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सच पर पर्दा डाल रहे हैं कुलकर्णी

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भाजपा ने अभी भी अपनी हार से भी नसीहत नहीं ली है। जनता की मनोदशा और सोच समझने से भाजपा नेता परहेज कर रहे है। हार के सही कारणों की खोज के बजाए लोगों को भाजपा के आला नेता गुमराह कर रहे है। भाजपा नेताओं को अपनी हार के कारणों को समझने से गुरेज है। कभी आरएसएस को हार का कारण बताते है तो कभी नेगेटिव वोट को। पर सच्चाई यह है कि भाजपा नेता हार के सही कारण नहीं तलाशना चाहते। क्योंकि हार का सही कारण तलाशेंगे तो हमाम में सारे नंगे होंगे। पीएम इन वेटिंग लालकृष्ण आडवाणी के करीबी सुधींद्र कुलकर्णी ने आरएसएस पर ही हमला बोल दिया है। उन्होंने अपने एक लेख में कहा कि आरएसएस ने एलके आडवाणी को कमजोर और मजबूर बना दिया। आरएसएस ने मजूबत नेता को कमजोर रुप में पेश किया।

ऐसा लगता है कि सुधींद्र कुलकर्णी सच्चाइयों से भाग रहे है। हार के सही कारणों की तलाश से उन्हें गुरेज है। कुलकर्णी शायद भाजपा के इन नेताओं में से है जो दोषी होते हुए भी दोष दूसरे को देना चाहते हैं। वो अपनी और आडवाणी जी की करतूतों पर परदा डालने के लिए आरएसएस पर आरोप लगा रहे है। पर सच्चाई तो सच्चाई है। आडवाणी कब मजबूत रहे इसे तो कम से कम कुलकर्णी बताए? जो शुरू से कमजोर रहा हो मजबूत कैसे हो सकता है? फिर आडवाणी की फौज के मजबूत सिपाही कौन है? इनके नाम कम से कम कुलकर्णी बताए? कुलकर्णी को कम से कम यह बताना चाहिए कि आडवाणी ने देश आजाद होने के कुछ महीनें बाद कराची क्यों छोड़ा? कम से कम इस सच्चाई से देश की जनता को वाकिफ कराए कि आडवाणी इतने डरपोक थे कि कराची के एक बम विस्फोट में नाम आने के बाद गिरफ्तारी के डर से कराची छोडकर भागे और भारत में आकर शरण ली।

आडवाणी कितने मजबूत हैं इसका एक और उदाहरण देखिए। बाबरी मस्जिद विध्वंस में जेल जाने के भय से तमाम गुणा गणित लगाते रहे। सारे जानते है कि बाबरी मस्जिद गिरवाने में आडवाणी की अहम भूमिका थी। पर जेल जाने से बचने के लिए उन्होंने अपने सहयोगियों को फंसवा दिया। खुद वकीलों की फौज लेकर अपना बचाव करते रहे। झूठ पर झूठ बोलते रहे। खुद को बाबरी मसजिद कांड में निर्दोष बताते रहे। कम से कम आडवाणी से दिलेर तो कल्याण सिंह थे, जिन्होंने सारा कुछ स्वीकार किया और जेल भी जा आए। दरअसल आडवाणी की कोई विचारधारा नहीं है। उनकी एक ही विचारधारा है, किसी तरह से सता हासिल करना। इसके लिए झूठ पर झूठ बोलना उनकी आदत है। सुधींद्र कुलकर्णी एक बार यह जरूर बताए कि जिन्ना सेक्यूलर कैसे हो गया? जिसने भारत का विभाजन ही द्विराष्ट्र सिद्वांत पर करवाया वो सेक्यूलर कैसे हो गया। क्या यह आडवाणी का सिंधी प्रेम था? कहा जाता है आडवाणी को नवाज शरीफ से ज्यादा बेनजीर अच्छी लगती थी, क्योंकि बेनजीर सिंधी थी। आडवाणी बेनजीर से हमेशा सिंधी में ही बात करते थे।

आडवाणी की हार का कारण आरएसएस हो सकता है, लेकिन यह कई कारणों में से सिर्फ एक कारण हो सकता है। आडवाणी के हार के कई कारण और है। इसकी समीक्षा कम से कम आडवाणी और उनके सहयोगी करे। पहले आडवाणी पूरे देश में इस बात की समीक्षा कराएं कि उन्होंने अपने कितने ऐसे चेलों को टिकट दिया, जो आले दर्जे के झूठे हैं? फिर आडवाणी इस बात की भी समीक्षा कराए कि पार्टी नेताओं ने कितने लोगों को टिकट बेचा? फिर किन-किन लीडरों ने इन टिकटों को बेचा और कितना माल कमाया? आडवाणी इस बात की भी पड़ताल कराए कि ऐसे कितने लोगों को टिकट दिया गया जो पार्टी विरोधी गतिविधियों में वर्षों से शामिल रहे? फिर उन पार्टी प्रभारियों के चाल-चलन की समीक्षा भी होनी चाहिए जो राज्यों में जाकर मलाई खाते रहे।

आडवाणी जी के कुछ ऐसे करीबी है जो शुरू से पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल रहे। पर उन्हें टिकट मिला। वो काफी अरसे से चुनाव हार रहे थे फिर भी उन्हें टिकट मिला। उदाहरण चंडीगढ़ से भाजपा प्रत्याशी सत्यपाल जैन का है। सत्यपाल जैन पर 1999 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के चंडीगढ़ से तत्कालीन उम्मीदवार स्वर्गीय कृष्णलाल शर्मा को हराने का आरोप लगा। पर इसकी सजा उन्हें नहीं मिली। दो साल बाद ही उन्हें चंडीगढ़ में पार्टी की पूरी कमान सौंप दी गई। इसके बाद सत्यपाल जैन लगातार दो लोकसभा चुनाव हार गए। भाजपा उनके नेतृत्व में चंडीगढ़ नगर निगम का दो चुनाव हार चुकी है। इस बार पूरी चंडीगढ़ भाजपा सत्यपाल जैन को उम्मीदवार बनाए जाने के खिलाफ थी। पर सुष्मा स्वराज और आडवाणी जी नहीं माने। आखिर सत्यपाल जैन लिब्राहण कमिशन में आडवाणी के वकील है। फिर सुष्मा स्वराज को भी ऐसे ही नेता पंसद आते है जो उनके आगे-पीछे घूमते रहे। खुद सुषमा स्वराज कितनी जमीनी है ये सारे जानते है?

अब हार की समीक्षा भी अलग तरीके से हो रही है। पार्टी के प्रभारी और सह प्रभारी आते है। वो चंडीगढ़ स्थित पंजाब भवन के एससी कमरे में रुकते है। फिर चार दिन तक भोजों का धुआंधार दौर चलता है। चंडीगढ़ की पार्टी की सह प्रभारी किरण घई को कभी कोई गोल्फ क्लब में भोज दे रहा है तो कभी कोई चंडीगढ़ क्लब में भोज दे रहा है। फिर किरण घई दरी बिछाने वाले कार्यकर्ताओं को राष्ट्रवाद की दीक्षा देकर लौट जाती है। पार्टी के हार के कारणों की समीक्षा करने में उन्हें कोई दिलचस्पी नहीं है। वो पार्टी की आला नेता सुष्मा स्वराज के दबाव में है। अगर दिल्ली की राजनीति में आगे कुछ मलाई पाना है तो सुषमा स्वराज की दया और दुआ चाहिए। उधर पंजाब भाजपा की समीक्षा बैटक होती है। निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए कोई राजी नहीं है। क्योंकि पांचों मंत्री नहीं चाहते कि उनका मंत्री पद जाए। पार्टी हार गई तो क्या हो गया? उनकी कुर्सी का टेन्योर अभी तीन साल बचा है। उधर पार्टी केपदाधिकारी भी अकाली दल के विरोध में ज्यादा मुखर नहीं है। क्योंकि कोई कालेज खोल रहा है तो कोई कहीं और से माल बना रहा है।

सुधींद्र कुलकर्णी इस बात का जवाब दे कि आखिर इतनी बड़ी हार के बाद भी उतराखंड के मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी की कुर्सी कैसे बच गई? भाजपा के किस नेता ने खंडूरी की जान बचायी। चुनाव में हार के बाद उतराखंड में भाजपा की दो सदस्यों वाली टीम गई। विधायकों से राय ली गई। बाद में खंडूरी को जीवन दान मिल गए। आखिर इस बात की जांच होनी चाहिए की इतनी बड़ी हार के बावजूद खंडूरी को जीवनदान क्यों मिल गया? कुलकर्णी कम से कम यह बताए कि दिल्ली में लगातार भाजपा इतने सालों से क्यों हार रही है? राजस्थान में भाजपा क्यों हारी? छतीसगढ़ और झारखंड में भाजपा इतना बेहतर प्रदर्शन कैसे कर गई?क्या कुलकर्णी को यह नहीं पता कि भाजपा के सेकेंड लाइन लीडरशीप सांड़ हो गई है? वो किसी के कंट्रोल में नहीं है चाहे वो आरएएस ही क्यों न हो। हालांकि ये सांड़ कागजी है। चुनाव से ठीक पहले दोनों कागजी सांढ़ राजनाथ सिंह और अरुण जेतली लड़ गए। कई दिनों तक विवाद चलता रहा। आडवाणी मूकदर्शक बने रहे। अब राजनाथ सिंह की कहानी देखे। राजनाथ सिंह शायद अपनी जिंदगी का तीसरा चुनाव लड़ें होंगे। ये भाजपा के राष्ट्रीय नेता कभी नहीं हो सकते। न ही देश में इनकी कोई स्वीकार्यता है। ये भाजपा से ज्यादा राजपूतों के नेता है। उतर प्रदेश के सभी कैटेगरी के राजपूत इनके दोस्त है। जबकि अरुण जेतली एक वकील से ज्यादा कुछ नहीं है। वो कुशल प्रबंधक भी नहीं है। जबकि सुष्मा स्वराज की जमीनी हकीकत कोई भी देख ले। हरियाणा की है पर कभी हरियाणा से चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं हुई। डमी रुप से सोनिया गांधी के खिलाफ खड़ी हुई और लोकप्रियता ले गई। अब वेकेंया नायडू को लीजिए। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रह लिए पर उनके गृह राज्य में भाजपा की हालत क्या है?

फिर कुलकर्णी जी इस बात का जवाब दे कि भाजपा में जमीनी नेताओं की कद्र क्यों नहीं होती? कल्याण सिंह पार्टी छोड़ कर क्यों गए? अगर बिरादरी के हिसाब से भी देखा जाए तो कल्याण सिंह आडवाणी से मजबूत है। कल्याण सिंह की लोध बिरादरी की संख्या इस देश में आडवाणी की सिंधी बिरादरी ज्यादा है। फिर कल्याण सिंह कम से कम आडवाणी की तरह डरपोक नहीं थे। वे सच्चाई से भागने वाले नहीं थे। बाबरी मसिजद गिरवाया तो उसे स्वीकार किया। यह भी सच्चाई है कि मुलायम सिंह उनकी मदद से कम से आठ सीट इस बार यूपी मे जीते। फिर उमा भारती के साथ क्या हुआ? कुलकर्णी इसका भी जवाब दे? बाबू लाल मरांडी को किन परिस्थितियों में झारखंड में मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी इसका जवाब भी कुलकर्णी दे। फिर किन परिस्थितियों में बिहार में सुशील मोदी ने पूरी पार्टी नितीश कुमार के हवाले कर दी है, इसकी पड़ताल भी सुधींद्र कुलकर्णी को करनी चाहिए?

भाजपा में दो मुसलमान नेता नजर आते है। एक है मुख्तार अबबास नकवी और दूसरे है शहनवाज हुसैन। अब दोनों नेताओं की जमीन देख ले। दोनों जमीन पर जीरो है। इनके साथ एक भी मुसलमान नहीं है। पार्टी के नेता भी इसे समझते है। पर दोनों नेताओं को राज्यसभा और लोकसभा देना इनकी मजबूरी है। नकवी और शहनवाज के करीबी है इस बात का खुलासा करते है कि समर्थन के आभाव में दोनों नेता दिल्ली में काम करने वाले बिहार और यूपी के मजदूरों को मुसिलम टोपी पहना पार्टी आफिस में लाते है। कभी उन्हें अटल बिहारी वाजपेयी के घर ले जाते थे तो कभी आडवाणी के घर ले जाते रहे है। शहनवाज हुसैन जिस लोकसभा क्षेत्र भागलपुर से जीत कर आते है वहां पर एक भी मुसलमान इन्हें वोट नहीं देता और सिर्फ हिंदू वोटों के बल पर ये जीतते है। ऐसे में कुलकर्णी जी यह सुझाव जरूर दे कि आखिर भाजपा को मुसलिम वोट लेने के लिए और क्या करना चाहिए?

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Tyagi on 11 June, 2009 01:02;24
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lekh me dam nahi. sachai se koso door hai. patrkar mohadya ko jameen par jakar aroop lagane chaiya. lekh keval khanapurti hai BJP frustration ki.
yes kami to bjp main hai. prantu patrkar mohadya ki story ek dam bakvas.
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alok on 11 June, 2009 11:25;21
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visfot ji ya sanjay tiwari ji koi lekh chapne se pahle ek nigah jaroor dal le.
ye bhadas par chapne layak lekh tha visfot ki viswasniyata kayam rakhen. warna mohalla ki tarah is par bhi ana band karna hoga. ye blog nahi hai jahan koi bhi akar apni vomitting kar de. aise lekh ya to paise le kar chap sakta hain ya phir yari dosti me. kisi ko bhi patrakar mat bana dijiye sir. umeed hai mere likhe ko swasth alochana man kar is par vichar karenge
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image संजीव पाण्डेय छात्र राजनीति से पत्रकारिता में आये संजीव पाण्डेय ने कई अखबारों के लिए काम किया है. हाल-फिलहाल तक अमर उजाला में कार्यरत थे. वर्तमान में चंडीगढ़ में रहकर स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन. विस्फोट.कॉम के नियमित स्तंभलेखक.
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