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'मुझे धक्के मारकर भगाओ, तब जाऊंगा'

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अमर सिंह अड़ गये हैं. कह रहे हैं कि पार्टी नहीं छोड़ेंगे. रविवार को मुलायम सिंह यादव से बात हुई तो अपनी नाराजगी दिखाई. कहा सैफई नहीं आऊंगा नेताजी. इन्कार से ज्यादा इसमें मनुहार की तमन्ना थी. लेकिन नेताजी ने भी ज्यादा जोर नहीं डाला. उल्टे सोमवार को बयान दे दिया कि अमर सिंह इतिहास हो गये हैं.

लेकिन अमर सिंह हैं कि इतिहास होने के लिए तैयार नहीं हैं. सोमवार को एक प्रेस कांफ्रेस करके उन्होंने कहा कि वे सपा से बाहर नहीं जाएंगे. इसके लिए क्या करना होगा? अमर सिंह कहते हैं कि धक्के मारकर मुझे बाहर कर दो, मैं चला जाऊंगा. असल में अमर सिंह को उम्मीद नहीं थी कि नेताजी उनका इस्तीफा स्वीकार कर लेंगे. इसलिए बहकी बहकी बातें कर रहे थें. लेकिन जब मुलायम सिंह ने उनका इस्तीफा स्वीकार ही कर लिया तो अमर सिंह के पैरों तले जमीन खिसक जाना स्वाभाविक है. इसलिए रविवार और सोमवार को अमर सिंह की सक्रियता कई स्तरों पर रही.

अमर सिंह के हवाले से कई अखबारों ने खबर प्रकाशित की कि वे कोई ठाकुरों का राजनीतिक दल बनाने की सोच रहे हैं. ऐसे ही एक अखबार मिड-डे का कहना है कि वे अपनी नयी पार्टी की घोषणा 27 जनवरी को अपने जन्मदिन के मौके पर कर सकते हैं. अमर सिंह के दबाव की यह राजनीति काम करेगी इसमें थोड़ा संदेह है. अमर सिंह ने सोमवार को अपनी प्रेस कांफ्रेस में इतना तो स्वीकार किया कि वे समाजवादियों से मेल जोल बढ़ाएंगे. इसमें उन्होंने रघु ठाकुर का नाम लिया जो पहले से ही एक झोलानुमा पार्टी चलाते हैं. किसी दौर के कट्टर समाजवादी नेता रहे रघु ठाकुर मुफलिसी के दिन काट रहे हैं. वे सक्रिय हैं लेकिन उनकी सक्रियता किसी काम की नहीं है. ऐसे में अगर उन्हें अमर सिंह का साथ और पैसा मिल जाता है तो इतना तो जरूर होगा कि उत्तर प्रदेश में वे उपस्थिति दिखाने के लिए कुछ वकत हासिल कर लेंगे. लेकिन अगर रघु ठाकुर अमर सिंह के साथ मिलकर समाजवाद को मजबूत करने की कोशिश करते हैं तो उनकी रही सही प्रतिष्ठा भी ध्वस्त हो जाएगी. ऐसे में शायद ही रघु ठाकुर अमर सिंह के करीब जाने की कोशिश करें.

अमर सिंह अलग से कोई राजनीतिक दल बनाएंगे या नहीं इस बात का कोई बहुत मतलब नहीं है. अमर सिंह स्वभाव से जोंक हैं. वे बने बनाये दल से चिपककर मुनाफा वसूली तो कर सकते हैं लेकिन वे कोई राजनीतिक दल बनाएंगे और उस राजनीतिक दल को जन समर्थन भी मिल जाएगा इसे सोच पाना थोड़ा मुश्किल है. जिस दिन ऐसा संभव हो गया उस दिन मानना होगा कि भारतीय मानस पूरी तरह से असंतुलित हो गया है. कांग्रेस में अमर सिंह के लिए सीधे कोई स्थान है नहीं. कांग्रेस जानती है कि अमर सिंह का उपयोग तो किया जा सकता है लेकिन उनको अपना परिचय नहीं दिया जा सकता. परमाणु समझौते के मसले पर अमर सिंह कांग्रेस के खूब काम आये लेकिन जैसे ही दूसरी बार कांग्रेस थोड़ा मजबूत होकर सत्ता में वापस लौटी उसने सबसे पहले अमर सिंह को ही अलविदा कहा. कहते हैं इस बीच अमर सिंह ने सोनिया गांधी से मिलने की कोशिश की है लेकिन अभी तक वे शायद सफल नहीं हो पाये हैं. वैसे तो भाजपा में भी अमर सिंह के शुभचिंतक हैं लेकिन भाजपा सपने में भी अमर सिंह को अपने पास नहीं फटकने देगी. 

अमर सिंह भी इस बात को जानते हैं. इसलिए वे अब कह रहे हैं कि न तो सपा से बाहर जाएंगे और न ही नेताजी के खिलाफ कुछ बोलेंगे. फिर वे क्या करेंगे? अमर सिंह कह रहे हैं कि वे मुलायमवादी होने की बजाय समाजवादी होना पसंद करेंगे. अमर सिंह के भाई बंधु कह रहे हैं कि अमर सिंह का राजनीतिक कद उतना ऊंचा है कि वे किसी राजनीतिक दल में फिट ही नहीं हो सकते. इसलिए सिवा पार्टी बना लेने के और कोई रास्ता नहीं बचता है. वैसे भी नेताजी कह रहे हैं कि अतीत की ओर क्यों देखते हैं? हमेशा आगे की ओर देखना चाहिए. अमर सिंह ने यह सुना तभी शायद उन्हें याद आया कि वे अभी पार्टी में बतौर सदस्य मौजूद हैं. इसलिए एक समाजवादी की तरह धक्के खाकर बाहर जाने की बात शुरू कर दी.

अमर सिंह धक्के खायें, सपा में रहें या सपा से बाहर जाएं, इससे कुछ खास फर्क नहीं पड़ता. दिल्ली की राजनीतिक गलियों में यह चर्चा तेज है कि अमर सिंह समाजवादी पार्टी में जिस काम के लिए प्लांट किये गये थे वह उन्होंने कर दिया. सपा से कल्याण सिंह को जोड़कर उन्होने सपा से जो मुस्लिम मतों का बिखराव किया है वह शायद ही दोबारा लौटे. अब उत्तर प्रदेश में इसी मुस्लिम मत के सहारे कांग्रेस दोबारा अस्तित्व में लौटने के सपने देख रही है. हो सकता है उत्तर प्रदेश में आगामी चुनाव बजया सपा बसपा के बसपा और कांग्रेस के बीच लड़ा जाए. मुलायम सिंह की चिंता भी यही है. इसलिए कल्याण के साथ भाईचारा पीछे छोड़ वे अपना राजनीतिक वजूद बचाने में लग गये हैं. हालांकि अमर सिंह का दोषारोपण है कि सपा में कल्याण सिंह को लानेवाले वे नहीं बल्कि खुद नेताजी हैं. जो भी हो, अमर सिंह ने अपना काम कर दिया है. ऐसा लगता नहीं कि उन्हें धक्का मारने की जरूरत है. जब नेताजी उन्हें अतीत कह रहे हैं तो धक्का मारने के लिए अपना समय और बल कौन जाया करेगा?

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marwah t k on 19 January, 2010 13:07;31
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कहावत हे की भेड़िया आया और सचमुच मैं भेड़िया आ ही गया ,अब भाई जी का हाल ये हो गया , दोनों दीन से गए पान्डे हलुआ मिला ना मांडे,बेचारे कोई हमदम ना रहा कोई सहारा ना रहा हम किसी के ना रहे कोई हमारा ना रहा सिवा जया................के
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Ajit on 19 January, 2010 15:23;53
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Sanjay tiwari ji, likhna achchi baat hai, lekin jis tarah se aap jaise kuchh congress ke ….likhte hai use mujhe aschary hota hai ki ya to aap naye samachar patr padhte nahi ya padhkar use vishleshit nahi karte…
Mai aapse poochhna chahunga ki aapke is line ka adhar kripaya bataye ki « Uttar Pradesh ka agami chunav BSP aur Congress ke beech hoga » Bhaijaan shayad aapne abhi bita huaa Vidhan Pasihad chunaav ya Vidhan sabha upchunaav ke nateeje nahi dekhe…Vidhan Parishd me 27 se jyada jagaho par SP no. 2 par rahi aur congres ko awwal to pratayashi nahi mile aur kai pratayashiyo ko unke prastavako tak ke vote nahi mile kamobesh yahi haal upchunaav me bhi raha.Kendriy mantri tak apne ghar walo aur chaheto ko nahi jita paye, is tathy ke baavjood ki kendr me aaj wo satta me hai..

Central me bhale hi unnhe SP ke saath Galat fahmi aur BJP ki kamjori ka fayda mila lekin Vidhan sabha me sirf aapjaise kalam ke saudagaro (Sipahi nahi) ka hi sahyog milega..
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sanjay Tiwari on 19 January, 2010 15:31;13
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विधान परिषद वाली जानकारी देने के लिए शुक्रिया.
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Samar Singh on 21 January, 2010 03:54;45
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बड़े बेशरम निकले अमरसिंह!! बताओ अब किस पार्टी की वाट लगानी है?? अब तो बस आपके लिए एक ही रास्ता बचा है. क्यों ना ठाकुरों की एक पार्टी बना ली जाए और ठाकुर-मुस्लिम जैसा कोई नया समीकरण बनाया जाए. और उत्तरप्रदेश में जात-पांत कि ऐसी आग लगाई जाए कि अपनी कुर्सी पक्की हो जाए. सेकुलर भडवो की जय हो!!
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sanjay on 01 May, 2010 22:16;47
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amar singh ka ipl se bhi rista juura hai
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