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राजनीति में सैटल होने की राजनीति

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गोपाल शाही उत्तर प्रदेश के देवरिया से हैं. दिल्ली आये थे राहुल गांधी के टैलेण्ट हण्ट में हिस्सा लेने. राहुल गांधी राजनीति में युवाओं की भागीदारी बढ़ाने के अपने देशव्यापी अभियान में काफी समय से इस तरह के टैलेण्ट हण्ट का सहारा ले रहे हैं. गोपाल शाही भी राहुल की अपील से प्रेरित होकर आ गये थे. कांग्रेस मुख्यालय में जब उनसे मुलाकात हुई तो उन्होंने अपना मकसद साफ किया. 'यदि हमें राजनीति में एक भी अवसर मिल गया तो उसके बाद हमें कुछ करने की जरूरत नहीं है। सब अपने आप सैटिल होता चला जाएगा।' उनके इस साफ मकसद से राजनीति में राहुल गांधी के युवाओं को शामिल करने के बारे में किसी भी का भी दिमाग साफ हो सकता है. रूपया, पैसा और पावर के सहारे राजनीति में सैटल होने आये राजनीति के ऐसे युवा कलाकार रंगमंच पर कैसा प्रदर्शन करेंगे इसकी झलक उनसे बात करके ही मिल जाती है.

गोपाल शाही जैसे नौजवान उस जमावड़े का हिस्सा हैं जो राहुल गांधी के टैलेण्ट हण्ट की पुकार से पैदा हो रहे हैं. कांग्रेस के युवराज एक बार फिर अपनी भावी टीम को तैयार करने के काम में जुट गए हैं। टैलेंट हण्ट के नाम से चलाए जाने वाले इस कार्यक्रम में राहुल युवाओं को कांग्रेस पार्टी में शामिल होने का अवसर दे रहे हैं और जहां जहां वह यह कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं, वहां युवाओं का एक अच्छा खासा जमावड़ा जुड़ रहा है। राजनीति एक ऐसा उद्योग हो गया है जिसकी एक बार शुरुआत भर होने से कई पीढ़ियां धन्य हो जाती हैं। राजनेता सत्ताधारी दल का हो या विपक्ष का उसके रुतबे, पैसे और पावर में कोई कमी नहीं आती। यही कारण है कि राहुल के टैलेंट हंट में पढ़ी-लिखी पीढ़ी के ऐसे नौजवान सामने आ रहे हैं जो पेशे से इंजीनियर और डॉक्टर जैसी डिग्रियां लिए हुए हैं और राजनीति में अपना भविष्य तलाश कर रहे हैं। ऐसे युवाओं के राजनीति में आने के निहितार्थ तो आसानी से समझे जा सकते हैं, लेकिन इसके फलितार्थ क्या गुल खिलाएंगे? 

राहुल गांधी जिस लक्ष्य और जमीनी राजनीति के लिए युवाओं की तलाश का कार्यक्रम चला रहे हैं, क्या इस मंच से उनके साथ जुड़ने वाले युवा उनका और उनकी पार्टी का सपना पूरा कर सकेंगे? आज जो लोग राहुल की टीम में स्थान पाने के लिए खूंटे तोड़ते दिख रहे हैं, वह विदेशी नामचीन स्कूलों और संस्थानों से शिक्षित और डिग्रियां हासिल किए हुए हैं, जिनकी आंखों में अमरीका की सिलिकॉन वैली या यूरोप के अन्य देशों अथवा आस्ट्रेलिया जैसे देशों में पैसा कमाने के सपने पल रहे हैं। नवउदारवादी व्यवस्था की देन उपभोगवादी संस्कृति में पले-बढ़े इन लोगों का न तो राजनीति से कोई वास्ता है, न ही राजनीतिक इतिहास और परंपरा से। किसी जनांदोलन में सहभागिता की बात तो बहुत बाद में आती है। वह यदि कांग्रेस के युवराज के साथ काम करने के लिए राजनीति को पेशे के तौर पर चुन रहे हैं, तो जाहिर है कि उसके पीछे कहीं न कहीं पैसा और पावर का लोभ जुड़ा है। इन युवाओं को लोकतंत्र, जनसरोकार, सामाजिक न्याय, सामाजिक विकास, जन सहभागिता, राजनीतिक एवं जनप्रतिबद्धता आदि जैसे शब्दों का राजनीति में क्या मतलब होता है यह भले न पता हो लेकिन ये लोग इस बात को बखूबी जान और समझ रहे हैं, कि वह जिसके साथ काम करने जा रहे हैं वह देश का भावी प्रधानमंत्री है।
राजनीति कोई टीवी पर चलनेवाला सारेगामा का नाच गाने का शो नहीं है जिसको टैलेण्ट हण्ट के जरिए पापुलर किया जाए. राजनीति जन सरोकारों से जुड़ी चरम अभिव्यक्ति है. राहुल गांधी के इस टैलेण्ट हण्ट प्रयोग से और कुछ हो न हो इतना जरूर होगा कि नैतिक शुचिता, भ्रष्टाचार, जनसरोकार आदि बातों का व्यावसायीकरण हो जाएगा. अभी तक जिन बातों के लिए राजनीतिक लोगों की आलोचना होती थी वही बातें और कर्म राजनीतिक व्यावसायिकता का हिस्सा हो जाएंगी.

पिछले दिनों कांग्रेस मुख्यालय में मेरी कुछ युवा कांग्रेस के नेताओं से मुलाकात हुई। करीब 22 से 30 साल की आयु के इन युवाओं से बातचीत में पता चला कि यह सभी राहुल की नई टीम का हिस्सा बनने के लिए यहां जोड़तोड़ के लिए आए हैं। इनमें से एक कानपुर के संदीप दूबे से जब मैंने राजनीति में आने का मकसद जानना चाहा तो उसने जवाब दिया कि ``मैं राजनीति में इसलिए आना चाहता हूं क्योंकि इसमें आज वह सभी कुछ है जो हमें चाहिए। पैसा पावर और क्षेत्र में दबदबा कायम करना है तो राजनीति से बेहतर और कोई विकल्प हो ही नहीं सकता।´´ यह लोग देश का नहीं अपना भला करने के लिए राजनीति को औजार के तौर पर आजमाना चाहते हैं। देवरिया से आये गोपाल शाही तो यहां तक कहते हैं कि ``यदि हम ऐसा करते हैं तो इसमें गलत क्या है? सभी अपने विकास के लिए किसी न किसी क्षेत्र को अपनाते हैं। हम यदि राजनीति को अपना रहे हैं तो क्या बुरा कर रहे हैं?´´
 
एक जमाना था जब राजनीति प्रिशक्षण की मांग करती थी और उसमें जनांदोलनों की तपती भट्ठी में पके युवा ही आगे चलकर राजनीति में अपना स्थान पक्का करते थे। जनांदोलन एक तरह के उनके लिए प्रशिक्षण शिविरों का काम किया करते थे। गांधी, नेहरू, गोखले, जेपी, लोहिया और यहां तक कि वर्तमान पीढ़ी के अधिकांश नेता किसी न किसी आंदोलन की उपज कहे जा सकते हैं। गांधी ने जब राजनीति में आने की इच्छा जताई थी तब गोखले ने उन्हें कहा था कि जाओ पहले भारत को समझो फिर राजनीति करने की सोचना। लेकिन समय के साथ समीकरण बदलते चले गए। आज जो युवा राजनीति में आ रहे हैं, उनकी मान्यताएं भी अलग हैं और सरोकार भी। लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीति सर्वोच्च तत्व हुआ करती है। लेकिन आज जो युवा राजनीति में पदापर्ण कर रहे हैं, उनका राजनीति से उतना ही वास्ता है कि वह इसे एक फलते फूलते उद्योग के तौर पर देख कर इसकी ओर लालायित हो रहे हैं।

हम राहुल की मंशा पर शक नहीं करते लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि आज जिन युवाओं को टैलेंट हंट के माध्यम से वह राजनीति में ला रहे हैं, क्या कल वह उनकी योग्यता के आधार पर उन्हें संसदीय व्यवस्था में आगे कर सकेंगे? क्या वह राजनीति को लेकर उनके माइंडसेट को बदल सकेंगे? क्या निर्वाचित क्षेत्रों के जातिगत समीकरण उनके हाथ बांधने का काम नहीं करेंगे? क्या आने वाले समय में राहुल युवाओं की बढ़ती इस फौज की रोजगार संबंधित आशाओं को पूर्ण करने का काम कर सकेंगे?

राहुल के टैलेंट हंट के दूसरे पहलू की ओर भी एक नजर डालना जरूरी है। एक तो यह कि वह राजनीति के लिए जो भावी जमात कर रहे हैं, उनमें अधिकांश बड़े घरानों के ही युवा हैं। ऐसे में क्या देश की ऐसी एक बड़ी जमात राजनीति से दूर नहीं हो जाएगी जिसकी संख्या दो तिहाई से भी अधिक बताई जा रही है। क्या इस वर्ग के युवा राजनीति से भले ही हम किसी एक दल की बात कर रहे हों, बेदखल नहीं रह जाएंगे। हालांकि बीते एक दो साल के दौरान राहुल ने ऐसे तबकों को छूने की कोशिश की है लेकिन वहां भी जो नए चेहरे सामने आ रहे हैं वह कोई नई आशा की किरण जगाते नहीं दिखते। राजनीति का आधे मैदान पर पहले ही राजनीतिक कुनबों के लाडलों ने अपना कब्जा जमा रखा है और अब कम से कम कांग्रेस के मामले में बाकी के आधे पर उन युवाओं की नजर है, जो यह भी ठीक से नहीं जानते कि भारत का निर्माण कैसे हुआ है।

यह कहना सही हो सकता है कि बड़ी संख्या में युवाओं की राजनीति में भागीदारी से भारतीय राजनीति में एक नए युग का सूत्रपात हुआ है। लेकिन इसके साथ साथ हमें यह भी देखना होगा कि राजनीति की कमान अपने हाथों में थामने को आतुर यह नौजवान पीढ़ी किन सरोकारों के साथ इस क्षेत्र में आगे आ रही है। इस देश का एक बड़ा हिस्सा आज भी खेती किसानी पर निर्भर करता है। और दूसरा, जिसकी संख्या करीब 80 करोड़ बताई जाती है, वह है जो 20 रुपए प्रतिदिन की आमदनी पर गुजर-बसर करने को अभिशप्त है। क्या राहुल की नई टीम में शामिल होने का ख्वाब देखने वाले युवाओं के पास इस तबके के ख्वाब पूरा करने की क्षमता है?

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R.kumar on 01 July, 2009 00:33;43
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Bilkul sahi farmaya aapne anil ji..jin yuvao'n ko na to samaj ke bare ma kuch pata hei na hi desh ke bare me..? na to ye yuva samajvad ke bare me kuch jante hei,na desh ke itihaas ko samjhte hei'n..log desh me kin halato'n me rah rahe hei ,iska bhi inhe kuch pata nahi ..or eise yuvao'n ko desh ka bhavishya kaha ja raha hei..yahi to is desh ki vidambana hei..?..?..
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amit sharma on 01 July, 2009 02:40;03
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anil ji apne thik likha hai. assal main ye yuva rajniti ke jariye desh ke liye nahian apne liye kam chahte hain
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ashish sharma on 13 October, 2009 14:39;08
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Anil ji aapne itna sab kuch likh diya telent hunt ke baare main. lekin main kehta hun ki Rahul Gandhi ne kam se kam kuch karne ke liye kadam toh uthaya.varna aap dekho sab kya kar rahe hain.bas jesa chal raha hai sab usi main khush hain.aur koi kuch karta hai toh hum uski aalochna karlete hain. lekin hum kuch nahi karte. aap bataiye aapne aalochna main itna bada lekh likha hai lekin iske liye koi hul bataya? hum sab kudh ko theek kar le toh baki sab toh apne aap theek ho jaayega.rahi baat yuvao ki raajneeti main toh mujhe baatao ki abhi kon sa neta hai jisne desh ke liye kuch kiya hai. kam se kam hum yuvao se ye apeksha toh kar sakte hain ki vo inse behtar pradarshan hi karenge.
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