कहां खो गया गैरकांग्रेसवाद?
पिछले आम चुनाव में यूपीए को मिली जीत को कांग्रेस की ऐतिहासिक सफलता के तौर पर विश्लेषित करने का जोरदार दौर चल रहा है। इस जीत के जश्न में वे लोग भी शामिल हो गए हैं, जिनकी पूरी राजनीतिक पूंजी गैरकांग्रेसवाद की सीढ़ी के ही सहारे पली-बढ़ी है। मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान राजनीतिक क्षितिज पर आज जहां पहुंचे हैं, उसकी सबसे बड़ी वजह गैरकांग्रेसवाद ही रहा है। कांग्रेस के विरोध का परचम थामे हुए ही ये लोग राजनीति ही नहीं देश की बड़ी शख्सियत बनने में कामयाब हुए हैं। लेकिन आज ये ही लोग कांग्रेस के साथ बैठने में ही गर्व का अनुभव कर रहे हैं।
दस- पंद्रह साल पहले तक उत्तर भारत की राजनीति के इन सूरमाओं की नजर में कांग्रेस ना सिर्फ भ्रष्टाचार, बल्कि देश की तमाम समस्याओं की गंगोत्री थी। लेकिन आज उनका ये नजरिया बदल गया है। संसद की लाल और हरी कालीन के बीच लगी बेंचों पर अब उन्हें कांग्रेस के साथ बैठने में ही गर्व और देशहित नजर आने लगा है। गैरकांग्रेसवाद की सीढ़ी से शुरू हुई ये यात्रा आज कांग्रेस के कितना करीब पहुंच गई है कि रामविलास पासवान के पास एक भी सांसद नहीं हैं, लेकिन वे कांग्रेस सरकार को समर्थन की चिट्ठी देने में पीछे नहीं रहे। और ये सब हो रहा है नैतिकता के नाम पर।
तीस मई को जिस तरह से जनता दल यूनाइटेड की कार्यसमिति की बैठक में दिल्ली में खत्म हुई है, उससे राजनीतिक जानकारों को यही उम्मीद अब जेडीयू से भी लगती नजर आ रही है। जिस तरह से अपनी सरकार के साथी बीजेपी पर जेडीयू ने हमला बोला है, उसके संकेत साफ हैं। यानी जब तक बिहार में सरकार बचाए रखने की जेडीयू की मजबूरी रहेगी, तब नीतीश कुमार और ललन सिंह की जोड़ी बीजेपी के साथ रहेगी। दरअसल जिस तरह से शरद यादव को जनता दल यू के संसदीय दल का नेता नहीं बनने दिया गया, उससे साफ है कि पार्टी पर नीतीश और ललन की जोड़ी ही हावी है। साफ है, जिस नीतीश और शरद की जोड़ी ने अपनी ही पार्टी के कद्दावर नेता जार्ज फर्नांडिस को किनारे लगाया, अब उसमें भी दरार आनी शुरू हो गई है। बहरहाल विधान सभा चुनावों के ठीक पहले हो सकता है कि नीतीश कुमार और ललन सिंह की जोड़ी भगवा पार्टी का साथ छोड़कर उड़ीसा के क्षत्रप नवीन पटनायक की राह पर चल पड़ें। गैरकांग्रेसवाद के सहारे पनपी-पली बढ़ी पार्टी का ये कदम भी जाहिर है सांप्रदायिकता के विरोध के नाम पर शुरू होगा और गैर कांग्रेसवाद की ये यात्रा कांग्रेस के साथ गलबहियां डालने के साथ खत्म हो जाएगी।
मीडिया में पिछले कुछ सालों से एक जोरदार खेल चल रहा है। पार्टियां विधानसभा चुनाव जीतती हैं तो मीडिया भी उनकी ही जयजयकार करने लगता है। पिछले साल जब बीजेपी ने कर्नाटक समेत कई राज्यों में सरकारें बनाईं तो मीडिया को बीजेपी में अकूत संभावनाएं नजर आने लगी थीं। लेकिन राजस्थान में बीजेपी को पटखनी मिली तो कांग्रेस सबसे बड़ी संभावना बन गई और अब यही हाल केंद्र में यूपीए की कामयाबी के खेल के साथ शुरू हो गया है। तत्कालिक जीत और हार तत्कालिक राजनीतिक परिस्थितियों को प्रभावित तो कर सकती है। लेकिन ये भी सच है कि इसकी अनुगूंज दूर तक नहीं सुनी जाती। इसका प्रभाव देर तक नहीं देखा जाता। जिस तरह राजनीतिक दल अपने सियासी कदम को तत्कालिकता की नजर से आगे बढ़ाते हैं, मीडिया का बड़ा वर्ग भी इसी अंदाज में चीजों को देखने-समझने लगा है। इसी नजरिए से बीजेपी को लेकर नीतीश कुमार की तल्खी और खिंचाई मीडिया को अच्छा लग रहा है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि अगर नीतीश कुमार विधानसभा चुनावों में नवीन पटनायक की तरह वापसी ना कर पाएं तब भी क्या उनके कदम की ऐसे ही जयजयकार होती रहेगी।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या अब इस देश से गैरकांग्रेसवाद की लहर खत्म हो जाएगी? क्या अब कांग्रेस की गंगोत्री साफ हो गई है? क्या देश के कई इलाकों में अब भी पीने का पानी और बिजली नहीं पहुंच पाई है, देश की अस्सी करोड़ आबादी अब भी बीस रूपए रोज पर गुजर करने को मजबूर है, इसके लिए देश ने कांग्रेस को माफ कर दिया है। जिस तरह गैरकांग्रेसवाद की हवा निकलती जा रही है, उसके तो संकेत यही हैं। जब गैरकांग्रेसवाद की ही सियासत के सहारे आगे बढ़े लोग कांग्रेस के साथ नजर आएंगे तो इस नतीजे पर पहुंचना गलत भी नहीं होगा।
1967 में संविद सरकारों के साथ गैरकांग्रेसवाद का जो झंडा बुलंद हुआ था, तब से लेकर गंगा-जमुना में काफी पानी बह चुका है। और ये कांग्रेस की सफलता ही मानी जा सकती है कि आज वह हिंद महासागर की तरह खुद को सबका लक्ष्य बन गई है और देश की सारी राजनीतिक धाराएं चाहे आपस में कितना भी लड़ती-भिड़ती क्यों ना रहें, लालू और नीतीश सभी आपस में कितना भी क्यों ना लड़ते रहें, आज कांग्रेस रूपी हिंद महासागर में अपना सबकुछ समाहित करने के लिए लालायित नजर आ रहे हैं।
दरअसल गैरकांग्रेसवाद की फिलहाल सबसे बड़ा दावेदार बनकर उभरी बीजेपी भी कांग्रेस से अलग हटकर नहीं है। विदेश नीति और आर्थिक नीतियों को लेकर उसमें और कांग्रेस में कोई फर्क ही नहीं है। यही वजह है कि कभी बीजेपी के विचारक रहे गोविंदाचार्य और कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे पीए संगमा दो वैचारिक ध्रुवों पर रहने के बावजूद एक ही सलाह देते रहे हैं। दोनों कह चुके हैं कि छोटे दलों की बजाय दोनों बड़े दलों को ही मिलकर सरकार बनानी चाहिए। फिलहाल ऐसा होता नहीं दिख रहा है। सियासी मंच को फिलहाल ये जरूरत नजर नहीं आ रही है। कांग्रेस को बीजेपी का साथ फिलहाल नहीं चाहिए। क्योंकि गैरकांग्रेसवादी धारा को अब वही सबसे विश्वसनीय नजर आने लगी है।
अगर ऐसा नहीं होता तो राजनीतिक जानकारों को रामसुंदर दास के जनता दल यू के संसदीय दल का नेता चुने जाने के बाद पार्टी में एक टूट की आशंका नजर नहीं आती और मजे की बात ये है कि उन्हें इसका भी सटीक अंदाजा है कि विद्रोही धड़ा कांग्रेस के साथ ही जा सकता है? वह विद्रोही धड़ा, जो कभी लोकसभा का कार्यकाल पांच साल की बजाय छह साल करने के इंदिरा गांधी के फैसले के खिलाफ पहला जोरदार विरोध किया था।
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