमें दिया है। लेकिन राज्यपाल ने अभी तक उस पर हस्ताक्षर नही किये है।' फिर वहां उपस्थित लोगों से वे पूछते हैं 'तो क्या मैं मान लूं कि आप सब मेरे साथ है?' इतना कहते ही हजारों की संख्या में भीड ने हाथ खडा करके समर्थन की घोषणा कर दी। इसके साथ ही एक बार फिर महापंचायत की घोषणा कर दी जाती है। पूरा माहौल गुर्जर समाज के आराध्य देवनारायण भगवान के जयकारों से गूंज उठता है। 10 जून को राजस्थान के भरतपुर जिले की बयाना तहसील के महराबर गॉव में आगामी रणनीति के लिए महापंचायत की जा रही है।
महापंचायत की घोषणा और तिथि के नजदीक आते आते क्षेत्र में पुलिस प्रशासन की गतिविधयॉ पूर्व की ही भाति बढती चली जा रही है। राज्य के पुलिस अधिकारियों ने न केवल संभाग भर के अधिकारियों के साथ बैठक कर सावधानी बरतने के निर्देश दे दिये है बल्कि महापंचायत स्थल और पूर्व आन्दोलन स्थल का बारीकी से निरीक्षण किया जहॉ गत बर्ष एक महीने तक दूर दूर तक पुलिस का परिंदा भी जाने की हिम्मत नही जुटा सका था। दूसरी ओर जयपुर में बडे स्तर की बैठकों का दौर आरम्भ हो चुका है जिनमें समाधान के लिए माथापच्ची की जा रही है।
महापंचायत की घोषणा के साथ ही गुर्जर समाज में हमेशा की ही तरह देखने पर भले ही दिखाई कुछ नही दे रहा है, लेकिन अंदर ही अंदर बहुत कुछ चल रहा है। पिछली बार की तरह इस बार गुर्जर समाज इस बार आन्दोलन को लेकर एकमत नही है। उसका नेतृत्व अलग अलग तरह की बातें कर रहा है। ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि राजनैतिक रूप से विधानसभा और लोकसभा के चुनावों में बुरी तरह हार चुका गुर्जर नेत्तृव क्या एक बार फिर से महापंचायत में एक मंच पर आकर कोई बडा फैसला ले पाता है या नही। आईये गुर्जर समाज के लिए नाक और मूछों की लडाई बन चुके आरक्षण आन्दोलन की पूरी पृष्ठभूमि को समझने की कोशिश करते है।
परिवर्तन यात्रा में बसुंधरा राजे ने किया वायदा
गुर्जर समाज को एस टी वर्ग में शामिल कर आरक्षण देने का वायदा भाजपा प्रदेशाध्यक्ष के रूप में मई 2003 की परिवर्तन यात्रा में महारानी बसुंधरा राजे ने गुर्जर समाज की समधिन के रूप में गुर्जर बाहुल्य इलाकों की सभाओं में किया था। मुख्यमंत्री बनने के बाद महारानी ने भले ही इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया लेकिन समाज के बीच धीरे धीरे ये बात आगे बढती रही और फिर इसे फौजी शख्शियत कर्नल किरोडी सिंह बैंसला ने अपने हाथ में लेकर समाज के बीच अपनी फौजी गाडी में चंद साथियों के साथ ढाणी ढाणी घूमकर इस मुददे को गुर्जरों के बीच गरमा दिया ।
अब तक के प्रमुख आन्दोलन
कर्नल बैसला छोटी छोटी पंचायतों के बाद सितंबर 2006 में सबसे पहले हिण्डौन कस्बे की महापंचायत से सामने आऐ, जिसमें रेल्वे की करोडों रूपये की सम्पत्ति को बेकाबू भीड ने तहस नहस कर दिया। उसके बाद 29 मई 2007 को गुर्जर समाज राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 11 पर पाटौली में चक्का जाम के रूप में सामने आया और यहॉ से आन्दोलन रक्तरंजित हो गया जहॉ से उपजी हिंसा में लगभग एक दर्जन जानें गई और एक सप्ताह तक प्रदेश भर में भयावह स्थिति पैदा हो गई। उसके बाद 2 अक्टूबर 2007 को गुर्जर समाज ने जेल भरो आन्दोलन किया जिसमें करीब एक लाख गुर्जर समाज के लोग कई दिनों तक अस्थाई जेलों में बंद रहें। यहॉ से गुर्जर समाज के नेताओं के बीच मन मुटाव पैदा हुआ और कर्नल बैसला के खिलाफ भाजपा के विधायक अतर सिंह भडाना और प्रहलाद गुंजल ने पृथक मोर्चा खोल दिया। उसके बाद कर्नल बैसला ने 23 मई 2008 में पीलूपुरा में रेल रोको आन्दोलन किया जिसमें भडकी हिंसा में विभिन्न स्थानों पर करीब 50 लोगों की मौत पुलिस की गोलियों से हो हुई। ये आन्दोलन 28 दिनों तक खुले आसमान के नीचे विशेष तरह के प्रावधानों के साथ चला।
आन्दोलनों से अभी तक गुर्जर समाज को क्या मिला है?
पाटौली आन्दोलन के बाद राज्य सरकार ने गुर्जरों की स्थिति का अध्ययन करने के लिए चोपडा कमैटी बनाई जिसमें जस्टिस जसराज चोपडा ने अपनी रिपोर्ट में गुजरों को एस टी के दर्जे में शामिल करने की सिफारिश नहीं की और प्रदेश सरकार ने रिपोर्ट को ज्यों का त्यों केन्द्र को पे्रषित कर दिया जिसे लेकर खींचतान चली।इस रिपोर्ट की अनुशंषा के तहत बाद में राज्य सरकार ने गुर्जर बाहुल्य क्षेत्रों के लिए 400 करोड की देवनारायण योजना की घोशणा की। पीलूपुरा आन्दोलन के बाद राज्य सरकार ने गुर्जरों सहित गाडिया लुहारों के लिए राज्य सेवाओं में 5 प्रतिशत आरक्षण और इसके साथ ही 14 प्रतिशत आरक्षण सवर्ण गरीबों को देने की घोशणा की गई और राज्य विधानसभा ने इस बिल को ध्वनिमत से पारित भी कर दिया ।ये बिल राज्यपाल के पास अटका हुआ है।
किसने क्या खोया क्या पाया
गुर्जर आरक्षण की नींव रखने वाली भाजपा को जो बाद में गुर्जर समाज के साथ खुलकर सामने आ गई प्रदेश में अपनी सरकार गंवानी पडी और लोकसभा के चुनावों में भी करारी हार का सामना करना पड़ा, जबकि आन्दोलन के दौरान और उसके बाद भी शांतचित्त रहने वाली विपक्षी कांग्रेस को विधानसभा और लोकसभा दोनों ही चुनावों में आशा से अधिक समर्थन मिला,इसके साथ ही उसका परम्परागत मीणा मतदाता उसके खाते में लौटकर वापस आ गया।इस आन्दोलन का सबसे बुरा प्रभाव प्रदेश में उभरे जातीय जहर और गुर्जर मीणा वैमनस्य की खाई के रूप में सामने आया है ।
भविष्य में क्या हो सकता है
राजनैतिक, प्रशासनिक और सामाजिक रूप से हांसिए पर पहुंच चुका गुर्जर समाज एक बार फिर से सामाजिक अस्मिता के नाम पर सडकों पर आ सकता है इस बात की पूरी उम्मीद की जा रही है।और इस बार भी आन्दोलन स्थल के रूप में पूरी तरह से सुरक्षित पीलूपुरा नामक स्थान का चयन एक बार फिर से किया जा सकता है। वही प्रदेश में किनारे पहुंच चुकी भाजपा भी आन्दोलन के बहाने कांग्रेस सरकार के सामने संकट की स्थिति पैदा करने की कोशिश कर सकती है। वही दूसरी ओर प्रशासनिक तैयारियों को देखते हुए ये कहा जा सकता है कि आगामी आन्दोलन को विशेष रणनीतियों के तहत बिना कोई जान गवाऐं कुचला जा सकता है। अब ये देखना है कि आन्दोलनों के समय विपक्ष में उपस्थिति दर्ज कराने वाली कांग्रेस अब राज्य में सत्तासीन है जो तब और अब के बदलते परिदृश्य में किस समझौता टेबिल के तहत समय रहते प्रदेश के लिए नासूर बन चुके इस आरक्षण आन्दोलन के क्लेश को कैसे हल करेगी,और चुनावों में जादूगरी दिखा चुके जादूगर मुख्यमंत्री गहलौत किस प्रकार इस समस्या और चुनौती का हल ढूंढ पाते है ये भी देखना अभी बाकी है।वही कोई आदमी किसी भी ऐसे आन्दोलन की पुनरावृति नही चाहता जिससे उसके जीवन जीने के अधिकार पूरी तरह से किसी बेकाबू भीड के द्वारा छीन लिऐ जाऐं।
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