नहीं मिलेगी जमीन, आमीन!
ट्रांसपेरेसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट आ गयी है. अगर आप उस नक्शे को देखें जिसमें भारत के भ्रष्टतम राज्यों को चिन्हित किया गया है तो सबसे ऊपर कश्मीर आता है.
ये हालात तब हैं जब राज्य में चरमपंथियों की हितैषी होने का दावा करनेवाली पीडीपी और कांग्रेस ने सरकार में साढ़े चार साल पूरे कर लिये हैं. ट्रांसपेरेसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट जिन 11 आधारों पर बनायी गयी है उन सबके मामले में कश्मीर में हालात खतरे के स्तर तक पहुंचे हुए हैं. पुलिस, जमीन के रिकार्ड, पानी, जंगल, बिजली, स्वास्थ्य, जन वितरण प्रणाली, बिजली, ग्रामीण रोजगार गारंटी और दसवीं तक की शिक्षा में भ्रष्टाचार चरम पर है. जिस राज्य में जमीन के रिकार्ड रखने और जंगल के बारे में भ्रष्टाचार चरम पर हो वहां अमरनाथ यात्रियों की सुविधा के लिए दी जा रही 40 हेक्टेयर जमीन पर विवाद हो जाए तो बात व्यावहारिक राजनीति की ओर मुड़ जाती है.
और हकीकत भी यही है. अमरनाथ श्राईन बोर्ड को यह जमीन 2000 में दी गयी थी. राज्य विधानसभा ने एक कानून बनाकर जिस अमरनाथ श्राईन बोर्ड का गठन किया था यह जमीन उसे दी गयी थी. बालटाल में इस जमीन पर अमरनाथ यात्रियों के लिए अस्थाई सुविधा परिसर का निर्माण होना था. तब न तो किसी प्रकार के पर्यावरण नुकसान की बात उठायी गयी और अचानक पर्यावरणवादियों से अट पड़े श्रीनगर में किसी ने इस बारे में चर्चा करना भी उचित नहीं समझा. आठ साल बीत गये. इसी दौरान जनरल एस के सिन्हा राज्य के राज्यपाल बनकर आये. अमरनाथ यात्रा महीनेभर की होती थी. सिन्हा ने इसकी अवधि बढ़ाकर दो महीने कर दी. क्योंकि राज्यपाल ही तकनीकि रूप से श्राईन बोर्ड का अध्यक्ष होता है इसलिए सिवाय टकराव के मुफ्ती मोहम्मद सईद कुछ कर नहीं सकते थे. मुफ्ती का सवाल जायज था. तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद का कहना था कि दो हफ्ते से लेकर एक महीना के बीच चलनेवाली यात्रा को ही संभालना राज्य सरकार के लिए मुश्किल होता है फिर ऐसे में दो महीने की यात्रा का प्रावधान सुरक्षा के लिहाज से ठीक नहीं होगा. सिन्हा ने उस समय यह कहकर बात टाल दी कि वे राज्य के राज्यपाल हैं और वे विधानसभा के प्रति नहीं बल्कि संविधान और राष्ट्रपति के प्रति जवाबदेह हैं.
इतना तो पक्का है कि अब श्राईन बोर्ड को जमीन किसी कीमत पर नहीं मिलेगी. अमरनाथ यात्री तो अब भी अपने से यात्रा करेंगे ही. न कल उन्हें किसी सरकार की दरकार थी और न आज है.लेकिन 40 हेक्टेयर जमीन की इस छीनाझपटी ने कई राजनीतिक पार्टियों को नई जमीन दे दी है. उधर पीडीपी को नयी जमीन मिल गयी. इधर भाजपा को नयी जमीन मिल गयी. राज्य में पीडीपी जमीन वापसी के इस मुद्दे को भुनाएगी तो केन्द्र में भाजपा इसे राष्ट्रीय मुद्दा बनाएगी. भगवान के भक्तों की जमीन भले ही छिन गयी हो लेकिन राजनीतिक दलों के लिए नयी जमीन तैयार हो गयी.लेकिन घाटी के लोग मानते हैं कि सिन्हा ने श्राईन बोर्ड के कामकाज में गड़बड़ियां की और अपनी मनमानी चलाते थे. यह कहना मुश्किल है कि सिन्हा मनमानी करते थे या नहीं लेकिन अमरनाथ यात्रा के प्रति उनकी निजी अभिरूचि थी यह तो साफ दिखता था. उन्होंने एक बार अमरनाथ विकास प्राधिकरण बनाने की बात भी की थी और बालटाल में जिस अस्थाई निर्माण को लेकर विवाद खड़ा हुआ है उसमें कश्मीरियों की मुख्य आशंका यह है कि श्राईन बोर्ड कश्मीर में गैर-कश्मीरी पंडित हिन्दुओं को बसाने का दुष्चक्र रच रही है. कल तक यह बात दबी जबान में होती थी लेकिन अमरनाथ यात्रा शुरू होते ही यह दबी जबान मुखर आंदोलन में बदल गयी और अमरनाथ श्राईन बोर्ड को दी गयी जमीन के बहाने राजनीतिक जमीन पर चौसर की गोटियां फेटी जाने लगी.
राज्य के उपमुख्यमंत्री और पीडीपी नेता मुजफ्फर बेग जमीन दिये जाने के समर्थक रहे हैं. लेकिन अचानक ही उन्हें अमरनाथ यात्रियों के बननेवाले सुविधा केन्द्र में पर्यावरण का भारी नुकसान नजर आने लगा. जब उन्हें याद दिलाया गया कि आप तो खुद यह जमीन दिये जाने के समर्थक रहे हैं तो उन्होंने जवाब दिया कि "कुछ हिन्दु नेताओं ने उनके ऊपर दबाव डाला था" इसलिए उन्होंने उस समय श्राईन बोर्ड को जमीन देने का समर्थन किया था. उनका कहना था कि अगर वे ऐसा नहीं करते तो हिन्दू नेता मुगल मार्ग परियोजना में रोड़ा अटका सकते थे. बेग की इस ईमानदार चिंता का एक पहलू यह भी है कि उन्हें अमरनाथ श्राईनबोर्ड के बारे में ये तथ्य तब याद आ रहे हैं जब चुनाव सिर पर हैं और 28 जून को मय दल-बल वे सरकार से बाहर हो गये. पीडीपी के लिए यह जरूरी था क्योंकि अगर वे ऐसा नहीं करते तो उनकी राजनीतिक जमीन खिसकने का पूरा अंदेशा था.
सरकार में पीडीपी के बाहर हो जाने से वह आनेवाले चुनावों में विपक्षी की हैसियत से उतरेगी. एक बार फिर धार्मिक उन्माद और कट्टरता को पीडीपी ने हवा दे दिया और ऐसे मामले को अपना समर्थन दे दिया जिसके लिए कुछ हद तक वह खुद जिम्मेदार है. जिस बालटाल में जमीन दिये जाने का विरोध हो रहा है वह अमरनाथ यात्रियों का बेस कैंप है. अभी यह सब टेंटों और तंबुओं के भरोसे संचालित होता है. हो सकता है सिन्हा की मंशा रही हो कि यात्रियों के लिए एक अस्थाई इंतजाम यहां होना चाहिए, जिसमें कोई हर्ज भी नहीं था. लेकिन कश्मीर में उग्र प्रदर्शन चल रहे हैं वे न तो पर्यावरण प्रेम के कारण हैं और न ही हिन्दूओं को जमीन देने का विरोध है. अलगाववादियों ने इस मुद्दे को लपकना चाहा तो पीडीपी को अच्छा मौका नजर आया. पीडीपी ने वही किया है जो एक चतुर राजनीति दल को करना चाहिए था. अब गुलाम नबी आजाद जो कोशिशें कर रहे हैं वह क्षतिपूर्ति से ज्यादा कुछ नहीं है.
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PDP ne jo kuch kiya mujhe nahi lagta ki usne kuch alag kiya hai. vartmaan me political partiyon dwara ki ja rahi politics ko dekhte hue muhe PDP ke is nirnay par jyada ascharya nahi hua. ab hum in cheejon ke aadi ho gaye hain,
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