Home | राजनीति | कहां खो गया गैरकांग्रेसवाद?

कहां खो गया गैरकांग्रेसवाद?

image

पिछले आम चुनाव में यूपीए को मिली जीत को कांग्रेस की ऐतिहासिक सफलता के तौर पर विश्लेषित करने का जोरदार दौर चल रहा है। इस जीत के जश्न में वे लोग भी शामिल हो गए हैं, जिनकी पूरी राजनीतिक पूंजी गैरकांग्रेसवाद की सीढ़ी के ही सहारे पली-बढ़ी है। मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान राजनीतिक क्षितिज पर आज जहां पहुंचे हैं, उसकी सबसे बड़ी वजह गैरकांग्रेसवाद ही रहा है। कांग्रेस के विरोध का परचम थामे हुए ही ये लोग राजनीति ही नहीं देश की बड़ी शख्सियत बनने में कामयाब हुए हैं। लेकिन आज ये ही लोग कांग्रेस के साथ बैठने में ही गर्व का अनुभव कर रहे हैं।

दस- पंद्रह साल पहले तक उत्तर भारत की राजनीति के इन सूरमाओं की नजर में कांग्रेस ना सिर्फ भ्रष्टाचार, बल्कि देश की तमाम समस्याओं की गंगोत्री थी। लेकिन आज उनका ये नजरिया बदल गया है। संसद की लाल और हरी कालीन के बीच लगी बेंचों पर अब उन्हें कांग्रेस के साथ बैठने में ही गर्व और देशहित नजर आने लगा है। गैरकांग्रेसवाद की सीढ़ी से शुरू हुई ये यात्रा आज कांग्रेस के कितना करीब पहुंच गई है कि रामविलास पासवान के पास एक भी सांसद नहीं हैं, लेकिन वे कांग्रेस सरकार को समर्थन की चिट्ठी देने में पीछे नहीं रहे। और ये सब हो रहा है नैतिकता के नाम पर। 

तीस मई को जिस तरह से जनता दल यूनाइटेड की कार्यसमिति की बैठक में दिल्ली में खत्म हुई है, उससे राजनीतिक जानकारों को यही उम्मीद अब जेडीयू से भी लगती नजर आ रही है। जिस तरह से अपनी सरकार के साथी बीजेपी पर जेडीयू ने हमला बोला है, उसके संकेत साफ हैं। यानी जब तक बिहार में सरकार बचाए रखने की जेडीयू की मजबूरी रहेगी, तब नीतीश कुमार और ललन सिंह की जोड़ी बीजेपी के साथ रहेगी। दरअसल जिस तरह से शरद यादव को जनता दल यू के संसदीय दल का नेता नहीं बनने दिया गया, उससे साफ है कि पार्टी पर नीतीश और ललन की जोड़ी ही हावी है। साफ है, जिस नीतीश और शरद की जोड़ी ने अपनी ही पार्टी के कद्दावर नेता जार्ज फर्नांडिस को किनारे लगाया, अब उसमें भी दरार आनी शुरू हो गई है। बहरहाल विधान सभा चुनावों के ठीक पहले हो सकता है कि नीतीश कुमार और ललन सिंह की जोड़ी भगवा पार्टी का साथ छोड़कर उड़ीसा के क्षत्रप नवीन पटनायक की राह पर चल पड़ें। गैरकांग्रेसवाद के सहारे पनपी-पली बढ़ी पार्टी का ये कदम भी जाहिर है सांप्रदायिकता के विरोध के नाम पर शुरू होगा और गैर कांग्रेसवाद की ये यात्रा कांग्रेस के साथ गलबहियां डालने के साथ खत्म हो जाएगी।

मीडिया में पिछले कुछ सालों से एक जोरदार खेल चल रहा है। पार्टियां विधानसभा चुनाव जीतती हैं तो मीडिया भी उनकी ही जयजयकार करने लगता है। पिछले साल जब बीजेपी ने कर्नाटक समेत कई राज्यों में सरकारें बनाईं तो मीडिया को बीजेपी में अकूत संभावनाएं नजर आने लगी थीं। लेकिन राजस्थान में बीजेपी को पटखनी मिली तो कांग्रेस सबसे बड़ी संभावना बन गई और अब यही हाल केंद्र में यूपीए की कामयाबी के खेल के साथ शुरू हो गया है। तत्कालिक जीत और हार तत्कालिक राजनीतिक परिस्थितियों को प्रभावित तो कर सकती है। लेकिन ये भी सच है कि इसकी अनुगूंज दूर तक नहीं सुनी जाती। इसका प्रभाव देर तक नहीं देखा जाता। जिस तरह राजनीतिक दल अपने सियासी कदम को तत्कालिकता की नजर से आगे बढ़ाते हैं, मीडिया का बड़ा वर्ग भी इसी अंदाज में चीजों को देखने-समझने लगा है। इसी नजरिए से बीजेपी को लेकर नीतीश कुमार की तल्खी और खिंचाई मीडिया को अच्छा लग रहा है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि अगर नीतीश कुमार विधानसभा चुनावों में नवीन पटनायक की तरह वापसी ना कर पाएं तब भी क्या उनके कदम की ऐसे ही जयजयकार होती रहेगी।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या अब इस देश से गैरकांग्रेसवाद की लहर खत्म हो जाएगी? क्या अब कांग्रेस की गंगोत्री साफ हो गई है? क्या देश के कई इलाकों में अब भी पीने का पानी और बिजली नहीं पहुंच पाई है, देश की अस्सी करोड़ आबादी अब भी बीस रूपए रोज पर गुजर करने को मजबूर है, इसके लिए देश ने कांग्रेस को माफ कर दिया है। जिस तरह गैरकांग्रेसवाद की हवा निकलती जा रही है, उसके तो संकेत यही हैं। जब गैरकांग्रेसवाद की ही सियासत के सहारे आगे बढ़े लोग कांग्रेस के साथ नजर आएंगे तो इस नतीजे पर पहुंचना गलत भी नहीं होगा।

1967 में संविद सरकारों के साथ गैरकांग्रेसवाद का जो झंडा बुलंद हुआ था, तब से लेकर गंगा-जमुना में काफी पानी बह चुका है। और ये कांग्रेस की सफलता ही मानी जा सकती है कि आज वह हिंद महासागर की तरह खुद को सबका लक्ष्य बन गई है और देश की सारी राजनीतिक धाराएं चाहे आपस में कितना भी लड़ती-भिड़ती क्यों ना रहें, लालू और नीतीश सभी आपस में कितना भी क्यों ना लड़ते रहें, आज कांग्रेस रूपी हिंद महासागर में अपना सबकुछ समाहित करने के लिए लालायित नजर आ रहे हैं।

दरअसल गैरकांग्रेसवाद की फिलहाल सबसे बड़ा दावेदार बनकर उभरी बीजेपी भी कांग्रेस से अलग हटकर नहीं है। विदेश नीति और आर्थिक नीतियों को लेकर उसमें और कांग्रेस में कोई फर्क ही नहीं है। यही वजह है कि कभी बीजेपी के विचारक रहे गोविंदाचार्य और कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे पीए संगमा दो वैचारिक ध्रुवों पर रहने के बावजूद एक ही सलाह देते रहे हैं। दोनों कह चुके हैं कि छोटे दलों की बजाय दोनों बड़े दलों को ही मिलकर सरकार बनानी चाहिए। फिलहाल ऐसा होता नहीं दिख रहा है। सियासी मंच को फिलहाल ये जरूरत नजर नहीं आ रही है। कांग्रेस को बीजेपी का साथ फिलहाल नहीं चाहिए। क्योंकि गैरकांग्रेसवादी धारा को अब वही सबसे विश्वसनीय नजर आने लगी है।

अगर ऐसा नहीं होता तो राजनीतिक जानकारों को रामसुंदर दास के जनता दल यू के संसदीय दल का नेता चुने जाने के बाद पार्टी में एक टूट की आशंका नजर नहीं आती और मजे की बात ये है कि उन्हें इसका भी सटीक अंदाजा है कि विद्रोही धड़ा कांग्रेस के साथ ही जा सकता है? वह विद्रोही धड़ा, जो कभी लोकसभा का कार्यकाल पांच साल की बजाय छह साल करने के इंदिरा गांधी के फैसले के खिलाफ पहला जोरदार विरोध किया था।

Subscribe to comments feed Comments (1 posted):

Jeet Bhargava on 11 July, 2009 07:01;05
avatar
आपने सही बात सटीक तरीके से कही है. एक-एक करके सभी कांग्रेस की गोद में बैठ गए हैं. इसमे मुलायम से लेकर लालू और करूणानिधि से लेकर लाल झंडेवाले सभी शामिल हैं. महाराष्ट्र में शरद पवार है तो उत्तर में राम विलास और यादव कंपनी. अब तो ममता को भी कांग्रेस पे ममता आ गयी. शर्म की बात है कि इन्होने कोंग्रेस विरोध के नाम पे अपनी दुकाने जमाई (और अब भी चलाते हैं) लेकिन सत्ता में भागीदारी का मौका मिलते ही सेकुलर वाद के नाम पे कोंग्रेस की गोद में बैठ जाते हैं. इस देश में सेकुलरवाद के नाम पर सबकुछ चलता है, मौकापरस्ती भी, भ्रष्टाचार भी, तुष्टिकरण भी. जे एन यु में पले बढे और बिकाऊ मुख्यधारा का मीडिया इनसे सवाल करने की बजाय इनके महिमामंडन में लगा हुआ है. उससे तो उम्मीद बेकार है. शुभ संकेत ये है कि सबसे तेज और सबसे अलग होने या सब पर नजर रखने का दावा नहीं करने वाला 'विस्फोट' और आप जैसे ईमानदार पत्रकार यह काम कर रहे हैं. आपकी कलम को सलाम. शुभकामनाएं.
Thumbs Up Thumbs Down
0
total: 1 | displaying: 1 - 1

Post your comment comment

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Rate this article
5.00
More from राजनीति
Previous
image
ठाकरे परिवार में कौन बनेगा सरकार?
महाराष्ट्र की राजनीति में पिछले विधानसभा चुनाव में जो नहीं हुआ वह एक महानगरपालिका के चुनाव में हो रहा है. शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे अपने ही भतीजे से उलझ गये हैं. कल्याण-डोंबिवली महानगरपालिका चुनाव में जैसे ही राज ठाकरे ने बाल ठाकरे पर छींटाकसी की, बाल ठाकरे ने पलटकर ऐसा वार किया कि महाराष्ट्र की राजनीति गर्म हो गयी. चुप रहने की बजाय राज ठाकरे ने फिर जवाब दिया और आपसी ठसक परिवार की चौखट से निकलकर राजनीतिक के अखाड़े की जंग बन गयी. ...
image
नहीं, राहुल जेपी नहीं हो सकते!
दो दिन पहले अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के प्रवक्ता मोहन प्रकाश ने राहुल गाँधी द्वारा छात्रों और युवाओं की समस्याओं को प्राथमिकता देने और उनसे संवाद करने की वजह से उनकी तुलना जवाहरलाल नेहरु, एपीजे अब्दुल कलाम और जेपी से की तो इसकी आलोचना भाजपा और रामविलास पासवान ने की. मोहन प्रकाश के बयान को देखें तो पता चलेगा कि उन्होंने जेपी के व्यक्तित्व और राजनीति से नहीं, युवाओं से उनकी संवाद-शैली कि तुलना की है. उनका पूरा बयान इस प्रकार है, " (जवाहरलाल) नेहरु के बाद कलाम (पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम) थे जिन्होंने बच्चों को संबोधित किया. इसीप्रकार, जयप्रकाश नारायण के बाद, राहुल गाँधी हैं जिन्होंने युवाओं की जरूरतों, आकाँक्षाओं और देश में उनके भविष्य को संबोधित किया है."...
image
बादल के घर गरजा बादल
सताधारी अकाली दल की समस्या खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। अब बगावत घर में है। पहले बगावत घर से बाहर होती थी। प्रकाश सिंह बादल अपने राजनीतिक जीवन के सबसे गंभीर संकट को झेल रहे है। इस संकट से होने वाला नुकसान उन्हें पता है। उनके चेहरे पर इसके नुकसान की छाया दिख रही है। चेहरा उतरा हुआ है और आवाज में अब वो दमखम नहीं है।...
image
बिहार की राजनीति में मायावती का प्रवेश क्रांतिकारी
बिहार चुनाव में एक और आयाम जुड़ गया है . बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावाती ने बुधवार को बिहार में अपना पहला चुनावी दौरा करके यह साबित कर दिया है कि वे बिहार को अपनी पार्टी की राजनीतिक प्राथमिकताओं में बहुत ऊपर रख कर चल रही हैं. इसके बाद भी मायावती बिहार में चुनाव प्रचार करने जायेगीं और हर दौर के पहले कुछ चुनिन्दा विधानसभा क्षेत्रों में लोगों से वोट मागेगीं....
image
राजनीति के समंदर में धनतंत्र के धुरंधर
ग्राम से सेवाग्राम यात्रा के लिए आयोजित पत्रकार सम्मेलन में महाराष्ट्र कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष माणिकराव ठाकरे और प्रदेश के पूर्व मंत्री सतीश चतुर्वेदी के बीच रैली के लिए धन उगाही की प्रक्रिया पर चर्चा जिस अंदाज में स्टार माझा पर प्रसारित हुई उसने भले ही महाराष्ट्र कांग्रेस की राजनीति में भूकंप नहीं लाया हो लेकिन राजनीतिक दलों के संचालन में धनतंत्र की भूमिका को जरूर बेनकाब किया है. गौरतलब है कि स्टार माझा समेत तमाम चैनलों पर कांग्रेस की बखिया उधेड़ने के कार्यक्रम के बावजूद कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्षा सोनिया गांधी ने मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण और प्रदेश अध्यक्ष माणिकराव ठाकरे की पीठ को थपथपाने का काम करके इस बवंडर को खत्म करने की चतुराई दिखाई है. ...
image
सब्सिडी की राजनीति पर संकट के बादल
पंजाब के प्रभावशाली बादल परिवार में शुरू हुए राजनीतिक गृहयुद्ध ने कई चर्चाएं शुरू कर दी है। क्या क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की राजनीति जब परिवार के गृह युद्व में उलझ जाती है तो कुल की राजनीति करने वाला राजनीतिक दल जल्द ही समाप्त हो जाता है? क्या क्षेत्रीय राजनीतिक दल परिवार से ऊपर उठ कर राज्य के हित में नहीं सोच सकते? फिर सता में बने रहने के लिए क्या छोटे राजनीतिक दल लोकलुभावनी योजनाओं को बढ़ावा ही देते रहेंगे? पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के भतीजे मनप्रीत सिंह बादल को अकाली दल से निलंबित किए जाने के बाद अब देश के क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की राजनीति को लेकर नयी बहस छिड़ चुकी है। चूंकि नई बहस इसलिए कि इस विवाद में एक गंभीर आर्थिक मसला है, जो अभी तक क्षेत्रीय दलों में हुए पारिवारिक युद्व से अलग है। वह गंभीर मसला है, राज्य की खराब होती आर्थिक स्थिति और सब्सिडी की राजनीति।...
image
दिल्ली शिफ्ट हुआ कर-नाटक
अब दिल्ली शिफ्ट हो गया कर-नाटक। सोनिया-आडवाणी के घर फैसलाकुन बैठकों का दौर चला। राष्ट्रपति राज के खौफ में बीजेपी ने अपने 105 एमएलए दिल्ली बुला लिए ताकि राष्ट्रपति के सामने परेड करा राजनीतिक मुद्दे को धार दे सके पर तेल की धार देख कांग्रेस ने खुद को फिसलने से बचा लिया। बिहार, झारखंड, गोवा जैसी जल्दबाजी नहीं की, गवर्नर हंसराज भारद्वाज तो बेनकाब हो चुके। सो फैसले पर फौरन मोहर लगाने की तोहमत नहीं ली अलबत्ता बीजेपी को भी बेनकाब करने की रणनीति बनाई।...
image
सिमी से भी खतरनाक है संघ का स्वरूप
अपनी मध्य प्रदेश यात्रा के दौरान अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव राहुल गाँधी द्वारा आरएसएस की तुलना सिमी से करने पर समूचा संघ परिवार बौखला गया है. इस बौखलाहट की वजह यह है कि जिस सिमी का विरोध कर संघ परिवारी अपनी राष्ट्रभक्ति का रंग चोखा करते थे उसी सिमी से संघ की तुलना उसे अप्रत्याशित क्षति पहुंचा सकती है. भारत और दुनिया के अकादमिक जगत के लोग, नेता और पत्रकार सभी संघ की स्थापना से लेकर अब तक यह कहते रहे की संघ एक सांप्रदायिक,फासीवादी और भारतीय संविधान की भावना के विरुद्ध खड़ा संगठन है. आज भी संघ के इस घातक चरित्र पर किसी को संदेह नहीं है....
image
शिव सेना की राह पर अकाली दल
पंजाब में सारा कुछ ठीक चल रहा था। कुछ दिन पहले ही निचली अदालत से बादल परिवार को आय से अधिक संपति के मामले में राहत मिली थी। पर यह राहत ज्यादा देर नहीं चली। घर में विस्फोट हो गया है। मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के भतीजे मनप्रीत सिंह बादल ने यह विस्फोट किया है। कुछ दिन पहले उन्होंने अपने ही राज्य सरकार की नीतियों की आलोचना कर केंद्र सरकार की नीतियों की तारीफ कर दी है। यह तब किया है जब राज्य में खुद मनप्रीत सिंह बादल वित्त मंत्री है।...
image
न अचार है न मुरब्बा है, राहुल खाली डब्बा है
सबसे पहले तो उत्तर प्रदेश भाजपा को बधाई कि उसने राहुल गांधी का संघ ज्ञान बढ़ाने के लिए संघ विचारधारा को समझानेवाली पुस्तकों का सेट भेजा है. मध्य प्रदेश की तीन दिवसीय यात्रा में उन्होंने जिस प्रकार से संघ को सिमी के करीब ठहरा दिया उससे साबित होता है कि संघ विचारधारा के बारे में तो उन्हें तनिक भी अंदाज नहीं है, साथ ही यह भी आभास होता है कि वे राजनीतिक रूप से टीन और कनस्टर के ऐसे खाली डिब्बे हैं जो जैसे चाहे अपने हित के लिए इस्तेमाल कर सकता है. ...
image
कंगाल पड़े बंगाल में रा-हुल-रा-हुल
कांग्रेस के चिकने चुपड़े युवराज राहुल गाँधी को तीन दिन के बंगाल दौरे से वहां की उबड़-खाबड़ सियासी जमीन का अंदाज जरुर लग गया होगा. पार्क स्ट्रीट के रेस्तरां में मुर्ग मसल्लम उड़ाने से लेकर शांति निकेतन में नौजवान लड़कियों के रा-हुल रा-हुल नारों की मस्ती के बीच राहुल ने फुर्सत के क्षणों के लुत्फ़ जरूर उठाया, लेकिन बात जब सियासी जमीन पर कुछ कहने की आई तो ममता बनर्जी की पार्टी के साथ कांग्रेस के स्वाभिमान की बात उठा कर उन्होंने नयी मुसीबत मोल ले ली. राहुल गाँधी ने यहाँ कहा कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस तृणमूल के साथ हाथ जरूर मिलाएगी पर सर झुका कर नहीं. बंगाल में कांग्रेस के हाल से वाकिफ समझदार लोग सवाल कर रहे हैं कि यहाँ जब कांग्रेस ही नहीं बची है तो स्वाभिमान किसका?...
image
नेहरू से नौ कदम आगे निकलने की चाह
आम तौर पर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के बारे में टिप्पणी करने से बचने वाली कांग्रेस को उनका यह बयान रास नहीं आया कि मौजूदा सरकार सबसे ‘एकजुट‘ सरकारों में से एक है- यहां तक कि पंडित नेहरू के नेतृत्व वाली पहली सरकार से भी। डॉ. सिंह के इस बयान ने सबको चौंकाया क्योंकि कांग्रेस के भीतर से कोई नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू, स्व. इंदिरा गांधी या स्व. राजीव गांधी के बारे में अप्रत्यक्ष टिप्पणी भी करे तो वह एक बड़े जोखिम का काम है। लेकिन डॉ. सिंह बार-बार सिद्ध कर चुके हैं कि वे राजनीति के गुर आजमाने में निष्णात किसी खुर्राट नेता की तरह नहीं हैं। उन्होंने जो कहा वह उनकी सीधे-सादे और बेबाक इंसान की छवि के अनुरूप ही था।...
image
राजनीतिक एनकाउण्टर का बढ़ता खतरा
क्या देश में अब एनकाउण्टर के नाम पर राजनीतिक हत्याकाण्ड का दौर शुरू हो गया है? पिछले एक डेढ़ साल में हुई राजनीतिक हत्याओं पर नजर दौड़ाएं तो यह सवाल बिल्कुल ही बेकार नजर नहीं आता. अभी हाल में ही मध्य प्रदेश पुलिस ने भिंड युवक जिला कांग्रेस के पद पर कार्यरत अमजद खान को एनकाउण्टर में मार गिराया. जिस पर मध्य प्रदेश विधानसभा के उपनेता चौधरी राकेश सिंह और मध्य प्रदेश कांग्रेस उपाध्यक्ष डॉ. गोविन्द सिंह नें भिंड पुलिस के ऊपर आरोप लगाया है कि भिंड पुलिस नें 22 अगस्त को एक मुठभेड़ दिखाकर अमजद खान की हत्या कर दी।...
image
लालू-पासवान का मुख्यमंत्री हो मुसलमान!
बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है लेकिन उससे पहले पाटलिपुत्र के युद्ध में हर दल या मोर्चा-दूसरे मोर्चे की राजनीतिक जमीन अपने पक्ष में करने की कोशिश में जुटा है। राजनीति के इस खेल में कौन किस पर भारी पड़ेगा, इसकी कुंजी तो जनता जनार्दन के पास है। लेकिन उससे पहले नेता वोट की राजनीति को जात-पात, सामाजिक ध्रुवीकरण के इर्द-गिर्द केंद्रित करने की कोशिश में जुटे हैं। पिछले बिहार विधानसभा चुनाव में मात खाए लालू यादव और रामविलास पासवान ने राजनीतिक इच्छा व्यक्त की है कि राज्य में एक मुस्लिम उपमुख्यमंत्री हो?...
image
सात रेसकोर्स पर दस जनपथ का दावा
दस जनपथ से अगर आप सात रेसकोर्स पहुंचना चाहें तो बमुश्किल सात मिनट का समय लगता है. लेकिन इन दिनों कांग्रेस के शीर्ष पर शुरू हुए सत्ता संघर्ष ने लुटियंस जोन के इन दो सड़कों की दूरिया बढ़ा दी हैं. पिछले कुछ दिनों में कांग्रेस के अंदर कुछ वही राजनीति शुरू हो गई है जिसे किनारे लगाने की राजनीति कह सकते हैं। अक्सर जो किनारे लगाने की कांग्रेस स्टाइल है, उसी स्टाइल में काम की शुरूआत हुई है।...
image
सुप्रीम कोर्ट का सवाल और प्रधानमंत्री का मलाल
आखिरकार प्रधानमंत्री का दुख प्रकट हो ही गया. संपादकों के साथ बातचीत में उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट सरकार के काम काज के लिए नीति निर्धारण न करे. प्रधानमंत्री का यह दुख प्रशासन की उस चिंता से प्रकट होता है जो न्यायालयों के हस्तक्षेप से जुड़ा है. पहले भी कई मौकों पर न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच टकराव के मौके आये हैं. अनाज के सड़न के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से एक बार फिर वह सवाल उठ खड़ा हुआ है, जिस पर प्रधानमंत्री अपनी आपत्ति जाहिर कर रहे हैं....
image
राजनीतिक हिन्दुत्व पर दिग्गी का दांव
हिन्दुओं का ठेकेदार बनने की आरएसएस और उसके मातहत संगठनों की कोशिश को चुनौती मिल रही है. भगवान् राम के नाम पर राजनीति खेलकर सत्ता तक पंहुचने वाली बीजेपी के लिए और कोई तरकीब तलाशनी पड़ सकती है क्योंकि कांग्रेस की नयी लीडरशिप हिन्दू धर्म के प्रतीकों पर बीजेपी के एकाधिकार को मंज़ूर करने को तैयार नहीं है. कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने साफ़ कहा है कि हिन्दू धर्म पर किसी राजनीतिक पार्टी के एकाधिकार के सिद्धांत को वे बिल्कुल नहीं स्वीकार करते....
Next
Tags
No tags for this article
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम में प्रकाशित सामग्री पर हमारी ओर से कोई कापीराइट नहीं है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2